vivek shunyata shastra vs conspiracy
हम सब देख रहे हैं कि देश और समाज में अपराध की अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। उन विषयों के लिये भी लोग वर्षों तक न्यायालय के चक्कर लगाया करते हैं जो परिवार और समाज चुटकियों में हल कर देता था। लोगों का स्वाभिमान जगा है या अहंकार भर गया है ये समझ ही नहीं पा रहे हैं। ऐसे में यह आवश्यक है कि इसका कारण ढूंढें और समाधान का मार्ग निकालें।
विवेक की अचेतावस्था: आधुनिक शिक्षा, सामाजिक पतन और ‘संघ’ के नैरेटिव का शास्त्र सम्मत विश्लेषण
वर्त्तमान में देश कर समाज की जीतनी भी बड़ी-बड़ी समस्यायें हैं उनका मूल उस शिक्षा व्यवस्था के भीतर है जो विदेशी शिक्षा पद्धति प्रचलित है। चक्रव्यूह तो देखें जब राजनीतिक बहस होती है और देश के स्वघोषित या राजनीति और मीडिया द्वारा घोषित बुद्धिजीवि इन विषयों पर फिर से कहता है कि सबका कारण है शिक्षा का अभाव और शिक्षा जीतनी बढ़ रही है अपराध, दुराचार, भ्रष्टाचार सबकुछ उतने ही बढ़ते जा रहे हैं।
एक बार को मान लेते हैं कि सबका कारण शिक्षा का अभाव है; पहले की तुलना में शिक्षादर की वृद्धि हुयी है अर्थात ३-४ दशक पूर्व लोग कम शिक्षित थे तो उस काल में अधिक समस्यायें होनी चाहिये थी, जबकि धरातल पर हमें यही दिखता है कि पहले समस्यायें कम थी और अब बढ़ गयी है। यह उस विचार को पूर्णतः असिद्ध कर देता है जो यह कहते हैं कि सभी समस्याओं का कारण शिक्षा का अभाव होना है।
समस्या
जब हम समस्याओं के बढ़ने की बात कर रहे हैं तो समस्या क्या है यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है :
- दुराचार : हम सभी देख रहे हैं कि दुराचार में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। कहीं अविवाहित जोड़े लव तो कहीं विवाहित जोड़े भी किसी और के साथ। चिंताजनक तो यह भी है कि न्यायपालिका को इसमें कुछ भी अनैतिक नहीं लगता और वो इसे मान्यता तक भी दे देती है। एक पति अपनी दुराचारिणी पत्नी को झेलता रहे नहीं तो बलात्कार या महिला उत्पीड़न आदि का आरोपी बन जायेगा।
- परिवार का विखंडन : शादी-और तलाक का खेल तो इतना होने लगा है कि दो दशक पूर्व लोग सोच भी पा रहे थे। किसी का बेटा भाग रहा है तो किसी की बेटी और वो हाथ पर हाथ धरकर बैठा रहे, कुछ करना हो तो अपना सर पटके। जिस बच्चे के लिये माता-पिता ने सब-कुछ लुटा दिया वो बच्चा उसे बुढ़ापे में भटकने के लिये छोड़ देता है। भाई-भाई में ही नहीं अब तो भाई-बहन में भी संपत्ति का विवाद आरंभ हो गया है। बच्चे को या पता नहीं कि कब उसके माता या पिता उससे अलग हो जायेंगे।
- जातीय विद्वेष : आरक्षण की मार हो या संरक्षण वाले कानूनों का दुरुपयोग अथवा घृणित जातिवादी राजनीति सबने मिलकर समाज में जातीय संघर्ष को चरमोत्कर्ष पर पहुंचा दिया है। सोचिये जिसकी धर्म में आस्था है उसे नास्तिक/अधर्मी मनुवादी कहकर चिढ़ाते हैं।
- स्वार्थलोलुपता : स्वार्थलोलुपता तो ऐसी कि जो चाहिये वो चाहिये भले ही उसके लिये इज्जत की दाव क्यों न लग जाये। एक कुख्यात वकील का वीडियो भी वायरल हुआ था जिसमें वो एक महिला को जज बनाने के नाम पर….. सोचिये जब उस स्तर पर भी ऐसी बातें हो सकती हैं तो निचले स्तर पर क्या-क्या नहीं होता होगा। भ्रष्टाचार मिटा है और सरकार के भेजे १ रुपये में से पुरे १ रुपये लोगों के खाते में पहुंच रहे हैं किन्तु क्या भ्रष्टाचार कम हुआ है ? कौन-कौन से ऐसे काम हैं जो बिना घूस के हो रहे हैं, संभवतः कुछ गिने-चुने ही होंगे जो ऑनलाइन ही हो जाता हो, किसी से मिलने की आवश्यकता न हो।
- विश्वासघात : साझेदारों का परस्पर विश्वासघात करना चिंता का विषय भले न हो किन्तु पति-पत्नी का भी विश्वासघात करना, मित्रों का भी विश्वासघात करना तो चिंता का विषय होना ही चाहिये।
मूल कारण : विवेक की समाप्ति
विभिन्न जिहड़ों की तो हम यहां चर्चा ही नहीं करेंगे। यद्यपि वैसे राज्य जहां योगी जैसा मुख्यमंत्री हो इसको नियंत्रित करने का भरपूर प्रयास भी हो रहा है। किन्तु हम जिन बिंदुओं को उठा रहे हैं उसमें योगी जैसे मुख्यमंत्री भी कुछ करते नहीं दिखते। यदि हम इसके मूल कारण को ढूंढने का प्रयास करते हैं तो हमें ज्ञात होता है कि इसका मूल कारण हमारे विवेक का समाप्त हो जाना है।
जन्म हुआ, 25 वर्षों तक बैग ढोते रहे, जैसे ही युवा हुये कमाई, पारिवारिक विवादों में ऐसे उलझे की विवेक क्या होता है सोचने का भी अवसर नहीं मिलता। बच्चे हुये और बच्चों की शिक्षा में ऐसे उलझे की जब चेते तो बूढ़े हो गये और खाली हाथ रह गये। जिसके लिये सब कुछ लुटा दिया वो बच्चे स्वतंत्रता की ओट में, मेरा-जीवन मेरी इच्छा “My life, my choices.” कहकर कलेजे पर पत्थर से प्रहार करने लगे।

जीवन भर सोचते रहे कि बुढ़ापे में छाती चौड़ा करके, सिर उठाकर चलेंगे, बात करेंगे किन्तु बच्चों ने ऐसे कुकर्म किये की थोड़े से संस्कार होने के कारण मुंह दिखाने लायक नहीं रहे। वो विषय तो अलग हैं जब अस्पतालों, न्यायालयों में दौड़ते रहे, बेकार की राजनीतिक बहसों में समय को नष्ट करते रहे। संक्षेप में वर्त्तमान जीवन की यही सच्चाई है।
यहीं पर वह प्रश्न मुंह बाये खड़ा है कि यदि शिक्षा ही समाधान था तो हमने अपने बच्चों की शिक्षा पर सब-कुछ लुटा दिया किन्तु बुढ़ापे में उसका साथ न होना ही अच्छा लगता है, यदि साथ होते तो और दुर्दशा होती। तो फिर समस्या शिक्षा का अभाव कैसे थी ?
कुछ वर्ष पूर्व तक जिहाद और आतंकवाद का कारण शिक्षा का अभाव बताया जाता था, शिक्षा दिया तो क्या अब तो डॉक्टर/इंजीनियर भी जिहादी/आतंकवादी निकल रहा है और ये उससे अधिक भयावह है। तो प्रश्न वही है कि समस्या शिक्षा का अभाव कैसे था ?
समस्या शिक्षा का अभाव है ही नहीं समस्या तो विवेक का अभाव है जो स्कूलों/कॉलेजों में नहीं मिलते। हम दूरदर्शन, मोबाईल ने जीवन में क्रन्तिकारी परिवर्तन लाया है और उस क्रन्तिकारी परिवर्तन में एक और बड़ी बात जो छुपी है वो यह कि ये हमें सोचने का कभी अवकाश ही नहीं दे रहा है। यदि दो-चार घंटे का अवकाश दिन में कभी मिलता भी है तो वो यही निगल जाता है। यदि किसी से मिले और वार्तालाप करें तो हमारे पास विचार-विमर्श का जो विषय भी होता है वो घृणित राजनीति होती है।
मूल समस्या विवेक का अभाव है और आगे इसी को समझेंगे लेकिन एक विशेष तरीके से।
क्या आपको लगता है कि आप मूर्ख नहीं हैं ?
वैसे यह प्रश्न कुछ लोगों को विस्मय में डाल सकता है तो कुछ के अहंकार को जगा सकता है कि उसे मूर्ख कहा जा रहा है, ये किसी व्यक्ति विशेष के बारे में है ही नहीं सामूहिक है और आपको यदि ऐसा लगता है कि आप मूर्ख नहीं हैं तो आगे के प्रश्नों का सही-सही उत्तर स्वयं ही विचार करें :
- अपनी संस्कृति के अनुसार प्रणाम/नमस्ते करना पुरानी सोच और हाथ मिलाना आधुनिकता है कैसे? जबकि हाथ मिलाना तो ईसाइयों की भी पुरानी व्यवस्था है।
- धोती पहनना पुरानी सोच और पैंट-सर्ट-कोर्ट पहनना आधुनिकता लगती है कैसे ? ये भी ईसाई परिधान है।
- धर्म और धार्मिक परम्पराओं का पालन करना पुरानी सोच है किन्तु पार्टियां करना कर नशे में चूर होना आधुनिकता कैसे है ? ये भी तो ईसाइयों की ही देन है।
- भोज में भूमि पर (दरी आदि बिछाकर) बैठकर भोजन करना पुरानी सोच है और कुर्सी-टेबल लगाकर खाना आधुनिक कैसे? ये भी तो ईसाइयों की ही पुरानी व्यवस्था है।
- नित्यकर्म तक का मौलिक ज्ञान भी हो या न हो किन्तु “तू ही राम है तू रहीम है तू करीम …” जैसी प्रार्थनायें करते हैं। क्या बौद्धिक द्वार को ही बंद नहीं कर रखा है ?
- जब आप हिन्दी या अन्य भारतीय भाषा बोलते हैं तो मूर्ख और अंग्रेजी बोलते हैं तो शिक्षित (पढ़ा-लिखा) हो जाते हैं कैसे? ये भाषा भी तो ईसाइयों की ही है।
गंभीरता से विचार करें ईसाई व्यवस्था में ढलना आधुनिकता कैसे है और अपनी संस्कृति का ज्ञान और पालन करना रूढ़िवादिता कैसे ? तकनीक और यंत्रों का उपयोग भिन्न विषय है जब कोई संस्कार-संस्कृति की बात करता है तो उसे आधुनिक तकनीक और यंत्रों का भी त्याग करने का कुतर्क किया जाता है। किन्तु बल्व, मोबाईल, फ्रीज, वाहन, यान, कंप्यूटर ये सब यंत्र हैं किसी संस्कृति का हिस्सा नहीं। यदि मैं सर्ट-पैंट का प्रयोग न करूँ तो इससे हमें मोबाइल/लैपटॉप आदि का प्रयोग कैसे बाधित होता है, ये किसी संस्कृति का अंग कैसे बन जाता है ?
मूल रूप से तीन प्रश्न हैं :
- अपनी संस्कृति के अनुसार जीवन-निर्वहन रूढ़िवादिता कैसे है ?
- ईसाई की जीवनशैली अपनाना (परिधान, भाषा, अभिवादन आदि) आधुनिकता कैसे है ?
- तकनीक और यंत्रों का ईसाई रिलीजन से क्या संबंध है ?
इन प्रश्नों को स्वयं से पूछें, इसका उत्तर ढूंढे। जब उत्तर मिल जाये तो अगला प्रश्न है कि इसका उत्तर आपको ज्ञात क्यों नहीं था ? क्या आप दिग्भ्रमित नहीं थे ? और …. और …… और …….
“क्या आपका विवेक सो नहीं रहा था ?“
विवेक अचेत है
अब वही बात आ गई कि विवेक कहां गया ? वास्तव में विवेक कहीं गया नहीं अचेत है। इसको म्लेच्छों ने आधुनिकता के विष से अचेत कर दिया है और इस दशा में हम विचार भी नहीं कर पा रहे हैं। हमें नेता-मीडिया-NGO वाले जो कहते हैं (नैरेटिव चलाते हैं) हम उसी को स्वीकार कर लेते हैं, सच मान लेते हैं। इसके लिये भी कुछ उदाहरण प्रस्तुत करना आवश्यक है और इसमें मुख्य रूप से संघ के जो नैरेटिव होते हैं उसको लिया गया है, संघ के नैरेटिव लेने का कारण यह है कि जब हिंदुत्व, सनातन की बात करने वाला भी ऐसा कर सकता है तो बाकियों का विचार ही क्या करना ?
वास्तव में संघ भी यह जान रहा है कि विवेक अचेत है और हमें अपना साम्राज्य स्थापित करना है इनको सचेत नहीं करना है, अर्थात संघ भी अपने साम्राज्य के लिये एक विचारधारा के रूप में ही कार्य कर रहा है जो शब्द, भाषा से तो कहता है सचेत हो जाओ, किन्तु वो भी हमारा उपयोग अपने लिये कर रहा है। ठीक वैसे ही जैसे साम्यवादी हो, मार्क्सवादी हो, ईसाई हो, इस्लाम हो या और कुछ सब हमें अपने जैसा ही बनाना चाहते हैं, उसी प्रकार संघ भी हमें अपनी विचारधारा के अनुकूल बनाना चाहता है।
षड्यंत्र का पटाक्षेप
हमारी स्थिति यह है कि हम स्वयं ही अचेत हैं और जो भी आता है हमारा शरीर से कोई न कोई अंग काट कर ले जाता है, जब दूसरा आता है तो थोड़ा बहुत विवाद करके उससे समझौता कर लेते हैं कि “आधा-आधा” (50-50), फिर इसी क्रम में तीसरा-चौथा भी आता है; पहले उसे भगाने का प्रयास करते हैं किन्तु यदि वो भी सबल ही है तो समझौता करके उसे भी हिस्सा दे देते हैं। हमें सचेत करने से किसी को कोई लेना देना नहीं है, हमारे शरीर से सभी उपयोगी अंगों को आपस में बांटना है। यहां शरीर का तात्पर्य सनातनी, भारतीय, हिन्दू आदि है जिसे जिस प्रकार समझना हो समझे।
समझौता का तात्पर्य इस प्रकार से समझा जा सकता है कि कोई लुटेरा बैंक लूटने गया और दूसरा आ गया तो तत्काल समझौता कर लिया कि पहले मिलकर लूटकर चलो बाद में बंटवारा करेंगे या लड़ेंगे, यहां लड़ेंगे या बंटबारा करने लगेंगे तो फंस जायेंगे ?
अचेत होने का तात्पर्य मृत होना नहीं है, अचेत होने का तात्पर्य है ऐसी नींद में सुला दिया कि न ही उठ पायेगा, न ही कुछ रोकेगा अर्थात हमें जो कार्य करना चाहिये हमारे पास उतना अवसर है, यदि कुछ देख-सुन भी ले तो भी समझ ही नहीं पायेगा और स्मरण भी बस इतना रहेगा कि हम अचेत थे।
समग्र समाज है और इसको कोई मुसलमान बना रहा है तो कोई ईसाई, कोई बौद्ध, कोई नास्तिक, कोई असली हिन्दू आर्य समाजी और ऐसे में ही एक संगठन संघ बना उसने कहा सब मेरा है सब मेरा है किन्तु इस संगठन के पास मौलिकता ही नहीं है; इसने सनातन शास्त्रों (भारतीय शास्त्रों) को ही आधार बनाया ही नहीं परिस्थिति मात्र को आधार बनाया, आर्य समाजियों ने कान में मंत्र फूंका ऐसे नहीं चलेगा कुछ-कुछ शास्त्रों की बात भी करनी होगी नहीं तो लात पड़ेगी जैसे आक्रांताओं को पड़ी, तुमको मैं इतिहास की सीख दे रहा हूँ ।

ये बात म्लेच्छों ने चुपके से सुन लिया और उसने भी मजार बनाकर, यीशु की आरती-चालीसा बनाकर नया तरंग गाया। किन्तु हमें संघ के विषय में समझना है क्योंकि अभी तो हमको संघ ही अपना लगता है न ?
संघ की मान्यतायें और शास्त्र
बहुत सारे लोगों को ऐसा लग सकता है कि यहां आर्य-समाज और संघ को घनिष्ठता से जोड़ते हुये उन्हीं के समकक्ष स्थापित कर दिया गया जिसको ये लोग आक्रांता कहते हैं। ये एक गभीर विवाद का विषय हो सकता है किन्तु जब संघ ही संवाद की बात करता है तो इस विषय में वह संवाद (शास्त्रार्थ) कराने का साहस और धैर्य रखता है क्या ?
ये तो शास्त्रों को मानते ही नहीं है, इन्होंने अपने नियम बनाये और जिन शास्त्रों से उन नियमों को बल मिलता है उसे प्रामाणिक कहते हैं और जिससे खंडन हो जाये उसे अप्रमाणिक/प्रक्षिप्त कह देते हैं। अर्थात इनके बनाये नियम/परम्परायें/व्याख्या सत्य हैं किन्तु शास्त्र असत्य है यदि वह इन नियमों/परम्पराओं/व्याख्याओं की पुष्टि न करे।
- जब संघ आपकी किसी सांस्कृतिक पहचान/प्राचीन परम्परा को जो शास्त्र सम्मत भी है, आक्रांताओं के अत्याचार/दमनकाल से जोड़कर अशास्त्रीय कहता है, गलत बताता है क्या वो तब भी सही है, विश्वसनीय है ?
- यदि आप इसके प्रक्षिप्तवाद को भी नहीं स्वीकारते और रूढ़िवादिता, गलत कहने पर भी अपनी प्राचीन परंपरा (गिने-चुने प्रतीकात्मक) को ही धारण करने में रूचि व्यक्त करते हैं तो संघ कहता है “शास्त्र आउटडेटेड हो गये हैं”, इनमें संशोधन की आवश्यकता है, ऐसा जानकर भी आपको लगता है कि संघ सही है और विश्वसनीय है ?
शास्त्र मान्य है अथवा नहीं यह विवाद का विषय ही नहीं है, किन्तु संघ ने शास्त्रों को भी विवादित कर दिया। किन्तु संघ ने स्वयं जो नियम बनाये, मान्यतायें स्थापित किये वो सही हैं और इसके लिये भले ही कालनेमियों को भगवा पहनाकर जगद्गुरु बनाना पड़े वो भी कर रहा है। यह कार्य तो सीधे-सीधे कालनेमी के कुकर्म से ही मिलता है जो कथा तो कहने लगा, भगवा तो धारण कर लिया किन्तु उद्देश्य हनुमान को भ्रमित करना था, कालक्षेप करना था।
कालनेमी का पटाक्षेप
मैं कालनेमी के स्वरूप को समझाने प्रयास तो कर रहा हूँ किन्तु वास्तविकता तो यही है कि विवेक के बिना नहीं समझ पाएंगे और इसीलिये मैं विवेक की अचेतावस्था को लेकर चिंतत हूँ, मैं संघ या आर्यसमाज आदि की चर्चा करना ही नहीं चाहता हूँ किन्तु विवेक को जाग्रत करने के लिये उसके कुछ कुकर्मों की चर्चा करना अनिवार्य है। चूँकि इन सभी तथ्यों पर मैं पृथक-पृथक विस्तृत चर्चा कर चुका हूँ इसलिये यहां संक्षेपतः ही प्रस्तुत करूँगा और सम्बंधित आलेख/वीडियो को संलग्न कर दूंगा जिसे विस्तार से समझना हो वो अनुगमन भी कर सकेंगे।
संघ का यह तर्क कि प्राचीन काल में ऐसा कोई भेदभाव नहीं था और यह केवल ‘मुस्लिम आक्रान्ताओं’ की देन है, ऐतिहासिक एवं शास्त्रीय दृष्टि से असत्य है। स्मृतियों में शुचिता और अशुचिता के नियम जीवाणु विज्ञान (आधुनिक दृष्टि) और आत्मिक पवित्रता (शास्त्रीय दृष्टि) पर आधारित हैं, जिन्हें संघ ‘छुआछूत’ कहकर अपमानित करता है। संघ कर्मणा वर्णव्यवस्था की सिद्धि करता है किन्तु शास्त्र जन्मना और यही कारण है कि शास्त्र को ही परिवर्तित करने की बात करने लगा। यदि शास्त्र से संघ की मान्यता सिद्ध नहीं होती है तो शास्त्र को ही बदल दिया जायेगा ये कुतर्क करके कि शास्त्र ऑउटडेटेड हो गए।

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥ (श्रीमद्भगवद्गीता ३.३५)
अर्थ : दूसरों के धर्म (कर्तव्य) का भली-भाँति अनुष्ठान करने की अपेक्षा अपना गुणरहित स्वधर्म ही श्रेष्ठ है।
व्याख्या: संघ की विचारधारा राष्ट्र-रक्षा (क्षत्रिय कर्म) को ही सबका सामान्य धर्म घोषित करती है, जबकि शास्त्रों के अनुसार ब्राह्मण के लिए शम, दम और तप ही परम धर्म है। स्वधर्म से च्युत होकर किया गया कोई भी महान कार्य आध्यात्मिक दृष्टि से निष्फल और समाज के लिए भयावह होता है। स्वधर्म की सिद्धि जन्म से ही होती है, यदि कर्म से वर्ण की सिद्धि होती तो स्वधर्म का कोई सिद्धांत ही नहीं होता क्योंकि जब जैसे कर्म करेंगे वही वर्ण हो जायेगा।
पुनः यदि बच्चे का वर्ण उसके कर्म से ही निर्धारित होता तो माता-पिता के वर्ण भेद से वह वर्णसंकर कैसे हो सकता है। अर्थात वर्णव्यवस्था जन्मना ही सिद्ध होता है कर्मणा नहीं।
विवाह रात में करें या दिन में : संघ और उसके स्थापित भगवाधारी धर्मगुरु/कथावाचक आदि कहते हैं कि रात में विवाह नहीं करना चाहिये और ये आक्रांताओं के कारण उस काल में की गयी व्यवस्था थी, शास्त्रोक्त नियम नहीं। अब देखिये शास्त्र क्या कहता है :
विष्णुधर्मोत्तर पुराण और गृह्यसूत्रों के प्रमाणों के सम्मुख ऐसा विचार नितान्त निराधार और शास्त्र-विरुद्ध है। भगवान शिव और पार्वती के विवाह के वृत्तान्त में भी ध्रुव दर्शन के उपरान्त ही सिन्दूर दान और हृदयालम्भन जैसे मुख्य कृत्यों का वर्णन शिवपुराण में प्राप्त होता है, जो रात्रि-काल की महत्ता को पुष्ट करता है।
रात्रौ दानं प्रशंसन्ति विना चैव हि दक्षिणाम्। विद्यां कन्यां तथा श्रेष्ठं दीपमन्नं प्रतिश्रयम्॥
(विष्णुधर्मोत्तर पुराण, तृतीय खण्ड, ३०१.३०)
अर्थ: विष्णुधर्मोत्तर पुराण का यह स्पष्ट निर्देश है कि पाँच प्रकार के दान रात्रि के समय भी अत्यन्त प्रशस्त और फलदायी माने गए हैं: विद्या दान, कन्या दान, दीप दान, अन्न दान और प्रतिश्रय (आश्रय) दान। यहाँ ‘कन्या दान’ को रात्रि में सम्पादित करने की अनुमति देकर शास्त्र ने रात्रि-विवाह की शास्त्रीयता को प्रमाणित किया है। कन्यादान विवाह संस्कार का प्राण है, और यदि दान का काल रात्रि में विहित है, तो सम्पूर्ण अनुष्ठान की शास्त्र-सम्मति स्वतः सिद्ध हो जाती है।

अस्तमिते ध्रुवं दर्शयति। (पारस्कर गृह्यसूत्र १.८.१९)
अर्थ: सूर्यास्त के उपरान्त (रात्रि में) वर वधू को ध्रुव नक्षत्र का दर्शन कराए।
इसी प्रकार संघ की और भी ढेरों मनमुखी मान्यतायें हैं और जो मान्यता सामाजिक परम्पराओं के विरुद्ध होता है उसके विषय में शास्त्र से समीक्षा न करके आक्रांताओं, इतिहासकारों द्वारा प्रचारित किया जाता है और अपनी मान्यता को बिना शास्त्र प्रमाण के ही प्रामाणिक सिद्ध कर दिया जाता है जबकि शस्त्रान्वेषण करने पर वो मान्यता ही खण्डित हो जाती है और तब शास्त्र को ही ऑउटडेटेड कह दिया जाता है। हमें शास्त्र के ऑउटडेटेड वाले विचार पर भी गंभीरता सोचने, चिंतन-मनन करने की आवश्यकता है जो पृथक करेंगे किन्तु संक्षेप में मूल सूत्र के आधार पर यहां भी समझेंगे।
शास्त्र ऑउटडेटेड कैसे
“शास्त्र अपरिवर्तनीय हैं क्योंकि आत्मकल्याण का लक्ष्य नहीं बदला; बदला है तो केवल हमारा विवेक, जो आधुनिकता के विष से मूर्छित है।”
हम शास्त्रों के सबसे मूल सिद्धांत को लेकर यहां संक्षेप में सिद्ध करेंगे कि शास्त्र न ही ऑउटडेटेड हुये हैं। वो मूल सिद्धांत है जीवन का लक्ष्य आत्मकल्याण। जी हाँ आत्मकल्याण ही जीवन का मूल लक्ष्य है जिसके लिये यदि सतयुग आदि के आधार पर विचार करें तो कलयुग में मनुष्य अल्पायु होता है व अन्य अनेकों विसंगतियां होती है जिसके कारण उसके आत्मकल्याण का अधिकार भले ही समाप्त न हो किन्तु सम्भव नहीं रहता।
ऐसी दशा में विचार यह करना आवश्यक हो जाता है कि क्या कलयुग में भी सतयुग आदि के अनुसार धर्म का पालन करके ही आत्मकल्याण संभव है अथवा कुछ विशेष छूट शास्त्रों में पहले ही दिया जा चुका है। और इस विषय में अन्वेषण करने पर हमें यह ज्ञात होता है कि शास्त्रों में पहले ही कलयुग के लिये बहुत सारे छूट दे दिये गए हैं और इस युग में भी आत्मकल्याण सम्भव है व सुगम है। जैसे :
- “कलौ केशव कीर्तनात्”
- “कलयुग केवल नाम अधारा”
इसी प्रकार और भी ढेरों विषय हैं जिससे यह सिद्ध हो जाता है कि शास्त्र ने कलयुग में भी आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। तो एक गंभीर प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि
- कहीं कलयुग की आवश्यकता ही तो नहीं बदल गयी ?
- क्या कलयुग में आत्मकल्याण का प्रयास नहीं करना चाहिये ?
इसका उत्तर यह है कि मनुष्य जीवन का परम लक्ष्य आत्मकल्याण कलयुग में भी यथावत है किन्तु इसका मार्ग सुगम है। और जब न ही लक्ष्य बदला है और न ही उस कठिन मार्ग की समस्या है क्योंकि शास्त्र ने सुगम मार्ग भी प्रदान कर रखा है तो यह कैसे सिद्ध हो सकता है कि शास्त्र ऑउटडेटेड हो गये। अर्थात यह संघ का दुराग्रह है जो उसे कालनेमी सिद्ध करता है। ध्यातव्य यहां हमारा लक्ष्य शास्त्र की महत्ता एवं अनिवार्यता की सिद्धि है संघ का कालनेमी होना नहीं। यह दुर्भाग्य है कि जैसे ही हम शास्त्र की महत्ता कर अनिवार्यता सिद्ध करने का प्रयास करते हैं अपनी मान्यताओं और दुराग्रह के कारण संघ स्वयं ही कालनेमी सिद्ध हो जाता है।
इस प्रकार से यहां इस विमर्श का मूल विषय इस प्रकार स्थापित होता है कि हमारा विवेक ऐसा अचेत है कि आक्रांताओं के पश्चात् अब जो हमारा अगला भक्षक “संघ” है उसे हम अपना रक्षक मान रहे हैं। “धर्मो रक्षति रक्षितः” तो संघ भी कहता है किन्तु हम स्वयं ही इसका चिंतन नहीं कर पा रहे हैं और धर्म उसे समझ रहे हैं जो संघ समझा रहा है चाहे स्वयं या अपने स्थापित भगवाधारियों के माध्यम से।

निष्कर्ष: मर्यादा की विजय और षड्यंत्र का अंत
“जागो! इससे पहले कि अचेतावस्था मृत्यु में बदल जाए”
इस विमर्श का सार यह है कि हम जिस शिक्षा और आधुनिकता को अपनी समस्याओं का हल मान रहे थे, वही हमारी जड़ों को काटने का औजार बन गई है। समस्याओं का मूल शिक्षा का अभाव नहीं, बल्कि ‘विवेक का अभाव’ है। हमने तकनीक को तो अपनाया, लेकिन अनजाने में ईसाइयत की जीवनशैली को आधुनिकता समझकर ओढ़ लिया।
सबसे भयावह स्थिति तब होती है जब हिंदुत्व की बात करने वाले संगठन (जैसे संघ) स्वयं को शास्त्रों से ऊपर समझने लगते हैं और अपनी सुविधानुसार धर्म की व्याख्या करते हैं। शास्त्रों को ‘आउटडेटेड’ कहना वास्तव में उस सनातन सत्य से द्रोह है जिसने हजारों वर्षों से इस राष्ट्र को जीवित रखा है। आत्मकल्याण का मार्ग कलयुग में भी शास्त्रों के पास ही है, किसी विचारधारा या संगठन के पास नहीं। अब समय है कि हम मीडिया और संगठनों के बनाए ‘नैरेटिव’ से बाहर निकलकर अपने शास्त्रों की मर्यादा और विवेक को जाग्रत करें, अन्यथा रक्षक के वेश में खड़े भक्षक हमारा अस्तित्व मिटा देंगे।
“शिक्षा की डिग्री हाथ में है और विवेक अचेत है; यही कारण है कि आज का समाज सभ्य होकर भी सबसे अधिक अशांत है।”
भ्रम और यथार्थ (FAQ)
FAQ
प्रश्न 1: यदि शिक्षा बढ़ रही है, तो समाज में दुराचार, भ्रष्टाचार और परिवार का विखंडन क्यों बढ़ रहा है?
उत्तर: इसका कारण यह है कि वर्तमान शिक्षा पद्धति केवल ‘साक्षर’ बनाती है, ‘विवेकशील’ नहीं। यह शिक्षा हमें ‘जीविका’ (कमाई) तो सिखाती है, लेकिन ‘जीवन’ और ‘संस्कार’ नहीं। जब शिक्षा का मूल आधार ही विदेशी (मैकाले पद्धति) हो, तो वह हमें अपनी जड़ों से काटकर एक ऐसा ‘स्वार्थी रोबोट’ बना देती है जिसे “My life, my choices” के नाम पर मर्यादाहीनता ही आधुनिकता लगती है।
प्रश्न 2: क्या हाथ मिलाना, अंग्रेजी बोलना या पैंट-शर्ट पहनना वास्तव में हमारी संस्कृति के लिए घातक है?
उत्तर: यंत्र और तकनीक (जैसे मोबाइल, लैपटॉप) का उपयोग घातक नहीं है, क्योंकि वे निर्जीव साधन हैं। किंतु, परिधान, भाषा और अभिवादन हमारी सांस्कृतिक पहचान हैं। जब हम अपनी श्रेष्ठ परंपराओं (जैसे प्रणाम या धोती) को ‘पिछड़ा’ और ईसाइयों की जीवनशैली को ‘आधुनिक’ मानते हैं, तो यह हमारे विवेक की अचेतावस्था को दर्शाता है। यह एक मानसिक दासता है जो धीरे-धीरे हमारे स्वाभिमान को नष्ट कर देती है।
प्रश्न 3: संघ (RSS) या आर्य समाज जैसे संगठनों के विचारों को ‘भ्रामक’ क्यों कहा गया है?
उत्तर: क्योंकि ये संगठन शास्त्रों को ‘सुविधा और परिस्थिति’ के अनुसार व्याख्यायित करते हैं। जब कोई संगठन शास्त्रों को ‘आउटडेटेड’ (अप्रासंगिक) कहता है या जन्मना वर्ण-व्यवस्था जैसे मूल सिद्धांतों को नकारता है, तो वह वास्तव में सनातन धर्म की नींव पर ही प्रहार करता है। धर्म ‘वोट बैंक’ या ‘लोकप्रियता’ से नहीं, बल्कि ऋषि-प्रोक्त मर्यादा से चलता है। शास्त्रों को बदलना ‘सुधार’ नहीं, बल्कि ‘अधिकारों का विप्लव’ है।
प्रश्न 4: क्या रात्रि-विवाह वास्तव में मुस्लिम आक्रांताओं के डर के कारण शुरू हुए थे?
उत्तर: यह सरासर मिथ्या नैरेटिव है। विष्णुधर्मोत्तर पुराण, पारस्कर गृह्यसूत्र और शिवपुराण जैसे प्राचीन ग्रंथ स्पष्ट रूप से रात्रि के समय कन्यादान और ध्रुव दर्शन जैसे कृत्यों की महिमा गाते हैं। “आक्रांताओं का डर” वाला तर्क केवल इसलिए गढ़ा गया ताकि हमारी प्राचीन परंपराओं को ‘मजबूरी’ बताकर उन्हें बंद करवाया जा सके और समाज को शास्त्र-विमुख किया जा सके
प्रश्न 5: शास्त्रों को ‘आउटडेटेड’ कहना गलत क्यों है?
उत्तर: शास्त्र तब आउटडेटेड होते जब मनुष्य का अंतिम लक्ष्य ‘आत्मकल्याण’ बदल गया होता। चूंकि कलयुग में भी आत्मकल्याण का लक्ष्य वही है, और शास्त्रों ने इस युग के लिए पहले ही ‘नाम संकीर्तन’ जैसे सुगम मार्ग प्रदान कर दिए हैं, इसलिए शास्त्र कभी अप्रासंगिक नहीं हो सकते। जो लोग शास्त्रों को बदलने की बात करते हैं, वे वास्तव में अपनी मनमुखी मान्यताओं को धर्म के रूप में थोपना चाहते हैं।
⚠️ विशेष चेतावनी (Disclaimer & Warning)
यह आलेख उन लोगों के लिए नहीं है जो धर्म को केवल एक ‘वोट बैंक’ या ‘सुविधाजनक जीवनशैली’ समझते हैं। यह उन ‘आधुनिकतावादियों’ और ‘स्वघोषित समाज-सुधारकों’ के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है जो अपनी अल्पज्ञ बुद्धि से ऋषियों के वचनों को मापने का दुस्साहस करते हैं:
शास्त्र सर्वोपरि हैं: जो व्यक्ति या संगठन शास्त्रों को ‘आउटडेटेड’ (अप्रासंगिक) कहने का साहस करता है, वह वास्तव में उस सनातन वृक्ष की जड़ों पर प्रहार कर रहा है जिसकी छाया में वह बैठा है। भगवान कृष्ण की वाणी (गीता) या ऋषियों के सूत्र किसी ‘संशोधन’ (Amendment) के मोहताज नहीं हैं।
कालनेमी की पहचान करें: साधु का वेश धारण कर जो भी व्यक्ति आपको शास्त्र-विमुख होने का परामर्श दे, चाहे वह कितना ही प्रतिष्ठित क्यों न हो, उसे ‘कालनेमी’ का आधुनिक स्वरूप ही समझें। स्वधर्म का त्याग और शास्त्रों का निरादर ही वह मार्ग है जो समाज को पतन की ओर ले जाता है।
विवेक की जागृति ही सुरक्षा है: यदि आप आज भी यह नहीं देख पा रहे हैं कि कैसे आपकी सांस्कृतिक पहचान को ‘रूढ़िवादिता’ का नाम देकर आपसे छीना जा रहा है, तो आपका विवेक केवल अचेत नहीं, बल्कि मृतप्राय है। याद रखें, जो समाज अपने शास्त्रों की मर्यादा का रक्षण नहीं कर पाता, कालक्रम में वह समाज और उसका राष्ट्र—दोनों ही इतिहास के पन्नों से मिटा दिए जाते हैं।
परिणाम के उत्तरदायी आप होंगे: सुधारवाद के नाम पर वर्ण-मर्यादाओं को तोड़ना और ईसाई जीवनशैली को ओढ़ना ‘प्रगति’ नहीं, ‘आत्महत्या’ है। इसका अंतिम परिणाम—परिवार का विखंडन, संस्कारों का लोप और धर्म का नाश—आपको और आपकी आने वाली पीढ़ियों को ही भुगतना होगा।
“श्रुतिस्मृतिपुराणानां विरोधो यत्र दृश्यते। तत्र श्रोत्रं प्रमाणं स्यात्…” (जहाँ भी विवाद हो, वहां केवल शास्त्र और श्रुति ही अंतिम प्रमाण हैं, न कि किसी नेता या संगठन का भाषण।)
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कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।
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