कर्मकाण्ड के विषय में भ्रम का मूल कारण यह है कि वर्त्तमान में अनेकों विधर्म को भी धर्म घोषित किया जा रहा है और जनमानस को यही सिखाया-बताया जा रहा है और भ्रमित जनमानस शास्त्रों से विमुख होकर ऐसा ही समझती है।
इसके साथ ही लोकतंत्र का यह स्वभाव है कि वह जनमानस को अपने अनुकूल परस्पर विरोधी समूहों में बांट ले अथवा यदि कोई व्यस्थित समूह हो तो उसी का अपने अनुकूल प्रयोग करे। एवं आज घर-घर में देखने को मिल सकता है वामपंथी कहना तो समझ में आता है दक्षिणपंथी कहना भी समझ आता ही है किन्तु एक घर में यहां तक कि पति-पत्नी, पिता-पुत्र, भाई और बहनों के मध्य यदि कोई विरोध न हो तो भी एक विरोधाभास राजनीतिक दल और नेता को लेकर होता ही है। (अपवादातिरिक्त)
लोकतंत्र की राजनीति जनमानस के चिन्तन-मनन की दिशा स्वयं की ओर कर लेती है और ये उसके अस्तित्व हेतु अनिवार्य है यदि ऐसा न करे तो उसका अस्तित्व न रहे। जब तक जनमानस भ्रमित रहेगी तभी तक लोकतंत्र का राग अलापा जा सकता है और इस कारण जनमानस को दिग्भ्रमित करके रखना लोकतंत्र को जीवित रखने की अनिवार्य शर्त है।
यह एक कलयुगी शासन प्रणाली है जहां कलयुग स्वयं की सत्ता भी स्थापित कर लेता है। हम इस विषय में उलझने के लिये प्रवेश नहीं कर रहे हैं अपितु उस तथ्य को समझने हेतु संदर्भ के रूप में ग्रहण कर रहे हैं और यहां यह सिद्ध हो रहा है कि किसी भी सूचना तंत्र से जुड़े व्यक्ति के पास यदि कुछ अतिरिक्त विश्राम अथवा अन्य चिंतन-मनन का समय हो तो उस समय का लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था अपहरण कर लेती है। और इसका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण यह है कि यज्ञमंडप में उपस्थित कर्मकाण्डी भी अतिरिक्त समय में राजनीति की चर्चा करने लगते हैं। इससे उत्कृष्ट उदाहरण हो ही नहीं सकता।
इस कारण जनमानस कर्मकाण्ड का मूल भाव ग्रहण करती है उसको बिन्दुवार कुछ इस प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है :
- कभी-कभार अथवा प्रतिदिन किसी मंदिर में जाना, तीर्थों में जाकर डुबकी लगाना आदि।
- घर में कोई चित्रादि रखकर फूल-अगरबत्ती दिखाना, भले ही वो चित्र भूत-प्रेत की क्यों न हो।
- श्राद्ध कर्म से विमुक्ति अथवा पूर्णतः अनुकूलित प्रदर्शन मात्र, अनुकूलित प्रदर्शन का तात्पर्य भी कर्म से विमुक्ति ही है।
- विवाहादि को पटाखे, कैमरे आदि तक सीमित कर लेना। कर्म करते समय जिस व्यक्ति का अवलोकन भी नहीं करना चाहिये उसका मंडप में भरपूर सान्निध्य प्राप्त करते हैं, वार्त्तालापादि करते हैं।
कर्मकांड का इससे अधिक ज्ञान सामान्य रूप से अदृष्ट। यहां प्रयोजन सिद्धि इस प्रकार होती है कि यदि कहीं न कहीं से रत्ती भर भी आशा की किरण मिल रही है तो उसको प्रगाढ़ करने का प्रयास होना ही चाहिये। यदि प्रदर्शन के उद्देश्य से कुछ करते रहे हैं और कर रहे हैं तो आगे यह समझने-समझाने का प्रयास अवश्य होना ही चाहिये वास्तविकता क्या है ?
हम जो कर रहे हैं वही कर्मकांड शास्त्र-सम्मत है अथवा शास्त्रविरुद्ध है किन्तु हमें यह ज्ञात ही नहीं है।
एक उदाहरण से समझें यदि आप गंगा स्नान करने जाते हैं (कभी भी) अथवा अन्यान्य तीर्थों में भी जाते हैं तो आपको उसका शास्त्रीय विधान समझने की जिज्ञासा होनी ही चाहिये।
दूसरे उदाहरण से समझते हैं यदि आप एकादशी आदि व्रत कर रहे हैं तो आपको उस व्रत विषयक शास्त्रीय विधान का ज्ञान होना चाहिये और यदि नहीं है तो न्यूनतम जिज्ञासा तो आवश्यक है।
यदि कर्मकाण्डी हैं तब दूसरे उदाहरण से समझ सकते हैं :
वर्त्तमान में विधवा विवाह अथवा तलाक लेकर द्वितीय विवाह का प्रचलन आरम्भ हो गया है। यहां अशौच विधान भिन्न है अर्थात उस विवाहिता पत्नी और उससे उत्पन्न पुत्रों से जिस प्रकार का अशौच विधान है द्वितीय विवाहिता (परस्त्री) और उससे उत्पन्न पुत्र का उससे भिन्न विधान है और आप यह नहीं जानते हैं तो यह समस्या नहीं है, किन्तु यदि यह जानने की जिज्ञासा भी नहीं है तो चिंताजनक है।
वर्त्तमान काल की जो वास्तविक स्थिति है वह इससे भी गंभीर है; ज्ञान भी नहीं, जिज्ञासा भी नहीं किन्तु सर्वज्ञ का अहंकार भी है।
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