धर्मनिरपेक्षता और भारतीय ग्रंथ

धर्मनिरपेक्षता और भारतीय ग्रंथ

धर्मनिरपेक्षता संविधान में चाहे जैसे भी लिखा गया हो जब तक लिखा है तब तक तो मान्यताप्राप्त है और भाजपा सरकार भी इसे हटाने के प्रयास करेगी ऐसा रुख कहीं से नहीं दिखता है। किन्तु इतना तो अवश्य ही किया जा सकता है कि सेकुलरिज्म का अर्थ धर्मनिरपेक्षता नहीं है पंथनिरपेक्षता है यह बताया जाय और आधिकारिक रूप से बताया जाय। यहां हम इस विषय के साथ-साथ भारतीय ग्रंथों के हो रहे अपमान को भी समझने का प्रयास करेंगे।

जैसा कि विभिन्न बहसों में चर्चा की जाती है उसमें इतना ही समझ आता है कि सेकुलरिज्म शब्द जो संविधान में लिखा गया वो भी षड्यंत्रपूर्वक और उसका अर्थ जो धर्मनिरपेक्षता बताया जाता है वो भी षड्यंत्र है। एवं सेकुलरिज्म की व्याख्या जो भी हो, कितनी भी सुंदर व्याख्या की जाये किन्तु इसका जो स्वरूप दिखता है वो बड़ा ही भयावह और निंदनीय है।

धर्मनिरपेक्षता क्या है

निरपेक्षता का तात्पर्य होता है कई पक्ष हों और उनमें से किसी भी पक्ष नहीं लेना, किसी के प्रति भी आकृष्ट न होना, तटस्थ रहना इत्यादि। किन्तु यदि एक ही पक्ष हो तो इसका अर्थ हो जाता है उसकी अपेक्षा न करना, तथापि अपेक्षा न करने से तात्पर्य उपेक्षा करना भी नहीं होता है मात्र अपेक्षा का त्याग होना ही निरपेक्षता होता है।

यदि अनेक धर्म होता तो अर्थ होता किसी भी धर्म का पक्षधर न होना। किन्तु धर्म चूँकि एक ही है अर्थात सत्य सनातन ही धर्म है एवं अन्य स्वघोषित धर्म की वास्तविकता यह है कि वो धर्म न होकर पंथ हैं। अर्थात धर्म यदि एक ही है तो धर्मनिरपेक्षता का तात्पर्य होता है उसकी अपेक्षा न करना, उसका त्याग करना, उसके अपेक्षाओं की अनदेखी करना इत्यादि। इस प्रकार सेकुलरिज्म का जो अर्थ बताया जाता है वो भी भ्रामक है और एक षड्यंत्र है।

पंथनिरपेक्षता क्या है

सेकुलरिज्म का वास्तविक तात्पर्य पंथ निरपेक्षता है। कहा गया है “महाजनो येन गतः स पन्थाः” – महाजन (महापुरुष) द्वारा जो मार्ग दिखाया गया हो वो पंथ है। यद्यपि महाजन के ऊपर विचार करने लगें तो पंथनिरपेक्षता भी भ्रामक ही प्रतीत होगा क्योंकि महापुरुष का भी जो तात्पर्य लिया जाता है महाजन का वो अर्थ नहीं होता है। तथापि यदि सेकुलरिज्म का तात्पर्य धर्मनिरपेक्षता होना अस्वीकार किया जाय तो न्यूनतम पंथनिरपेक्षता स्वीकार करनी ही चाहिये।

संप्रदाय पद का जो प्रयोग किया जाता है वो वास्तव में पंथ के लिये ही होता है, जैसे वैष्णव संप्रदाय। अर्थात पंथ, संप्रदाय वास्तव में सीमित रूप से धर्म के कुछ भाग को ग्रहण करना होता है, जो विशेष पुरुष, महापुरुष, महाजन द्वारा बताया गया हो। इसका उद्देश्य भी आत्मकल्याण से पृथक नहीं होता है अपितु भटकते रहने की अपेक्षा सार ग्रहण करके उसका पालन करते रहना चाहिये यह होता है।

जैसे कोई व्यक्ति ऐसा भी हो सकता है जो 10 वर्ष भगवान सूर्य की उपासना करता रहे फिर उसे दुर्गा की महिमा पढ़ने को मिले और वह सूर्य की उपासना से विचलित होकर दुर्गा की उपासना करने लगे, इसी प्रकार पुनः गणपति, विष्णु, शिव आदि की उपासना करे किन्तु कहीं भी टिक न पाये। इस श्रेणी का व्यक्ति आजीवन भटकता ही रह जायेगा, आत्मकल्याण न कर पायेगा। तो महापुरुषों ने इनके लिये एक मार्ग पर टिके रहने के लिये विशेष व्यवस्था किया जिससे वो भटकता न रहे और उसे पंथ, संप्रदाय आदि सम्बोधित किया जाता है।

इस प्रकार पंथ का अर्थ भी धर्म के सीमित उपासना पद्धति अथवा एकाकी उपासना पद्धति पर स्थिर होना है। और इस प्रकार से पंथ के वास्तविक अर्थ में भी वो नहीं आयेंगे जो स्वघोषित धर्म हैं अथवा पंथ भी कह दिया जाता है। तथापि जिस प्रकार से बौद्ध, जैन आदि पंथ, संप्रदाय कहे जाते हैं उसी प्रकार से अन्य स्वघोषित धर्मों को भी जिसका भारत से संबंध भी नहीं है आयातित है अर्थात विदेश में उत्पत्ति हुयी है उस उपासना पद्धति को भी पंथ की मान्यता प्रदान की जाती है।

अब यह स्पष्ट होता है कि धर्मनिरपेक्षता कहकर जिसे धर्म कहा जाता है वास्तव में वो आयातित विदेशी पद्धति है और पंथ संज्ञक होने में भी समर्थ तो नहीं है किन्तु मान्यता प्राप्त पंथ कहा जा सकता है और ऐसा इसलिये क्योंकि विद्वद्जन मान्यता प्रदान करते हैं।

अब सेकुलरिज्म का अर्थ इन पंथों में भेदभाव न करना, समदृष्टि रखना आदि हो सकता है। यह वास्तव में राजनीतिक विचार ही है और राज व्यवस्था में किसी भी पंथ या मान्यता प्राप्त पंथों में भी कोई भेदभाव न किया जाय, सेकुलरिज्म का यह तात्पर्य होता है। इसका अर्थ यह भी होता है कि एक कानून हो जो सबके ऊपर समान रूप से प्रभावी हो, जैसे एक लाभकारी योजना का लाभ सभी समान रूप से प्राप्त करते हैं। तथापि कानूनी रूप से देखा जाये तो ७ दशकों से भेद-भाव होता रहा है और वर्त्तमान में एक देश एक कानून चर्चित है।

सेकुलरिज्म का घिनौना रूप सेखुलरिज्म

हम जब बीते ७ दशकों की ओर देखते हैं तो हमें इस सेकुलरिज्म जिसे बहुत ही सुंदर व्यवस्था सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है उसका विकृत और घिनौना रूप दिखता है। इस सेकुलरिज्म के जो प्रतीक-प्रवाहक-पुरोधा बनते रहे हैं उनके सार्वजानिक व्यवहार को देखें तो यही दिखता है कि उन्होंने कभी भी सार्वजनिक जीवन में अपने धर्म का पालन नहीं किया अर्थात त्याग कर दिया किन्तु तुष्टिकरण की एक विशेष नीति बनाकर सत्तासुख के लिये इफ्तार आदि का प्रदर्शन किया।

कभी मजारों पर चादर चढ़ाया भले ही नाम में राम, कृष्ण, शंकर आदि क्यों न लगा हो। विशेष टोपी पहने दिखते रहे लेकिन कभी भी तिलक-शिखा आदि धारण किये न दिखे। तिलक-शिखा आदि सबका परित्याग करने का तात्पर्य इन्होंने राजनीति को, सत्तासुख को धर्म से, आत्मकल्याण से ऊपर रखा।

वर्त्तमान में एक दशक से थोड़ा हृदय परिवर्तन हुआ है और उसका कारण है शनैः शनैः इनका घृणित चेहरा मतदाताओं के समक्ष प्रकट होना, मतदाताओं का इनसे मोह भंग होना। मतदाताओं का मोहभंग होने के कारण इनके सेखुलरों को ऐसा लगा कि छलना आवश्यक है तो छलने के उद्देश्य से अब वो लोग भी कभी तिलक लगाने लगे कभी मंदिर जाने लगे तो कभी आरती करने लगे और ये प्रदर्शन मात्र है, छलावा मात्र है सोच वही है।

इन्हें सेकुलर न कहकर सेखुलर कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। सेकुलरिज्म की जो व्याख्या की जाती है उस स्वरूप में यह कभी दिखा ही नहीं इसका जो स्वरूप कई दशकों में देखने को मिला है उसे सेखुलरिज्म ही कहा जा सकता है और कुछ नेता इनके लिये सेखुलर शब्द का प्रयोग भी करते हैं।

सेकुलरिज्म के वास्तविक स्वरूप को यदि एक उदाहरण से समझने का प्रयास करें तो सरलता से समझा जा सकता है :

अपनी मां तो मां होती ही है किन्तु औरों की मां का भी अपनी मां की तरह ही सम्मान करना चाहिये। भले ही कोई स्त्री आपकी अपनी मां न हो किन्तु आप उसका भी अपमान न करें और उसे भी अपनी मां के समान सम्मान दें, आदर करें। किन्तु “मां के समान का तात्पर्य” इनमें से कोई नहीं हो सकता है :

  • जिसे मां के समान आदर दें, सम्मान करें; आपके पिता उसे पत्नी कहने लगें।
  • जिसे मां के समान सम्मान-आदर दे रहे हैं उसे घर ले आयें, देखभाल भी करें, पैर दबायें।
  • जहां अपनी मां की आवश्यकता हो वहां भी उन सबको बुलायें जिसे मां के समान सम्मान-आदर देते हैं।

किन्तु ये शाब्दिक व्याख्या का विषय है, सेखुलरिज्म के विकृत स्वरूप में; जो कई दशकों से राजनीतिक आचरण में दिख रहा है; यदि इस उदाहरण को ढालने का प्रयास करें तो वो कुछ इस प्रकार होगा :

  • एक ऐसी स्त्री जो आपकी मां से द्रोह करती है, द्वेष रखती है उसे आप अपनी मां के समान सम्मान-आदर देते हैं,
  • वो स्त्री आपसे कहती है कि तुम मेरा सम्मान नहीं करते हो तो आप पूछते हैं कि ऐसा क्या करूँ जिससे आपको विश्वास हो कि मैं आपका सम्मान करता हूँ इस पर वो कहे कि तुम अपनी मां की देखभाल करना बंद करो मेरी देखभाल करो, और आप ऐसा ही करने लगे।
  • फिर कुछ दिनों बाद वही स्त्री आपसे कहे कि तुम मेरा सम्मान नहीं करते हो, आप पूछें कि आगे क्या करूँ तो वो कहे कि अपनी मां को गाली दो और आप ऐसा करने लगें।

सेकुलरिज्म का जो स्वरूप इसके कर्णधारों ने ७ दशकों में प्रस्तुत किया है वो कुछ इसी प्रकार का है :

  • इनसे कहा गया : अपने धार्मिक चिह्नों का परित्याग करो इन्होंने परिधान-तिलक-शिखा आदि का परित्याग कर दिया।
  • इनसे कहा गया : टोपी पहनना, फीता काटना, कैंडल जलाना आरंभ करो इन्होंने कर दिया।
  • इनसे कहा गया : मंदिर जाना, तीर्थ जाना बंद करो और इन्होंने बंद कर दिया।
  • इनसे कहा गया : इफ्तार दो और ये देने लगे।
  • इनसे कहा गया : मनुस्मृति जलाओ ये जलाने लगे।
  • इनसे कहा गया : रामायण पर विवाद करो और ये करने लगे।
  • इनसे कहा गया : अंग्रेजी (विदेशी भाषा) को पूरे भारत प्रचलित करो इन्होंने किया।
  • इनसे कहा गया : हिन्दी (भारतीय भाषा) पर विवाद करो ये करने लगे।
  • इनसे कहा गया : संस्कृत (भारतीय भाषा) के प्रचलन को रोको और इन्होंने भरपूर प्रयास किया। वो कर्मकांड है जिसने संस्कृत हो जीवंत बनाये रखा है।
  • इनसे कहा गया : भगवा को, सनातन को गाली दो और ये गाली देने लगे।
  • इनसे कहा गया : पत्थरबाजों, आतंकवादियों का संरक्षण करो, पोषण करो और ये करने लगे।

कितने गिनायें अनगिनत घृणित-निंदनीय दुराचरण किये हैं। लेकिन यदि आप भी इस विषय में कुछ कहना चाहें तो टिपण्णी करके अवश्य बतायें।

  • जब नया प्रधानमंत्री गंगा जाता है तो वह सांप्रदायिक है किन्तु जब इफ्तार देते थे तब साम्प्रदायिकता नहीं होती थी,
  • जब CJI गणेश आरती करते हैं और प्रधानमंत्री को बुलाते हैं, राममंदिर का प्रधानमंत्री शिलान्यास करते हैं तब वो सांप्रदायिक हो जाते हैं,
  • किन्तु उन्हें सांप्रदायिक कहने वाले जब टोपी पहनते थे, हज-सब्सिडी देने लगे, हज-हॉउस बनाते थे, चादर इफ्तार प्रदर्शन करते थे, वक्फ बना दिये तब सांप्रदायिक नहीं थे, कैंडल जलाते थे, फीता काटते थे तब सेकुलर थे।
  • नहीं जी तब ये सेकुलर नहीं सेखुलर थे।

कहां तक गिनायें, कितना बतायें सेकुलरिज्म के नाम पर जो दशकों से षड्यंत्र रचा गया है उसके काले कारनामों की बहुत बड़ी लिस्ट है और इसमें से ज्वलंत उदाहरण है वेद, स्मृति, पुराण, रामायण, महाभारत आदि का सांप्रदायिक ग्रन्थ हो जाना।

भारतीय ग्रंथ

  • जब हम भारतीय ग्रंथों की बात करें तो क्या-क्या होंगे ?
  • क्या उसमें कुरान, बाइबल आदि हो सकता है ?

कदापि नहीं हो सकते; कुरान, बाइबल आदि सभी विदेश किताब या बुक हैं, इन्हें किसी प्रकार से भारतीय ग्रन्थ नहीं कहा जा सकता । भारतीय ग्रन्थ वेद, स्मृति, पुराण, रामायण, महाभारत आदि ही भारतीय ग्रन्थ हैं, इन्हें किसी प्रकार से विदेशी ग्रन्थ, आयातित ग्रन्थ नहीं कहा जा सकता है।

अब मां और उस स्त्री जिसे मां के समान सम्मान देना चाहिये वाले उदाहरण पर इसे समझने का प्रयास करते हैं :

इस उदाहरण के अनुसार हमारे ग्रन्थ वेद, स्मृति, पुराण, रामायण, महाभारत आदि हैं किन्तु हम कुरान, बाइबल आदि का भी इनके समान ही सम्मान करेंगे। ये सेकुलरिज्म की आदर्श स्थिति है।

किन्तु सेकुलरिज्म का जो व्यावहारिक स्वरूप है उसमें क्या देखा जाता है; जिसमें मां से द्रोह-द्वेष करने वाली वो स्त्री वाला उदाहरण सटीक बैठता है जिसमें अपनी उस स्त्री की तो सेवा करने लगे किन्तु अपनी मां को गाली देने लगे, दुत्कारने लगे।

ये सेकुलर के कर्णधारों ने कुरान, बाइबल आदि का सम्मान किया ये आदर्श स्थिति थी, यहां तक सेकुलरिज्म स्वीकार किया जा सकता है, यही होना चाहिये। हम विदेशी किताबों, बुक का भी अपमान, तिरस्कार नहीं करेंगे ये आदर्श स्थिति है। किन्तु यदि उसमें आस्था रखने वाला यह कहे कि अपने ग्रंथों (अपनी मां) को गाली दो, दुत्कारो, जलाओ तब मेरा सम्मान होगा तो ये विकृत स्वरूप हो जाता है, षड्यंत्र हो जाता है और उसे सेकुलरिज्म नहीं सेखुलरिज्म ही कहा जा सकता है। और दुर्भाग्य यह है कि सेकुलरिज्म के कर्णधार सेखुलर बनकर ऐसा भी करने लगे।

भारतीय ग्रंथों जो अपना ग्रन्थ है अपनी मां है को जलाने लगे, फाड़ने लगे, विवाद करने लगे, गाली देने लगे, निंदा करने लगे।

  • जब एक भारतीय व्यक्ति (सेखुलर नेता) जो सेकुलर होने के कारण गीता को सांप्रदायिक कहता है तो क्या यह द्वेषी स्त्री द्वारा प्रेरित किये जाने पर अपनी मां को गाली देने के समान नहीं है ?
  • जब एक भारतीय व्यक्ति (सेखुलर नेता) जो सेकुलर होने के कारण रामायण पर विवाद करता है तो क्या यह द्वेषी स्त्री द्वारा प्रेरित किये जाने पर अपनी मां को गाली देने के समान नहीं है ?
  • जब एक भारतीय व्यक्ति (सेखुलर नेता) जो सेकुलर होने के कारण योग को सांप्रदायिक कहता है तो क्या यह द्वेषी स्त्री द्वारा प्रेरित किये जाने पर अपनी मां को गाली देने के समान नहीं है ?
  • जब एक भारतीय व्यक्ति (सेखुलर नेता) जो सेकुलर होने के कारण मनुस्मृति को जलाता-फाड़ता है तो क्या यह द्वेषी स्त्री द्वारा प्रेरित किये जाने पर अपनी मां को जलाने-पीटने के समान नहीं है ?

शतप्रतिशत है, सेकुलरिज्म के नाम पर यह जो निन्दित आचरण दशकों से देखा जा रहा है यह गंभीर है और सेकुलरिज्म की आदर्श स्थिति के भी विरुद्ध है। इस स्थिति पर जो इस छद्म सेकुलर समूह के विरुद्ध वाली राजनीतिक समूह है वो इसपर जो तर्क-वितर्क करती है वह भी आदर्श स्थिति नहीं है।

सेकुलर समूह के आचरण का विरोध करने वाला जो राजनीतिक समूह है वो यहां पर कबीर के समान संतुलन स्थापित करने की बात करता है। जैसे कबीर के दो प्रसिद्ध दोहे हैं जो संतुलन बैठाने का उदाहरण बताये जाते हैं वो भी आदर्श स्थिति नहीं है।

पोथी पढ़ि-पढ़ि जगमुआ पंडित भया न कोय।
ढाई अक्षर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय॥

काकर-पाथर जोड़ के मस्जिद लिया चुनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बांग दे का बहरा हुआ खुदाय॥

कबीर के इस व्यवहार को आदर्श सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है कि उन्होंने दोनों पक्षों के लिये बोला। किन्तु यह भी भ्रम ही है। ढाई आखर प्रेम का जो दोहा है वो शास्त्रों के विरुद्ध नहीं है वो शास्त्र-सम्मत और शास्त्र सिद्ध ही है, विरोध नहीं है। किन्तु काकर-पाथर जोड़ के जो है वो उनके किताब से सम्मत नहीं है, वो विरोध है।

दूसरा राजनीतिक समूह जो है वो कहता है यदि आपने सनातन के विरुद्ध कोई वक्तव्य दिया है तो थोड़ा अन्य पंथों के विरुद्ध भी बोलो, संतुलन स्थापित करो। रामायण की निंदा करते हो तो कुरान, बाइबल आदि की भी निंदा करके संतुलन स्थापित करो किन्तु यह आदर्श स्थिति नहीं है।

वास्तविकता तो कुछ भिन्न है जो ऊपर स्पष्ट किया गया है। आदर्श स्थिति तो यह है कि आप सनातन धर्म, अपने ग्रन्थ वेद, स्मृति, पुराण, रामायण, महाभारत आदि के विरुद्ध तो कुछ कुछ भी मत बोलो क्योंकि ये भारतीय है, आपकी मां के समान नहीं है मां है। विदेशी ग्रंथों कुरान, बाइबल और आयातित पंथों इस्लाम, पारसी, इसाई के विरुद्ध भी कुछ न बोलो क्योंकि वो भी भले ही आयातित है, विदेशी है तथापि मां के समान ही उसका भी सम्मान करो।

किन्तु वास्तविक व्यवहार और आचरण सर्वथा निंदनीय है और वो उसके समान है जिसमें एक मां की द्रोही-द्वेषी स्त्री कहती है कि मेरा सम्मान करने के लिये तुम अपनी मां का त्याग करो, गाली दो और मेरी सेवा करो, देखभाल करो।

आदर्श सेकुलरिज्म की अपेक्षा

इस निंदनीय आचरण को सेकुलरिज्म कदापि नहीं कहा जा सकता है। यह राष्ट्रीय सांस्कृतिक और धार्मिक अपराध है। इस पर देश की विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपलिका शासन के तीनों अंगों को संज्ञान लेकर गहन विचार करना चाहिये और सेकुलरिज्म के आदर्श स्थिति की व्याख्या करनी चाहिये, परिभाषित करना चाहिये, स्पष्ट करना चाहिये जिससे इस प्रकार का निन्दित आचरण न किया जाय और यदि किया जाता है तो उसे दण्डनीय अपराध घोषित करना चाहिये।

  • भारतीय ग्रंथों और भारतीय धर्म (सनातन) मां है और इसके विरुद्ध किसी भी प्रकार का आचरण-व्यवहार करना मां का अपमान करना है और यह दंडनीय अपमान हो।
  • कुरान-बाइबल आदि अन्य किताब विदेशी किताब हैं, इस्लाम-इसाई-पारसी आदि आयातित विदेशी पंथ हैं; इनका भी मां के समान ही सम्मान होना चाहिये इनके विरुद्ध भी किसी प्रकार का आचरण-व्यवहार-अपमान दंडनीय अपराध होना चाहिये।
  • इनमें से कदाचित किसी एक का अपमान हो भी जाये तो संतुलन स्थापित करने के लिये दूसरे का भी अपमान नहीं किया जा सकता। यदि ऐसा किया जाता है अर्थात एक का अपमान करने पर संतुलन स्थापित करने के लिये दूसरे का भी अपमान किया जाय तो दोनों के लिये दंड का पात्र होगा।

मीडिया को भी इस विषय पर गंभीर बहस करने की आवश्यकता है और ये हम सबका दायित्व है कि सरकार तक यह मांग पहुचायें।

निष्कर्ष : बीते सात दशकों में सेकुलिज्म के नाम पर सेकुलरिज्म के कर्णधारों ने जो व्यवहार-आचरण किया है वो निंदनीय है और इसका अधिकार उन्हें नहीं दिया जा सकता है। दूसरी स्त्री को भी मां के समान सम्मान देना आदर्श है किन्तु यदि वो स्त्री हमारे मां से द्वेष रखती हो, द्रोह करती हो और हमें सम्मान सिद्ध करने के लिये यह कहे कि अपनी मां को घर से बाहर निकालो, गाली दो, पिटाई करो तो ये सम्मान नहीं है और इसे ग्रहण नहीं किया जा सकता है। सेकुलरों का जो आचरण और व्यवहार दिखता है वो ऐसा ही है और निंदनीय है। इस निंदनीय आचरण-व्यवहार को समाप्त करना आवश्यक है और इसके सरकार, मीडिया सबको अपेक्षित प्रयास करना चाहिये।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।


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