धर्मांतरण भारत की ही नहीं वैश्विक समस्या है और इससे अखिल विश्व त्रस्त है। यदि गंभीरता से विचार करें तो धर्मांतरण शब्द की सिद्धि ही नहीं होती है, वास्तविक शब्द जो होगा वह धर्मत्याग है, धर्मच्युत है, पतित है। सरकार इसे रोकने का प्रयास तो कर रही है किन्तु सही दिशा में नहीं है जिस कारण सरकार का प्रयास स्थायी समाधान नहीं सिद्ध होता है। स्थायी समाधान है पैतृक संपत्ति में शास्त्रोचित अधिकार (paitrik sampatti ka adhikar) अर्थात उत्तराधिकार विधान। यदि उत्तराधिकार विधान को सही कर दिया जाय तो जिसकी ५ – १० ऊपर वाली पीढ़ी भी धर्म स्वीकारने के लिये उठक-बैठक करने लगेगी।
धर्मांतरण या धर्म त्याग, पैतृक संपत्ति का अधिकार छीनो – paitrik sampatti ka adhikar chino
मतान्तर पर अंकुश लगाने का सबसे बड़ा उपाय यही होगा कि उत्तराधिकार अधिनियम को शास्त्रसम्मत बनाया जाय। शास्त्रों के अनुसार धन-संपत्ति मनुष्य का मल है और जो उसे ग्रहण करता है उसका कुछ दायित्व भी बनता है। कोई किसी कोई कुछ यूं ही नहीं प्रदान करता है, यदि कोई उत्तराधिकारी बनाता है तो उसके कुछ कर्तव्य का भी निर्धारण होता है। यदि किसी का धनग्रहण करके उसके प्रति निर्धारित दायित्व का निर्वहन न करें तो वो चोरी ही कहा जा सकता है। आगे की किसी भी चर्चा से पूर्व प्रमाण को ही जान लेते हैं, तदनन्तर चर्चा करेंगे :
मलमेतन्मनुष्याणां द्रविणं यत्प्रकीर्तितम् । तद्गृह्णन् मलमादत्ते दुर्भेदं ज्ञानिनामपि ॥
ऋषिभिस्तस्य निर्दिष्टा निष्कृतिः पावनी परा । आदेहपतनात्कुर्यात्तस्य पिण्डोदकक्रियाम् ॥
स्कन्द पुराण का वचनानुसार : धन-संपत्ति मनुष्य का मल होता है और जो धन ग्रहण करता है उसे मल भी प्राप्त होता है जो उसके लिये तत्क्षण दुर्भेद्य हो जाता है अर्थात उस मल से निवृत्ति पाना कठिन होता है। लेकिन ऋषियों ने इसकी निष्कृति हेतु भी पावन कर्म का विधान किया है कि जिसका मल सहित धन प्राप्त हुआ हो आजन्म (आदेहपतनात् – जब तक शारीरिक सामर्थ्य रहे) उसके लिये पिण्ड-जल प्रदान करे। पुनः एक और प्रमाण :
श्राद्धं मातामहानां तु अवश्यं धनहारिणा । दौहित्रेणार्थनिष्कृत्यै कर्तव्यं विधिवत्सदा ॥
स्कंदपुराण के ही इस वचन से और अधिक स्पष्ट हो जाता है कि दौहित्र को मातामह के सभी श्राद्ध का अधिकार है एवं यदि मातामह का धन-सम्पति ले तो षोडश श्राद्ध, सपिंडीकरण और वार्षिक श्राद्ध का भी अधिकार प्राप्त हो जाता है।
इसी प्रकार से पुराण-स्मृत्यादि में धन और श्राद्ध दोनों का संबंध प्राप्त होता है और प्रमाणों से ही आलेख को भरना आवश्यक नहीं है। किन्तु जब इस विषय के लिये व्यापक विमर्श किया जायेगा तो अधिक प्रमाणों के साथ विरोधाभासी प्रमाणों के अवलोकन की, उनमें तारतम्य स्थापित करने की आवश्यकता होगी। किन्तु मूल विषय तो यह है कि शास्त्रानुसार उत्तराधिकार विधान बनाने के लिये सरकारें विचार तो करे।
सीधी सी बात है जिसे दो प्रकार से ऐसे समझा जा सकता है :
- उत्तराधिकारी वही होता है अर्थात धन-संपत्ति वही ग्रहण कर सकता है जो श्राद्धादि करे।
- जो धन-संपत्ति लेता हो वह जिसकी धन-संपत्ति लिया है शास्त्रानुसार उसका श्राद्धादि करने के लिये बाध्य है।
इसी तथ्य से एक अन्य विषय जो प्रकट होता है वो है जो व्यक्ति श्राद्धादि न करे वो धन का उत्तराधिकारी नहीं हो सकता। अब इन्हीं तथ्यों को हम विस्तार से समझने का प्रयास करते हुये धर्मत्याग (धर्मांतरण/मतांतरण/धर्म परिवर्तन) नियंत्रण हेतु इसकी आवश्यकता को भी समझेंगे।
जन्म से प्राणियों को बहुत कुछ प्राप्त होता है जिसे कुतर्की नकारने का प्रयास करते हैं और इसे नकारने के लिये भी “कर्म प्रधान” ही चिल्लाते हैं। वास्तव में एक ऐसा गिरोह है जो सनातन का उन्मूलन चाहता है और सनातन में जो भी सिद्धांत है उसके विरुद्ध ही कुतर्क गढ़ता रहता है। यह सनातन से द्वेष है जो स्वाभाविक है और सनातन की श्रेष्ठता को सिद्ध करता है, सनातन ही धर्म है यह सिद्ध करता है। हमें गर्व होना चाहिये कि हम सनातनी हैं। जानिये जन्म का महत्व :
- किसी भी प्राणी का बच्चा जन्म से वही प्राणी होता है, गाय का गाय, हाथी का हाथी, मनुष्य का मनुष्य।
- किसी भी प्राणी के बच्चे का गुण उसके जन्म से ही निर्धारित होता है भैंस के बच्चे में गाय का गुण नहीं होता और गीदर के बच्चे में शेर का गुण नहीं होता।
- मनुष्य की बात करें तो मनुष्य को जन्म से ही वर्ण, कुल, वंश, परंपरा, नाम, सामाजिक-राजनीतिक स्थिति, संपत्ति आदि प्राप्त होता है जिसमें परिवर्तन मात्र अपवाद होता है। एक ही चाय वाला प्रधानमंत्री बन सकता है, सभी चाय वाले नहीं जो कि अपवाद है।
- यदि और आगे बढ़ायें तो जन्म से ही घर, टोला, गांव, शहर, जिला, राज्य, देश, महादेश आदि भी मिलता है।
- यदि और आगे बढ़ायें तो जन्म से माता, पिता, दादा, नाना, बुआ, मौसी, भाई, बहन इत्यादि संबंध मिलते हैं।
- जन्म से मनुष्य को गुण और संस्कार भी प्राप्त होते हैं जिसे कुतर्की नकारने का प्रयास करते हैं किन्तु यदि DNA की बात करें तो वैज्ञानिक रूप से स्वीकारते हैं, वंशानुगत रोग की बात करें तो उसे भी स्वीकारते हैं। किन्तु जिद है कि गुण-संस्कार को स्वीकार नहीं करते हैं।
उपरोक्त तथ्यों को तो कुतर्की कभी नकार नहीं सकते किन्तु कुतर्कियों का कुतर्क होता है कि धर्म, वर्ण, जाति आदि जन्म से नहीं मिलता है। जबकि यही सच्चाई है और कुतर्कियों के कुतर्क जाल से बाहर आकर हमें यह स्वीकारना होगा कि जन्म से ही धर्म, वर्ण, जाति आदि भी निर्धारित होती है। कुतर्क का कारण मात्र धर्म को समाप्त करने का लक्ष्य होना अथवा सनातन से द्वेष होना है।
चिंताजनक मात्र इतना है कि बहुत सारे सनातनी भी अपने किसी स्वार्थ के कारण; चाहे वो राजनीतिक हो या आर्थिक हो अथवा कुछ अन्य हो, उन कुतर्कियों के साथ देते हुये रात-दिन नौटंकी करते रहते हैं, षड्यंत्र रचते रहते हैं।
अपने ही धर्म पर आघात करने वाली नीचता करते हुये निकृष्ट और अधम नारकीय प्राणी बन जाते हैं। ऐसे अधम स्वयं का पतन तो करते ही हैं, अपने परिवार, सगे-संबंधियों, पूर्वजों को भी नरक के भागी बनाते हैं। यदि आपका कोई भी सगा-संबंधी इस प्रकार का निकृष्ट-नीच-नारकीय प्राणी हो तो उसे तिलांजलि दे देना चाहिये अन्यथा आपके लिये भी नरक का द्वार खोलने वाला होगा क्योंकि ये दुष्ट-दुर्जन स्वयं ही नहीं अपने सगे-संबंधियों को भी पाप और कलंक का भागी बनाते हैं। सत्संग से पाप का क्षय और पुण्य की प्राप्ति होती है एवं दुष्टों के संग से पाप की प्राप्ति व पुण्य का क्षय होता है।
किसी के कहने मात्र से स्वीकार करना ही नहीं चाहिये यदि आपके मन में प्रमाण जानने की इच्छा उत्पन्न न हुयी हो तो उत्पन्न कीजिये। कोई भी धर्म-अध्यात्म के विषय में कुछ कहे तो ऐसे ही स्वीकारना बंद कीजिये, प्रमाण मांगना आरंभ कीजिये। सत्संग का महत्व तो जानते ही होंगे, जहां कहीं भी कथा होती है सत्संग का महत्व अवश्य ही बताया जाता है किन्तु दुर्जनों-दुष्टों-पापियों से असंग की भी उससे अधिक चर्चा करनी चाहिये जो नहीं की जाती है, आइये दुष्टों के संग से होने वाली हानि का प्रमाण देखते हैं :
दुर्जनः परिहर्तव्यो विद्यालंकृतोऽपि सन्। मणिना भूषितो सर्पः किमसौ न भयंकरः ॥
ये मूल रूप से गरुडपुराण का श्लोक है, अन्य पुराणों में भी मिल सकता है किन्तु अंतर्जाल पर यह नीतिशतक, चाणक्यनीति आदि का बताया जाता है। इसमें कहा गया है कि दुर्जन यदि विद्वान भी हो तो भी उसका त्याग ही करना चाहिये, क्या सर्प यदि मणि से विभूषित हो तो वह भयंकर नहीं होता है। आपके पास जितने भी दुष्ट होते हैं सुंदर बनकर, वैज्ञानिक-तर्कशास्त्री, इतिहासकार, विश्लेषक, बुद्धिजीवी आदि बनकर ही आते हैं और मीठी-मीठी बातें भी करते हैं। हमें इंसान बनना चाहिये ये वो बोल रहा होता है जो हैवान होते हैं।
तुलसीदास ने रामचरित मानस में लिखा है : बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता ॥ दुष्टों के संग से अच्छा नरक भोग करना होता है। विधाता से प्रार्थना की जा रही है कि विधाता दुष्ट का संग न दें, उससे अच्छा नरक का वास दे दें। किन्तु ऐसा क्यों इसका पुनः अगला प्रमाण गरुडपुराण में ही मिलता है कि क्यों दुष्टसंग से नरक का वास अच्छा होता है :
वरं हि नरके वासो न तू दुष्चरिते गृहे। नरकात् क्षीयते पापं कुगृहान्न न निवर्तते॥ दुष्टों के संग की तुलना में नरकवास श्रेष्ठ है उत्तम है वो इसलिये कि नरक में पापों का क्षय होता है किन्तु दुष्टों के संग से नहीं होता है।
तज्यो पिता प्रहलाद, विभीषण बंधु भरत महतारी।
बलि गुरू तज्यौ, कंत ब्रज-बनितन, भए मुद-मंगलकारी॥
तुलसीदास का ही एक प्यारा भजन है “जाको प्रिय न राम वैदेही” इसमें अनेकों नाम गिनाये गये हैं जिसने दुष्टों का त्याग कर दिया भले ही वो सगे-संबंधी क्यों न हों। और सगे-संबंधी दुष्टों का त्याग करने से वो कल्याण के भाजन बन गए।
“जैसा करे संग वैसा चढ़े रंग” तो आपने सुना ही होगा। किन्तु हम आपको ये समझाना चाह रहे हैं कि यदि आपका कोई अपना भी दुर्जन बन जाये तो शास्त्र कहता है उसको तिलांजलि दे देना चाहिये। पूर्व आलेखों में आपको हम बता चुके हैं की किस प्रकार से आपके परिवार से सदस्यों को लूटा जा रहा है।
यदि आप अपने बच्चों को बाल्यावस्था से ही संस्कारित नहीं करेंगे तो ये गिरोह उसे छीन लेगा। यदि आपसे ये त्रुटि हो जाये तो उसका भी त्याग करना ही श्रेयस्कर होगा। उसे उत्तराधिकारी नहीं बनाया जा सकता। उत्तराधिकारी उसे ही बनाना चाहिये जो श्रद्धावान, सच्चरित्र हो क्योंकि वो आपकी मृत्यु के उपरांत आपके लिये श्राद्धादि करेगा किन्तु यदि पुत्र भी दुर्जन बन जाये तो वह नहीं करेगा।
भ्रमित करने वाले किस प्रकार से समाजशास्त्री, विश्लेषक, विदूषक आदि रूप धारण करके किस प्रकार से कुतर्क करके भ्रमित करते हैं उसे भी समझ लीजिये। आपने अवश्य ही रहीम का एक दोहा पढ़ा होगा :
कह रहीम उत्तम प्रकृत्ति का करि सकत कुसंग। चन्दन विष व्यापत नहीं लपटे रहत भुजंग ॥
ये भी विधर्मी होने के कारण भ्रमित ही कर रहा था और इसकी यह पंक्ति शास्त्रवचनों के विरुद्ध ही नहीं तर्क मात्र से ही खंडित भी हो जाती है। चंदन पर आग का प्रभाव होगा या नहीं ? चलो मान लिया कि चंदन उत्तम प्रकृति का है तो दूसरा कौन सा ऐसा अधम श्रेणी का वृक्ष है जिस पर उसी सर्प के विष का प्रभाव आ जाता है। ये मात्र कुतर्क है और किस प्रकार से इसमें कुतर्क द्वारा शास्त्र के विरुद्ध बोला गया है ये भी आप समझ गये होंगे। वास्तव में ये उसका स्वभाव था जो कितना भी दिखावा करे, सनातन द्वेष इसमें दिख ही गया।
जब उस श्रेणी का व्यक्ति भी जिसके दोहे आज भी आपको पढ़ाये जाते हैं, जो तुलसीदास का समकालीन था और प्रभावित भी था फिर भी उसके हृदय से सनातन के प्रति द्वेष अर्थात सनातनद्रोह का निवारण न हो सका तो औरों की बात ही क्या करें जो बात-बात पर 15 मिनट की धमकी देता रहता है, शांति-शांति कहकर वास्तव में धमकी दे रहा होता है की यदि हमारी बात न मानी गयी तो अशांत कर दूंगा।
आप टीवी पर होने वाले बहसों में कई शांतिदूतों को कहते सुनते होंगे कि हम चाहते हैं देश में शांति-व्यवस्था बनी रहे, सौहार्द्र बना रहे आदि। वास्तव में ये विपरीतार्थ बोल रहे होते हैं खुलकर दंगा कर दूंगा ऐसा नहीं कहकर कहते हैं शांति-सद्भाव बना रहना चाहिये। कबीर की उलटवासियां आप जानते होंगे ये उसी प्रकार का वक्तव्य होता है, जो कहा जा रहा है भाव उसका विपरीत होता है।
अब समझिये मनुष्य जन्म मिलना बड़ा सौभाग्य कहा गया है, मनुष्य मात्र को आत्मकल्याण का प्रयास करना चाहिये। अपना कल्याण मनुष्य को स्वयं ही साध लेना चाहिये, तथापि ये संभावना की आत्मकल्याण न कर पायें तो, तो कोई ऐसा हो जो दुःख को कम कर सके। पुत्र की आवश्यकता यही होती है, यदि माता-पिता नरकगामी भी हो गये हों तो श्राद्धादि करके उनके दुःख को कम करे।
पुत्र को पिता से पर्याप्त संपत्ति मिले अथवा न मिले पित्रादि का श्राद्धादि करना उसका कर्तव्य होता है। क्षमता न हो तो विकल्प भी होता है। जिसे संपत्ति भी प्राप्त हो वह तो श्राद्ध करने के लिये बाध्य होता है। अर्थात जो पुत्र श्राद्ध नहीं करे वो संपत्ति का उत्तराधिकारी नहीं होता है।
अब यह कैसे सिद्ध होगा कि पुत्र श्राद्ध नहीं करेगा। जो धर्मत्याग कर देता है उसके लिये तो सिद्ध ही है न कि वो श्राद्ध नहीं करेगा। यदि यह सिद्ध है कि धर्मत्याग करने वाला अपने पितरों का श्राद्ध नहीं करेगा तो वह संपत्ति का भी उत्तराधिकारी नहीं हो सकता। ऐसे लोगों के अन्य संबंधी जिसने धर्मत्याग न किया हो और अगला श्राद्धाधिकारी हो श्राद्ध करने का और संपत्ति लेने का अधिकार भी उसी का होता है। यदि कोई न हो तो भी पुरोहित, राजा आदि का विकल्प है। किन्तु जो श्राद्ध न करे उस पुत्र को भी उत्तराधिकारी नहीं बनाया जा सकता क्योंकि जो श्राद्ध करेगा वही संपत्ति भी लेगा।
- जो किसी भी कारणवश धर्मच्युत हो जाते हैं अर्थात धर्मत्याग कर देते हैं जिसे धर्मपरिवर्तन कहा जा रहा है वो तो अपने पूर्वजों का श्राद्ध नहीं करता है।
- फिर उसका संपत्ति में अनधिकार सिद्ध हो जाता है।
- यदि धर्मत्याग करने वालों का पैतृक संपत्ति में अधिकार समाप्त हो जाता है तो उससे संपत्ति भी छीननी चाहिये।
- यदि मृतकों के अन्य श्राद्धाधिकारी स्वीकार करें और धर्मत्याग संभावित न हो तो उन्हें उत्तराधिकार दिया जाय।
- यदि सभी सगे-संबंधी पुरोहित सहित धर्मत्याग कर चुके हों तो वह संपत्ति सरकार अपने अधिकार में ले ले और अपने प्रतिनिधि (जो श्रद्धावान हो) के माध्यम से संपत्ति वाले का श्राद्धादि करे।
आशय यह है कि यदि कोई धर्म का त्याग करता है अर्थात मतांतरण करता है तो पैतृक संपत्ति में अधिकार भी समाप्त होता है और ऐसा विधान बनाया जाना चाहिये। जिसकी संपत्ति थी (पूर्वजों) उसके अधिकार का हनन होता है। क्योंकि जो उसकी संपत्ति लेने वाला है उससे पूर्वजों (मृतात्माओं) की अपेक्षा भी जुड़ी होती है, मृतकों की अपेक्षा श्राद्ध होती है। अब धर्मत्याग करने वालों के कुछ प्रश्न तो उत्पन्न होंगे, विरोध तो होगा, आइये उनके कुछ प्रश्नों और उसके उत्तर को भी समझें :
प्रश्न : हमारा देश सेकुलर है, सांप्रदायिक नहीं, यह सांप्रदायिक विधान नहीं बनाया जा सकता।
उत्तर : हमारा देश सेकुलर इसी षड्यंत्र के लिये है कि सभी विदेशी सम्प्रदाय देश के धर्म-संस्कृति को निगल सकें। यदि भारत सेकुलर है भी तो भी उसे अपनी संस्कृति का रक्षा करने का अधिकार है, अपने ग्रंथों के पालन का अधिकार। क्या भारत का कोई अधिकार नहीं है ? भारत क्या है, कैसा है, क्या हो यह सब भारतीय ग्रंथ ही बतायेंगे और भारतीय ग्रन्थ वेद-पुराण-सूत्र-स्मृति-रामायण-महाभारत आदि ही हैं, किन्तु कुरान-बाइबल आदि भारतीय ग्रंथ नहीं है, विदेशी है।
भारत को अपने ग्रंथों में वर्णित विधानों का पालन करने का अधिकार है, चाहे उसे सेकुलर कहो या और कुछ भी कहो। अथवा यदि सेकुलर होने का तात्पर्य यह होता है कि अपनी संस्कृति, अपने ग्रन्थ, अपने व्यवहार, अपनी परंपरा आदि की बलि दे दें तो ऐसा सेकुलरिज्म नहीं चाहिये। आयातित विचारधारा/आस्था भारत की विचारधारा, आस्था से बड़ी नहीं हो सकती।
दूसरी बात संप्रदाय वैष्णव, शैव आदि हैं, सनातन संप्रदाय नहीं है धर्म है, भारत की संस्कृति है और साम्प्रदायिकता की सिद्धि नहीं होती है। यदि मात्र वैष्णव संप्रदाय की बात करें तो सांप्रदायिक कहा जा सकता है, यदि शैव संप्रदाय की बात करें तो सांप्रदायिक कहा जा सकता है किन्तु धर्म की बात करें तो सांप्रदायिक नहीं कहा जा सकता।
प्रश्न : यह हमारे साथ भेद-भाव होगा।
उत्तर : नहीं, तुम्हें भी अपने मत के पालन में हम व्यवधान नहीं करेंगे, किन्तु हम अपने धर्म और संस्कृति में भी व्यवधान नहीं होने देंगे। यदि कोई धर्म त्याग करेगा या कर चुका है तो पैतृक संपत्ति में उसका उत्तराधिकार समाप्त होगा। यही भारतीय ग्रंथों का बनाया हुआ विधान है और भारत अपने ग्रंथों के विधान का ही पालन करेगा, आयातित किताबों के दबाव से नहीं।
भेद-भाव तब होगा जब तुम्हें तुम्हारे उस विचार का पालन करने से रोकें जो मानवीयता का भाव रखती हो, सनातन संस्कृति और धर्म पर किसी प्रकार से आघात नहीं करती हो। यदि गोहत्या से सनातन धर्म-संस्कृति पर आघात होता है तो इसकी स्वतंत्रता नहीं दी जायेगी और यह भेदभाव की श्रेणी में नहीं आ सकता है। गोहत्या जिस संस्कृति का हिस्सा है हमारा विधान उसके देशों पर प्रभावी नहीं होगा।
प्रश्न : चलो मान लिया, फिर भी यदि हमने धर्मत्याग (मतांतरण) किया है उसके अनुसार तो जो करना होगा करते ही हैं, फिर उत्तराधिकार कैसे समाप्त होगा ?
उत्तर : धर्मत्याग तुमने किया है, तुम्हारे पूर्वजों ने नहीं जिनकी संपत्ति पर तुम अधिकार चाहते हो। तुम्हारे ही पूर्वज जो सनातनी थे उनकी अपेक्षा मतांतरित विधान की नहीं हो सकती, उनकी अपेक्षा सनातनी विधि ही होगी और इसलिये जो उनका सनातनी विधि से क्रिया करने वाला (शास्त्रानुसार अधिकारी) होगा वही करेगा और संपत्ति पर भी वही अधिकार पायेगा। यदि कोई भी अधिकारी नहीं होगा तो यह दायित्व सरकार का है एवं संपत्ति पर भी सरकार का ही अधिकार होगा।
प्रश्न : हमारी तो पांचवीं पीढ़ी ने ही धर्मत्याग कर दिया था, हमारा क्या अपराध है ?
उत्तर : तुम्हारे ही शब्दों के अनुसार तुम्हारी छठी पीढ़ी का क्या अपराध था जो उसका श्राद्धादि नहीं किया गया ?
प्रश्न : उस समय वो तो आक्रांताओं से भयभीत हो गये थे, और डर से धर्मत्याग कर लिया, अब क्या करें ?
उत्तर : अब तो आक्रांता नहीं हैं न, अब तो आक्रांताओं का भय नहीं है न, शास्त्र की विधि के अनुसार पुनः धर्मग्रहण करो। शास्त्रानुसार तुम अन्त्यज वर्ण को धारण करते हुये धर्मपथ पर गमन करो, आत्मकल्याण का प्रयास करो।
प्रश्न : हम अन्त्यज वर्ण क्यों ग्रहण करें ? हम तो ब्राह्मण बनेंगे, पुजारी बनेंगे।
उत्तर : तुम धर्म का पालन करने के लिये स्वीकार करोगे अथवा संपत्ति बचाने मात्र के लिये ? यदि संपत्तिरक्षा के उद्देश्य से धर्म को पुनः स्वीकार करते हो तो नहीं करने देंगे। धर्मपालन का भाव रखकर करते हो तभी कर सकते हैं। धर्मपालन का भाव है तो शास्त्रों की आज्ञा का पालन करना ही होगा, मनमर्जी से कुछ भी नहीं कर सकते हो।
प्रश्नों की तो बाढ़ आयेगी और जब आयेगी तब उत्तर देने की आवश्यकता होगी। वर्त्तमान में तो सरकार इस विषय पर गंभीरता से मंथन करे और आगे प्रयास तो करे। कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर इस लिये दिये गये हैं ताकि यदि तंत्र इस दिशा में आगे बढ़ता है तो उसे इन्हीं प्रश्नों के आधार पर रोकने का प्रयास किया जायेगा। उत्पात और हंगामा भिन्न विषय है जिसके लिये सरकार को पूर्वानुमान करके अपेक्षा से अधिक सुरक्षा व्यवस्था करनी होगी।
निष्कर्ष : भारत एक देश है और भारत को भी अपनी संस्कृति, अपने ग्रंथ, अपनी परंपरा आदि के संरक्षण करने का अधिकार है जो सेकुलर कहने से समाप्त नहीं हो सकता। यदि कोई व्यक्ति सेकुलर हो जाये तो उसका कौन सा धार्मिक-सांस्कृतिक अधिकार नष्ट होता है। यदि व्यक्ति का कोई अधिकार नष्ट नहीं होता तो राष्ट्र का अधिकार कैसे नष्ट हो सकता है। सेकुलर होना और धर्मत्याग करना दोनों भिन्न विषय है।
धर्म त्याग का तात्पर्य मात्र पूजा पद्धति बदलना नहीं है, DNA के अतिरिक्त सभी प्रकार का त्याग करना है, किसी व्यक्ति के धर्मत्याग करने से उसके पूर्वजों का धर्मत्याग सिद्ध नहीं होता। धर्मत्याग करने वाला पूर्वजों के अपेक्षित विधि से श्राद्धादि नहीं करता इसलिये उसका पैतृक संपत्ति में अधिकार भी समाप्त होता है।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।
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