मनुष्य जन्म आत्मकल्याण के लिये सौभाग्य से प्राप्त होता है। आत्मकल्याणार्थ सतत आध्यात्मिक यात्रा पर अग्रसर रहना चाहिये। कर्मकांड मात्र आध्यात्मिक यात्रा में ही नहीं सांसारिक यात्रा में भी एक महत्वपूर्ण अंग है। कर्मकांड में संस्कारों का भी महत्वपूर्ण स्थान है, और संस्कारों में स्वयं के शाखा का भी महत्वपूर्ण स्थान है। लोग संस्कार करने में भी पिछड़ रहे हैं और शास्त्रों में मात्र संस्कार ही नहीं स्वशाखा के अनुसार संस्कार की अनिवार्यता बताई है। यहां हम परशाखा ग्रहण अर्थात शाखारण्ड दोष के विषय में चर्चा करेंगे।
शाखारण्ड : एक महत्वपूर्ण विश्लेषण – Shakharand
यो वा को वा पुनर्वच्मि स्ववेदं वा स्वसूत्रकम्। त्यक्त्वा समाश्रयेदन्यं सद्यः पातित्यमर्हति वेदत्यागेनास्य वेदस्वीकारात्सद्य एव वै॥ शाखारण्डो भवेन्नूनं न योग्यो हव्यकव्ययोः। न पङ्क्तियोग्यश्च तथा स तु स्यान्नित्यकिल्विषी॥ – मार्कण्डेय स्मृति
वर्त्तमान युग में कुलपरंपरा के पालन को रूढ़िवादिता सिद्ध कर देना ही शिक्षित होने की, आधुनिकता की पहचान हो गयी है। यदि आप अपने कुलपरंपरा का पालन करते हैं तो आपको रूढ़िवादी, उन्नीसवीं सदी का, अंधविश्वासी आदि कुछ भी कहकर अपमानित किया जा सकता है। इसी कड़ी में एक विषय उपनयन का भी है। ऐसा देखा जाने लगा है कि कहीं सामूहिक उपनयन किया जा रहा है तो कहीं शाखा-गोत्र से हटकर भी आचार्य बनाया जा रहा है जो कि गंभीर विषय है।
यः स्वशाखां परित्यज्य अन्यशाखामनुस्मरन् । उपनयनादिकं तत्र कुर्वन् विप्रो यदा भवेत्।
शाखारण्डः स विज्ञेयः सर्ववर्णबहिष्कृतः॥ चतुर्वर्गचिन्तामणी प्रायश्चित्तखंड गौतम
गौतम ऋषि के वचनानुसार जो अपनी शाखा का त्याग करके अन्य शाखा को ग्रहण करते हुये उपनयनादि कर्म करते हैं, अर्थात अन्य शाखा को ग्रहण कर लेते हैं उन्हें सभी वर्णों के लिये बहिष्कृत शाखारण्ड समझना चाहिये। पुनः वसिष्ठ जी उपरोक्त विषय पर पूर्ण सहमति रखते हुये कहते हैं :
यः स्वशाखां परित्यज्य परशाखां समाश्रयेत् । स शूद्रवद् बहिष्कार्यः सर्वकर्मसु साधुभिः॥ वसिष्ठ
उपनयन (संस्कार) मात्र की चर्चा इसलिये होती है वो भी तो प्रतीकात्मक मात्र होने लगा है और स्वेच्छाचार भी किया जाने लगा है। कुतर्क गढ़ते हुये स्वयं की कुलपरंपरा को मात्र रूढ़िवादिता कहते हुये उसके विरुद्ध व्यवहार करके स्वयं को शिक्षित/आधुनिक विचारों वाला आदि सिद्ध करने के लिये प्रदर्शन मात्र ही तो किया जाता है, बाकि संस्कार तो कुछ होता नहीं, होने को फोटोग्राफी और विडियोग्राफी होती है। रिवाज़ और रस्म निभाने वाले से संस्कार की तो अपेक्षा करनी भी नहीं चाहिये।
यच्छाखीयैस्तु संस्कारैः संस्कृतो ब्राह्मणो भवेत्। तच्छाखाध्ययनं कार्यमन्यथा पतितो भवेत्॥
स्वीया शाखोज्झिता येन ब्रह्मतेजोऽर्थिना परम्। ब्रह्महैव स विज्ञेयः सर्वकर्मसु गर्हितः॥ – वसिष्ठ
इस विषय में वशिष्ठ के और भी वचन हैं जो यह कहते हैं कि शाखा से उपनयन करे स्वयं की शाखा का अध्ययन भी करे। अध्ययन की बात जब आयी तो स्वयं की शाखा और पर शाखा का क्या करें शाखा तो होती ही नहीं है। प्रथम दिन से ही A, B, C, D/वन, टू, थ्री आदि सिखाया-पढ़ाया जाता है। विद्वद्जन इसी से समझ सकते हैं कि इसमें शाखा है ही नहीं तो स्वशाखा और परशाखा का क्या विचार किया जा सकता है।
यहां हम शाखारण्ड के विषय में विचार करेंगे जिसका तात्पर्य होता है स्वशाखा का त्याग करके परशाखा को ग्रहण करके अध्ययन करना। इसका तात्पर्य यह है कि शाखाभेद होने से भी वेदाध्ययन करना। किन्तु जब वेदाध्ययन ही न हो तो शाखाभेद का क्या, शाखा नामक कुछ विषय शेष ही नहीं बचता।
तथापि सबके-सब ऐसे नहीं हैं, भले ही अत्यल्प हों किन्तु शास्त्रवचनों को स्वीकार करते हुये धर्ममार्ग पर चलने वाले भी हैं और यह शाखारण्ड विषय उन्हीं के लिये उपयोगी है न की उनके लिये जो शास्त्र को स्वीकारते ही नहीं, अध्ययन ही नहीं करते अपितु जलाने की बात ही नहीं करते हैं जलाते भी हैं। अन्य शाखा वाले यदि अधिक विद्वान, ब्रह्मतेज संपन्न भी हों तो भी ब्रह्मतेज आदि की कामना से भी स्वशाखा का त्याग करने से पातित्य की ही प्राप्ति होती है, वसिष्ठ जी के वचन में वह ब्रह्महत्यारा है।
उच्छेता तस्य वंशस्य रौरवं नरकं व्रजेत् ॥ वीरमित्रोदय में तो उसे रौरवनरक का भागी बताया गया है।
स्वसूत्रोक्तविधानेन सन्ध्यावन्दनमाचरेत्। अन्यथा यस्तु कुरुते आसुरीं तनुमाप्नुयात्॥ विश्वामित्र संहिता
विश्वामित्र ने कहा है स्वसूत्र (गृह्यसूत्र) अर्थात स्वयं की शाखा विधि के अनुसार संध्या-वन्दनादि करे, आसुरी ही सिद्ध होता है और तदनुसार फलकारक भी। संध्या-वंदनादि का आरंभ तो उपनयन से ही होता है। यदि उपनयन ही परशाखा में हो तो संध्या-वंदनादि भी तो उसी शाखा का किया जायेगा। अन्य सभी कर्म तो उपनयन की शाखा के अनुसार ही होगा।
स्वे स्वे गृह्ये यथा प्रोक्तास्तथा संस्कृतयोऽखिलाः। कर्तव्या भूतिकामेन नान्यथा सिद्धिमृच्छति ॥ अंगिरा, आश्वलायन
स्वयं के गृह्यसूत्रोक्त विधि के अनुसार संस्कार करने से ही उसकी सिद्धि होती है, फलित होता है अन्यथा अर्थात अन्य गृह्यसूत्रोक्त विधि से नहीं।
यो न मन्त्रैः स्वशाखोक्तैः संस्कृतोनाधिकारिणा। नासौ द्विजत्वमाप्नोति पुनःसंस्करणं विना ॥ ज्योतिर्निबंध
ज्योतिर्निबंध में कथन मिलता है कि जिसका स्वशाखोक्त मंत्र-विधि आदि से अधिकारी द्वारा संस्कार न किया जाये उसे स्वशाखोक्त मंत्र-विधि-अधिकारी द्वारा पुनः संस्कार किये बिना द्विजत्व की प्राप्ति ही नहीं होती है।
इसका तात्पर्य यह भी निकलता है कि कदाचित अज्ञानतावश किसी का संस्कार परशाखोक्त मंत्र-विधि-अधिकारी द्वारा हो जाये तो भी ज्ञान होने पर स्वशाखा में पुनर्वापसी संभव है किन्तु इसके लिये पुनः स्वशाखोक्त मंत्र-विधि-अधिकारी द्वारा संस्कार की भी आवश्यकता होती है।
यहां संस्कार शब्द से मुख्य भाव उपनयन मात्र नहीं सभी संस्कार समझना चाहिये। उपनयन को विशेष महत्व है इतना भाव ही ग्रहण करे।
पितापितामहोभ्राता ज्ञातयो गोत्रजाग्रजाः । उपायनेधिकारीस्यात् पूर्वाभावेपरः परः ॥ – वृद्धमनु
वृद्धमनु ने पिता, पितामह, भ्रातादि से गोत्रजाग्रज तक को पूर्वाभाव में अधिकारी बताया है। अन्यत्र भी यही नियम प्राप्त होता है।
पितैवोपनयेत् पुत्रं तद्भावे पितुःपिता । तदभावे पितुर्भ्राता तदभावे तु सोदरः ॥ – प्रयोगरत्न
पिता आदि से संबंध अधिकारी निर्णय का विषय उपनयनपरक ही है और ब्राह्मण के निमित्त ही है। क्षत्रियादि के लिये कुलपुरोहित को ही उपनयन का अधिकार है और इसी प्रमाण से भगवान श्रीकृष्ण गर्गाचार्य के आश्रम गये थे।
शाखारण्ड सरल शब्दों में
उपनयनाधिकारी विषयक प्रमाणों से भी शाखारण्ड की सिद्धि होती है। इसका कारण क्या है ? आदि को और अधिक सरलता से समझने के लिये आगे थोड़ी और चर्चा की गयी है जिसे समझना बहुत ही सरल है।
ब्राह्मणों के उपनयन हेतु अधिकारी का शास्त्रों में वर्णन मिलता है जिससे यह ज्ञात होता है कि पिता-पितामहादि अधिकारी हैं, किन्तु किसी भी स्थिति में जो सगोत्र न हो वह अधिकारी नहीं है। इसका कारण यही है कि सगोत्र भी एक शाखा का ही होगा, यदि वह भी सगोत्र मात्र हो किन्तु शाखारण्ड हो अर्थात शाखा का त्याग कर चुका हो तो अधिकारी नहीं होगा। जैसा की वर्त्तमान में देखा जाता है विभिन्न संस्थाओं/संगठनों द्वारा सामूहिक उपनयन किया जाता है, और उसमें बिना शाखा विचार किये सबको एक विधि और मंत्र से जनेऊ पहना दिया जाता है यह अनुचित है।
प्रथम तो एक आचार्य एक ही बरुआ का उपनयन करे इस नियम का भी खंडन होता है और द्वितीय शाखा त्याग का क्योंकि शाखा ज्ञात किये बिना किस शाखा से उपनयन हो इसका निर्धारण कैसे हो सकता है। यदि हो भी जाये तो सामूहिक उपनयन में जहां सबका एक विधि और मंत्र से गोत्रभिन्न आचार्यों द्वारा भी उपनयन कर दिया जाता है तो वह निश्चित रूप से शाखारण्ड ही होता है।
इसके पश्चात् एक विषय यह भी मिलता है कि नाना, मामा आदि द्वारा भी उपनयन करने की परंपरा भी पनप चुकी है, इस स्थिति में भी शाखारण्ड दोष होता है यह ध्यान रखना आवश्यक है।
एक अन्य स्थिति इस प्रकार की भी होती है कि कोई प्रसिद्ध गुरु/सिद्ध/महात्मा आदि के प्रति आस्था का उदित होना, यह आस्था इतनी हो जाती है कि उसी को आचार्य बनाकर ब्रह्मतेज/दिव्यता आदि प्राप्ति की भावना उत्पन्न होती है और उनसे ही जनेऊ ग्रहण कर लिया जाता है और उनकी दिव्यता/सिद्धि का भी स्तर यह होता है कि उन्हें शास्त्र का कोई ज्ञान ही नहीं होता, शाखारण्ड बना देते हैं। यदि किसी अन्य सिद्ध/महात्मा आदि के प्रति दिव्यता का भाव उत्पन्न हो तो भी उपनयन स्वशाखा में ही करे, अन्यथा शाखारण्ड होना शास्त्र से सिद्ध होता है।
शाखारण्ड दोष का तात्पर्य भी पतित होना है, शाखारण्ड हव्य-कव्य में अनधिकृत हो जाता है, और यदि उपनयन करके भी शाखारण्ड ही बनाना हो तो उस उपनयन का कोई महत्व नहीं है। व्रात्य की तुलना में शाखारण्ड दोष का मार्जन सरल है अंतर मात्र यही है।
सारांश : कुल मिलाकर जितना आवश्यक उपनयन होना है उतना ही आवश्यक यह भी है कि स्वशाखोक्त विधि से हो। यदि स्वशाखा का त्याग करके परशाखा का ग्रहण किया जाता है तो उसे शाखारण्ड कहा जाता है जो पातित्व का कारण है।
विनम्र आग्रह : त्रुटियों को कदापि नहीं नकारा जा सकता है अतः किसी भी प्रकार की त्रुटि यदि दृष्टिगत हो तो कृपया सूचित करने की कृपा करें : info@karmkandvidhi.in
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।
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