आये दिन पत्नी ही पति की हत्या करती है या कराती है ऐसे प्रकरण देखे जा रहे हैं और देश व समाज हतप्रभ है कि ये क्या हो रहा है ? इसके साथ ही एक अन्य प्रकार से भी पति की हत्या की जा रही है जिसमें पति को आत्महत्या करने के लिये बाध्य कर दिया जाता है और ऐसे भी कई प्रकरण देखे गये हैं जिसमें प्रताड़ित पति ने वीडियो भी बनाया और प्रताड़ना गाथा भी सुनाई या पत्रों में लिखा। देश व समाज हतप्रभ है किन्तु प्रश्न यह है कि ऐसा क्यों हो रहा है अर्थात कारण क्या है और रोकथाम के उपाय अर्थात निवारण क्या है ?
इस कड़ी में हमें विचार-विमर्श करने की आवश्यकता है जो यहाँ आरम्भ की गयी है एवं आगे भी करने का प्रयास करेंगे।
हत्यारिन पत्नी : क्यों और कैसे पत्नी बनी चुड़ैल – patni bani chudail
जिस प्रकार से प्रताड़ित पति आत्महत्या करने लगा है अथवा पत्नी हत्या करने लगी है यह शासन तंत्र, कानून, जीवनशैली, समाज, परिवार आदि सबको संदेह के घेरे में ले रही है। पत्नी को हत्यारिन कह देना, उसके लिये फांसी की मांग करना, दुत्कारना जो कुछ भी करते हैं इससे लाभ क्या होने वाला है तनिक ये भी तो सोचें। इस प्रकरण पर मीडिया में जीतनी बहस हुयी उससे अगली हत्यारिन पत्नी को बचने के लिये और पैंतरों के लिये सोचने-समझने का अवसर मिला, कानून को कैसे चकमा देकर बचा जाये ऐसा कुछ सोचने के लिये प्रेरित किया गया है।
जितनी भी हत्यारिन पत्नी है सबको फांसी पर चढ़ा दिया जाय उसके बाद हमारे पास कुछ प्रश्न शेष बचेंगे जिसपर चिंतन-मनन करना आवश्यक है। कारण को समझना, निवारण ढूंढना ये सब अत्यावश्यक है जिसकी किसी को न तो चिंता है, न अवकाश है और यदि हो भी तो करेंगे नहीं।
विचारणीय प्रश्न :
- क्या हत्यारिन मात्र पत्नी है अथवा पत्नी हत्यारिन नहीं हो सकती यदि हो गयी तो उसके पीछे कोई अन्य है अर्थात वास्तविक अपराधी कोई अन्य है ?
- यदि वास्तविक अपराधी अन्य है तो वो कौन-कौन है ?
- पत्नी के हत्यारिन बनने के कारण क्या-क्या हैं ?
- इसका निवारण क्या हो सकता है ?
हम इन प्रश्नों का उत्तर समझने का प्रयास करेंगे तो इस चर्चा में अन्य जो अपराधी सिद्ध होगा वो ऐसी चर्चा होने भी नहीं दे सकता, इस चर्चा को नष्ट कर सकता है, और भी क्या-क्या कर सकता है यह अनुमान से परे है। इसलिये यह चर्चा करना सरल कार्य नहीं है।
दूसरी बात है इस प्रकार की चर्चा करने के लिये जिस दृष्टिकोण की आवश्यकता है वो उन लोगों के पास है ही नहीं जो सामान्य रूप से ऐसी समस्याओं के बारे में चर्चा करते हैं, अपितु यदि यह कहें की उन्हीं लोगों के द्वारा यह समस्या लायी गयी है तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। अब यदि वही लोग जिन्होंने भारत में ये समस्या लायी है इस पर विचार करें तो क्या करेंगे, क्या सही तथ्य बतायेंगे, क्या निवारण बतायेंगे ? कदापि नहीं !
प्रश्न 1 : क्या हत्यारिन मात्र पत्नी है अथवा पत्नी हत्यारिन नहीं हो सकती यदि हो गयी तो उसके पीछे कोई अन्य है अर्थात वास्तविक अपराधी कोई अन्य है ?
उत्तर : यदि हम दण्ड के आधार पर बात करें तो पत्नी (सहयोगी सहित) ही हत्यारिन कही जायेगी और दण्डित होगी। अर्थात प्रत्यक्ष अपराधी पत्नी ही सिद्ध होगी किन्तु यह सत्य नहीं है क्योंकि इसमें अनेकों परोक्ष तत्व हैं जिसने ऐसे वातावरण का निर्माण कर दिया कि पत्नी अपने ही पति की हत्या कर देती है अथवा इतना अत्याचार करती है कि पति आत्महत्या कर ले। और यदि सत्य कहें तो मूल अपराधी ये परोक्ष रूप से वातावरण का निर्माण करने वाले तत्व ही हैं।
भारत में अनेकों ऐसे तत्व सक्रीय हैं जो भारतीय संस्कृति के विरुद्ध सक्रीय हैं। विदेशी कुसंस्कार से ग्रस्त हैं और भारत में भी वही प्रसारित करना चाहते हैं। इनमें मुख्य रूप शासन के तीनों अंग आते हैं, शेष अन्य तत्व जो हैं यथा वॉलीवुड, छोटा पर्दा, शैक्षणिक व्यवस्था, मीडिया आदि ये इन्हीं के द्वारा नियंत्रित होते हैं और इसके मूल में भी वो तंत्र ही दोषी है जिसे कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के नाम से जाना जाता है।
इनमें भी सर्वाधिक दुर्गंध न्यायपालिका में बैठे लोगों ने फैलाया है जिसके उदाहरण हैं :
- पति के ऊपर भी पत्नी बलात्कार का वाद ला सकती है। सोचिये पत्नी यदि पति के ऊपर बलात्कार का आरोप लगाने का अधिकार रखती है तो विवाह करने का अधिकार कैसे रख सकती है ? ये तो घोर अंधेर है।
- अविवाहित जोड़े भी पति-पत्नी की भांति साथ में रह सकते हैं जिसे “लिव एण्ड रिलेशनशिप” कहा जाता है।
- यदि विवाहित पत्नी किसी अन्य पुरुष से भी यौन संबंध रखती है अर्थात दुराचारिणी है तो भी इसमें कुछ गलत नहीं है। ये उसकी स्वतंत्रता है और न्यायपालिका का यह विचार है।
- इन्होंने तो समलैंगिक विवाह को भी थोपने का प्रयास किया है, किन्तु इन्हीं के अन्य सहयोगी सहमत न हुये जिस कारण चर्चा मात्र करके पीछे हट गये।
ये सभी तथ्य भारतीय संस्कृति के पूर्ण विरुद्ध है किन्तु भारत में प्रचलित है, मात्र समलैंगिक विवाह को मान्यता नहीं दी गयी है। यदि न्यायपालिका में बैठे लोगों ने ऐसा कुकर्म किया है तो इससे यही सिद्ध होता है कि ये लोग भारतीय संस्कृति का ज्ञान नहीं रखते अथवा यदि रखते भी हैं तो भी आस्था नहीं रखते, इनकी आस्था विदेशी कुसंस्कारों में है जो ये भारत में भी फैलाना चाहते हैं।
पत्नी या सशक्त नारी
एक सशक्त नारी परिवार की आवश्यकता नहीं होती है, परिवार के लिये पत्नी की आवश्यकता होती है जिसे गृहिणी, गृहलक्ष्मी, भार्या आदि कहा जाता है।
हमें पत्नी के विषय में भी जानना समझना आवश्यक है अन्यथा हम यूँ ही पत्थर पर सर पटकते रहेंगे। पत्नी किसे कहते हैं, पत्नी की बारे में हमें जानकारी कहां से प्राप्त हो रही है, हमें जो पत्नी विषयक जानकारी प्राप्त हो रही है हम उसे क्यों अस्वीकार करने लगे हैं, सशक्त नारी से क्या परिवार को बल मिलता है, क्या सशक्त नारी परिवार के लिये नाशक है, सशक्त नारी से अगली पीढ़ी पर क्या प्रभाव पड़ता है, आदि अनेकानेक प्रश्न हैं जिनका उत्तर समझना आवश्यक है।
पत्नी के विषय में हमें शास्त्रों से ही जानकारी प्राप्त होती है, एक नए परिवार का आरम्भ पत्नी के साथ ही होता है और पत्नी रहित होने पर उस परिवार का विखंडन हो जाता है। सनातन संस्कृति की विशेषता यह है कि यहां नये परिवार के निर्माण की व्यवस्था तो की गयी किन्तु परिवार के विखंडन का नहीं। पत्नी के विषय में शास्त्रों में कहा गया है :
सा भार्या या गृहे दक्षा सा भार्या या पतिव्रता।
सा भार्या या पतिप्राणा सा भार्या या प्रजावती॥
: शंखस्मृति ॥४॥१५॥
भार्या पत्नी का ही नाम है और पत्नी के विषय में शंखस्मृति में जो कहा गया है वो इस प्रकार है “भार्या वही होती है जो गृहकार्य में दक्ष हो, जो पतिव्रता हो, जिसमें पति के प्राण बसते हों और जो संतान उत्पन्न करने वाली हो।”
“पतनात् त्रायते इति पत्नी” कहकर यह बताया गया है कि जो पतन से बचाये वही पत्नी होती है।
गृहाश्रमात्परं नास्ति यदि भार्या वशानुगा।
तथा धर्मार्थकामानां त्रिवर्ग फलमश्नुते ॥
: दक्ष स्मृति
दक्ष स्मृति में गृहस्थाश्रम की प्रसंशा करते हुये कहा गया है कि गृहस्थाश्रम से बड़ा कोई आश्रम नहीं यदि पत्नी वश में रहने वाली हो तो। इसके साथ ही गृहस्थाश्रम ही धर्म, अर्थ और काम तीनों पुरुषार्थों के लिये उत्तम आश्रम है।
गृहवासं सुखार्थं हि पत्नि मूलं च तत्सुखं।
सा पत्नी या विनीता स्याच्चित्तज्ञा वशवर्तिनी॥
:- दक्षस्मृति
दक्षस्मृति में पुनः गृहस्थाश्रम की प्रशंसा करते हुये कहा गया है कि “गृहस्थाश्रम (गृहवास) सम्बन्धी सुख का मूल पत्नी होती है, किन्तु वह पत्नी विनीता हो, मनोनुकूल हो, वशवर्तिनी हो।” अब यदि पत्नी सशक्त हो, स्वेच्छाचारिणी हो, वश में न हो तो इसका तात्पर्य यही होता है कि परिवार में सुख नहीं मिलेगा, क्योंकि गृहस्थाश्रम के सुख का मूल तो पत्नी ही होती है, सशक्त नारी नहीं।
छायेवानुगता स्वच्छा सखीव हितकर्मसु ।
दासीनाऽदिष्ट कार्येषु भार्या भर्तुः सदा भवेत्॥
:- वेदव्यास स्मृति ॥२॥२७॥
वेदव्यास स्मृति में पत्नी के कुछ लक्षण इस प्रकार बताये गए हैं : “छाया की भांति अनुगमन करने वाली हो अर्थात सदैव साथ देने वाली हो (न कि दुःख के दिन आने पर तलाक देकर भाग जाने वाली), हित करने में मित्र के समान हो (अर्थात पति को सशक्त करने का प्रयास करने वाली हो न कि स्वयं ही सशक्त होकर पति को अशक्त करने वाली), पति की आज्ञा का पालन करने में दासी के समान हो (न कि पति को नौकर बनाने वाली), भर्ता के लिये भार्या को ऐसी ही होनी चाहिये।
लालनीया सदा भार्य्या ताडनीया तथैव च ।
लालिता ताडिता चैव स्त्री श्रीर्भवति नान्यथा ॥
:- शंख स्मृति ॥४॥१६॥
शंख स्मृति में यह भी कहा गया है कि भार्या को सदैव लालन (प्रेम) करे साथ ही ताडन (आवश्यकतानुसार) भी करे। लालित और ताडित दोनों से युक्त होने पर ही स्त्री (पत्नी) लक्ष्मी स्वरूपा होती है अन्यथा नहीं। ध्यातव्य यह है कि पत्नी को गृहलक्ष्मी भी कहा जाता है किन्तु गृहलक्ष्मी कैसे होती है यह सूत्र इस प्रमाण से स्पष्ट होता है।
क्रयक्रीता तु या नारी न सा पत्न्यभिधीयते । न सा दैवे न सा पित्र्ये दासीं तां कवयो विदुः॥
अधर्म्योढा तु या नारी न सा पत्न्यभिधीयते । दैवे पित्र्ये न सा योग्या दासीवत्कवयो विदुः॥
जो क्रय की गयी हो (खरीदी गयी अथवा अन्यान्य प्रकार से भी जैसे भगाई गयी, पुनर्विवाहित आदि) वह पत्नी नहीं होती, वह दैवकर्म अथवा पितृकर्म की योग्यता नहीं रखती, उसे दासी समझना चाहिये ऐसा विद्वानों का कथन है। अधर्मपूर्वक अथवा धर्मविरुद्ध विधान से जो नारी ग्रहण की गयी होती है वह पत्नी नहीं होती, वह दैवकर्म अथवा पितृकर्म की योग्यता नहीं रखती, उसे दासी समझना चाहिये ऐसा विद्वानों का कथन है।
वर्त्तमान में तो ऐसा बहुत ही देखा जा रहा है कि आज एक विवाह, कल दूसरा विवाह, विधवा विवाह, पति को छोड़कर किसी और के साथ विवाह इत्यादि प्रकार से नौटंकी किया जा रहा है और इसे आधुनिकता, खुला विचार आदि कहकर गर्वान्वित भी होते हैं। अरे वह पत्नी नहीं होती है, दासी होती है। वह दैवकर्म अथवा पितृकर्म की अधिकारिणी नहीं होती।
पित्रा भर्त्रा सुतेनापि नेच्छेद्विरहमात्मनः । एषा हि विरहेण स्त्री गर्हिता स्यात्कुलद्वये ॥
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने । पुत्रो रक्षति वार्धक्ये न स्वातन्त्र्यं क्वचित्स्त्रियाः॥
सूक्ष्मेभ्योऽपि प्रमादेभ्यः स्त्रियो रक्ष्या विशेषतः। द्वयोर्हि कुलयोः शोकमावहेयुररक्षिताः॥
यदि मनुस्मृति की बात करें तो कहा गया है कि स्त्री (पतिरहित होने पर भी) का पिता, भ्राता, सुत से विरह नहीं होना चाहिये इनसे जिसका विरह हो जाये वह दोनों ही कुल के लिये गर्हित हो जाती है। कौमार्यावस्था में पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र रक्षा करता है, स्त्री कभी स्वतंत्र नहीं होती। सूक्ष्म प्रमाद होने पर भी स्त्रियों की रक्षा करनी चाहिये, अरक्षित स्त्री से दोनों कुलों (पिता और पति) के लिये शोक का आवाहन होता है।
अनृतं साहसं माया मूर्खत्वमतिलोभता । अशुचित्वं निर्दयत्वं स्त्रीणां दोषाः स्वभावजाः॥
असत्य, साहस (दुस्साहस), माया, मूर्खता, अतिलोभ, अपवित्रता, निर्दयता आदि कुछ दोष हैं जो स्त्रियों में स्वाभाविक रूप से विद्यमान होते हैं और यदि वह रक्षित न हो तो इन सभी दुर्गुणों की वृद्धि होती है। पिता/पति/पुत्र से रक्षित रहने पर ही इन दुर्गुणों का शमन होता है। अभी ऐसा दिख भी रहा है जो अरक्षित हो जाती है अर्थात स्वतंत्र हो जाती है उनमें ये सभी दुर्गुण कूट-कूट कर भर जाते हैं, ऐसे ही पति की हत्या थोड़े न कर देती है, ऐसे ही मनु को नारीविरोधी थोड़ी न कहती है। मनुस्मृति को स्त्रीविरोधी कहने वाली स्वेच्छाचारिणी कुलटाओं का तो दुश्चरित्र भी जगजाहिर ही होता है।
नास्ति स्त्रीणां पृथग्यज्ञो न व्रतं नाप्युपोषणम् । शुश्रूषयति भर्तारं तेन स्वर्गे महीयते ॥
पत्यौ जीवति या नारी उपोष्य व्रतचारिणी । आयुष्यं हरते भर्तुर्नरकं चाधिगच्छति॥
मनुस्मृति में और भी कहा गया है कि स्त्रियों के लिये पति से पृथक कोई यज्ञ/व्रतादि नहीं होता है, पति की सेवा से ही पत्नी स्वर्गलोक की उत्तम गति प्राप्त कर सकती है। पति के जीवित रहते (अथवा अनुमतिरहित होकर/स्वतंत्र रूप से व्रतादि का आचरण) करना पति की आयु का हरण करता है कर स्त्री नरक की भागिनी बनती है।
मनुस्मृति पर प्रश्नचिह्न लगाने वाली न ही किसी की पुत्री, न ही किसी की पत्नी, न ही किसी की मां होती है वह तो स्वेच्छाचारिणी कुलटाएं होती हैं। कभी इसकी पत्नी/गर्लफ्रेंड, कभी उसकी अर्थात कपड़े की तरह पुरुष को बदलने वाली वेश्या होती है किसी की पत्नी नहीं बनती और ये वेश्यायें ही हैं जो मनुस्मृति पर प्रश्नचिह्न लगाती रहती है। जो वेश्या बन गयी हो वो मनुस्मृति पर धर्मशास्त्रों पर प्रश्नचिह्न न लगाये तो क्या करे, यदि आस्था रखती तो वेश्या थोड़े न बनती।
विवाह के लिये पत्नी ढूंढो वेश्या नहीं
प्रमाणों पर ही यदि चर्चा करते रहें तो ये अंतहीन चर्चा है, हमें भाव को समझते हुये आगे बढ़ने की आवश्यकता है। परिवार चाहिये, पारिवारिक सुख चाहिये, गृहस्थाश्रम से आत्मकल्याण करना हो तो पत्नी चाहिये, यदि पत्नी चाहिये तो विवाह करते समय ही पत्नी ढूंढना आवश्यक होता है, यदि वेश्या को घर ले आयेंगे तो वो पत्नी थोड़े न बनेगी, वो पत्नीधर्म का निर्वहन थोड़े न करेगी। एक सशक्त स्त्री के लिये भी पत्नीधर्म का निर्वहन करना संभव नहीं है क्योंकि उसका आत्मसम्मान इसमें बाधक हो जाता है।
इसी प्रकार अधिक अवस्था वाली स्त्रियों से भी पत्नी की कामना नहीं रखनी चाहिये। ३०-४० वर्ष की होने पर कहने के लिये ही लड़की होती है, वो वास्तव में लड़की नहीं स्त्री होती है और पत्नीधर्म का पालन करने में सक्षम नहीं होती। पत्नीधर्म का पालन वही कर सकती है जिसका विवाह उचित अवस्था में किया गया हो। इसलिये जिसे पत्नी चाहिये उसको इन तथ्यों का विशेष रूप से ध्यान रखना ही होगा :
- माता-पिता को यह ध्यान रखना चाहिये कि उसकी बच्ची का परिवार सुखी हो, आत्मकल्याण करने के लिये पत्नीधर्म की शिक्षा दे, उचितकाल में विवाह करे न कि सशक्त नारी बनाने के चक्कर में फंसकर नरक के दलदल में फेंके। स्कूल/कॉलेज, फिल्म/सीरियल/सोशल मीडिया आदि जितने भी सिखाने वाले हैं सब-के-सब दुराचारिणी बनाना ही सिखाते हैं, सदाचारिणी बनने की, दोनों कुल के उद्धार की शिक्षा देना माता-पिता का ही दायित्व होता है।
- यदि वर का जीवन सुखमय बनाना चाहें तो वरपक्ष को भी चाहिये कि उसके लिये योग्य पत्नी ढूंढे, न कि सशक्त नारी, वेश्या, ३०-४० वर्ष की महिला आदि। कन्यापक्ष की कुलीनता, धर्म में आस्था आदि का विशेषरूप से परिक्षण करे।
- विवाह के पश्चात् वधू को गृहणी बनाये न कि औरों का नौकर। नौकरी करने वाली नौकर ही तो होती है। स्त्रीधन नरक का द्वार खोलता है इसलिये वधू से धनार्जन की कामना ही न करे। अपने बच्चे को भी पतिधर्म, सदाचार, पारिवारिक जीवन आदि से सम्बंधित शिक्षा दे।
हमारी सबसे बड़ी समस्या यह हो गयी है कि हम पाश्चात्य संस्कृति को अच्छा समझने लगे हैं और अपनी संस्कृति के विरोधी बनते जा रहे हैं और आश्चर्यजनक तो यह भी है कि भारत को विश्वगुरु भी कहते हैं। अरे मूर्खों यदि हम दूसरों की बताई बातों को ही स्वीकार कर रहे हैं, अनुपालन कर रहे हैं तो हम उसके शिष्य होंगे न, गुरु कैसे बनेंगे ? वहां परिवार का अस्तित्व यदि संकट में है तो उसका अंधानुकरण करके हम अपने परिवार के अस्तित्व को भी संकट में ही डाल रहे हैं न।
हमें तो यह चाहिये की विश्वगुरु बनते हुये उनके भी पारिवारिक संकट का हल उन्हें प्रदान करें और इसके लिये हमें अपनी संस्कृति का ही पालन करना होगा क्योंकि हमारी संस्कृति में परिवार बनाया तो जाता है किन्तु उसका विघटन नहीं किया जाता।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।
Discover more from कर्मकांड सीखें
Subscribe to get the latest posts sent to your email.