लुटेरा कौन – Lutera Kaun

लुटेरा कौन - Lutera Kaun

आपको लुटेरा कौन है यह तो प्रश्न समझ में आ रहा होगा लेकिन क्या लूटा जा रहा है और कौन लुट रहा है। ये लुटेरे अदृश्य हैं और इतने बड़े हैं कि इन्हें सीधे-सीधे न तो समझा जा सकता है न ही देखा जा सकता है। देखा जो जा सकता है वो यही है कि लूटा क्या जा रहा है और किसको लूटा जा रहा है, किन्तु इसमें आश्चर्यजनक यह है कि सभी लुट रहे हैं किन्तु कोई भी “चूं” करने को तैयार नहीं है अथवा समझ भी नहीं पा रहा है कि उसे भी लूटा गया है। अंत में भी यह प्रश्न अनुत्तरित ही रहता है कि लुटेरा कौन (Lutera Kaun) है।

वैसे यह चर्चा आपको काल्पनिक लग सकती है और जिस प्रकार से राजनीति में कहा जाता है कि “आतंकवाद का धर्म नहीं होता”, “लव जिहाद नाम का कुछ भी नहीं है” आदि-इत्यादि। किन्तु जब किसी मृत आतंकवादी को दफनाया जा रहा होता है तो उसका धर्म दिखाई दे रहा होता है, जो घर-गांव-शहर लव जिहाद का शिकार बनता है उसे पता होता है कि लव जिहाद है, उसी प्रकार से जो परिवार लूटा गया है वह सत्यापित करेगा कि हाँ चारों और लूटतंत्र का साम्राज्य फैला हुआ है और सबको लूटा जा रहा है, लेकिन लुटेरा कौन है यह स्पष्ट नहीं हो सकता है।

उन्नीसवीं सदी में लुटेरों ने लूटने की योजना बनाई, बीसवीं सदी में पूरा तंत्र स्थापित किया और सदी के अंत में प्रयोग भी आरम्भ कर दिया जो इक्कीसवीं सदी में सर्वत्र दिखाई दे रहा है। हो सकता है आप स्वयं को इक्कीसवीं सदी का बोलने में गर्वान्वित होते हों, और जो कोई भी इक्कीसवीं सदी बोलता है तो सीना फुलाकर 56 इंच का बना लेता है और छाती ठोककर कहता है कि वो इक्कीसवीं सदी का है।

किन्तु उसे यदि सच्चाई ज्ञात हो जाये तो लगेगा कि पैरों के नीचे तो धरती ही नहीं है। उसे स्वयं से ही घृणा होने लगेगी कि इक्कीसवीं सदी का बनते-बनते वो लुटेरा बन गया है। आश्चर्य यह है कि सबके-सब मानवता, नारी अधिकार, बाल संरक्षण आदि शब्दों का मायाजाल भी रचते रहते हैं।

बहुत सारे लोगों को आगे के तथ्य अविश्वसनीय भी लग सकते हैं, और बहुत लोगों को समझ में आने पर और विश्वसनीय लगने पर भी अस्वीकारने की बाध्यता होगी क्योंकि उसे लगेगा कि वो स्वयं भी लूटतंत्र का हिस्सा है और इस कारण नकारने का ही प्रयास करेगा, और बहुत लोगों को यह समझ में आएगा कि उसे भी लूटा गया है किन्तु लूटा किसने है यह स्पष्ट नहीं हो पायेगा।

यहां हम जिस लूट की बात कर रहे हैं वो धन-संपत्ति आदि भौतिक वस्तुयें हैं ही नहीं। ये विभिन्न संबंधी हैं जिन्हें लूटा जा रहा है और इसे लूट ही कहा जायेगा, चोरी नहीं। जिसे लूटा जाता है वह समझ भी नहीं पा रहा है कि उसे लूटा गया है। इक्कीसवीं सदी में संबंधों की लूट की जा रही है और यह धन-संपत्ति आदि किसी भी वस्तु की लूट से अधिक दुःखद है, भयावह है और चिंताजनक है।

माता-पिता से उसकी संताने लूटी जा रही है

इस लूटतंत्र में सबसे बड़ी लूट है माता-पिता से उसकी संताने लूट लेना। असंख्य माता-पिता हैं जिनसे पुत्र अथवा पुत्री लूट ली गयी है अर्थात छीन ली गयी है।

इस लूट का तात्पर्य यह है कि उनकी संताने उनकी आज्ञाकारी नहीं रहती है, उनके मान-सम्मान की तनिक भी चिंता नहीं करती है, स्वेच्छाचारी बनती जा रही है। हो सकता है आपकी संताने भी लूट ली गयी हो और अब आपकी संताने आपकी आज्ञा नहीं मानती हो अपितु इसके विपरीत वो भले ही आपको आज्ञा न दे रही हो किन्तु आपको अपनी संतानों के अनुसार निर्णय लेने पड़ते हों, भले ही आप भीतर से वह निर्णय न भी लेना चाह रहे हों।

भारतीय संस्कृति में माता-पिता को महागुरु भी कहा जाता है और इनकी आज्ञा का उल्लंघन करना पाप कहा गया है। संताने यदि माता-पिता की आज्ञा का उल्लंघन करने लगी हैं तो इसका सीधा तात्पर्य है कि वो मात्र जन्म से ही संतान है कर्म से नहीं, उसे किसी ने लूट लिया है और अब वह स्वेच्छाचारी हो गया है।

यदि माता-पिता ही उसकी बिना दी गयी आज्ञा का पालन करें तो करें अन्यथा उसे माता-पिता से कोई लेना-देना नहीं है, वह अपना जीवन अपनी इच्छा से ही जियेगा अर्थात स्वेच्छाचारी बनकर ही जियेगा। बाध्य माता-पिता होते हैं जो संतानों की बिना दी हुयी आज्ञा को भी स्वीकार करते हैं अर्थात वो उनकी संताने न रही अपितु बाप बन गया।

अब ढूंढिये संतानों का लुटेरा कौन है ?

  • क्या वो स्कूल-कॉलेज-यूनिवर्सिटी है जहां वह पढ़ने-लिखने गया था ?
  • क्या फिल्म, सीरियल, सोशल मीडिया के पोस्ट विडियो हैं जिसे वह देखता है ?
  • क्या मीडिया है जिसे वह रात-दिन समाचार के लिये देखता है ?
  • क्या कोई अन्य संस्थायें हैं जो मानवाधिकार आदि जैसे नामों से जाना जाता है ?
  • क्या देश की विकृत राजनीति है ?
  • क्या देश का संविधान और कानून है ?

इनके अतिरिक्त भी अनेकों नाम गिनाये जा सकते हैं, किन्तु विषय यह है कि लुटेरा इनमें से है कौन ? और यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है कि वास्तविक लुटेरा है कौन जो माता-पिता से उनकी संतानों को लूट रहा है। लेकिन किसी को हरी झंडी भी नहीं मिल सकता है। विचार देश और समाज को स्वयं ही करना होगा कि लुटेरा है कौन ?

ऐसा प्रतीत होता है कि लुटेरा इन सबसे पृथक है किन्तु उसने सर्वत्र अपनी पैठ बना रखी है। लुटेरे के दलाल सर्वत्र हैं और भिन्न-भिन्न रूपों में अपने-अपने कार्य को कर रहे हैं और उन्हें भी ज्ञात नहीं है कि वो किसी लुटेरे के लिये कार्य कर रहे हैं।

गांवों में भी ये लुटेरे प्रवेश कर चुके हैं और गांवों के माता-पिता भी अपने बच्चों से आज्ञा लेते हैं कि क्या तुम्हारे विवाह की बात करूँ अथवा तुमने किसी को चुन रखा है (और हमें कुछ नहीं करना है बस कठपुतली बनकर टुकुर-टुकुर ताकते रहना है – अनकही पंक्ति) जो ऐसा नहीं करते उनकी संताने पता नहीं कब भाग जाये, विवाह कर दें तो उसे नकार दे, त्याग दे आदि कुछ भी।

पति से पत्नी की और पत्नी से पति की लूट

ये लूट यहीं समाप्त नहीं होती है विवाहित बच्चे पुनः लूटतंत्र के जाल में फंसे ही रहते हैं और यह अज्ञात ही रहता है कि कब पति से पत्नी अथवा पत्नी से पति लूट लिया जाय। ढेरों ऐसी घटनायें होती है जिसमें विवाहित जोड़े में से कोई एक छोड़कर भाग जाता है अथवा भगा देता है। कारण जो हो स्वेच्छाचार की पाठशाला में ये सिखाया गया हो अथवा और कुछ हो।

इसके पश्चात् अधिकांश तलाक के प्रकरण इन्हीं जोड़ों के होते हैं, सामान्य रूप से जिनका विवाह संस्कृति के अनुसार होता है उनके तलाक संबंधी प्रकरण अपवाद मात्र होते हैं और नगण्य होते हैं। किन्तु इस विषय पर किसी संगठन-संस्था को कोई विचार नहीं करना है, किसी समाजशास्त्री-दार्शनिक-बुद्धिजीवी-विश्लेषक-विचारक आदि किसी को कोई चर्चा नहीं करनी है। यहां भी एक प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या अधिवक्ताओं व अन्य के रोजगार को ध्यान में रखकर ऐसा किया जाता है ?

क्योंकि इनके इच्छा स्पष्ट हो चुकी है जिसे दुराचार कहा जाता है और जो दुराचार है उसे इनलोगों ने अन्य भाषा में “लिव & रिलेशनशिप” नाम देकर ऐसा बना दिया जैसे वह दुराचार न हो, जीवनशैली का एक सामान्य भाग हो। इसके साथ ही विवाहित जोड़े का भी अन्य से संबंध होना इन लोगों ने दुराचार नहीं माना है। अरे कहाँ तक कहें ये तो समलैंगिक विवाह भी थोपने का प्रयास करने लगे हैं। इनको हरी झंडी कैसी मिल सकती है ये तो बड़ी भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं।

एक विवाहित जोड़े के टूटने की प्रक्रिया में अनेकों रोजगार सृजन होता है तो क्या रोजगार सृजन करने वाले भी इसके लिये दोषी हैं ?

रोजगार बड़ी समस्या है न, हो अथवा बनाई गयी हो किन्तु बताई तो जा रही है। अब रोजगार सृजन करने के लिये जो इकाई काम करती है उसे तो एक जोड़े के टूटने में भी रोजगार दिख रहा होगा। क्योंकि पुनः विवाह भी होना है और यदि एक व्यक्ति की २ – ३ शादी-तलाक भी हो तो उसमें अनेकों रोजगार बनते हैं, अर्थव्यवस्था को बल मिलता है। यह विश्लेषण आपको थोड़ा असंगत लग सकता है किन्तु ये आंशिक विश्लेषण मात्र है वास्तविकता तो बहुत ही निंदनीय है। अरे ये तो मदिरालय से राजस्व, रोजगार आदि सिर ऊँचा करके बताते भी हैं।

भाई से बहन की और बहन से भाई की लूट

यहां भाई से भाई के लूट की हम चर्चा ही नहीं करेंगे किन्तु इसे कम नहीं समझना है, भाई-भाई के बीच सर्वत्र विवाद हो रहे हैं और संबंधों के बीच वाले विवादों की बात करें तो सर्वाधिक विवाद भाई-भाई के बीच ही चलते हैं। लेकिन हम भाई से बहन अथवा बहन से भाई के लूट की चर्चा करेंगे।

विवाहित बहन भाई से संपत्ति का बंटवारा करने जाती है और एक-दूसरे का संबंध समाप्त होता है, वहीं जो बहन बनकर भाई से संपत्ति को लेकर संबंध समाप्त कर रही है उसके पति की बहन भी होती है और उसके पति का बहन से संबंध टूट रहा है। अथवा यूँ कहें की भाई और बहन से संबंधों को भी लुटेरे लूट रहे हैं और यदि यथाशीघ्र न संभाला जाये तो जितने विवाद भाई-भाई के बीच में होते हैं उतने ही विवाद भाई और बहन के बीच भी होने लगेंगे। किसका रोजगार बढ़ेगा सोचकर देखिये, हर बार बताना आवश्यक नहीं है।

इसी तरह पिता की बहन अर्थात बुआ भी आयेगी और बुआ का संबंध लूटेगा एवं माँ अपने भाई के संबंध को लुटा देगी अर्थात मामा से भी संबंध समाप्त। तनिक कल्पना करके तो देखिये कितना बड़ा तूफान आने वाला है, जहां हम विश्व बंधुत्व का नारा लगा रहे हैं वहीं सभी रक्तसंबंध नष्ट होने जा रहा है।

किन्तु चिंता करने की कोई बात नहीं है, बिगड़े संबंधों को भी जोड़ने के लिये रोजगार सृजन होगा, संस्थायें व संगठन बनेंगे जो बिगड़े संबंधों को जोड़ने का कार्य करेगी अथवा बिकाऊ संबंध नाम से कुछ बनाकर बेचेंगी। देश में रोजगार सृजन होगा, GDP में उछाल आयेगा। हमें सकारात्मक सोचना चाहिये न नकारात्मक सोचकर रोते क्यों रहें !

अब तेरा क्या होगा कालिया ?

अब यहां पर चिंता करने के लिये जो शेष बच रहे हैं वो हैं बुड्ढे-बुड्ढियां, माता-पिता जानकर नहीं कह रहा हूँ क्योंकि माता-पिता होते तो चिंता की कोई बात ही नहीं रहती। अरे वृद्धाश्रम होते हैं न वहां रहेंगे ये बुड्ढे-बुड्ढियां। कालनेमि नये-नये रूप में इनके पास आएगा और जो कुछ बची-खुची संपत्ति-सुख-शांति शेष होगी वो भी लूटकर ले जायेगा।

अरे इनके लिये चिंता क्यों करें अपने बच्चे को बड़ा आदमी बनाने के लिये संस्कार न देकर कान्वेंट में भेजने वाले यही तो थे। इन्होंने जब स्वेच्छा से अपने बच्चे का कन्वर्जन कराया ही था तो इनकी दुर्गति के लिये हमलोग क्यों रोयें। किन्तु अपने लिये तो सोचना पड़ेगा न हम भी सोचते हैं आप भी सोचिये।

क्या लग रहा है कथा समाप्त हो गई ?

कदापि समाप्त नहीं हुयी है सर्वाधिक पीड़ित होने वाले की कथा तो अभी शेष ही है। बुड्ढे-बुड्ढियों का तो जो होगा सो देख लेंगे, सह लेंगे, रो-धोकर ५ – १० वर्ष जी ही लेंगे। उनके लिये करने को और शेष होगा क्या ? सर्वाधिक पीड़ित तो इन स्वेच्छाचारियों की वो संताने होंगी जिनके माता-पिता बदलते रहेंगे। नहीं समझे जो नये जोड़े शादी-तलाक का खेल खेलेंगे उनके बच्चे भी तो बीच-बीच में होंगे एक बच्चा इस पति एक बच्चा उस पति का फिर एक बच्चा किसी और पति का।

अभी तो बच्चे पर अधिकार के लिये विवाद होते हैं आगे अधिकार समाप्त करने को लेकर लड़ाई होगी कि मुझे नहीं चाहिये तो मुझे भी नहीं चाहिये। हल तो ढूंढ लेंगे अरे दोनों में से कोई नहीं रखेंगे अनाथाश्रम में रख देते हैं अथवा ऐसे बच्चों के लिये कोई नया आश्रम-NGO आदि बनने लगेगा। आप भी यदि रोजगार को लेकर चिंतित हैं तो आपके लिये ये एक सुनहरा अवसर है आप उन बच्चों के लिये कुछ करने का प्रयास कर सकते हैं जो दुराचारी माँ-बाप की संताने होंगी। यदि कोई ऐसे दुराचारी माँ-बाप को पढ़ रहे हैं तो कृपया बुड़ा न माने मैं आपकी भावना को आहत नहीं करना चाहता हूँ।

अब आपके मन में प्रश्न आ रहा होगा कि क्या उन बच्चों के भविष्य को लेकर न्यायपालिका हाथ-पर-हाथ रखे बैठी रहेगी, कुछ भी नहीं कर पायेगी, अधिवक्ताओं को कोई अवसर नहीं मिलेगा ? अरे महाशय आप भी क्या सोच रहे हैं ? इन लोगों की इच्छा के बिना तो आप साँस भी नहीं ले पायेंगे, ये ऐसे कैसे छोड़ देंगे। पहले तो उस बच्चे के लिये दुराचारी माँ-बाप की संपत्ति में भाग निर्धारित करेंगे और फिर बंदरबांट।

अधिक बोलना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से आगे बढ़कर न्यायपालिका की अवमानना भी कही जा सकती है इसलिये मौन रहना ही उचित होगा, शेष आप स्वयं समझ पायें तो समझिये हम कुछ नहीं बोलेंगे, बस चुप रहेंगे।

अब आपको क्या चिंतन करना चाहिये ? क्या मैं ही थोड़ा और सहयोग करूँ ?

सोचिये :

कौन लुटा ? क्या लुटा ? किसने लूटा ? कैसे लूटा ? क्यों लूटा ?

हो सकता है यह आपको कपोल कल्पना लगे किन्तु जो घटनायें घटित हो रही हैं उसको कैसे नकारेंगे ? क्या बिल्ली को देखकर आंख मूंदने वाला चूहा बनेंगे अथवा अपना दायित्व समझने का प्रयास करेंगे, दायित्व को समझकर उसे निभाने का प्रयास करेंगे?

लेकिन एक तथ्य को मैं स्पष्ट रूप से नकार रहा हूँ जो आपकी प्रथम अपेक्षा अथवा धारणा होगी और वह ये होगी कि सरकार को कुछ करना चाहिये। सरकार इस विषय में कुछ नहीं कर पायेगी और यदि कुछ कर भी ले तो भी सरकार के द्वारा किया गया प्रयास परिणामविहीन होगा।

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किन्तु सरकार रोजगार-अर्थव्यवस्था-GDP आदि के दलदल में इस तरह फंसी है कि वो इस दिशा में कोई सार्थक प्रयास कर ही नहीं सकती है क्योंकि यदि सरकार इस विषय के लिये सार्थक प्रयास करेगी तो रोजगार-अर्थव्यवस्था-GDP आदि पर नकारात्मक प्रभाव होगा।

इसे स्पष्ट करना अनिवार्य इसलिये था कि हमारी एक धारणा बनती जा रही है कि हम स्वयं कुछ नहीं करेंगे जो करना है सरकार करे। हम आखिर कुछ करें तो क्यों करें, सरकार को टैक्स देते क्यों हैं? सरकार तो हमारी नौकरी करती है न अर्थात नौकर है न! हम मालिक हैं और मालिक होकर नौकरों वाला काम क्यों करें भला ?

यहां आपको एक अपेक्षा मीडिया से भी हो सकती है और यदि मीडिया से तनिक अपेक्षा भी रखी जाय तो वह मूर्खता के अतिरिक्त कुछ भी नहीं होगा। मीडिया तो स्वयं ही कहीं न कहीं लूटतंत्र से जुड़ी हुयी प्रतीत होती है।

समाधान की दिशा में हम विचार करने का अवश्य ही प्रयास करेंगे किन्तु अगले आलेख में करेंगे।

निष्कर्ष : हमें ये चीज समझ ही नहीं आ रही है कि निष्कर्ष में कहें तो क्या कहें ? सबका मूल जो लुटेरा है उसका रहस्योद्घाटन तो हुआ ही नहीं। लुटेरा कौन है ये तो अनुत्तरित ही है और हमें ज्ञात नहीं है। हो सकता है आप लुटेरे को जानते हों तो आप लोग एक-दूसरे को बतायें कि ये लुटेरा है इससे सावधान रहो। यह विषय जनसामान्य का है और प्रत्येक परिवार का है क्योंकि सभी निशाने पर हैं। लूट का खेल आरम्भ होनेवाला नहीं है हो चुका है और यथाशीघ्र इस विषय पर जनजागरूकता की आवश्यकता है। सरकारें अधिकतम जनजागरूकता के लिये ही सकारात्मक प्रयास कर सकती हैं।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।


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