विवाह रात में क्यों नहीं करना चाहिये – vivah muhurat

विवाह रात में क्यों नहीं करना चाहिये - vivah muhurat

एक बड़े विद्वान का कथन है कुछ लोगों को मुंह में बवासीर हो जाता है और वो बोलने से पहले सोचना-समझना बंद कर देता है। vivah muhurat : पहले तो एक हिन्दूवादी संगठन ये राग अलापती थी कि विवाह रात में नहीं होना चाहिये, सभी कर्म दिन में होता है तो विवाह रात में क्यों ? तदनन्तर कुछ कथावाचकों ने धीरे-धीरे भेंड़चाल पकड़ना आरम्भ कर दिया। आज हम उन महाराजों/समनोरंजनकथाकारों से जानना चाहते हैं कि विवाह रात में क्यों नहीं करना चाहिये ?

इस आलेख का प्रयोजन यह सिद्ध करना नहीं है कि रात में विवाह का निषेध है, अपितु यह सिद्ध करना है कि रात में विवाह प्रशस्त ही होता है और शास्त्रों में प्रमाण भरे-पड़े हैं किन्तु यदि कोई पढ़े ही न तो उसे वक्तव्य देने से बचना चाहिये। जिस विषय का ज्ञान न हो उस विषय में निर्णय करने का प्रयास नहीं करना चाहिये। कथाकारों को कर्मकांड व ज्योतिष में हस्तक्षेप करने का प्रयास ही नहीं करना चाहिये।

समस्या का आरंभ कैसे हुआ ? संयोग से मैं भी २४ जनवरी को कथा सुनने लगा था और इसी बीच में दो प्रकरण आ गया :

  1. विवाह होटलों में नहीं करना चाहिये; इस विषय में कर्मकांडियों की सहमति होगी।
  2. विवाह रात में निषिद्ध है दिन में ही करें और इस विषय में कर्मकांडी विद्वान कदापि सहमत नहीं हैं।

इस प्रकार की चर्चा करने की आवश्यकता तब है जब बड़े-बड़े कथावाचक भेंड़चाल चलते हुये इस प्रकार का वक्तव्य देनें लगें। कथावाचकों के साथ बड़ा जनसमूह जुड़ा हो सकता है किन्तु कथावाचक विद्वान होते हैं ऐसा नहीं है और इसका सबसे बड़ा प्रमाण यही प्रकरण है कि बिना शास्त्रोक्त तथ्यों को जाने-समझे भेड़चाल में चलते हुये कहने लगते हैं कि विवाह दिन में ही करो, रात में न करो, रात में कोई कर्म नहीं होता है। रात में वेद पाठ नहीं होता आदि-इत्यादि।

इसमें विवाह के साथ गृहप्रवेश को भी जोड़ दिया जाता है। गृहप्रवेश प्रकरण की जहां तक चर्चा है तो प्रवेश तीन प्रकार के होते हैं : वधूप्रवेश, नृपप्रवेश और गृहप्रवेश

  1. वधूप्रवेश : वधूप्रवेश के लिये रात ही प्रशस्त होता है, दिन ही निषिद्ध है।
  2. नृपप्रवेश : नृपप्रवेश के लिये दिन प्रशस्त है और रात्रि निषिद्ध है।
  3. गृहप्रवेश : गृहप्रवेश दिन और रात दोनों में प्रशस्त कहा गया है।

रात्रि में विवाह निषेध के प्रमाण

यदि हम उपनयन के बारे में चर्चा करें तो कृष्ण पक्ष में निषिद्ध है, यदि इसे आधार मानकर सभी कर्मों के लिये कृष्णपक्ष को निषिद्ध मान लें तो ये मूर्खता के अतिरिक्त क्या कही जायेगी। उपनयन हेतु पूर्वाह्न को ही प्रशस्त भी कहा गया है और ये नियम भी विवाह में क्यों नहीं लगना चाहिये। श्राद्ध के लिये मध्याह्न और अपराह्न काल प्रशस्त कहा गया है किन्तु पूर्वाह्न व रात्रि का निषेध है। फिर नान्दीश्राद्ध की बात करें तो पूर्वाह्न में ही प्रशस्त होता है, तथापि जातक निमित्त होने पर रात्रि में भी प्रशस्त होता है। रात में कलश स्थापन का निषेध है।

ये जो प्रशस्त और निषिद्ध प्रकरण है सबके प्रमाण हैं, किन्तु सबके प्रमाण यहां देने की आवश्यकता नहीं है संबंधित आलेखों में प्रमाण उपलब्ध हैं। संभव है अथवा मान लें कि सभी कर्मकांडी व ज्योतिषी मूर्ख हो जायें और २ – ४ समनोरंजनकथाकार जो कर्मकांड व ज्योतिष का ककहरा भी नहीं जानते हैं वो किस आधार से विद्वान हो जायेंगे। मनोरंजन करने का तो प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं और मनोरंजन करते भी हैं किन्तु विद्वान होने का अहंकार पाल लें तो मुख बवासीर का उत्पन्न होना कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं होगी।

ये लोग बिना कोई प्रमाण दिये मुगलकाल का राग अलापते हुये रात्रिकालीन विवाह को निषिद्ध घोषित करने लगे हैं जो जनमानस को भ्रमित करने वाला है और इस विषय पर जो कर्मकांडी-ज्योतिषी जहां से प्रमाण की मांग कर सकते हैं मांगे। प्रमाणरहित होने पर कहने वाला कोई भी हो उसका कोई महत्व नहीं होता है। ये लोग जो मुख बवासीर से पीड़ित हैं उन्हें आगे से जब रात्रिकालीन विवाह का निषेध करें तो प्रमाण भी प्रस्तुत करना चाहिये। प्रमाणरहित होने पर ऐसी भ्रामक बातें करना निंदनीय होता है।

रात में विवाह होने के प्रमाण

रात में विवाह के निषिद्ध होने के प्रमाण तो हैं ही नहीं किन्तु रात्रिकालीन विवाह के पक्ष में अनेकों प्रमाण हैं और आगे वो सभी प्रमाण प्रस्तुत भी किये गये हैं। इन प्रमाणों के संग्रहकर्ता पंडित श्री उमाकांत शर्मा हैं जिसमें श्रीमान अरुण दूबे का विश्लेषण व प्रश्न करना सराहनीय है। आगे के विषय में मैं निज शब्दों की प्रविष्टि नहीं करूंगा; यथावत प्रस्तुत करूँगा। इन प्रमाणों का संग्रह सभी ज्योतिषी और कर्मकांडियों को कर लेना चाहिये नहीं तो आगे आपको समस्यायों का सामना करना पर सकता है क्योंकि उनसे जुड़े यजमान आपसे रात में विवाह के प्रमाण की मांग कर सकते हैं, भले ही उनसे निषेध का प्रमाण न मांगे।

ये लोग कितने भी मुख बवासीर से पीड़ित हो जायें, भेड़चाल चलने लगें किन्तु इनके ऊपर अंधविश्वास करने वालों की संख्या तो बड़ी होती है। अन्धविश्वास इसी को कहा जाता है जो शास्त्रज्ञान से रहित होने पर भी धर्म-अध्यात्म बताये और उसकी बातों पर विश्वास करें।

अन्धविश्वास सम्बन्धी चर्चा हम पूर्व में ही कर चुके हैं और यह प्रकरण इसका ज्वलंत उदाहरण है। ये कथावक्ता लोग तो उन्हीं श्रद्धालुओं को अंधविश्वासी की श्रेणी में धकेल रहे हैं जो इनके ऊपर विश्वास करने वाले हैं।

आगे श्रीमान अरुणदूबे जी द्वारा प्रस्तुत प्रमाण और प्रश्न यथावत दिये गये हैं :

कर्मकांड जिनका का विषय नहीं, उनके द्वारा ऐसी अनुचित बातें उचित नहीं! रात्रि कालीन विवाह अशास्त्रीय हैं इस बात से सहमत नहीं है।

आइये जानने का प्रयास करते हैं ….

  • शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन शाखा के अंतर्गत पारस्कर गृह्यसूत्र में विवाह संस्कार प्रकरण में रात्रि विवाह संस्कार में ध्रुव के दर्शन कराए जाते हैं ।
  • यही बात शिव महापुराण की रूद्र संहिता में भगवान शिव के विवाह के समय ब्रह्माजी ने नारदजी से बताई,भगवान शिव ने भी ध्रुव के दर्शन किए थे ।
  • पता नहीं ध्रुव के दर्शन दिन में कब से होने लगे?

तो फिर महाराज जी ने रात्रि कालीन विवाह को अशास्त्रीय क्यों बताया?

उपरोक्त तथ्य के समर्थन में कुछ सूत्रप्रमाण निम्न हैं :-

  • हुत्वोपोत्थायोपनिष्क्रम्य ध्रुवं दर्शयति (गोभिल गृह्यसूत्र २.३.८)
  • अरुन्धतीं च (२.३.१०)
  • अस्तमिते ध्रुवं दर्शयति ।(पारस्कर १.८.१९)
  • ध्रुवमरुन्धतीं च दर्शयति (आपस्तम्ब २.६.१२)
  • ध्रुवमरुन्धतीं सप्तऋषीनिति दृष्ट्वा वाचं विसृजेत जीवपत्नीं प्रजां विन्देयेति (आश्वालयन १.७.२२)
  • जीवन्तीं ध्रुवं स्वस्त्यात्रेयं दर्शयत्यरुन्धतीं च । एतेषामेकैकं पश्यसीत्याह पश्यामीति प्रत्याह (काठकगृह्यसूत्र २५.४५)
  • नक्षत्रेषु दृश्यमानेषु ध्रुवं दर्शयति (कौषीतिकी २५.१२)
  • अथोदितेषु नक्षत्रेषूपनिष्क्रम्य ध्रुवमरुन्धतीं च दर्शयति । (बौधायन गृह्यसूत्र १.५.१३)

शिवपुराणानुसार भगवान शिव के विवाह में ध्रुवदर्शन के पश्चात ही हृदयालम्भन और देवी पार्वती के शिर में सिन्दूर भरने का कार्य हुआ:-

तयोः शिरोऽभिषेकच बभूवादरतस्ततः । ध्रुवस्य दर्शनं विप्राः कारयामासुरादरात् ॥
हृदयालम्भनं कर्म बभूव तदनन्तरम् । स्वस्तिपाठश्च विप्रेन्द्र महोत्सवपुरस्सरः ॥
शिवाशिरसि सिन्दूरं ददौ शम्भुर्द्विजाज्ञया ।तदानीं गिरिजाभिख्याद्भुतावण्यां बभूव ह ॥

(शिवपुराण/पार्वतीखण्ड/ ५०.२-४)

अन्य साहित्य से प्रमाण :-

  • ध्रुवावलोकाय तदुन्मुखभुवा निर्दिश्य पत्याभिदधे विदर्भजा । (नैषधीयचरितम् १६.३८)
  • ध्रुवेण भर्त्रा ध्रुवदर्शनाय प्रयुज्यमाना प्रियदर्शनेन । (कुमारसम्भव ७.८५ )

रात्रौ दानं न शंसन्ति विना चाभयदक्षिणाम्।
विद्यां कन्यां द्विजश्रेष्ठा दीपमन्नं प्रतिश्रयम्॥
रात्रावपि हितं देयं यच्चान्यत्कथितं पुरा।

(विष्णुधर्मोत्तरपुराण, खण्ड – ०३, अध्याया – ३०१)

श्रीमद्देवीभागवत, तृतीय स्कन्ध में भी इक्ष्वाकुवंशीय सुदर्शन एवं काशिराजकुमारी शशिकला का विवाह रात्रि में वर्णित है।

विवाहं कुरु रात्रौ मे वेदोक्तविधिना नृप। पारिबर्हं यथायोग्यं दत्त्वा तस्मै विसर्जय॥

ध्यान दीजिएगा … शास्त्र क्या कहता है??

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः। न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्

जो पुरुष शास्त्र विधि को त्याग कर अपनी इच्छा से मन माना आचरण करता है वह न सिद्धि को प्राप्त करता है न सुख को और न परम गति को!

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्य व्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥

इस कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है ऐसा जानकर शास्त्र विधि से ही नियत कर्म करना चाहिए ।
श्रीमद् भगवत गीता/अध्याय १६/श्लोक २३-२४

वैसे तो महाराज जी का वीडियो काफी वायरल हो रहा है परंतु हम, हमारे एक मित्र का बहुत आभार व्यक्त करते हैं उन्हीं के कारण यह बात हमारे संज्ञान में आई। (आशा करते हैं कि हमारे मित्र हमारे उत्तर को अन्यथा नहीं लेंगे, क्योंकि हमारे उत्तर से समाज का कल्याण ही होगा, क्या उचित है और क्या अनुचित ? इसका निर्णय शास्त्र ही करता है व्यक्ति विशेष नहीं! )

उनका मत है कि वर को “विष्णुरूपाय” कहा गया है और भगवान विष्णु का विवाह गोधूलि लग्न में हुआ था इसलिए रात्रि कालीन विवाह शास्त्र सम्मत नहीं!

इस संबंध में पहला बिन्दु.. शास्त्रों में कहीं पर भी भगवान विष्णु के विवाह को लेकर रात्रि के विवाह का निषेध नहीं, यदि निषेध होता तो भगवान शंकर के विवाह में भगवान विष्णु आपत्ति करते !
क्या भगवान शंकर के विवाह में भगवान विष्णु नहीं गए थे?
😊

दूसरा बिन्दु… यदि एक देवता(भगवान शंकर) का विवाह रात्रि में और एक देवता का विवाह(भगवान विष्णु) दिन में हो तो इसका अर्थ यह नहीं कि दिनगत अथवा रात्रिगत विवाह का विरोधाभास उत्पन्न होगा।

तीसरा बिन्दु… जिन मूल ग्रंथों में दिन के लिए सूर्य दर्शन के लिए कहा गया है उन्हीं मूल ग्रंथों में रात्रि में ध्रुव के दर्शन के लिए भी कहा गया,जब आप और हम सूर्य दर्शन को मान रहे हैं तो ध्रुव दर्शन को भी स्वीकार करना होगा, ध्रुव प्रमाण को नकारा नहीं जा सकता!
दिनगत और रात्रिगत,दोनों ही विवाह संस्कार वैदिक सनातन पद्धति में प्राप्त है!

चलिये यदि इन महाराज जी की बातों को मान भी लिया जाए तो अनेकों प्रश्न उत्पन्न हो जाएंगे और अनेकों ग्रंथों का विरोधाभास उत्पन्न होगा ! जैसे :

  • भगवान शंकर का विवाह रात्रि काल में क्यों हुआ?
  • सबसे पहले शिव महापुराण का ही विरोध उत्पन्न होगा।
  • क्या आप और हम शिव महापुराण का विरोध करेंगे?
  • नहीं!

पारस्कर गृह्यसूत्र के साथ-साथ अन्य गृह्यसूत्र तथा जितने भी मूल ग्रंथ हैं उन सभी का विरोध उत्पन्न होगा,क्योंकि उन सभी में रात्रि में ध्रुव के दर्शन के लिए कहा !

  • क्या रात्रिकालीन विवाह का निषेध किसी स्मृत्यादि में वर्णित है?
  • नहीं!

अत: निषेध न होने की स्थिति में और शास्त्रांतर से अविरोध पर तो यह कार्य सम्यक ही सिद्ध होता है क्योंकि यह वैदिक ब्राह्मणों और लोकपरम्परा दोनों से समर्थित है।

महाराज जी का दूसरा कुतर्क है कि “मुगलों से विवाह की रक्षा के लिए रात्रिविवाह प्रारम्भ हुआ”। इनसे पूछना चाहिए कि क्या रात्रि में साम्राज्यों तक पर आक्रमण करने में सक्षम मुगलों पर क्या एक विवाह में आक्रमण करने की क्षमता नहीं थी? सैनिक, शस्त्र, संसाधन सभी उनके पास उपलब्ध थे।
अत: यह सभी कुतर्क मिथ्या ही सिद्ध होते हैं।

विवाह एक स्मार्तकर्म है जिसकी विधि का प्रतिपादन गृह्यसूत्रों में किया गया है। विवाह में मुख्यकर्म व्यक्ति की कुलपरम्परा सम्बन्धी गृह्यसूत्रानुसार सम्पादित होते है एवं शेष क्रियाएं लोकपरम्परा के आधार पर !गृह्यसूत्रों में स्पष्ट रूप से “ध्रुवदर्शन” “अरुन्धतीदर्शन” “सप्तऋषितारामण्डलदर्शन” इत्यादि कृत्यों का उल्लेख है जो सूर्यास्त के पश्चात अथवा रात्रि में ही किए जाते हैं।

महाराज जी का कहना है कि रात्रि में सस्वर वेद का पाठ नहीं किया जाता, यह वर्जित है परंतु क्या महाराज जी इतना भी नहीं जानते कि यज्ञ पूजन आदि में सस्वर मंत्रों का उच्चारण नहीं किया जाता अतः रात्रि में मंत्रोच्चारण ग्राह्य हैं।

पुनः कहना चाहूंगा कि शास्त्र ही प्रमाण है मनुष्य नहीं, फिर चाहे भगवान बुद्ध ही क्यों ना हो !
भगवान बुद्ध ने वेद विरुद्ध बातें की !
हम उन्हें भगवान तो मानते हैं परंतु उनके विचारों का अनुसरण नहीं करते, इसीलिए आपके और हमारे यहां मात्र संकल्प में “बौद्ध अवतारे” कहा जाता है परंतु वे जैसा उपदेश देकर गए हैं उनका अनुसरण नहीं करते।

निष्कर्ष : इस प्रकार हम इस प्रकरण के निष्कर्ष पर सरलता से पहुँच जाते हैं कि जो लोग रात्रिकालीन विवाह को निषिद्ध बताते हैं वो कोई प्रमाण नहीं देते हैं मात्र अनर्गल प्रलाप करते हैं जो विद्वता का संकेत न करके विपरीत संकेत करता है। यदि रात में विवाह होने के प्रमाण ढूंढते हैं तो बहुशः मिलते हैं और यही सिद्ध करते हैं कि रात में विवाह प्रशस्त है और अनर्गल प्रलाप करने वाले किसी न किसी प्रकार से ज्ञानमद में मदमस्त होते हैं और जिस विषय का कोई ज्ञान न हो उसमें भी “आ बैल मुझे मार” चिल्लाने लगते हैं।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।


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