अंधविश्वास एक ऐसा शब्द है जिसे जब-जहां-जिसे मन करे सनातन की निंदा करने के लिये कहता-सुनता है। अंधविश्वास मात्र सनातन पर आघात करने के लिये ही प्रयोग किया जाता है, अन्य पंथों के लिये नहीं भले ही उसमें कितनी भी जाहिलियत क्यों न हो। किन्तु एक दूसरा पहलू यह है कि अंधविश्वास क्या है (andhvishwas kya hai) ये पूछो तो कोई बता नहीं पाता है कुछ भी गोल-मोल करके पीछा छुड़ा लेता है। यहां हम अंधविश्वास को समझेंगे एवं विश्वास और अंधविश्वास में भेद को भी उदाहरण सहित समझेंगे।
अंधविश्वास किसे कहते हैं उदाहरण सहित जाने और समझें ~ andhvishwas kya hai
अंधविश्वास-रूढ़िवाद-दकियानूसी आदि शब्दों द्वारा सदैव सनातन के सभी विषयों को निर्मूल, अप्रमाणिक, अवैज्ञानिक आदि सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है। अंधविश्वास के बारे में एकबार तो यह स्वीकार भी किया जा सकता है कि यह संस्कृत शब्द है, किन्तु दकियानूसी तो संस्कृत शब्द नहीं है इसका भी अंधविश्वास का पर्यायवाची के रूप में सनातन के विरुद्ध ही प्रयोग किया जाता है, जिसका शब्द है उसके लिये नहीं।
किन्तु सनातन द्रोही ऐसा इसलिये कर पाते हैं क्योंकि सनातन के भी जो प्रसिद्ध कथावाचक आदि होते हैं वो मात्र उदरपोषण के निमित्त नटवेश धारण कर गांधर्व क्रियाओं में संलिप्त रहते हैं जनमानस को ज्ञान नहीं देते। आगे अंधविश्वास को समझने के पश्चात् ज्ञात होगा कि इन नट-नर्तकों पर भी जो विश्वास होता है वो अंधविश्वास ही होता है।
हमें अंधविश्वास को गंभीरता से समझना और अन्य सनातनी को भी समझाना आवश्यक है जिससे सनातन पर आघात को नियंत्रित किया जा सके। आइये अंधविश्वास के वास्तविक तात्पर्य को समझते हैं जिससे अंधविश्वास का निवारण किया जा सके।

हम अंधविश्वास के वास्तविक तात्पर्य को समझें उससे पूर्व यह आवश्यक है कि सनातनद्रोही अंधविश्वास के बारे में क्या बताते हैं वो भी समझें। धर्मद्रोहियों के अनुसार जो अतीन्द्रिय विषय है उसमें विश्वास करना अंधविश्वास है जैसे आत्मा-स्वर्ग-नरक आदि। यद्यपि वो इसी भाव को अन्य उदाहरण प्रस्तुत करते हुये भिन्न शब्दों में व्यक्त करते हैं। उनकी व्याख्या के अनुसार :
- जब तक वायुयान का निर्माण नहीं हुआ था तब तक रामायण का पुष्पक विमान कल्पना थी, अंधविश्वास था। जबसे वायुयान का निर्माण हो गया तबसे वो अंधविश्वास नहीं है।
- जब धनञ्जय धृतराष्ट्र को लाइव महाभारत बता रहा था तो वो अंधविश्वास था; किन्तु जब दूरदर्शन-इंटरनेट आदि आ गया तो अंधविश्वास नहीं रहा दूरस्थ घटनाओं को भी तत्क्षण देखे जा सकते हैं जिसे लाइव कहा जाता है।
- व्रत करना अंधविश्वास है किन्तु जब शोध में यह ज्ञात हुआ कि फास्टिंग करने से इम्यून सेल बनते हैं तो वह वैज्ञानिक हो गया।
वास्तविकता यह है कि एक विशेष विचारधारा है जो मात्र तर्क-कुतर्क-षड्यंत्र में विश्वास करती है, विश्व में अनाचार-अव्यवस्था-अनैतिकता का साम्राज्य स्थापित करना चाहती है किन्तु मुखौटा लगाती है आधुनिकता और वैज्ञानिकता की जिसके सिद्धांत-सूत्र सभी क्षणभंगुर होते हैं।
अंतर्जाल रूपी मंच भी इसी विचारधारा के अधीन काम करता है और उसके अनुकूल विषयों-विचारों को प्रचारित-प्रसारित करता है एवं जो उसका खंडन करने वाले विचार होते हैं, भले ही वो कितने भी प्रामाणिक क्यों न हों उसकी अभिव्यक्ति तक की स्वतंत्रता का भी हनन करने से पीछे नहीं हटते। इसका भी उदाहरण है जो भारतीय चिकित्सा पद्धति में विभिन्न असाध्य रोगों को भी साध्य कहता है उपचार करता है किन्तु वैधानिक रूप से बोल नहीं सकता, पतंजलि और IMA के विवाद में यह देखा जा चुका है।
अंधविश्वास में जो दो शब्द हैं, जो अर्थ है जो वास्तविक तात्पर्य है उसे न तो कोई समझता है, न कहीं चर्चा होती है किन्तु बोलने के लिये तपाक से कभी भी अंधविश्वास बोल देता है। यदि आपके समक्ष भी कोई अंधविश्वास-अंधविश्वास का रोना रोये तो उससे पहले अंधविश्वास क्या है यह पूछें।
अंधविश्वास किसे कहते हैं ~ andhvishwas kya hai
अंधविश्वास दो शब्दों से मिलकर बनता है अंध और विश्वास। अंध का सीधा अर्थ है अंधा, अंधे के द्वारा, अंधे पर आदि और विश्वास का तात्पर्य है जो बताया-कहा जा रहा है उसे शर्तरहित भाव से स्वीकार करना, सत्य समझना। दोनों शब्द मिलकर जो वास्तविक अर्थ प्रकट करते हैं उसे कुछ उदाहरणों के माध्यम से सरलतापूर्वक समझा जा सकता है।
एक अंधा व्यक्ति यात्रा नहीं कर सकता है उसे चलने के लिये किसी छड़ी, किसी व्यक्ति की आवश्यकता होती है। प्रथमतया अंधविश्वास का यही अर्थ प्रकट होता है कि अंधा व्यक्ति जो कि छड़ी अथवा अन्य व्यक्ति पर विश्वास करता है वह अंधविश्वास है क्योंकि इसमें अंधा भी है और विश्वास भी है। किन्तु इसमें अंधविश्वास नहीं है, अंधा व्यक्ति जो होता है वह छड़ी हो अथवा व्यक्ति जो सहारा दे रहा होता है उस पर विश्वास करता है, यह विश्वास होता है।
पुनः इसका विपरीत भाव भी हो सकता है कि कोई आंख वाला व्यक्ति अंधे पर विश्वास करके उसका सहारा लेकर चले। अंधविश्वास का सांसारिक तात्पर्य यही है कि अंधे पर विश्वास करना। अंधे के ऊपर जो पथप्रदर्शन हेतु जो विश्वास हो वह अंधविश्वास है।
किन्तु यह सांसारिक उदाहरण मात्र समझाने के उद्देश्य से दिया गया है सांसारिक जीवन में अंधविश्वास होता ही नहीं है, जब दो व्यक्ति हों जिसमें से एक अंधा हो और दूसरा आंख वाला तो सदैव अंधा व्यक्ति ही आंख वाले पर विश्वास करेगा, आंखवाला अंधे पर कभी भी विश्वास नहीं करेगा। अतः अंधविश्वास सांसारिक जीवन का विषय ही नहीं है और अंधविश्वास शब्द का प्रयोग कभी भी सांसारिक जीवन में नहीं किया जाता है अपितु जब भी सनातन धर्म विषयक कोई चर्चा होती है तब अंधविश्वास कहा-सुना जाता है।
वर्त्तमान युग की सबसे बड़ी समस्या भी यही है कि हम विभिन्न संचारमाध्यमों से ही सबकुछ जानना-समझना चाहते हैं और इन सभी माध्यमों के द्वारा हमें जो कुछ भी बताया जा रहा है, सब अंधों के द्वारा बताया जा रहा है और सबके-सब अंधविश्वास की ही श्रेणी में आते हैं। चाहे किसी कोई फिल्म हो, धारावाहिक हो अथवा अन्य आलेख-विडियो आदि हो वहां पर धर्म की चर्चा करने वाला भी अंधा ही होता है जिसे सांसारिक रूप से बुद्धिजीवी, पढ़ा-लिखा, शिक्षित आदि कहा जाता है।
किसी भी फिल्म, धारावाहिक आदि जो धर्म-संस्कार से भी संगत लगता है उसमें भी क्या-क्या दिखाया जाता है ?
- वो ये दिखाते हैं कि सांई मंदिर जाओ, साईं को भगवान मानो। सांई को किसने भगवान बनाया है ? इन्हीं लोगों ने बनाया है।
- वो ये दिखाते हैं कि पत्नी यदि पति के लम्बी आयु हेतु कड़वा चौथ करती है तो पति को भी पत्नी के लिये कड़वा चौथ करना चाहिये।
- वो ये दिखाते हैं कि पति परमेश्वर होता है, पत्नी तो पति को प्रणाम करती है किन्तु अब पति ही पत्नी को प्रणाम करे। पत्नी देवी होती, लक्ष्मी होती है उसे प्रणाम करना चाहिये।
- घर में द्वादशाङ्गुल प्रतिमा की पूजा करने का ही विधान है किन्तु ये बड़ी-बड़ी प्रतिमा रखने का संदेश दे रहे हैं।
- इनके ज्योतिषी भी अंधे ही होते हैं, वो प्रपोजल मुहूर्त बताते हैं।
- ये लोग पंडितों को स्टाफ की तरह दिखाते हैं, जबकि कहीं भी कर्मकांडी के प्रति स्टाफ की भांति व्यवहार नहीं होता है, कुछ मूर्खों को छोड़कर।
- ये लोग भले ही जी लगा दें किन्तु पति-पत्नी को एक-दूसरे का नाम लेते हुये ही दिखाते हैं, जबकि पति-पत्नी को एक-दूसरे का नाम नहीं लेना चाहिये। बड़े पुत्र का भी नाम नहीं लेना चाहिये और गांवों जाकर देखिये आज भी कई बूढ़े मिलेंगे जिनका नाम ही वौआ-नुनू आदि होता है, वास्तविक नाम लोग जानते भी नहीं। ये बड़े पुत्र होते हैं और बड़े पुत्र को वास्तविक नाम से नहीं पुकारना चाहिये।
- ये लोग जब कभी भी धर्म में आस्था रखने वालों को दिखाते हैं, तिलक-शिखा आदि धारण करने वालों को दिखाते हैं तो नकारात्मक भाव प्रकट करने के लिये दिखाते हैं। अपराधी-दुराचारी-भ्रष्ट आदि बनाकर दिखाते हैं।
- ये बच्चों को विद्रोही बनने का संदेश देते हैं, बच्चे स्वच्छन्द-अनाचारी-उच्छृंखल बनते जा रहे हैं। परिवार का विघटन बढ़ता जा रहा है वो इन्हीं सबकी देन है।
और चूंकि हम विश्वास के साथ सभी प्रकार की जानकारी इन्हीं स्रोतों से प्राप्त कर रहे हैं तो वो हमें भ्रामक जानकारी देते हुये भ्रमित भी कर रहे हैं, यही अंधविश्वास है। हम यह मान लेते हैं कि साईं भी भगवान हैं, पति को भी कड़वा चौथ करना चाहिये, पति-पत्नी एक-दूसरे को नाम से पुकार सकते हैं आदि-इत्यादि। यही अंधविश्वास है।
लेकिन क्यों, किस आधार से ?
क्योंकि ये बताने वाले जो हैं वो अंधे हैं एवं हम उन अंधों पर विश्वास कर लेते हैं इस कारण ये अंधविश्वास है।
और परोक्षतः ये अंधे ही हमें सीखा रहे हैं कि स्वर्ग-नरक, आत्मा-परमात्मा आदि अंधविश्वास है। प्रत्यक्ष शब्द आत्मा-परमात्मा तो नहीं होता है कुछ और रखा जाता है किन्तु जो स्वयं अंधे हैं और हमें अंधविश्वासी बना रहे हैं वही अंधविश्वास की मनगढंत व्याख्या भी कर रहे हैं।
अंधविश्वास वास्तव में आध्यात्मिक जीवन से संबंधित है और इसकी व्याख्या आध्यात्मिक गुरु ही कर सकते हैं, सांसारिक जीवन में आकण्ठ डूबा हुआ व्यक्ति, समुदाय, संगठन नहीं कर सकता क्योंकि अंधविश्वास सांसारिक जीवन से संबद्ध ही नहीं है।
अब एक प्रश्न उत्पन्न होता है कि इन्हें अंधा क्यों कहा जा रहा है ? इनके भी आंख हैं और आंखों से ये देखते भी हैं। वास्तव में ये सांसारिक आंखों के आधार पर अंधे नहीं हैं और यहां हमने अंधा नहीं कहा है। ये लोग आध्यात्मिक दृष्टिकोण से अंधे हैं और इन्हें शास्त्र अंधा कहता है। आध्यात्मिक जीवन में नेत्र विषयक प्रमाण पूर्व आलेख में दिया जा चुका है किन्तु एक प्रमाण की पुनरावृत्ति की पुनः आवश्यकता है।
श्रुतिः स्मृतिश्च विप्राणां नयने द्वे प्रकीर्तिते । काणःस्यादेकहीनोऽपि द्वाभ्यामन्धः प्रकीर्तितः ॥ – हारीत स्मृति
अनेकानेक स्मृतियों में इसी प्रकार से श्रुति (वेद) और स्मृति को नेत्र कहा गया है। यह आध्यात्मिक जीवन से संबंधित नेत्र है। इनमें से यदि एक का ज्ञान न हो तो वह आध्यात्मिक रूप से काण (काना) होता है और यदि एक का भी ज्ञान न हो तो वह अंधा होता है। अंधा का तात्पर्य यह है कि वह आध्यात्मिक यात्रा करने में सक्षम नहीं होता है।
(आलेख में जहां कहीं भी अंधा कहा गया है वहां यही भाव है न कि भौतिक अंधता, और इसका प्रमाण विभिन्न शास्त्रों में है, मेरा व्यक्तिगत विचार मात्र नहीं है।)
उपरोक्त प्रमाण के अनुसार जो अंधे हैं उनके ऊपर विश्वास करना अर्थात अंधे के ऊपर विश्वास करके आध्यात्मिक यात्रा करना है अर्थात अंधविश्वास है।
अंधविश्वास की परिभाषा : आध्यात्मिक रूप से श्रुति-स्मृति रूपी नेत्रविहीन को अंधा कहा गया है और उसके ऊपर विश्वास करना अंधविश्वास है।
अब अंधविश्वास क्या है, अंधविश्वास की परिभाषा क्या है पूर्णतः स्पष्ट हो गया है। लेकिन और गहराई से समझने के लिये कुछ विशेष उदाहरणों की आवश्यकता है जिससे विश्वास और अंधविश्वास में अंतर भी स्पष्ट हो जायेगा। क्योंकि अंधे पर विश्वास करना अंधविश्वास है तो जो अंधा नहीं है उसके ऊपर विश्वास करना अंधविश्वास नहीं विश्वास है।
प्रथम उदाहरण : वर्ष पर्यन्त अनेकानेक व्रत होते रहते हैं किन्तु व्रत में देखा यह जाता है कि किसी के कहे-सुने अनुसार लोग कोई भी व्रत कर लेते हैं। व्रत और देवता पर विश्वास है वहां सही है किन्तु किसके उपदेश से कर रहे हैं यह महत्वपूर्ण है।
एकादशी व्रत की भी विशेष विधि है किन्तु विधिवत व्रत करने वाले ढूंढने से नहीं मिलेंगे क्योंकि अंधों के उपदेश से आरंभ कर लेते हैं अंधे व्यक्ति उन्हें व्रत का तात्पर्य अनशन करके किसी प्रकार से देवता की पूजा करना बता देता है और उसी प्रकार से किया करते हैं। जबकि एकादशी व्रत की बहुत सारी विधियां एकादशी व्रत कथा सुनकर भी समझी जा सकती है। यह अंधविश्वास तब नहीं होगा जब विद्वान ब्राह्मण जो वेद-स्मृति के ज्ञाता हों, व्रत की आज्ञा दें, विधि-विधान बतायें।
द्वितीय उदाहरण : इसी प्रकार कड़वा चौथ भी एक व्रत है किन्तु फिल्म और धारावाहिकों को देखकर आरंभ करने वालों की संख्या उनकी तुलना में अधिक होगी जो क्षेत्रीय परंपरा से करते हैं। यह अंधविश्वास है क्योंकि इसमें बताने वाला (उपदेशकर्ता) अंधा है। इसी प्रकार बहुत सारे पुरुषों ने भी कड़वा चौथ से आधुनिकता का प्रदर्शन करना आरंभ किया है और यही अंधविश्वास है।
तृतीय उदाहरण : इन्हीं माध्यमों के द्वारा जानकारी प्राप्त करके बहुत लोगों ने साईं को भगवान बनाकर पूजा करना प्रारंभ कर दिया, घरों में चित्र-प्रतिमा आदि रखने लगे। चूंकि प्रेरक/उपदेशक अंधा है इस कारण यह अंधविश्वास है। इसी कड़ी में कब्र पर चादर चढाने की प्रेरणा भी अंधे ही किया करते हैं और अंधे ही उपदेशक होते हैं इस कारण यह भी अंधविश्वास है।
अब इनके दोमुहेंपन को देखिये इन्होंने ही अंधविश्वास फैलाया है और वर्त्तमान में भी फैला रहे हैं एवं उसे आस्था का नाम दे देते हैं और दूसरे मूंह से अंधविश्वास-अंधविश्वास चिल्लाते रहते हैं। अर्थात अंधविश्वास फैला भी रहे हैं और अंधविश्वास का रोना भी रो रहे हैं।
अब जाकर यह भी स्पष्ट हो जाता है कि वर्तमान में जो बड़े-बड़े प्रसिद्ध कथावाचक हैं वो भी अंधे हैं। क्योंकि उन्होंने जो पद ग्रहण कर रखा है उस पद के अनुसार उपदेश नहीं करते हैं, मनोरंजन मात्र करते हैं। यदि ज्ञान हो भी किन्तु उसका प्रयोग न हो तो उसके होने का क्या प्रयोजन अपितु वैसा ज्ञान तो भार ही होता है “ज्ञानं भारः क्रियां विना” ये लोग डंके की चोट पर शास्त्राज्ञा का उल्लंघन करते हैं अथवा शास्त्र के ज्ञानी नहीं है रट्टूमल तोता हैं। इनके विषय में अन्य आलेखों में विस्तृत चर्चा की गयी है इस कारण उसी चर्चा की पुनरावृत्ति अनावश्यक है।
जो कर्मकांड सीखना चाहते हैं, आध्यात्मिक यात्रा करना चाहते हैं उनके लिये अंधविश्वास को भलीभांति समझना आवश्यक होता है और आशा है इस आलेख में भलीभांति समझ गये हों।
निष्कर्ष : अंधविश्वास का संबंध आध्यात्मिक जीवन से है और सांसारिक जीवन जीने वाले हमें अंधविश्वास के विषय में जो बताते है उसपर विश्वास करना भी अंधविश्वास की ही श्रेणी में आता है। शास्त्रों में श्रुति (वेद) और स्मृति को नेत्र कहा गया है और इस नेत्र से विहीन व्यक्ति को अंधा कहा गया है। इस प्रकार इन श्रुति-स्मृति का जिसे ज्ञान न हो उस अंधे के कथन पर विश्वास करना अंधविश्वास होता है।
विनम्र आग्रह : त्रुटियों को कदापि नहीं नकारा जा सकता है अतः किसी भी प्रकार की त्रुटि यदि दृष्टिगत हो तो कृपया सूचित करने की कृपा करें : info@karmkandvidhi.in
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।
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