शूद्र भी सवर्ण है: फिर ये दूरियां क्यों? सवर्ण साथ में भोजन क्यों नहीं करते, विवाह क्यों नहीं करते ?

शूद्र भी सवर्ण है: फिर ये दूरियां क्यों? सवर्ण साथ में भोजन क्यों नहीं करते, विवाह क्यों नहीं करते ? शूद्र भी सवर्ण है: फिर ये दूरियां क्यों? सवर्ण साथ में भोजन क्यों नहीं करते, विवाह क्यों नहीं करते ?

varn vyavastha social harmony and conspiracy

यह एक अत्यंत संवेदनशील और विचारोत्तेजक विषय है। “शूद्र भी सवर्ण हैं और यदि सवर्ण हैं तो बाकी सवर्णों के साथ भोजन, विवाह आदि का संबंध क्यों नहीं होता” इस विमर्श के केंद्र में वह भ्रम है जिसे आक्रांताओं काल से लेकर आधुनिक राजनीति तक निरंतर पोषित किया गया है। यहाँ हम शास्त्रीय सत्य को समझते हुये उन सभी महत्वपूर्ण प्रश्नों पर विचार करेंगे और समझने का प्रयास करेंगे जिसे उठाया तो जाता है किन्तु उद्देश्य मात्र सामाजिक विद्वेष उत्पन्न करना होता है जिज्ञासा-निवारण नहीं, समाधान नहीं, सामाजिक सद्भाव नहीं, राष्ट्र का उत्थान नहीं।

Table of Contents

“शास्त्रों ने जिसे ‘वर्णसंकर’ कहकर वर्जित किया, आज की राजनीति उसे ‘क्रांति’ बताकर प्रोत्साहित कर रही है। यह क्रांति नहीं, बल्कि धर्म और राष्ट्र के विनाश का सुनिश्चित मार्ग है। यदि हम अपने वर्ण की मर्यादा और संस्कारों को सुरक्षित नहीं रखेंगे, तो हम केवल अपनी जाति ही नहीं, बल्कि अपना राष्ट्र भी खो देंगे।”

भारतीय समाज के इतिहास में यदि किसी एक विषय ने सबसे अधिक भ्रम और विवाद उत्पन्न किया है, तो वह है ‘वर्ण और जाति’। आज भारत जातीय संघर्ष के मुहाने पर पहुंच गया है और सामाजिक व राजनीतिक वातावरण कटुता से भर गया है। आज प्रश्न पूछा जाता है कि यदि शूद्रों के साथ भेद-भाव क्यों, सामाजिक स्तर पर रोटी-बेटी का संबंध क्यों नहीं बन पाया? इस प्रश्न के उत्तर में कोई धार्मिक कुरीतियाँ नहीं, बल्कि एक गहरा धर्मांतरण का षड्यंत्र और वोटबैंक की घृणित राजनीति छिपी है।

वर्ण व्यवस्था का सच : जो कोई नहीं बताता

वर्णव्यस्था ईश्वरीय व्यवस्था है जिसकी घोषणा वेद में की गयी है और चार वर्ण बताये गये हैं : ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। ये बातें तो सभी करते हैं किन्तु जैसे ही सवर्ण शब्द बोला-सुना जाता है तो उसका तात्पर्य यही लिया जाता है कि ब्राह्मण-क्षत्रिय कर वैश्य, अर्थात शूद्र को छोड़कर और ये बहुत बड़ा भ्रम है। यद्यपि इस विषय में एक विस्तृत आलेख प्रस्तुत किया जा चुका है इसलिये मात्र महत्वपूर्ण बिंदुओं के आधार पर संक्षेप में ही इसको समझेंगे कि शूद्र भी सवर्ण ही है।

गर्व से कहो सवर्ण (savarna) हूँ! क्या आप जानते हैं कि शास्त्रों के अनुसार 'शूद्र' (shudra) भी सवर्ण है? एक राजनैतिक षड्यंत्र का पर्दाफाश!

सवर्ण का तात्पर्य

सवर्ण शब्द के अनेकों अर्थ हो सकते हैं किन्तु यहां हम मात्र वर्ण-व्यवस्था परक सन्दर्भ में ही चर्चा करेंगे। “स” और “वर्ण” के संयोग से सवर्ण शब्द होता है जिसके निम्न भाव होते हैं :

  1. वर्णयुक्त : सहित का भाव अर्थात जो इनमें से किसी भी वर्ण का हो वो सवर्ण है। अर्थात ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये चारों ही सवर्ण हैं, क्योंकि वर्ण से युक्त हैं। युक्त होने का तात्पर्य होता है जन्म के उपरांत वर्णोचित कर्तव्यों का निर्वहन करना और वर्ण से परिभ्रष्ट करने वाला कोई कार्य न करना।
  2. स्ववर्णी : अपने ही वर्ण के भाव में, जैसे वह मेरा सवर्ण है अर्थात जो मेरा वर्ण है वो भी उसी वर्ण का है। विवाह में सवर्ण शब्द का यही भाव ग्रहण किया जाता है। अर्थात ब्राह्मण के लिये ब्राह्मण सवर्ण है, क्षत्रिय के लिये क्षत्रिय, वैश्य के लिये वैश्य और शूद्र के लिये शूद्र सवर्ण है। एक दूसरे के लिये ये सवर्ण नहीं हैं अपितु परवर्ण होंगे और परधर्म का भी यही मूल सिद्धांत है।
  3. संयुक्त रूप से चारों वर्ण : यह अवर्ण के सापेक्ष अंतर सिद्ध करने के संदर्भ में प्रयुक्त करने वाला विशेष भाव है, अर्थात अवर्ण के सापेक्ष ये चारों वर्ण सवर्ण होंगे।

शूद्र का सवर्ण होना: एक अकाट्य शास्त्रीय सत्य

ऊपर स्पष्ट हो गया कि शूद्र भी सवर्ण ही है और यह अकाट्य सत्य है। जिस प्रकार ब्राह्मण के लिये शास्त्रों में कर्तव्याकर्तव्य सुनिश्चित हैं, कर्म-वृत्ति आदि की व्यवस्था है उसी प्रकार अन्य वर्णों के लिये भी है और इनका विभाजन इस प्रकार से किया गया है कि आपात्काल के अतिरिक्त एक-दूसरे का कोई अतिक्रमण न करे। वर्त्तमान में सवर्ण का तात्पर्य उच्च जातिओं से लिया जाता है अथवा सामान्य वर्ग तो यह एक गंभीर षड्यंत्र है और आगे इसका भी पटाक्षेप करेंगे।

शूद्र का सवर्ण होना: एक अकाट्य शास्त्रीय सत्य
शूद्र का सवर्ण होना: एक अकाट्य शास्त्रीय सत्य

फिर सवर्ण साथ में भोजन क्यों नहीं करते, विवाह क्यों नहीं करते

इस प्रश्न का मूल कारण शास्त्र का ज्ञान न होना और षडयंत्रकारियों द्वारा जातीय संघर्ष हेतु भ्रमित कर देना है। इस प्रकार के प्रश्न में यह भी भाव छिपा हुआ है कि मैं सवर्ण नहीं हूँ और बाकी तीनों ही सवर्ण हैं। ये भ्रम मन में भर दिया गया है जिसका उद्देश्य द्वेष उत्पन्न करना था, जिज्ञासा नहीं। यदि जिज्ञासा हो तो निवारण किया जा सकता है और यहां उत्तर भी दिया जायेगा एवं यदि आप जिज्ञासा के साथ अध्ययन करें तो संतुष्ट भी हो जायेंगे।

सभी वर्णों के लिये सवर्ण अर्थात अपने वर्ण के साथ ही बेटी-रोटी के संबंध का शास्त्रीय विधान है। ब्राह्मण की पंक्ति में बैठकर यदि शूद्र भोजन नहीं कर सकता तो इसका तात्पर्य यह नहीं कि क्षत्रिय और वैश्य कर सकता है, वो भी नहीं कर सकता तो भी समस्या एक मात्र शूद्र को ही क्यों होती है ?

और ब्राह्मण भी किसी अन्य की पंक्ति में बैठकर भोजन नहीं कर सकता यही नियम है, क्षत्रिय सदैव राज्य संचालन और रक्षात्मक कार्य करते थे और वैश्य व्यापार आदि का अतः ये दोनों स्वाभाविक रूप से धनाढ्य होते थे और होते हैं, किन्तु न तो तब और न ही अब ब्राह्मण के मन में इनके साथ बेटी-रोटी के संबंध का था या है।

इसी प्रकार ब्राह्मण और शूद्र में विवाह नहीं करते का भी भाव है कि ब्राह्मण और क्षत्रिय में भी या और कोई भी एक-दूसरे वर्ण के साथ विवाह नहीं कर सकता, यही शास्त्रों का सिद्धांत है। यहां भी वही प्रश्न उत्पन्न हो जाता है जिसका विचार करना चाहिये कि यह प्रश्न किसी और के मन में क्यों नहीं आता, केवल शूद्रों के मन में ही क्यों आता है ? अर्थात ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के मन में एक दूसरे के प्रति क्यों नहीं उत्पन्न होता, मात्र शूद्र के मन में ही क्या उत्पन्न होता है ? वास्तविकता ये है कि ये प्रश्न उत्पन्न नहीं हुआ है षड्यंत्रकारियों ने भ्रमित कर दिया है।

शूद्र भी सवर्ण है: फिर ये दूरियां क्यों? सवर्ण साथ में भोजन क्यों नहीं करते, विवाह क्यों नहीं करते ?
शूद्र भी सवर्ण है: फिर ये दूरियां क्यों? सवर्ण साथ में भोजन क्यों नहीं करते, विवाह क्यों नहीं करते ?

क्षत्रिय और वैश्य के यहां तो ब्राह्मण भोजन करते थे और करते हैं, शूद्र के यहां क्यों नहीं ?

इसी प्रकार ब्राह्मण और शूद्र में विवाह नहीं करते का भी भाव यह है कि ब्राह्मण और क्षत्रिय में भी या और कोई भी एक-दूसरे वर्ण के साथ विवाह नहीं कर सकता, यही शास्त्रों का सिद्धांत है। यहां भी वही प्रश्न उत्पन्न हो जाता है जिसका विचार करना चाहिये कि यह प्रश्न किसी और के मन में क्यों नहीं आता, केवल शूद्रों के मन में ही क्यों आता है ? अर्थात ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के मन में एक दूसरे के प्रति क्यों नहीं उत्पन्न होता, मात्र शूद्र के मन में ही क्या उत्पन्न होता है ? वास्तविकता ये है कि ये प्रश्न उत्पन्न नहीं हुआ है षड्यंत्रकारियों ने भ्रमित कर दिया है।

धर्म का पालन शास्त्र की आज्ञा के अनुसार ही होता है, ब्राह्मणों ने सदैव शास्त्र को ही सर्वोपरि रखा है। ऐसा निर्देश शास्त्रों का ही है अर्थात शास्त्र के अनुसार ही धर्म का पालन सबको करना चाहिये। क्षत्रिय और वैश्य के यहां भी जल में पके अन्न के भोजन का निषेध है तो भात का भोजन नहीं करते थे और आज भी नहीं करते हैं।

फिर प्रतिप्रश्न उत्पन्न होता है कि क्षत्रिय और वैश्य कभी यह प्रश्न करके विवाद क्यों नहीं करते कि हमारा भात क्यों नहीं खाओगे ? कारण सीधा है उनकी शास्त्रों में आस्था है और शास्त्र के अनुसार ही धर्माचरण करते हैं, विवाद नहीं।

यहां इस कथन का तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि शूद्र विवाद करते हैं अपितु शूद्रों को भड़काने के लिये, ब्राह्मणऔर शास्त्र द्वेषी बनाने के लिये स्वतंत्र भारत के कुकर्मी नेता करते हैं, वामपंथी करते हैं और कुछ शूद्र भी उकसावे में आ जाते हैं। ये वास्तव में वो हैं जो सवर्ण हैं ही नहीं अर्थात शूद्र भी नहीं हैं, अपितु वर्णभ्रष्ट हैं।

जो शूद्र भी धर्म का पालन करता है, शास्त्रों में आस्था रखता वो ऐसा कुकर्म नहीं करता अर्थात ब्राह्मण द्वेष और शास्त्र द्वेष नहीं करता। विश्वास न हो तो गांवो में जाकर अवलोकन कर लें, ये शहरी पढ़े-लिखे आधुनिक विचार वाले मानसिक रूप से म्लेच्छों का कार्य है और वही करते हैं।

कुंयें पर जल भरने से क्यों रोका जाता था ?

हम पूर्णतः वास्तविक उत्तर प्रस्तुत करेंगे जो कुछ कड़वा भी हो सकता है किन्तु कड़वाहट को कम करने के लिये उदाहरण से आरंभ करेंगे :

मान लीजिये आप शूद्र हैं और मैं ब्राह्मण हूँ, मैंने अपने घर के बाहर एक नल लगा लिया है जहां कोई भी जल ले सकता है। संयोग से एक दिन आप पहुंचे और उसी समय मैं भी पहुंच गया तो आपका क्या दायित्व है पहले लेने की जिद करना या मुझे पहले लेने के लिये कहना। इसका उल्टा कर दीजिये आपने अपने घर के बाहर नल लगाया है और मैं भी वहीं से जल लेता हूँ, वैसी ही स्थिति हो जाये तो मैं स्वयं ही कहूंगा कि पहले आप ले लो और आपके लेने के बाद ही मैं लूंगा। क्या यह नियम गलत है ? उकसाने वाले कुओं की बात तो करते हैं, पानी लेने से रोकने की बात तो करते हैं किन्तु ये नहीं बताते कि वो कुँयें किसके थे ?

ब्राह्मणों को पहले देने का नियम यदि था तो वो अब भी है, क्षत्रिय और वैश्य अब भी धर्म पालन के उद्देश्य से किसी भी विषय में ब्राह्मण को ही पहले देते हैं और इसका तात्पर्य सम्मान देकर धर्मपालन करना है क्योंकि यही शास्त्रोक्त विधान है। प्रतिप्रश्न पुनः यही उत्पन्न होता है कि इस विषय को लेकर भी प्रश्न मात्र शूद्र के प्रतिनिधित्व करने वाले ही क्यों करते हैं और उसे क्यों भड़काते हैं। ये दायित्व तो शूद्र का भी है कि वो भी अपने धर्म का पालन करे और इसके लिये ब्राह्मणों को सम्मान दे।

वो इसे सामाजिक भेद-भाव के सन्दर्भ में क्यों देखता है, और गंभीरता इस बात में है कि मात्र शूद्र के प्रतिनिधि ही ऐसा भेद-भाव क्यों सिद्ध करते हैं, क्षत्रिय और वैश्य स्वेच्छा से पालन क्यों करते हैं ? स्पष्टतः षड्यंत्र प्रतीत होता है जो राजनीति करने वाले ही नहीं अपितु म्लेच्छों से जुड़ा हुआ है, नेता तो मात्र मोहरा बन रहे हैं।

शम्बूक वध अत्याचार था, क्यों किया गया ?

शम्बूक वध को जो अत्याचार बताते हैं, सामाजिक विद्वेष फैलाते हैं उनसे पूछिये कि यदि आज भी ऐसा ही कुछ हो जाये, वही परिस्थिति हो और शम्बूक के स्थान पर कोई भी अन्य व्यक्ति हो तो आज का राजा क्या न्याय करेगा ? आज भी वही करेगा अपितु उससे भी आगे बढ़ जायेगा, पुरे कुल को ही नष्ट कर देगा। सिखों के नरसंहार को स्मरण कीजिये ज्वलंत उदाहरण भी है।

एक व्यक्ति के लिये हजारों की हत्या, इसी प्रकार गाँधी की हत्या के पश्चात् होने वाले हजारों महाराष्ट्र के चितपावन ब्राह्मणों के ४०० गांवों में की गयी आगजनी, हिंसा को स्मरण कीजिये। ये लोग जो आपके मन में शम्बूक प्रकरण के आधार पर विष भरते हैं उन्होंने स्वयं क्या किया था, क्या करते हैं ? सोचिये सुनियोजित षड्यंत्र है या नहीं ?

वास्तविकता यह है कि इन नेताओं का धर्म से कोई संबंध ही नहीं है, यदि कुछ करते भी हैं तो वो दिखावा करते हैं। मानसिक रूप से म्लेच्छ हो चुके हैं, अन्यथा महाभारत का प्रसंग स्मरण कीजिये अश्वत्थामा ने द्रोपदी के पांच पुत्रों का सोते हुये वध कर दिया था, अर्जुन ने अश्वत्थामा वध की प्रतिज्ञा भी कर लिया, किन्तु जब अश्वत्थामा को पकड़कर द्रोपदी के सामने लाया तो द्रोपदी कहती है ब्राह्मण और गुरुपुत्र होने के कारण अवध्य हैं, इनका वध मत कीजिये और भगवान श्री कृष्ण ने एक ऐसा उपाय बताया जिससे अर्जुन की प्रतिज्ञा भी पूरी हुयी और अश्वत्थामा का वध भी नहीं किया गया।

यदि आज के नेताओं का धर्म में रत्ती भर भी आस्था होती तो चितपावन ब्राह्मणों के ४०० गावों में आगजनी होती क्या ? हजारों ब्राह्मणों को जिन्दा जलाया जाता क्या ? स्पष्ट है इन नेताओं का धर्म से कोई संबंध ही नहीं है और ये शूद्रों को भी धर्म से भ्रष्ट करना चाहते हैं इसलिये ऐसे-ऐसे विषय और प्रश्न चुनकर उठाते हैं जिससे मन में द्वेष उत्पन्न हो।

ऐसे नृशंसों/कुकर्मियों जो नरसंहार से भी नहीं चूकते उनके ऊपर विश्वास करना कैसी बुद्धिमत्ता है तनिक विचार तो करें। स्वयं सोचें दलित-सवर्ण कार्ड तो तब खेला जाता है जब पीड़ित दलित हो और उसे राष्ट्रीय विवाद का विषय बना दिया जाता है, किन्तु इसका विपरीत जब होता है तब कहीं चर्चा ही नहीं होती। और यदि पीड़ित दलित ही हो किन्तु उत्पीड़क यदि म्लेच्छ हो तो भी कोई चर्चा नहीं होती। इससे इन नेताओं की मानसिक म्लेच्छता सिद्ध होती है, अधर्मी होना सिद्ध होता है। इन अधर्मियों/कुकर्मियों को तो देखना भी नहीं चाहिये, इनको अपना मार्गदर्शक क्यों बना लेते हैं ?

चितपावन ब्राह्मणों के ४०० गावों में आगजनी
चितपावन ब्राह्मणों के ४०० गावों में आगजनी

शम्बूक प्रकरण जैसा ही एक अन्य प्रकरण है किन्तु ये इन कुकर्मियों के षड्यंत्र के अनुकूल नहीं है इसलिये कभी नहीं बताते और आप नहीं जानते होंगे। इसके लिये आपको देवशयनी एकादशी की व्रत कथा (अन्य नाम पद्मा/हरिशयनी) का अवलोकन करना चाहिये जो संक्षेप में इस प्रकार है :

सतयुग में एक सूर्यवंशी राजा मान्धाता विख्यात हुये जो धर्मपूर्वक प्रजा पालन करते थे और उनका राज्य हर तरह से संपन्न था। एक बार अकाल पड़ने से सारे धर्म-कर्म का भी लोप हो गया। ३ वर्षों बाद प्रजा व्याकुल होकर राजा के पास वर्षा हेतु उचित प्रयत्न का प्रस्ताव लेकर पहुंची तो मान्धाता सेना के साथ वन में ऋषि-मुनियों के आश्रम में भटकने लगे जहां दैवकृपा से एक दिन उन्हें अङ्गिरा का दर्शन प्राप्त हुआ तो दंडवत करके सारी व्यथा सुनाते हुये समाधान के लिये उपाय पूछा।

इस पर अङ्गिरा ऋषि ने कहा कि यह सतयुग है और सतयुग में शूद्रों को तपस्या करने का अधिकार नहीं है, तुम्हारे राज्य में एक शूद्र तपस्या कर रहा है जिसका तुम्हें वध करना होगा। इसपर राजा मान्धाता ने कहा कि किसी निरपराधी तपस्यारत व्यक्ति का वध मैं नहीं कर सकता भले ही वह शूद्र क्यों न हो, कृपया कोई अन्य धर्माचरण का उपदेश करें। फिर अङ्गिरा ऋषि ने पद्मा (देवशयनी) एकादशी का उपदेश दिया, राजा और प्रजा सबने पद्मा एकादशी का व्रत किया जिसके प्रभाव से शीघ्र प्रचुर वर्षा हो गयी।

शम्बूक वध प्रसंग तो त्रेतायुग का है और ये उससे भी पूर्व सतयुग का। यदि शूद्र की प्रताड़ना ही की जाती थी तो सतयुग में भी करना चाहिये था क्योंकि वहां भी उचित कारण था, किन्तु चूंकि दूसरा उपाय भी था इसलिये नहीं किया गया। शम्बूक के प्रसंग में दूसरा उपाय नहीं था। यहां पर ये बात क्यों नहीं बताई जाती है वो शास्त्र विरुद्ध कार्य कर रहा था, जिसके दुष्परिणाम भी हो रहे थे। चलिये वो कुकर्मी नेता नहीं बताते किन्तु शूद्रों को स्वयं ही इस विषय का चिंतन-मनन करना चाहिये कि वो शास्त्रविरुद्ध कार्य कर रहा था या नहीं ?

शम्बूक वध प्रसंग को ही उठाने का कारण स्पष्ट है की शूद्रों की आस्था भंग हो, वो राम को भगवान न माने, शास्त्रों में आस्था न रखें। कई नेताओं ने ऐसा कुकर्म किया भी है, रामायण, मनुस्मृति आदि ग्रंथों का अपमान किया है। क्या शूद्रों की धार्मिक आस्था पर प्रहार नहीं होता है, क्या वो राम को भगवान नहीं मानते ? यदि इसी प्रकार से सोचा जाय तो गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या के साथ इन्द्र ने छल किया था।

यदि उसी नियम से सोचें तो ब्राह्मणों को तो इन्द्र की पूजा बंद कर देनी चाहिये थी। ब्राह्मण तो इन्द्र की पूजा के बिना किसी भी पूजा को पूर्ण नहीं समझते। इसका तात्पर्य यह है कि जो उदाहरण प्रस्तुत किया जाता है और उसका निष्कर्ष जो बताया जाता है वह शूद्रों की आस्था भंग करने के लिये होता है, अन्य वर्णों के विरुद्ध उकसाने के लिये होता है और वास्तविकता यह है कि इस प्रकार से करने का कोई नियम ही नहीं है।

इसी प्रकार महिषासुर आदि को भी जाति विशेष से जोड़ा जाता है जो पूर्णतः गलत है। जब दुर्गा माता को वेश्या कहा जाता है तो शूद्रों की आस्था को भंग किया जाता है। विचार तो शूद्रों को ये करना चाहिये कि वो भगवान राम के विरुद्ध, माता दुर्गा के विरुद्ध ऐसी बातें करने वालों की जीभ क्यों नहीं खींच लेते।

संवैधानिक समानता का सिद्धांत :

बात संवैधानिक समानता की आ जायेगी तो यहां भी स्पष्ट कर दूँ, मान लीजिये राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों किसी मंच पर एक साथ ही पहुंच जाते हैं और संयोग से वहां कुर्सी एक ही थी तो उस कुर्सी पर कौन बैठेगा ? सीधी सी बात है राष्ट्रपति बैठेंगे और प्रधानमंत्री या तो खड़े रहेंगे या नीचे बैठेंगे। संवैधानिक समानता का सिद्धांत यहां किस प्रकार स्थापित होगा ?

इसी प्रकार दो सामान्य व्यक्ति को लीजिये एक ब्राह्मण है और एक क्षत्रिय है दोनों ही धर्म और शास्त्रों में आस्था रखते हैं और ऐसी ही स्थिति उत्पन्न हो जाये तो कौन बैठेगा ? क्षत्रिय स्वयं ही ब्राह्मण को बैठने के लिये कहेगा, सम्मान देकर पुण्य का भागी बनेगा। तो ऐसी किसी भी स्थिति में अपमान मात्र शूद्र का ही कैसे हो जाता है, क्षत्रिय और वैश्यों का क्यों नहीं होता ? संवैधानिक समानता का विचार मात्र शूद्र के लिये ही क्यों उठता है, क्षत्रिय और वैश्य के लिये क्यों नहीं उठता ?

आधुनिक काल संबंधी कुतर्क

एक कुतर्क आधुनिक काल का भी किया जाता है और २१वीं सदी, आधुनिकता आदि चिल्लाते रहते हैं। आधुनिक काल अर्थात कलयुग में भी कौन से नियम मान्य हैं और कौन से नहीं इसका भी शास्त्रों में ही वर्णन मिलता है, कुतर्कों से कुछ भी नया नियम नहीं बनाया जाता। वर्ण-व्यवस्था के संबंध में नियम यथावत ही हैं, इसमें परिवर्तन करने का कोई निर्देश नहीं है। हां यह वर्णन अवश्य है कि कलयुग में सब भ्रष्ट हो जायेंगे, म्लेच्छाचारी हो जायेंगे, जो हो भी रहा है।

वर्णसंकर और कुलघाती
वर्णसंकर और कुलघाती

किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि ये म्लेच्छाचारी होने की आज्ञा समझी जाय, भ्रष्ट होना ही धर्म स्वीकार कर लिया जाय। ऐसा होगा किन्तु हमारे लिये यह आवश्यक है कि हम धर्म के संरक्षण का प्रयास करें।

आत्मकल्याण का मार्ग

कलयुग में भी लोगों को आत्मकल्याण का प्रयास करना ही चाहिये एवं यदि इस विषय का विचार करें तो कलयुग को सभी युगों से श्रेष्ठ कहा गया है क्योंकि इस युग में आत्मकल्याण का मार्ग अत्यंत सुगम है, मात्र भगवान के नाम का आश्रय लेने से ही कल्याण के भागी बन जाते हैं। यही पर दूसरा तथ्य भी है की शूद्रों को यज्ञ करने की आवश्यकता ही नहीं सेवा मात्र से ही कल्याण प्राप्त कर लेता है तो यज्ञ में अधिकार की लड़ाई के लिये जो उकसाया जाता है वो स्पष्ट रूप से सिद्ध करता है कि ये धर्म कर समाज पर प्रहार किया जा रहा है जिससे स्वयं शूद्रों को भी सतर्क होना आवश्यक है।

आत्मकल्याण का मार्ग
आत्मकल्याण का मार्ग

म्लेच्छों का षडयंत्र

यदि धर्म में आस्था है तो उसका सीधा तात्पर्य है कि शास्त्रों में भी आस्था रखना होगा, क्योंकि धर्म शब्द भी तो शास्त्र से ही ज्ञात होते हैं। यदि शूद्र को स्वीकार किया जाय तो भी शास्त्र को स्वीकार करना होगा।

जो शास्त्र को स्वीकार नहीं करता वह तो नास्तिक हो जाता है। इस प्रकार ये दिग्भ्रमित करने वाले नेता शास्त्रों में आस्था को भंग करके शूद्रों को पहले तो नास्तिक बनाना चाहते हैं, सामाजिक विद्वेष उत्पन्न करना चाहते हैं, जातीय संघर्ष की अग्नि में देश को जलाना चाहते हैं और उसके पश्चात् बचे हुओं को भी नहीं छोड़ेंगे, या तो मतांतरण या सर कलम जो सदैव से करते रहे हैं। आज अनेकों ऐसे म्लेच्छ देश हैं जो कुछ हजार वर्ष म्लेच्छ देश नहीं थे।

जातीय संघर्ष

षड्यंत्र पूर्णतः सुनियोजित है और इतिहास अवलोकन करने पर ज्ञात होता है कि आज के कई देशों में सफल भी हुआ है। आज भारत के शूद्रों को स्वयं ही इस विषय पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है कि क्या वो भारत को भी इस्लामिक राष्ट्र बनाना चाहते हैं ? ऐसा होगा या नहीं ये तो दूसरी बात है किन्तु सभी म्लेच्छाचारी हो जायेगें (कुछ को छोड़कर) यह भविष्यवाणी तो पुराणों में किया ही गया है।

जहां कहीं ब्राह्मण विरोध दिखे वहां सीधा अर्थ यही ग्रहण करना चाहिये कि ये जो कोई भी है धर्मद्रोही है। जो कोई भी रामायण, गीता, पुराण, मनुस्मृति, राम, दुर्गा, ब्राह्मण आदि की निंदा करता है उसको सीधा-सीधा धर्मद्रोही समझना ही होगा। शूद्रों को भी इन षड्यंत्रों को समझना आवश्यक है कि ये आपके शुभचिंतक नहीं शत्रु ही हैं भले ही राजनीतिक रूप से आपको अपनी जातियों के नेता क्यों न लगते हैं।

ब्राह्मण-विरोध: विवेक के मार्ग को अवरुद्ध करना

इन नेताओं के पीछे न चलें, नेताओं को अपना मंतव्य दें कि आप क्या चाहते हैं ? वो कुछ नास्तिक, अधर्मी, म्लेच्छ हैं जो धर्मद्रोही हैं, शूद्र धर्मद्रोही नहीं हैं, किन्तु भ्रमित हो रहे हैं ये भी सच्चाई है। और इस भ्रम का निवारण हो यह आलेख का उद्देश्य है जिससे देश जिस जातीय संघर्ष के मुहाने पर खड़ा है उसका निवारण किया जा सके।

एक बार सोचिये अवश्य

“जातिवाद का जहर वह हथियार है, जिससे राजनीति अपनी तिजोरियां भरती है और राष्ट्र अपनी अखंडता खो देता है।”

यद्यपि मैं ऐसा चाहता नहीं किन्तु इस घृणित राजनीति के अंत हेतु जिसने देश को जातीय संघर्ष के मुहाने पर ला खड़ा कर दिया है कुछ ऐसे विचार भी करने की आवशयकता है ताकि जिनके प्रति हमें कृतज्ञता का भाव रखना चाहिये यदि न रखें, कम से कम कृतघ्नता तो सिद्ध न करें।

  • जिसने अपनी भूमि स्कूल/कॉलेज/अन्य सार्वजानिक आवश्यकताओं के लिये दान में दिया कर उससे हम भी लाभान्वित हो रहे हैं उसके प्रति हमें कैसा भाव रखना चाहिये ?
  • जिसने रास्ते के लिये अपनी भूमि दिया और हम उसी रास्ते पर चलते हैं तो उसके प्रति हमें कैसा भाव रखना चाहिये ?
  • जिसने भारत की स्वतंत्रता के लिये अपना सर्वस्व समर्पण कर दिया, बलिदान दे दिया उसके प्रति हमें कौन सा भाव रखना चाहिये ? कभी स्वतंत्रता के लिये बलिदानियों का भी वर्ण और जाति ढूंढकर देखिये और फिर विचार कीजिये।
  • आज जिसकी जितनी आबादी का नारा लगाया जा रहा है और यही नारा जिसका जितना योगदान या बलिदान में बदल जाये तो क्या होगा ?

निष्कर्ष

शूद्र भी चार वर्णों में से एक है अतः वह भी सवर्ण ही है। सभी वर्णों का अपना आत्मसम्मान होना ही चाहिये किन्तु किसी को भी दूसरे की सम्मान और प्रतिष्ठा जो की ब्राह्मणों की है में अपना अपमान नहीं देखना चाहिये। यदि शूद्र का सवर्ण होना भी शास्त्र से सिद्ध होता है तो शूद्र के लिये जो मर्यादायें जो नियम है वो भी शास्त्र से ही ग्राह्य हैं। यदि शास्त्र का त्याग करते हैं तो शूद्रत्व (सवर्णत्व) भी नष्ट हो जाता है और नास्तिक हो जाते हैं। नेताओं की घृणित जातिवादी राजनीति हमें धर्म से च्युत कर रही है जो चिंता का विषय है। साथ चिंता का विषय यह भी है कि यह हमें जातीय संघर्ष की अग्नि में झोंकने वाला है।

शास्त्रीय सत्य: “जैसे पैरों के बिना शरीर खड़ा नहीं हो सकता, वैसे ही शूद्रों के बिना सनातन धर्म की संरचना अधूरी है। वे हीन नहीं, बल्कि आधार स्तंभ हैं।”

भ्रम और यथार्थ (FAQ)

FAQ

प्रश्न 1: यदि शूद्र सवर्ण हैं, तो समाज में उनके साथ भेदभाव क्यों हुआ?

उत्तर: शूद्र सवर्ण भी शास्त्र से ही है और जिसे भेद-भाव कहा जाता है वो भेद-भाव नहीं शास्त्रीय मर्यादा है जिससे अन्य किसी वर्ण को कोई आपत्ति नहीं। मात्र शूद्र को ही आपत्ति क्यों ? वास्तव में शूद्र को भी आपत्ति नहीं है यह षडयंत्रकारियों का षड्यंत्र है।

प्रश्न 2: धर्मांतरण की शक्तियां इस भेदभाव का उपयोग कैसे करती हैं?

उत्तर: वे ‘विक्टिम कार्ड’ खेलती हैं। वे दलित और पिछड़े वर्गों को यह समझाते हैं कि “तुम हिंदू नहीं हो, तुम तो गुलाम हो।” जब व्यक्ति अपनी पहचान से कट जाता है, तो उसे ईसाई या अन्य मजहबों में ले जाना आसान हो जाता है।

प्रश्न 3: क्या जातिगत राजनीति ही राष्ट्र के विनाश का कारण बनेगी?

उत्तर: निश्चित ही। जब राजनीति ‘विकास’ के बजाय ‘विभाजन’ पर आधारित होती है, तो समाज का बौद्धिक स्तर गिर जाता है। 1948 का ब्राह्मण नरसंहार और 1984 का सिख नरसंहार इसके जीवंत उदाहरण हैं कि कैसे राजनीतिक उकसावे ने अपनों को ही अपनों का हत्यारा बना दिया।

प्रश्न 4: क्या सामाजिक समरसता बढ़ाने के लिये सभी वर्णों को रोटी-बेटी का संबंध नहीं बनाना चाहिये ?

उत्तर: यदि आज हमने ‘रोटी-बेटी’ के संबंधों को आधुनिकता की दृष्टि से सिद्ध करते हैं तो हमारी शास्त्रीय मर्यादा खंडित होगी और सामाजिक समरसता को प्राथमिकता नहीं दी, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी। 1948 और 1984 की गलतियों को दोहराने का अर्थ होगा—स्वयं अपने हाथों से अपने राष्ट्र की चिता सजाना। इसलिये “रोटी-बेटी” के संबंध वाले भ्रम से बाहर निकलो और देश व धर्म दोनों बचाओ क्योंकि “रोटी-बेटी” का सम्बन्ध करोगे तो धर्म नष्ट होगा और यदि धर्म नष्ट हो गया तो “धर्मो रक्षति रक्षितः” का विपरीत प्रभाव भी होगा।

प्रश्न 5: यदि शास्त्र ‘समरसता’ की बात करते हैं, तो समाज में छुआछूत और भेदभाव कैसे आया?

उत्तर: छुआछूत का विषय जानबूझकर जातिवादी आग लगाने के लिये उठाया जाता है। यह किसी भी सार्वजानिक स्थल पर देखने को नहीं मिलता है। बस, ट्रेन, स्कूल, कॉलेज जहां मन करे देख लीजिये। अपने घर में कैसे रहेगा ये किसी का व्यक्तिगत अधिकार होता है।

प्रश्न 6: क्या अंतर्जातीय विवाह और सह-भोज ही इस समस्या का एकमात्र समाधान है?

उत्तर: नहीं, क्योंकि इससे तो वर्णव्यवस्था ही नष्ट हो जायेगी और स्वयं शूद्र का भी सवर्णत्व नष्ट होगा। मुख्य समाधान ‘मानसिक परिवर्तन’ है। जब तक हम एक-दूसरे को ‘अंग’ के रूप में नहीं देखेंगे, शास्त्रों से स्वयं की मर्यादा का ज्ञान नहीं प्राप्त करेंगे और मर्यादा में रहना नहीं सीखेंगे, तब तक केवल कानून या सह-भोज से बात नहीं बनेगी। ‘एकात्मता’ का भाव तभी आएगा जब हम मानेंगे कि एक भी हिंदू का धर्मांतरण पूरे राष्ट्र की सुरक्षा के लिए खतरा है।

#Savarna #SanatanDharma #VarnaVyavastha #Brahman #ShudraIsSavarna #PoliticalConspiracy #GitaUpadesh #SocialUnity #IndiaPolitics #HinduRashtra #Hinduism #SocialReform #CasteSystem #NationalIntegrity #Dharmantar #HinduUnity #SocialEquality #PoliticsOfCaste #Dharmantar #NationalIntegrity #Samrasta

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।


Discover more from कर्मकांड सीखें

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *