Headlines

क्या आप योग्य ब्राह्मण हैं अथवा नामधारक या अयोग्य

क्या आप योग्य ब्राह्मण हैं अथवा नामधारक या अयोग्य क्या आप योग्य ब्राह्मण हैं अथवा नामधारक या अयोग्य

“जो ब्राह्मण स्वयं को योग्य नहीं बनाता, वह धर्म का संरक्षक नहीं, भक्षक सिद्ध होता है।”

यह भिन्न विषय है कि राजनीति में समानता आदि का अनर्थ करके कुछ भी बकवास किया जाता है किन्तु धर्म के नियमों का निर्धारण शास्त्र ही कर सकता है संविधान नहीं। वर्तमान में हम देखते हैं कि शहरों में तो पैजामा पहनकर पंडित पूजा करा रहे हैं, फिल्मी गाने गाकर फेरे लगवा रहे हैं। गांवों में भी स्थिति अब सही नहीं है। प्रश्न उठता है कि गांवों में क्यों सही नहीं है और यहीं पर प्रतिप्रश्न भी उत्पन्न होता है कि कहीं गांवों के ब्राह्मण भी तो अयोग्य नहीं हैं ? यहां इसी प्रश्न का उत्तर ढूंढने का प्रयास किया जा रहा है।

यह आलेख देश की वर्त्तमान अवस्था, शासन तंत्र के कुकर्मों का भी पटाक्षेप करने वाला है। वर्त्तमान काल में ब्राह्मणों को न जाने क्या-क्या कहा जा रहा है और अनेकानेक मनगढंत आरोप मढ़े जा रहे हैं यहां तक भी हो सकता है कि किसी अवर्ण के सर में यदि दर्द हो तो वो उसका उत्तरदायी ब्राह्मण को ही बता दे। क्योंकि पिछड़ेपन का उत्तरदायी तो ब्राह्मण को बताया ही जा रहा है जबकि दशकों से सभी प्रकार की सरकारी सुविधा पाकर भी (-)40 अंक ला रहा है, इसका दोष किसी न किसी पर मढ़ना है तो वो ब्राह्मण है।

सरकारें हर प्रकार से रोक रही है फिर भी ब्राह्मण मूर्धन्य स्थान पर स्थापित हो ही जाता है तो दोषी है। यहां ध्यान देने की बात यह है कि चारों वर्णों में से किसी के लिये ब्राह्मण दोषी नहीं है अपितु ब्राह्मण दोषी उसके लिये है जो अवर्ण हैं अर्थात इन चारों वर्णों में से किसी भी वर्ण में नहीं आते, किसी भी वर्ण के धर्म का पालन नहीं करते अर्थात अधर्मी भी हैं।

दशकों से संविधान, कानून, सरकारी नीतियों के माध्यम से ब्राह्मणों और सवर्णों का उत्पीड़न किया जा रहा है और ये मनगढंत तथ्य नहीं हैं, SC/ST Act, आरक्षण व्यवस्था ज्वलंत उदाहरण हैं फिर भी ब्राह्मण और सवर्ण उत्पीड़क है एवं UGC रेगुलेशन 2026 जैसा कुकर्म सरकार द्वारा किया जाता है। ब्राह्मणों को गाली देने की छूट है किन्तु विशेष जातियों का नाम लेना भी अपराध है।

यहां एक प्रश्न उत्पन्न होता है कि ऐसा कर कौन रहा है ? क्या सामान्य जनता सहमत है ? इसके साथ ही एक और गंभीर परिस्थिति है कि जो नहीं करना चाहिये था वो करने के कारण सम्पूर्ण ब्राह्मण वर्ग को गाली दिया जा रहा है किन्तु जो करना चाहिये था क्या वो सही से कर पा रहे हैं ?

जो नहीं करना था का तात्पर्य नौकरी, व्यवसाय आदि से है अर्थात कर रहे हैं एवं जो करना था अर्थात धर्म संरक्षण वो नहीं कर रहे हैं, वृत्ति मात्र से कुछ ब्राह्मण कर्मकांडी बनते हैं और वो भी उचित नहीं करते। यही वह मूल कारण भी है जिसके फलस्वरूप नेता अपनी घृणित राजनीति के लिये ब्राह्मणों को गालियां दे रहे हैं अथवा दिला रहे हैं, सामान्य जनता (सवर्ण) इससे सहमत नहीं है, हाँ एक वर्ण (शूद्र) को कुछ अंशों में दिग्भ्रमित किया गया है। किन्तु मूल रूप से जो ये कुकर्म कर रहे हैं वो वास्तव में अवर्ण हैं, उपद्रवी हैं, अराजक तत्व हैं।

ब्राह्मण और सवर्णों पर अत्याचार क्यों
ब्राह्मण और सवर्णों पर अत्याचार क्यों

हम इस विषय का विमर्श तो नहीं करने जा रहे हैं अतः विमर्श के विषय पर ही रहना अपेक्षित है। लेकिन समस्या का मूल यहीं पर है और वो यह कि सरकारें अपने कुकर्मों को ओट देने के लिये जनमानस को दिग्भ्रमित करती रहती हैं। जिसे जहां होना चाहिये वो वहां न होकर कहीं और होता है और जिसे नहीं होना चाहिये था वो वहां पर काम कर रहा होता है।

यही कारण है कि आप कभी सड़कें धंसने की तो कभी नए पल के गिरने की, कभी किसी नई बिल्डिंग के गिरने की तो कभी किसी एयरपोर्ट के वर्षा में डूबने की आदि-आदि समाचार सुनते रहते हैं। सरकारों ने ऐसा तंत्र विकसित कर दिया है कि दो करोड़ नौकरियों के लिये 20 करोड़ युवा भागदौड़ कर रहे होते हैं और 18 करोड़ बेरोजगार ही रहते हैं। यही समस्या है यदि नौकरी 2 करोड़ है तो 20 करोड़ को उसके लिये क्यों भागदौड़ कराते हैं ?

इन्हीं 20 करोड़ (अनुमान) में कुछ लाख ब्राह्मण बालक भी भेड़चाल चलते रहते हैं और 10 लाख में से एकाध लाख नौकरी पा लेते हैं शेष 9 लाख में से 2 – 3 लाख कुछ अन्य व्यवसाय आदि अपनाते हैं एवं 6 – 7 लाख पौरोहित्य वृत्ति/कर्मकांड में आ जाते हैं किन्तु इनके पास कर्मकांड का कोई ज्ञान नहीं होता है जो होता है वो औपचारिक मात्र होता है क्योंकि बचपन में देखकर सीखे थे और पढ़ने कॉलेज चले गए, थोड़ा-बहुत देखते-सुनते रहे तो कुछ जान गये। पुस्तक देखकर भी सही-सही मन्त्र नहीं पढ़ पाते किन्तु कर्मकांडी बन जाते हैं।

एक कर्मकांडी को जितना शास्त्रज्ञान होना चाहिये उसका 5% भी ज्ञान नहीं रखते किन्तु कराते हैं और फिर क्या कराते हैं यह सभी समझ सकते हैं। इसी प्रकार एक बड़ा वर्ग शिक्षक, सेवानिवृत्त सेवक अथवा आजीविका नष्ट होने के कारण जन्मजात वृत्ति से जुड़ने वाले भी होते हैं। यद्यपि अयाज्य श्रेणी के यजमानों के लिये यही अवलम्ब बन सकते हैं तथापि यदि ये योग्य हों तो यजमान को अयाज्य बनने से भी बचा सकते हैं। अब हम योग्य – अयोग्य ब्राह्मण की चर्चा पर आ गए हैं और यहीं पर प्रश्न स्वयं से पूछने की आवश्यकता होती है कि क्या मैं योग्य ब्राह्मण/कर्मकांडी/पुरोहित हूँ ?

यदि मैं एक कर्मकांडी हूँ तो मेरे लिये इतना तो अनिवार्य है कि मैं शास्त्र में निष्ठा रखूं, भले ही ज्ञान न भी हो। यह तो अनिवार्य है कि धर्म में आस्था रखूं और परंपरागत रूप से जितना ही ज्ञान मिला है उसका पालन करूँ, मोक्ष भले न मिले किन्तु स्वर्ग के तो द्वार खोलूं; नरकगामी तो न बनूँ। भले ही अब तक न सीखे किन्तु आगे तो सीखूं, जिज्ञासा को जीवित रखूं।

ग्राह्याग्राह्य ब्राह्मण अर्थात योग्यायोग्य ब्राह्मण विषय प्रमाण संकलन करके एक विस्तृत आलेख “संपूर्ण कर्मकांड विधि” पर प्रकाशित किया गया है, किन्तु विश्लेषण नहीं किया गया है और विश्लेषण की अपेक्षा निचोड़ को समझने के लिये यह आलेख लिखा जा रहा है। यदि आप प्रमाण संग्रह का अवलोकन करना चाहें तो उस आलेख अनुसरण सूत्र को यहां समाहित किया गया है।

ग्राह्याग्राह्य ब्राह्मण

अयोग्यता विषयक तथ्यों को पूर्णरूपेण सरलतम रूप से उजागर करना आवश्यक है अन्यथा अनर्थ ही होगा। यहां जो तथ्य प्रस्तुत किये गये हैं वो शास्त्र-सम्मत हैं किन्तु बौद्धिक त्रुटि संभव है अतः यदि कोई तथ्य शास्त्र से खंडित होता हो तो विद्वद्जन हमें अवगत करने की कृपा अवश्य ही करें। अयोग्यता संबंधी विषय को यहां तीन श्रेणी में रखा गया है :

  1. प्रथम : पूर्ण अयोग्य/अग्राह्य
  2. द्वितीय : मार्जन योग्य/प्रायचित्ति
  3. तृतीय : अजिज्ञासु/अकर्मण्य

इसका उद्देश्य यह होगा कि इन तीनों श्रेणियों में यदि नहीं हैं तो वर्त्तमान युग में ही ग्राह्य/योग्य ब्राह्मण हैं भले ही श्रेष्ठ न हों। ग्राह्य/योग्य की अर्हता का विचार उच्च मानकों से न करके निम्नतम मानकों के आधार पर किया गया है ।

प्रथम : पूर्ण अयोग्य/अग्राह्य

पूर्णतः अयोग्य/अग्राह्य को जानना सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि वर्त्तमान में बहुत सारे कर्मकांडी/पुरोहित भी वृत्तिरत हैं जिनको किसी भी स्थिति में नहीं होना चाहिये था। यहां कोई भी मनगढंत तथ्य नहीं दिया गया है, सभी प्रमाण पुष्ट हैं अर्थात शास्त्र-सम्मत हैं। पूर्णतः अयोग्य/अग्राह्य का तात्पर्य यह है कि इनका ग्रहण किया ही नहीं जाना चाहिये। इन बिंदुओं के आधार पर पूर्णतः अयोग्य कर्मकांडियों का निर्धारण किया जा सकता है :

  • जो किसी भी प्रकार की नौकरी करते हैं भले ही शिक्षक क्यों न हों; अथवा सेवानिवृत्त हो चुके हैं अथवा निष्काषित किये गए हों अथवा येनकेन प्रकारेण वृत्तिरहित हो गया हो ।
  • जो मंदिरों में वैतनिक पुजारी का कार्य करते हैं अर्थात पूजा के लिये किसी ट्रस्ट/व्यक्ति/संस्था से कुछ धन प्राप्त करते हैं, अथवा मंदिर की संपत्ति/धन/आय से जीवनयापन करते हैं।
  • जिसने अंतर्जातीय विवाह किया हो, अथवा विधवा के साथ विवाह किया हो अथवा पुनर्भू से विवाह किया हो अथवा ऐसे माता-पिता की संतान हो।

गावो दूरप्रचारेण हिरण्यं लोभलिप्सया । स्त्री विनश्यति गर्भेण ब्राह्मणो राजसेवया ॥
असंस्कृताध्यापका ये भृत्या वाऽध्यापयन्ति ये । अधीयते तथा वेदान् पतितास्ते प्रकीर्तिताः ॥
भृतकाध्यापकः क्लीबः कन्यादूष्यभिशस्तकः । एते विप्राः सदा त्याज्याः परिभाव्य प्रयत्नतः ॥
मद्यपो वृषलीसक्तो वीरहा दिधिषूपतिः । आगारदाही कुण्डाशी सोमविक्रयिणो द्विजाः ॥
नष्टशौचे व्रतभ्रष्टे वेदशास्त्रविवर्जिते । दीयमानं रुदत्यन्नं किं मया दुष्कृतं कृतम् ॥
अनूढातनयो राजन्यश्च पौनर्भवः सुतः । शूद्रापतिर्दुराचारो वाणिज्यायुधजीवकः ॥

नग्ननास्तिकनिर्लज्ज पिशुनव्यसनान्विताः । कदर्यस्त्रीजितानार्य परवादकृता नराः ॥
अमित्राकीर्तिमन्तोऽपि राजदेवलकोद्धताः। शयनासन संसर्गकृतकर्मादिदूषिताः ॥
अश्रद्दधानाः पतिता भ्रष्टाचारादयश्च ये । अभोज्यान्नाः स्युरन्नादो यस्य यः स्यात्स तत्समः ॥

वर्तमान में जो विभिन्न संस्थाओं/संगठनों द्वारा कर्मणा पंडित बनाये जा रहे हैं उनका कोई औचित्य ही नहीं है और उसके विषय में मात्र इतना कहा जा सकता है कि ये उन लोगों के लिये व्यवस्था कर रहे हैं जो समाज से विखंडित हो चुके हैं, म्लेच्छाचारी हो चुके हैं उनको ठगने के लिये उनके अनुकूल पूजा आदि कराने वाला व्यक्ति चाहिये जो विभिन्न संस्था/संगठन कर रहे हैं। यदि इन संस्था/संगठनों का वश चले तो हम जैसों को ही बहिष्कृत कर दें।

किन्तु ध्यातव्य यह है कि यहां सीधा प्रश्न आस्था के साथ-साथ शास्त्रविधान और परंपरा का भी है। शास्त्र का विधान जन्मना ही है और वो परम्परा विद्यमान भी है, भविष्य में धूमिल करने का प्रयास किया जा रहा है और शास्त्रों को भी परिवर्तित करने का कुप्रयास हो रहा है। किन्तु यहां समाज पर थोपा नहीं जा सकता यह मार्ग है समाज स्वयं ही निर्णय लेगा कि उसे किस कर्मकांडी से पूजा आदि कराना है ?

यह प्रयास दशकों पूर्व से किये जा रहे थे किन्तु शहरों से आगे सफलता नहीं मिलने के कारण शास्त्रों को ही बदला जा रहा है और अब नई प्रकाशित पुस्तकों में कर्मणा-कर्मणा का राग अलापा जायेगा। शास्त्रों में ब्राह्मणत्व के तीन कारक कहे गये हैं : जन्म, ज्ञान और तप। अर्थात जन्म प्रथम और महत्वपूर्ण कारक है। जो जन्म से ब्राह्मण हो किन्तु ज्ञान और तप से न हो वही जातिमात्र अथवा नामधारक कहलाता है।

ब्राह्मणत्व के तीन कारक

द्वितीय : मार्जन योग्य/प्रायचित्ति

द्वितीय श्रेणी में वो तथ्य हैं जिनका मार्जन किया जा सकता है अर्थात यदि मार्जन कर लें तो ग्राह्य/योग्य हो सकते हैं किन्तु जब तक मार्जन नहीं करते तब तक अग्राह्य/अयोग्य ही रहते हैं। यहां इसको दूसरे प्रकार से भी समझा जा सकता है कि जो प्रायश्चित्ति हो जाते हैं किन्तु यहां भी वर्त्तमान काल के अनुसार कुछ महत्वपूर्ण दोषों को भी ग्रहण नहीं किया गया है क्योंकि वो सार्वजनिक जीवन बन गया है और शोधन संभव नहीं, जैसे कि रजस्वला संसर्ग, अयाज्ययाजन।

  • जो मद्यपान करते हैं, वृथा मांस भक्षण करते हैं अथवा अन्यान्य अभक्ष्यभक्षण, अपेय-पान करते हैं अर्थात आहार शुद्धि का पालन नहीं करते।
  • इसी प्रकार शुद्धि विधान में और भी अनेकों विषय है शारीरिक शुद्धि, द्रव्यादि शुद्धि, अघशुद्धि, भावशुद्धि आदि।
  • जिसकी पत्नी नौकरी/व्यापार करती हो अर्थात स्त्रीधन भोग, स्त्रीजित आदि दोष।
  • जो पुत्रों का यथाकाल संस्कार न करता हो, धर्म-शास्त्र का ज्ञान प्रदान नहीं करता हो।
  • जो नित्य न्यूनतम १० बार गायत्री जप मात्र भी नहीं करता हो।
  • म्लेच्छाचारी/स्वेच्छाचारी/दुराचारी/भ्रष्टाचारी हो।
  • जो ब्राह्मण स्वरूप धारण करके नहीं आया हो अर्थात वेशभूषा/वाणी आदि से म्लेच्छ दिखता हो।
  • जिसने शिक्षा-सूत्र-तिलक आदि का त्याग कर दिया हो।
  • जो श्वानादि का पालन करता हो।

तृतीय : अजिज्ञासु/अकर्मण्य

श्रुतिः स्मृतिश्च विप्राणां नयने द्वे प्रकीर्तिते । काणः स्यादेकहीनोऽपि द्वाभ्यामन्धः प्रकीर्तितः ॥

उपरोक्त दोनों श्रेणी में आने वाले ब्राह्मण यदि विद्वान हों तो भी अग्राह्य/अयोग्य होते हैं किन्तु यदि इस तृतीय श्रेणी में आने वाले ब्राह्मण यदि सदाचारी अथवा विद्वान हों तो अग्राह्य नहीं होंगे एवं देश-काल-परिस्थिति का विचार करने पर इस श्रेणी को ग्राह्य/योग्य समझा जा सकता है। इस श्रेणी के ब्राह्मण ग्राह्य/योग्य तो होंते हैं किन्तु इसका ध्यान रखना आवश्यक है कि उपरोक्त दोनों श्रेणी में न आते हों। यदि उपरोक्त दोनों श्रेणी में से कोई एक भी दोष हो तो इस श्रेणी में समाहित ही नहीं हो सकते।

इस श्रेणी में अधिकांशतः वो आते हैं जिन्हें नौकरी की पढाई पढ़ने के लिये भेजा गया किन्तु नौकरी प्राप्त नहीं कर पाये और अंततः थककर कुछ और करने की अपेक्षा यजमान होने के कारण पौरोहित्य/पाण्डित्य को ही वृत्ति बना लिये। इसमें पुरोहित वर्ग एक बार क्षम्य हो जाता है जब वह स्वयं ही स्वीकार करता है की हम अल्पज्ञ हैं और दूसरे कर्मकांडी आकर विशेष कर्मकांडों का संपादन करते हैं, किन्तु जब धीरे-धीरे वो पुरोहित भी कुछ सीख-समझ लेता है तो अहंकारी हो जाता है और तब अग्राह्य हो जाता है।

किन्तु इस श्रेणी के जो पंडित बनते हैं वो विशेष रूप से अयोग्य होते हैं क्योंकि वो कर्मकांड विशेषज्ञ के रूप में कार्य करते हैं किन्तु इसकी योग्यता नहीं रखते, सीधे कहें तो अग्निस्थापन भी नहीं करा सकते। उनका ज्ञान रुद्रीपाठ, रुद्राभिषेक, सप्तशती पाठ, भागवत और गीता पाठ तक सीमित होता है एवं अधिकांशतः महामृत्युंजय जप या रुद्राभिषेक ही कराते हैं। आवश्यकता पड़ने पर सबकुछ करा देते हैं क्योंकि अन्यत्र तो विधि और मंत्र का विचार ही नहीं करना है केवल स्त्रियों के विधान को समझना होता है।

ऐसे पंडितों को यह भी ज्ञान नहीं होता कि प्रथम शिखाग्रंथि करके तदनन्तर आचमन होगा, ये पहले आचमन कराते हैं वो भी कुशा खोलकर और तदनन्तर “चिद्रूपिणि महामाये” मन्त्र से शिखा स्पर्श कराते हैं। कुल मिलाकर यहां स्पष्ट यह किया जा रहा है कि इनके पास शास्त्रज्ञान का अभाव होता है, क्योंकि शिक्षा-दीक्षा कॉलेजों में पाते हैं एवं परिस्थितिवश पंडित बन जाते हैं एवं यत्र-तत्र कुछ देख-सुनकर सीखते हैं शास्त्राध्ययन, स्वाध्याय से विमुख होते हैं और यही इनकी अयोग्यता का मूल कारण है। ऐसे पंडितों के कुछ विशेष लक्षण होते हैं जिसे स्पष्ट करना आवश्यक है :

  • ये लोग कर्मकांड में जब यजमान के यहां जाते हैं तब धोती-कुरता आदि धारण करते हैं और जब कर्मकांड नहीं कराना हो तो कुरता-पैजामा, सर्ट-पैंट आदि भी पहनते हैं।
  • धोती-कुरता धारण करने में भी ये लोग भगवा, रक्ताम्बरी, पीताम्बरी आदि धारण करते हैं अथवा नीलयुक्त धोती। धोती के समान दिखने वाला सिला पैजामा भी इसी श्रेणी में आता है और उसको धारण करने का भी तात्पर्य हो जाता है कि ज्ञान का अभाव है।
  • ये लोग पूजा-पाठ आदि में ढेरों भजन गाते हैं।
  • पूजा-पाठ में ये लोग प्रारम्भ में समय बर्बाद भी करते हैं और बाद में शीघ्रता करते हैं। जैसे रुद्राभिषेक करना हो तो शिवपूजन से पूर्व गणेशाम्बिका पूजन, कलश स्थापन और वेदियों में ३ – ४ घंटा व्यतीत कर देते हैं किन्तु आधे घंटे में जैसे-तैसे रुद्री पढ़कर रुद्राभिषेक करा देते हैं एवं आधे घंटे में जैसे-तैसे हवन।
  • गुटका आदि खाने में संयम नहीं करते हैं।
  • कुछ लोग ठीकेदारी भी करते हैं अर्थात ब्राह्मणों की दक्षिणा स्वयं ठीके में लेकर बाद में कम देते हैं, यजमान से ब्राह्मणों को नहीं दिलाते।
  • ये बुफे सिस्टम में खड़े-खड़े भोजन करते भी देखे जा सकते हैं। किसी के साथ भी पंक्ति में बैठकर भोजन कर सकते हैं।
  • ज्ञानाभाव को स्वीकार नहीं करने के कारण ये लोग कोई प्रामाणिक निर्णय तो दे ही नहीं सकते किन्तु मनमुखी निर्णय देने में पीछे नहीं रहते। मनमुखी होने के कारण इनका अधिकांश निर्णय यजमान के अनुकूल होता है।
  • भले ही असत्यवादी न हों किन्तु मोबाइल पर असत्य बोलने के आदि हो जाते हैं और एक कर्मकाण्डी हेतु यह भी दोष ही है।

इस श्रेणी के पंडितों की अयोग्यता का मुख्य कारण ज्ञानाभाव ही होता है किन्तु समस्या ज्ञानाभाव नहीं अपितु जिज्ञासा का अभाव है, ये लोग स्वाध्याय से भी रहित होते हैं, शास्त्रावलोकन करते ही नहीं हैं और जब एक प्रकार से परिस्थिति में ढल जाते हैं तब ज्ञानप्राप्ति से दूर भी हो जाते हैं क्योंकि तब इनके भाव होते हैं कि शास्त्रों में जितना कहा गया है उतना संभव ही नहीं है इसलिये जो जैसा चल रहा है सब सही है।

जैसे नीलयुक्त धोती पहनने की आदत लगने के पश्चात् यदि कहीं नीलनिषेध दिखता है तो उसका पालन करना कठिन लगता है अर्थात शास्त्राज्ञा को स्वीकारने में समस्या होती है और इस कारण भी आगे शास्त्रावलोकन का त्याग कर देते हैं कि जितना ज्ञान होगा उतनी समस्या बढ़ेगी।

इन लोगों में आचार्यत्व का आधार ज्ञान नहीं होता अपितु यजमान का आमंत्रण होता है अर्थात यजमान ने जिनको आमंत्रित किया वही आचार्य होते हैं, भले ही उन्होंने स्वयं और भी अधिक ज्ञाता को बुलाया हो। एक दिन अपने यजमान के यहां आचार्य होंगे वही दूसरे के यजमान के यहां जापक होंगे, आचार्य नहीं और वहां जो जापक होंगे वो अपने यजमान के यहां आचार्य हो जायेंगे। अर्थात आचार्यत्व का निर्धारण ज्ञान से नहीं किया करते हैं। इस श्रेणी के कर्मकांडियों को स्वाध्याय की आवश्यकता होती है और प्रयास करना चाहिये।

अधिकांशतः कर्मकांडी इसी श्रेणी के होते हैं जो ऊपर के अग्राह्य में यदि न हों तो भी। इनकी पहचान लक्षणों के आधार पर ही कर सकते हैं। चूंकि ९०% इसी श्रेणी के होते हैं इस कारण अग्राह्यता का तो मार्जन हो जाता है क्योंकि ग्राह्य उपलब्ध हों तब तो अग्राह्य का त्याग कर सकते हैं, किन्तु अयोग्यता का निवारण नहीं होता है।

ऐसा नहीं कहा जा सकता कि शास्त्रानुसार अग्राह्य नहीं हैं अपितु देश-काल-परिस्थिति के अनुसार “एरण्डोपि द्रुमायते” चरितार्थ होता है। “येषु देशेषु ये द्विजाः” का अवलंबन भी प्राप्त हो जाता है और इसी सूत्र से ग्राह्यता स्थापित होती है। किन्तु ये ग्राह्यता तभी तक के लिये होती है जब कोई ग्राह्य ब्राह्मण उपलब्ध न हो अर्थात अभाव में। इस श्रेणी के ब्राह्मण यदि आमंत्रित भी हों किन्तु यदि संयोगवश कोई अनामंत्रित योग्य ब्राह्मण उपस्थित हो जायें तो उस अवस्था में इनकी ग्राह्यता भंग भी हो जाती है।

जैसे यदि मैं “येषु देशेषु ये द्विजाः” का अवलम्ब लेकर कहीं आमंत्रित हूँ और संयोगवश वहां अनामंत्रित होते हुये भी यदि मुझसे अधिक ज्ञानी उपस्थित हो जायें तो वही ग्राह्य हो जायेगें, मेरा ही दायित्व बनता है कि धर्म की रक्षा के लिये उन्हीं को आचार्यत्व प्रदान करूँ यदि वो ग्रहण करें तो। ग्रहण करेंगे अथवा नहीं ये तो प्रस्ताव देने पर ही ज्ञात हो सकता है ऐसा नहीं कि बिना प्रस्ताव के ही स्वयं निर्णय ले लूँ।

आलेख को अधिक विस्तार देने की अपेक्षा ऐसे कर्मकांडियों को सन्देश देना आवश्यक है कि अयोग्यता का निवारण करने के लिये प्रयास अपेक्षित है और वो प्रयास है स्वाध्याय। शस्त्रावलोकन करें, ज्ञानार्जन करें क्योंकि धर्म की रक्षा का दायित्व आपके ऊपर ही है। न्यूनतम उन कर्मकांडों का पारंगत बनने का प्रयास करें जो-जो कराते हैं। सन्देश विषयक विस्तृत चर्चा पुनः भिन्न आलेख में करेंगे।

स्वाध्याय
स्वाध्याय

अंत में कर्मकांडियों से विनम्र आग्रह भी है कि इस आलेख को नकारात्मक रूप से ग्रहण न करके सकारात्मक रूप से ग्रहण करें अर्थात निंदा न समझकर अपनी योग्यता को बढ़ाने का उत्प्रेरक समझें। अपने ज्ञान-तप को बढ़ाने का प्रयास करें और न्यूनतम इतनी योग्यता का प्रयास तो करें ही करें कि सामने आया अन्न रोवे न।

निष्कर्ष (Conclusion)

आलेख का निष्कर्ष यह है कि ब्राह्मण वर्ग का वास्तविक पतन तब हुआ जब उसने ‘स्वधर्म’ (ज्ञान और तप) को त्यागकर केवल ‘वृत्ति’ (आजीविका) को प्रधानता दी। सरकारों ने जहाँ आरक्षण और SC/ST Act जैसे तंत्रों से सामाजिक विखंडन किया, वहीं ब्राह्मणों ने स्वयं स्वाध्याय और शुद्धि का त्याग कर अयोग्यता को आमंत्रण दिया। कलयुग में ‘श्रेष्ठ’ का मिलना कठिन है, अतः ‘न्यूनतम अयोग्य’ का चयन ही एकमात्र विकल्प शेष है। अंततः, ब्राह्मण की रक्षा सरकार या संविधान नहीं, बल्कि उसका अपना तप और ज्ञान ही कर सकती है।

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

सूचना: इस आलेख में व्यक्त विचार विशुद्ध रूप से व्यक्तिगत अनुभव और शास्त्रसम्मत प्रमाणों पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य किसी जाति या व्यक्ति विशेष का अपमान करना नहीं, बल्कि धर्म-संरक्षण हेतु ब्राह्मण समाज को उसकी खोई हुई मर्यादा और ज्ञान-परंपरा के प्रति जाग्रत करना है। यहाँ दी गई अयोग्यता की श्रेणियाँ शास्त्रों के निम्नतम मानकों के आधार पर विश्लेषित की गई हैं।

FAQ

प्रश्न : नामधारक ब्राह्मण का क्या अर्थ है?

उत्तर : जो केवल जाति से ब्राह्मण है, किन्तु कर्म और ज्ञान शून्य है।

प्रश्न : अयाज्य यजमान कौन है?

उत्तर : जो शास्त्र विरुद्ध आचरण करता हो और जिसकी धन-शुद्धि न हो।

प्रश्न : स्वाध्याय क्यों आवश्यक है

उत्तर : ज्ञान के अभाव में ब्राह्मण का ‘नयन’ (नेत्र) बंद माना जाता है।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।


Discover more from कर्मकांड सीखें

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *