क्या आप जानते हैं घर में दरिद्रता कैसे आती है – daridrata kaise aati hai

क्या आप जानते हैं घर में दरिद्रता कैसे आती है - daridrata kaise aati hai

दरिद्रा और लक्ष्मी दोनों ही बहने हैं किन्तु दोनों का परस्पर ऐसा संबंध है कि जहां दरिद्रा रहेगी वहां लक्ष्मी नहीं रह सकती और जहां लक्ष्मी रहेगी वहां दरिद्रा नहीं रह सकती। दोनों में से कोई एक ही रह सकती है, दोनों साथ-साथ नहीं रह सकती क्योंकि दोनों का स्वभाव-गुण परस्पर विरुद्ध है। संसार में ऐसे कुछ ब्राह्मण ही होते हैं जो दरिद्रा से भयभीत नहीं होते, सामान्य जन दरिद्रा से भयभीत रहते हैं और कोई भी दरिद्रता नहीं चाहता। दरिद्रता से बचने के लिये यह जानना आवश्यक है कि दरिद्रता कहां-कहां जाती है।

दरिद्रा यदि अकेले आये तो वो चिरकाल तक वास नहीं कर पाती किन्तु यदि अपने पति दुःसह के साथ आये तो चिरकाल तक वास करती है। दोनों के साथ-साथ होने का तात्पर्य है कि दुःसह ने इसका निर्णय मार्कण्डेय ऋषि से लिया था कि वो कहां जाकर रहें, और दुःसह इसका उल्लंघन नहीं करते हैं। यदि दरिद्रा अकेली चली भी जाये तो भी दुःसह विचार करते हैं और विचार पूर्वक ही वास करते हैं। यदि दुःसह भी दरिद्रा के साथ रहने न आयें तो दरिद्रा टिक नहीं पाती। किन्तु यदि दुःसह भी वास करने के लिये आ जायें तो दरिद्रा चिरकाल तक यहां तक की पीढ़ियों तक वास करती रहती है।

दरिद्रा अपने पति दुःसह के साथ कहां-कहां वास करेगी इसका वर्णन लिङ्गपुराण, उत्तरभाग के अध्यायः ६ में मिलता है जो आगे २३ बिंदुओं में समझने का प्रयास किया गया है। इससे उन लोगों को दरिद्रा को आने से रोकने में सहयोग प्राप्त होगा जो दरिद्रा से दूर रहना चाहते हैं।

  1. जिस घर में वैदिकों – द्विजों गौओं – गुरु जनों – तथा अतिथियों की पूजा न होती हो और जहाँ पति- पत्नी एक- दूसरे के विरोधी हों । – “न श्रोत्रिया द्विजा गावो गुरवोऽतिथयः सदा । यत्र भर्ता च भार्या च परस्परविरोधिनौ ॥”
  2. जहाँ देवाधिदेव महादेव तथा तीनों भुवनों के स्वामी भगवान रूद्र की निन्दा होती हो। – देवदेवो महादेवो रुद्रस्त्रिभुवनेश्वरः। विनिंद्यो यत्र भगवान् विशस्व भयवर्जितः॥
  3. जहाँ पितृकर्म से लोग विमुख हों – जिस घर में रात्रि वेला में परस्पर कलह होता हो । – पितृकर्मविहीनांस्तु सभार्यस्त्वं समाविश। रात्रौ रात्रौ गृहे यस्मिन् कलहो वर्तते मिथः॥
  4. जिसके यहाँ शिवलिंग का पूजन न होता हो – विष्णुभक्ति व गाय न हों वहाँ तुम पत्नी दरिद्रा के साथ रहो। – लिंगार्चनं यस्य नास्ति यस्य नास्ति जपादिकम्। रुद्रभक्तिर्विनिंदा च तत्रैव विश निर्भयः॥अतिथिः श्रोत्रियो वापि गुरुर्वावैष्णवोपि वा। न संति यद्गृहे गावः सभार्यस्त्वं समाविश ॥
  5. जहाँ बालकों को बिना दिये बडे लोग स्वयं भक्ष्य पदार्थ खा लेते हैं । – बालानां प्रेक्षमाणानां यत्रादत्त्वा त्वभक्षयन्। भक्ष्याणि तत्र संहृष्टः सभार्यस्त्वं समाविश ॥
  6. जहां महादेव अथवा वासुदेव किसी की अर्चना नहीं की जाती, जहाँ विधिपूर्वक हवन न होता हो । – अनभ्यर्च्य महादेवं वासुदेवमथापि वा। अहुत्वा विधिवद्यत्र तत्र नित्यं समाविश॥
  7. जहाँ काँटेंदार वृक्ष हों – घर में पलाशवृक्ष -आक – नील का पेड – दूध वाले वृक्ष -करवीर – केला – मल्लिका – ताल – तमाल – भिलावा – इमली – कदम्ब – खैर- तगर – बरगद – पीपल – आम – गुलर – कटहल – जटामांसी – गुलदुपहरिया – अपराजिता – अमजोद के वृक्ष हो वहाँ तुम पत्नी सहित निवास करो। – यत्र कंटकिनो वृक्षा यत्र निष्पाववल्लरी। ब्रह्मवृक्षश्च यत्रास्ति सभार्यास्त्वं समाविश॥
  8. जिस घर में कौओं का निवास हो – यस्य काकगृहं निंबे आरामे वा गृहेपि वा॥
  9. जिस घर में दण्डधारिणी स्त्री कपालधारिणी स्त्री हो । – दंडिनी मुंडिनी वापि सभार्यस्त्वं समाविश॥
  10. जिस घर में एक दासी – तीन गायें – पाँच भैंसें – छः घोड़े और सात हाथी हो वहाँ तुम पत्नी सहित निवास करो। – एका दासी गृहे यत्र त्रिगवं पंचमाहिषम्। षडश्वं सप्तमातंगं सभार्यस्त्वं समाविश ॥
  11. जिस घर में प्रेतरूपा तथा डाकिनी काली की प्रतिमा स्थापित हो – और जहाँ भैरव मूर्ति हो वहाँ पति सहित दरिद्रा का निवास है । – यस्य काली गृहे देवी प्रेतरूपा च डाकिनी। क्षेत्रपालेथवा यत्र सभार्यस्त्वं समाविश ॥
  12. जिस घर भिक्षु बिम्ब आदि हो – सोने – बैठने – भोजन तथा भ्रमण के समय में जिनकी वाणी ईश्वर के नामों का उच्चारण नहीं करती हो वहाँ तुम रहो । – भिक्षुबिंबं च वै यस्य गृहे क्षपणकं तथा। बौद्धं वा बिंबमासाद्य तत्र पूर्णं समाविश॥शयनासनकालेषु भोजनाटनवृत्तिषु। येषां वदति नो वाणी नामानि च हरेः सदा ॥
  13. जो लोग भगवान शिव को सबसे श्रेष्ठ नहीं कहते – इन्हें साधारण समझते हैं – विष्णु भक्ति से विहिन – नास्तिक – शठ लोग रहते हों वहाँ तुम निवास करो । – पाषंडाचारनिरताः श्रौतस्मार्तबहिष्कृताः। विष्णुभक्ति विनिर्मुक्ता महादेवविनिंदकाः ॥ नास्तिकाश्च शठा यत्र सभार्यास्त्वं समाविश। सर्वस्मादधिकत्वं ये न वदंति पिनाकिनः ॥
  14. जो स्त्री शौचाचार से भ्रष्ट हो, देह संस्कार से रहित हो, नित्य सर्वभक्षिणी हो । – या नारी शौचविभ्रष्टा देहसंस्कारवर्जिता। सर्वभक्षरता नित्यं तस्याः स्थाने समाविश ॥
  15. जहाँ भगवान को भोग लगाये मूर्ख लोग स्वयं भोजन करते हों – येऽश्रंति केवलं मूढाः पक्वमन्नं विचेतसः। स्नामंगलहीनाश्च तेषां त्वं गृहमाविश ॥
  16. बिना स्नान के भोजन करते हों – सूर्योदय के बाद तक सोते रहते हैं उन घरों में तुम निवास करो। – पादशौचविनिर्मुक्ताः संध्याकाले च शायिनः॥
  17. संध्या समय में भोजन व शयन करते हो – मलिन वस्त्र व मल युक्त दाँतों वाले – बहुत भोजन करने वाले -जुआ व मद्यपान करने वालों के घरों में निवास करो । संध्यायाम श्रुते ये वै गृहं तेषां समाविश ॥
  18. जहाँ द्यूत, विवाद आदि करने वाले मूढ़ हों, ब्रह्मस्व का हरण करने वाले हों, अपात्रों का पूजन होता हो – द्यूतवादक्रियामूढाः गृहे तेषां समाविश। ब्रह्मस्वहारिणो ये चायोग्यांश्चैव यजंति वा ॥
  19. शूद्रों का भोजन करने वालों, मद्यपान में रत रहने वालों, पापियों, मांसभक्षण में तत्पर रहने वालों के यहां तुम रहो। – शूद्रान्नभोजिनो वापि गृहं तेषां समाविश। मद्यपानरताः पापा मांस भक्षणतत्पराः ॥
  20. जहां पराई स्त्री में आसक्ति रखी जाती हो। – परदाररता मर्त्या गृहं तेषां समाविश॥
  21. जिस घर में दिन में मैथुन करने वाले – जो लोग कुत्ते तथा मृग की भांति पीछे से मैथुन करते हैं तथा जल में मैथुन करते हैं वहाँ तुम निवास करो। – “पृष्ठतो मैथुनं येषां श्वानवत् मृगवच्च वा । जले वा मैथुनं कुर्यात्सभार्यास्त्वं समाविश ॥”
  22. जो नराधम – रजस्वला स्त्री के साथ – चाण्डाली के साथ अथवा कन्या के साथ अथवा गोशाला में सम्भोग करता है – कृत्रिम साधनों से सम्पन्न होकर स्त्री संसर्ग करता है वहाँ तुम निवास करो। – रजस्वलां स्त्रियं गच्छेच्चांडालीं वा नराधमः। कन्यां वा गोगृहे वापि गृहं तेषां समाविश ॥
  23. अधिक कहने से क्या लाभ जहां नित्यकर्म – संध्या – अग्निहोत्र – अनुपनित – भगवतभक्ति से विहिन लोग रहते हैं वहाँ तुम्हारा निवास है। – बहुना किं प्रलापेन नित्यकर्मबहिष्कृताः। रुद्रभक्तिविहीनाये गृहं तेषां समाविश ॥

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।


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