Headlines

प्राक्कथन

नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि । अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्॥ 

सनातन धर्म में कर्मकांड केवल बाह्य अनुष्ठान नहीं, अपितु अंतःकरण की शुद्धि और देवऋण, पितृऋण तथा ऋषिऋण से विमुक्ति और आत्मकल्याण का शास्त्रीय मार्ग है जो सबसे सरल है। सरल का तात्पर्य यह है कि अन्यान्य अन्यान्य मार्ग में ही विशेष प्रयास की आवश्यकता होती कर्मकाण्ड मार्ग में नहीं। 

यदि कोई कर्मकाण्ड का आश्रय लेता है तो इसका तात्पर्य है कि वह कर्म तो पहले भी करता था आगे जी आजन्म करेगा किन्तु अब वह अपने कर्म को ही आत्मकल्याण का साधन बना रहा है। यदि कोई व्यक्ति कर्मकाण्ड का आश्रय नहीं करता है तो भी स्नान, भोजन, शयन, जागरण, भ्रमण, समागम आदि करेगा ही करेगा किन्तु वह उसके लिये विष का कार्य करेगी, दुःख और का मार्ग प्रशस्त करेगी। 

किन्तु यदि वही व्यक्ति धर्म और शास्त्र आस्था रखते हुये आत्मकल्याण की कामना से कर्मकाण्ड का आश्रय ग्रहण कर ले तो यह उसके लिये सर्वोत्तम और सबसे सरल उपाय होगा और उसके आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करेगा, सुख-स्वर्गादि प्रदान करेगा। 

यदि हम विषय का विस्तार न करें तो संक्षेप में मुख्य भाव यह है कि कर्मकाण्ड का वास्तविक तात्पर्य यह है कि हम कर्म किये बिना नहीं रह सकते किन्तु हमारे कर्म का परिणाम दुःख न होकर सुख हो। 

हम स्वाभाविक रूप से जो कुछ भी कर सकते हैं वो सभी शास्त्रीय मर्यादा के अनुरूप करें तो वही हमारे लिये कल्याणकारी जो जायेगा। यदि शास्त्रीय मर्यादा के अनुरूप न करें तो वह केवल और केवल दुःख का कारण बनेगा। 

सर्वप्रथम इस प्रवृत्ति के साथ कर्म को करना कि कल्याण का मार्ग प्रशस्त हो यह प्रवृत्तिमार्ग है और सुखदायक अर्थात नरक के दुःख से त्राण देकर स्वर्गप्रदायक होता है । ये कर्मकाण्ड का प्रारम्भ है किन्तु जब हम शस्त्रीय मर्यादा का पालन करना आरम्भ करते हैं तो शास्त्र में हमारी रूचि, श्रद्धा, विश्वास आदि प्रगाढ़ होता रहेगा और मुख्य फल कर्तृत्व भाव से भी मुक्ति प्रदान कर देगा। 

कर्मबन्धन ही आवागमन का कारण है और कर्मबन्धन से मुक्त हो जाना ही मुक्ति है। 

कर्मकाण्ड सीखें विषय में इस मुख्य भाव को ग्रहण करना अनिवार्य है और यदि इस मुख्य भाव को ग्रहण करेंगे तो शास्त्रीय मर्यादा, शास्त्रीय विधान आदि के सापेक्ष ही विश्लेषण आदि संभव है और प्रामाणिक विधि ही प्रस्तुत की जा सकती है, मनगढंत स्वेच्छाचार को लोकाचार-परम्परा आदि के नाम पर ग्रहण नहीं किया जा सकता। लोकाचार-परम्परा आदि के नाम पर भी केवल उन विषयों को ही ग्रहण किया जा सकता है जहां शास्त्रीय विधान बाधित न हो, कर्म विकृत न हो जो अंततः दुःखदायी जो जाये। 

यहां कर्मकाण्ड के विभिन्न विषयों को १६ श्रेणियों में विभाजित किया गया है और यह अनिवार्य है कि वर्त्तमान काल में युगप्रवृत्ति के अनुरूप संसाधन भी उपलब्ध किये जायें। सभी श्रेणियों में अध्ययन के उपरांत आत्ममूल्यांकन को भी संयुक्त किया गया है जिसको एक ऐसे नियम से संयुक्त कर दिया गया है कि प्रथम खण्ड को समझे बिना द्वितीय खण्ड में प्रवेश ही नहीं हो सकता। इस कारण से जो कर्मकांड सीखना चाहते हैं उनके लिये या अनुप्रयोग विशेष लाभकारी सिद्ध होगा क्योंकि यहां अवलोकन मात्र नहीं कराया जा रहा है ग्रहण करना ही होगा। 

आत्ममूल्यांकन में सफलता हेतु ७०% अंकों की अनिर्वायता जोड़ी गई है जो गहन अध्ययन हेतु प्रेरित करेगा। यह भी ध्यातव्य है कि ये कोई शैक्षणिक प्रमाणपत्र नहीं है और न ही “संपूर्ण कर्मकाण्ड विधि” कोई पंजीकृत शैक्षणिक संस्थान और यह भी सत्य है कि कर्मकाण्ड के व्यावहारिक पक्ष में किसी पंजीकृत शैक्षणिक संस्थान के प्रमाणपत्र की कोई आवश्यकता भी नहीं होती है। 

आत्ममूल्यांकन का प्रयोजन एकमात्र कर्मकांडियों के स्वयं के आकलन हेतु ही है, इससे भिन्न कुछ भी नहीं । 


Discover more from कर्मकांड सीखें

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *