जबसे सोशल मीडिया का युग आरंभ हुआ है तब से कर्मकांड के क्षेत्र में एक विशेष दोष को बड़े स्तर पर बढ़ावा दिया जा रहा है वह दोष है ब्राह्मणरहित कर्मकांड का। जब कभी किसी पूजा, हवन आदि हेतु बिना पंडित के स्वयं करें की चर्चा की जा रही होती है तो यही बताया जा रहा होता है कि कर्मकांड में पंडित (ब्राह्मण) की आवश्यकता नहीं होती है यदि करने की विधि मात्र ज्ञात हो, मंत्र न भी जानते हों तो स्वयं ही संपूर्ण कर्मकांड कर सकते हैं।
इस आलेख में यह चर्चा की गयी है कि बिना पंडित (कर्मकांडी ब्राह्मण) के कोई भी पूजा-अनुष्ठान आदि नहीं किया जा सकता है, कर्मकांड में पंडित आवश्यक मात्र ही नहीं अनिवार्य होते हैं।
बिना पंडित के स्वयं पूजा, अनुष्ठान विधि, हवन करना कैसे सीखें – bina pandit ke karmkand
सोशल मीडिया पर, आभासी दुनियां में आलेख, विडियो आदि बनाने के लिये किसी को किसी विषय का ज्ञाता होना आवश्यक नहीं होता है। कोई भी व्यक्ति किसी भी विषय पर आलेख, विडियो बना सकता है। सत्यता निर्धारित करने का कोई साधन ही नहीं है इसलिये कौन सत्य कहता है कौन असत्य यह ज्ञात नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि अंतर्जाल पर सत्य तथ्य भी हैं किन्तु असत्य तथ्य भी कम नहीं हैं, भ्रामक तथ्यों की भी कोई कमी नहीं है।
हम तो धर्म-अध्यात्म, कर्मकांड से संबंधित भ्रामक तथ्यों की चर्चा करेंगे किन्तु आप इसे भ्रामक समाचारों जिसे अफवाह भी कहा जाता है की संख्या से समझ सकते हैं। मात्र अंतर्जाल पर ही नहीं जिसे मेन मीडिया कहा जाता है वहां भी भ्रामक तथ्य प्रस्तुत किये जाते हैं। सत्य न बोलना, सत्य को छुपाना भी असत्य की ही श्रेणी में आता है और मेन मीडिया सदैव सत्य को छिपाने का ही प्रयास करती है। किन्तु हमें कर्मकांड विषय पर चर्चा करनी है जिसका विषय है बिना पंडित के पूजा-अनुष्ठान, यज्ञ आदि कर्मकांड का संपादन।
कर्मकांड में ब्राह्मण की आवश्यकता क्यों
कर्मकांड में तीन प्रकार के कर्म कहे गये हैं नित्यकर्म, नैमित्तिक कर्म और काम्य कर्म। सकाम-निष्काम, शान्तिक-पौष्टिक, मारण-मोहनादि प्रकारों की व्याख्या अन्य विषय है; यहां नित्य-नैमित्तिक कर काम्य कर्म के अनुसार ही कर्मकांड में ब्राह्मणों की आवश्यकता अथवा अनावश्यकता को समझेंगे।
नित्यकर्मों में कर्मकांडी ब्राह्मण की आवश्यकता नहीं होती है किन्तु इसके अतिरिक्त नैमित्तिक और काम्य सभी कर्मों में कर्मकांडी ब्राह्मण की आवश्यकता होती है। ब्राह्मण-गुरु की आज्ञा के उपरांत ही नैमित्तिक और काम्य कर्मों में अधिकार प्राप्त होता है एवं दिये गये उपदेश अर्थात बताई गयी विधि के अनुसार कर्म करने में ही कर्म विधिवत संपन्न हुआ सिद्ध होता है।
नाना प्रकार के पुस्तकों का अध्ययन करके कर्म की विधियों के बारे में विशेष जानकारी तो प्राप्त की जा सकती है किन्तु कर्म का अधिकार प्राप्त नहीं होता है। कर्म का अधिकार ब्राह्मण की आज्ञा से ही प्राप्त होता है और इस विषय को अधिक गंभीरता से समझने हेतु प्रायश्चित्त विधान समझना चाहिये। हम यहां प्रायश्चित्त विधान की चर्चा तो नहीं करेंगे किन्तु विभिन्न स्मृतियों में प्रायश्चित्त विधान वर्णित है उसका अध्ययन करने के लिये कह सकते हैं।
किन्तु एक सामान्य प्रवृत्ति अपवाद, विकल्प आदि को सिद्धांत समझने की बनती जा रही है जो इस विषय को समझने में बाधा भी उत्पन्न करती है। कुछ व्रत-पूजा का अत्यधिक महत्व होता है और उसकी कथा में यह भी वर्णन मिलता है कि बिना किसी विधि-विधान के अनायास होने मात्र से ही कल्याणकारी हो गया जैसे सफला एकादशी की कथा, शिवरात्रि व्रत कथा, रामार्चा में फूल चुराने वाले का प्रसङ्ग, गरुड़पुराण में मृतक की अस्थि-मांस लेकर उड़ने वाली पक्षी का अन्य पक्षी से छीना-झपटी के कारण अस्थि का गंगा में गिर जाना आदि।
उपरोक्त श्रेणी की गिनी-चुनी कथायें हैं जो माहात्म्य को सिद्ध करने वाले हैं न की सिद्धांत स्थापित करने वाले हैं।

और यदि इसे सिद्धांत स्थापित करने वाला स्वीकार किया जाये तो मुख्य सिद्धांत ही भंग हो जायेगा। यदि मात्र इतना सिद्धांत स्थापित हो जाये की जीवन पर्यन्त जितना भी पाप कर सको करो मात्र मृत्यु के उपरांत गंगा में अस्थिविसर्जन मात्र हो जाये तो सद्गति प्राप्त कर लोगे फिर श्राद्ध आदि के विधान की क्या आवश्यकता होगी ? गरुड़पुराण में ही यह भी कहा गया है कि यदि गंगा में अस्थिविसर्जन से मुक्ति मिले तो गंगा में रहने वाली मछलियों को सर्वप्रथम वैकुण्ठ प्राप्त होना चाहिये।
इस प्रकार का विचार करने पर तो भक्ति के सिद्धांत से कर्मकांड मार्ग ही समाप्त हो जाता है, किन्तु समस्या ये है कि भक्ति की प्राप्ति तो पहले हो। भक्ति की प्राप्ति होती नहीं किन्तु सबके-सब यही मंत्र जपते रहते हैं भाव-भाव। लेकिन भक्तों की कथाओं से जो ज्ञात होता है कि भक्तों के लिये संसार में कुछ भी नहीं रहता उसे स्वीकार नहीं करते। संसार को ही पाना चाहते हैं किन्तु भक्ति-भाव का जप करते हुये कर्मकांड के विधान का त्याग करना चाहते हैं। वास्तविकता यह है कि जो लोग धन-पुत्र-सांसारिक सुख की कामना भी रखते हैं और भक्ति-भाव का भी राग अलापते हैं वास्तव में वो शास्त्र के विधान का पालन नहीं करना चाहते।
लगभग सभी कथाओं में एक ही सिद्धांत मिलता है कि दुःखी व्यक्ति को किसी ब्राह्मण ने व्रत-पूजा का उपदेश दिया, विधि बताई और तदनुसार दुःखी व्यक्ति ने उस व्रत-पूजा को किया जिससे कल्याण हो गया। इसमें यह सिद्धांत स्पष्ट होता है कि सभी व्रत-पूजा आदि से चतुर्विध पुरुषार्थ की सिद्धि होती है किन्तु उसका उपदेश किसी विद्वान ब्राह्मण से प्राप्त होना चाहिये। यदि उपदेशकर्ता भी स्वयं वही व्रत-पूजा करना चाहे तो उसे अन्य श्रेष्ठ विद्वान से उपदेश (आज्ञा) प्राप्त करनी चाहिये।
चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की पापमोचनी एकादशी व्रत कथा में मंजुघोषा नामक अप्सरा मेधावी मुनि का तप भंग करती जिससे रुष्ट होकर मेधावी मुनि श्राप प्रदान करते हैं पुनः प्रार्थना करने पर पापमोचनी एकादशी का उपदेश करते हैं। ज्ञानी होते हुये भी स्वयं के पापमुक्ति हेतु च्यवन मुनि के पास जाते हैं जो उन्हें भी पापमोचनी एकादशी व्रत का ही उपदेश (आज्ञा) प्रदान करते हैं। मेधावी मुनि को क्या आवश्यकता थी च्यवन मुनि से निर्देश (आज्ञा) लेने की, ज्ञानी तो वो स्वयं भी थे और कुछ काल पूर्व ही मंजुघोषा को उपदेश (आज्ञा) भी कर चुके थे।
कर्मकांड में ब्राह्मण की आवश्यकता
अध्यापन और याजन नामक कर्म का अधिकार मात्र ब्राह्मण को ही प्राप्त है। ब्राह्मण के षट्कर्म कहे गये हैं जिससे ब्राह्मण का उन कर्मों में अधिकार सिद्ध होता है न कि उन कर्मों से ब्राह्मणत्व की सिद्धि होती है। जिसके जो कर्म में उसी में उसका अधिकार है अन्य वर्णों के कर्म में नहीं। आपत्काल की भी विशेष व्यवस्था शास्त्रों में वर्णित है। इस प्रकार यदि याजन (यज्ञ-कर्मकांड-पूजा-पाठ कराना) ब्राह्मण का कर्म है तो निःसंदेह कर्मकांड में ब्राह्मण अनिवार्य होते हैं। यदि सभी कर्म बिना ब्राह्मण के स्वयं ही संपन्न किये जा सकें तो ब्राह्मण के याजन कर्म की सिद्धि कैसे होगी ?
अब आइये अन्य प्रकार से विचार करते हैं, सभी कर्म में ब्राह्मण को दान और दक्षिणा देने का विधान है। दान और दक्षिणा जब देना ही होगा तो बिना पंडित (ब्राह्मण) के स्वयं ही कर्म क्यों करे ? सभी कर्मों में ब्राह्मण भोजन का भी विधान है, यदि बिना ब्राह्मण के ही कर्मकांड करेंगे तो ब्राह्मण भोजन किसे करायेंगे ? दक्षिणा यज्ञ की पत्नी है और दक्षिणा रहित यज्ञ को मृत कहा गया है यदि दक्षिणा नहीं देंगे तो किया गया यज्ञ (व्रत-पूजा-अनुष्ठान-हवन आदि सभी) मृत हैं अर्थात निष्फल हैं फिर उसे करने की आवश्यकता ही क्या है ?
यथोक्तं सुकृतं यस्तु विधिवत् कुरुते नरः । स्वल्पं मुनिवरश्रेष्ठ मेरुतुल्यं भवेच्च तत् ॥
विधिहीनं तु यः कुर्यात्सुकृतं मेरुमात्रकम् । अणुमात्रं न चाप्नोति फलं धर्मस्य नारद ॥
स्कन्द पुराण में कहा गया है कि शास्त्रोक्त विधि के अनुसार थोड़ा (अल्पकालिक व्रत-पूजा-अनुष्ठान आदि) करना भी सुमेरु के समान विशाल (फलकारक) होता है और विधि से हीन किया गया कर्म सुमेरु के समान (चिरकालिक, बहुत बड़े-बड़े यज्ञादि) होने पर भी निष्फल ही होते हैं। अर्थात यदि दक्षिणा, दान, ब्राह्मण भोजन आदि का विधान सभी कर्मों में है तो उसके बिना करने पर विधि रहित होगा और निष्फल होगा।
सर्वेषामप्यलाभे तु यतोक्तकरणं विना । द्विजवाक्यं स्मृतं राजन् सम्पूर्णं व्रतसिद्धिदम् ॥
पुनः स्कन्द पुराण में ही यह भी बताया गया है कि यदि कोई कर्म विधिहीन हो जाये, सामर्थ्याभाव अथवा अन्य अलाभ आदि के कारण यथोक्त विधि से न हो तो भी वह पूर्ण हो सकता है और उसकी सम्पूर्णता का विधान है ब्राह्मण का वचन प्राप्त होना। व्रत कथन का तात्पर्य व्रत मात्र नहीं सम्पूर्ण कर्मकांड समझना चाहिये। किसी भी कर्मकांड में कोई यह नहीं कह सकता कि उससे त्रुटि नहीं हुई, दोष नहीं हुआ और सबका निवारण ब्राह्मण के वचन से ही होता है अतः बिना ब्राह्मण के कोई कर्म (व्रत-पूजा-अनुष्ठान आदि) नहीं किया जा सकता।
बिना पंडित के हवन कैसे करें?
आपको बिना पंडित के हवन कैसे करें, स्वयं हवन कैसे करें इस प्रकार की चर्चा वाली ढेरों आलेख, विडियो मिलेंगे किन्तु जो भी इस प्रकार की बातें करते हैं उसने कर्मकांड का ज्ञान ही प्राप्त नहीं किया है। किसी प्रकार से थोड़ा-बहुत कुछ-कुछ जान गया होता है और सोशल मीडिया पर कमाई करने वाला गुरु जी बन जाता है। ऐसे मूर्खों से सावधान रहने की भी आवश्यकता है व अन्य लोगों को भी सावधान करने की आवश्यकता है।
बिना पंडित के गृह प्रवेश कैसे करें?
जिस प्रकार से बिना पंडित के हवन करने की ढेरों आलेख-विडियो मिलेती है उसी प्रकार से गृहप्रवेश के विषय में भी अनेकानेक आलेख-विडियो मिलेंगे। जब वास्तु प्रकरण आता है तो भूमि की शुद्धि गोचारण से होती है एवं मंडप-गृह आदि की शुद्धि ब्राह्मण भोजन से होती है। तो जो लोग इस प्रकार का भ्रम फैला रहे हैं कि बिना पंडित के गृह प्रवेश कैसे करें वो निश्चित रूप से मूर्ख हैं, कर्मकांडी-ब्राह्मण-विद्वान नहीं है। और ऐसे अधर्मी का वचन पालन करके धर्म-कल्याण की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
बिना पंडित के श्राद्ध कैसे करें? बिना पंडित के रुद्राभिषेक कैसे करें? बिना पंडित के तुलसी विवाह कैसे करें? इत्यादि बताने वाले पाखंडी-पापी स्वयं तो नरकगामी हैं ही अन्य लोगों को भी भ्रमित करके उन्हें भी नरकमार्ग तक पहुंचाने में लगे हुये हैं। शास्त्र विधि का उल्लंघन करना अधर्म ही है और अधर्म से नरक की ही प्राप्ति होती है। गीता में भी भगवान श्री कृष्ण ने कहा है :
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः। न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥
जो शास्त्रोक्त विधि – विधान का त्याग करके स्वेच्छाचार करते हैं अर्थात मनमाना आचरण करते हैं वह न तो सिद्धि प्राप्त करता है, न सुख प्राप्त करता है और न ही सद्गति। अर्थात शास्त्रोक्त विधि से रहित कर्म का कोई भी शुभफल नहीं होता, उससे कल्याण की प्राप्ति नहीं होती है।
अतः यह सिद्ध होता है कि व्रत-पूजा-हवन-गृहप्रवेश आदि कोई भी कर्म हो बिना ब्राह्मण (पंडित-कर्मकांडी) के नहीं किया जा सकता और यदि किया जाता है तो वह स्वेच्छाचार सिद्ध होता है जो किसी प्रकार से कल्याणकारी नहीं होता।
निष्कर्ष : इस प्रकार शास्त्रोक्त विधि के अनुसार सभी कर्मों में (नित्यकर्म को छोड़कर) ब्राह्मण (कर्मकांडी) की आवश्यकता होती ही है। उपदेश (आज्ञा) देने से लेकर दान-दक्षिणा-भोजन ग्रहण करने के लिये और सम्पूर्णता का वचन देने के लिये कर्मकांडी ब्राह्मण अनिवार्य होते हैं और यही शास्त्रों में बताया गया है। यदि कोई शास्त्रोक्त कर्म बिना पंडित (ब्राह्मण-कर्मकांडी) के करते हैं तो वह शास्त्र विधि से रहित होता है और वह कल्याणकारी तो कदापि नहीं होता किन्तु शस्त्रोलन्घन का दोष प्रदान करने वाला होता है।
विनम्र आग्रह : त्रुटियों को कदापि नहीं नकारा जा सकता है अतः किसी भी प्रकार की त्रुटि यदि दृष्टिगत हो तो कृपया सूचित करने की कृपा करें : info@karmkandvidhi.in
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।
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