वर्त्तमान युग में हम स्वेच्छाचारिता की सीमाओं का निरंतर विस्तार करते जा रहे हैं और उसे आधुनिकता का आवरण देते हुये उचित सिद्ध करने का भी प्रयास करते रहते हैं। ये स्वेच्छाचारिता पुरुष व स्त्री दोनों ही वर्गों में, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चारों वर्णों में देखने को मिलती है, आश्रमों की बात न ही करें तो उचित होगा। यहां हम स्त्री धर्म (stri dharm niti) के लिये शास्त्रोक्त प्रमाणों के अनुसार विचार करेंगे जिससे स्वेच्छाचारिता भी स्पष्ट हो जायेगा।
शास्त्र के प्रमाणों से समझें स्त्री धर्म क्या है – stri dharm niti
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य वर्ण, पुरुष वर्ग के बारे में चर्चा करें तो किसी का अपमान नहीं होता, किन्तु जैसे ही स्त्री व शूद्र की कोई बात की जाये तो इसे अपमान सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है और यह अनिरुद्धाचार्य द्वारा दिये गये वक्तव्य “मुंह मारने वाली” प्रकरण में सिद्ध होते दिखा। यहां एक तथ्य पूर्णरूपेण स्पष्ट कर देना उचित है कि यदि स्वेच्छाचारियों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है इसका तात्पर्य यह नहीं कि गुरु, ब्राह्मण, कथावाचक, संत आदि अपने मुंह पर ताला लटका लें।
यदि हमारी शास्त्रोक्त चर्चा आपमें से किसी को अनुचित लगती हो तो इसका कारण आपकी स्वेच्छाचारिता है और आपकी स्वेच्छाचारिता के कारण हम शास्त्रोक्त चर्चा से विमुख नहीं हो सकते अपितु और प्रखरता के साथ करेंगे ताकि आपकी स्वेच्छाचारिता भी उजागर हो।
सामान्यतः पुरुषों के लिये धर्म, कर्म, मर्यादा, आचरण आदि शास्त्रों में सर्वत्र भरे-परे हैं किन्तु स्त्रियों के लिये नहीं हैं ऐसा नहीं है। स्त्रियों के लिये भी कर्तव्याकर्तव्य का शास्त्रों में निर्धारण किया गया है और जो भी आध्यात्मिक चर्चा करते हैं उनके लिये स्त्रियों के धर्म, कर्म, मर्यादा, आचरण आदि की चर्चा भी आवश्यक है। यदि चर्चा ही नहीं करेंगे तो आधुनिकता के नाम पर दुर्गंध ही फैलता रहेगा।
यहां स्त्री धर्म से संबंधित शास्त्रोक्त चर्चा की गयी है जिसके संकलनकर्त्ता विद्यावारिधि दीनदयालमणि त्रिपाठी जी हैं एवं हम उनका आभार प्रकट करते हैं। यह आलेख दो भागों में है एवं आगे अन्य लेख भी आ सकते हैं, यहां प्रथम भाग दिया गया है।

स्त्री धर्म को समझने से पूर्व हमें थोड़ा पुरुष धर्म के बारे में भी समझना आवश्यक है। पुरुषधर्म का आरम्भ कब से होता है इसको समझने से ही स्पष्ट होगा कि स्त्री धर्म का प्रारम्भ कब होगा।
पुरुषधर्म का आरम्भ
तत्र पुरुषाणाम् आमौजीबन्धनात् शास्त्रेण नियमाः न विधीयन्ते, मौंजीबन्धनप्रभृत्येव नियमाः ॥
पुरुषों के लिए उपनयन (मौंजीबन्धन) से पहले शास्त्रों द्वारा कोई विधिबद्ध नियम नहीं बनाए गए हैं; नियमों की विधि मौंजीबन्धन (उपनयन) से ही प्रारम्भ होती है।
“नास्य कर्म नियच्छति किंचितामौजीबन्धनात्” । “प्रागुपनयनात् कामचारवादभक्षाः” । – उपनयन से पहले व्यक्ति के किसी कर्म को कोई धर्मनियम नहीं रोकता; उपनयन से पहले आचरण इच्छानुसार (कामचार), व्रत आदि का पालन वैकल्पिक और नियमातीत होता है।
उपनीय गुरुः शिष्यं शिक्षयेत् शौचमादितः । आचारमग्निकार्यं च सन्ध्योपासनमेव च ॥
उपनयन के पश्चात् गुरु को शिष्य को शौच, आचार, अग्निहोत्र और संध्या उपासना की शिक्षा देनी चाहिए। इत्यादि वचनात् । – इन शास्त्रीय वचनों से यह सिद्ध होता है कि पुरुषों के धर्मनियम उपनयन से ही आरम्भ होते हैं।
स्त्री धर्म का आरम्भ

स्त्रीणां तु – वैवाहिको विधिः स्त्रीणामौपनयनिकः स्मृतः – पतिसेवा, गुरौ वासः, गृहार्थाग्निपरिक्रिया इति मनुवचनेन – परंतु स्त्रियों के लिए विवाह को ही उपनयन के तुल्य विधि माना गया है — जिसमें पतिसेवा, सास-ससुर (गुरु) की सेवा, तथा गृहकार्य हेतु अग्निसेवा को धर्म के अंग के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है; ऐसा मनु का वचन है।
उपनयनस्थानापन्नो विवाह इति — विवाह पूर्व कामचार, व्रत, आहार आदि स्वतंत्र होते हैं, और विवाह के अनन्तर ही नियमों का अनुष्ठान किया जाता है। विवाह ही स्त्रियों के लिए उपनयन का स्थान लेता है, अतः विवाह से पूर्व आचरण इच्छानुसार होता है, तथा विवाह के बाद ही धार्मिक नियमों का पालन अपेक्षित होता है।
अतः वक्ष्यमाणधर्माः विवाहप्रभृत्येव ताभिरनुष्ठेयाः – इसलिए जो धर्म आगे बतलाए जाएंगे, वे स्त्रियों द्वारा विवाह के बाद ही पालन योग्य हैं।
स्त्री धर्म – stri dharm
तत्र पुरुषस्योक्ताः सामान्यधर्माः स्त्रीणामपि साधारणा एव – पुरुषों के लिए जो सामान्य धर्म बताए गए हैं, वे स्त्रियों के लिए भी समान रूप से लागू होते हैं।
तत्र तत्र सामान्यधर्मान् सिद्धवत्कृत्य — स्त्रीशूद्रयोः अर्धमाने शौचं प्रोक्तं मनीषिभिः । – विभिन्न स्थानों पर सामान्य धर्मों को सिद्ध मानते हुए, मनीषियों ने स्त्रियों और शूद्रों के लिए आधे (अल्प) मात्र में शौच विधान बताया है।
शुद्धये स्त्री च शूद्रश्च सकृत्स्पृष्टाभिरन्ततः – स्त्री और शूद्र एक बार स्पर्श कर लेने पर भी अंतःशुद्ध (भीतर से पवित्र) माने जाते हैं। ये स्पर्श आचमन स्थान पर जलस्पर्श के विधान से सम्बद्ध है।
एवञ्च ‘प्रातरुत्थाय यः पश्येद्’ इत्यादिना पुरुषस्योक्ता धर्माः स्त्रीणामपि साधारणा एव । इस प्रकार ‘प्रातः उठ कर जो देखे…’ आदि से जो धर्म पुरुषों के लिए कहे गए हैं, वे स्त्रियों के लिए भी समान रूप से मान्य हैं।
तत्र स्त्रीणामाह्निकं निरूप्यते – अब स्त्रियों की दैनिक दिनचर्या (आह्निक धर्म) का निरूपण किया जाता है।
स्त्रिया भर्तृप्रबोधात्पूर्वमेव प्रबोद्धव्यम् – स्त्री को अपने पति के जागने से पहले ही उठ जाना चाहिए। तथा च याज्ञवल्क्यः —
सुप्ते पश्चाच या शेते पूर्वमेव प्रबुध्यते । नान्यं कामयते चित्ते सा विज्ञेया पतिव्रता ॥
याज्ञवल्क्य कहते हैं — जो स्त्री पति के बाद सोती है, पर उससे पहले जागती है, और जिसके चित्त में किसी अन्य की कामना नहीं होती, वही सच्ची पतिव्रता कही जाती है।
प्रबुद्ध्य च देवताध्यानं कर्तव्यं। षोढा विभज्य रजनीं चरमांशे प्रबोधितः ।
पत्न्या सह हरिं ध्यात्वा धर्ममर्थं च चिन्तयेत् ॥७॥
प्रातः जागरण के समय (रात्रि को छह भागों में विभाजित करके उसके अंतिम भाग में) जागकर, व्यक्ति को अपनी पत्नी के साथ भगवान श्रीहरि का ध्यान करना चाहिए तथा धर्म और अर्थ के विषय में मनन करना चाहिए।
ब्राह्मे मुहूर्ते निद्राकरणे दोष उक्तः स्मृतिरत्नावल्याम् —
ब्राह्मे मुहूर्ते सेवेतां शयनं यत्र दंपती। श्मशानतुल्यं तद्वेश्म पितृभिः परिवर्जितम् ॥८॥
ब्राह्ममुहूर्त में सोते रहने को दोषपूर्ण कहा गया है। यदि पति-पत्नी ब्राह्ममुहूर्त में शयन करते हैं, तो वह गृह श्मशान के समान माना जाता है और पितर उस गृह को त्याग देते हैं।
प्रबोधानन्तरं दर्शनीयान्यदर्शनीयानि च दर्शयति–कात्यायनः ॥ तथा च स्मृत्यन्तरे–
श्रोत्रियं सुभगं गां च अग्निमग्निचितं तथा । प्रातरुत्थाय यः पश्ये दापद्भयः स प्रमुच्यते ॥९॥
प्रातःकाल जागने के बाद व्यक्ति को क्या देखना चाहिए और क्या नहीं — यह कात्यायन और अन्य स्मृतियों में कहा गया है। स्मृति कहती है:- जो व्यक्ति प्रातःकाल उठते ही किसी वेदज्ञ ब्राह्मण, सुंदर स्त्री, गाय, अग्नि अथवा अग्नि वेदी को देखता है, वह समस्त संकटों और पापों से मुक्त हो जाता है।
पापिष्ठं दुर्भगं मर्त्यं नग्नम् उत्कृत्तनासिकम् । प्रातरुत्थाय यः पश्येत् तत्कलेरुपलक्षणम् ॥१०॥
प्रातःकाल उठते ही जो व्यक्ति पापी, अपशकुनयुक्त, नंगा, या कटी हुई नासिका वाले व्यक्ति को देखता है, वह कलियुग के दोषों का सूचक माना गया है।
अपररात्रे धान्यसंस्कारादि कर्तव्यम्। तथा च मार्कण्डेयपुराणे—
निशायाः पश्चिमे यामे धान्यसंस्करणं तु यत्। क्रियमाणं हि नारीणां सर्वश्रेयोधनावहम् ॥११॥
रात्रि के अंतिम प्रहर में (अपररात्र) स्त्रियों द्वारा धान्य (अन्न आदि) का संस्कार करना चाहिए। मार्कण्डेय पुराण में कहा गया है कि — रात्रि के पश्चिम याम में स्त्रियों द्वारा जो धान्यसंस्कार किया जाता है, वह उन्हें समस्त कल्याण और धन की प्राप्ति कराने वाला होता है।
प्रातःकाले गृहसंमार्जनादिकं कर्तव्यम् । तदपि तत्रैव—
स्पृशन्ति रश्मयो यस्य गृहं संमार्जनादृते। भवन्ति विमुखास्तस्य पितरो देवमातरः ॥१२॥
प्रातःकाल स्त्रियों को गृह की सफाई आदि करना चाहिए। मार्कण्डेय पुराण में कहा गया है — जिसके घर को बिना संमार्जन (झाड़ने) के सूर्य किरणें स्पर्श करती हैं, उसके पितर, देवगण और देवमाताएं उससे विमुख हो जाते हैं।
प्रातःकाले स्त्रिया कार्यं गोमयेनानुलेपनम् । प्रत्यहं सदने तस्मात् नैव दुःखानि पश्यति ॥१३॥
प्रातःकाल स्त्री को घर में गोमय (गाय के गोबर) से लेपन करना चाहिए। जो स्त्री प्रतिदिन अपने घर में गोमय का लेपन करती है, वह कभी भी घर में दुःख नहीं देखती।
गोमयस्य प्राशस्त्यम् आनुशासनिके —
श्रीः कृत्वेह वपुः कान्तं गोमध्येषु विवेश ह । अप्येकाङ्गेष्वथो वस्तुमिच्छामि च सुकुत्सिते ॥१४॥
अनुशासन पर्व (महाभारत) में गोमय की महिमा बताते हुए कहा गया है — श्री (लक्ष्मी) ने यहां (पृथ्वी पर) अपना सुंदर स्वरूप बनाकर गोमय (गाय के गोबर) में प्रवेश किया। वह कहती है— “भले ही यह वस्तु (गोमय) एक अंग से अपवित्र या सुकुत्सित (घृणित) प्रतीत हो, फिर भी मैं इसमें वास करना चाहती हूँ।”
न वोऽस्ति कुत्सितं किञ्चिदङ्गेष्वालक्ष्यते मया । पुण्याः पवित्राः सुभगा मम वासं प्रयच्छत् ।
वसेयं यत्र वो देहे तन्मे वक्तुमिहार्हथ ॥१५॥
हे गौओं! तुम लोगों के शरीर में मुझे कोई भी कुत्सित (घृणित) वस्तु नहीं दिखाई देती। तुम सब पुण्यमयी, पवित्र और सौभाग्यवती हो। अब तुम मुझे बताओ कि मैं तुम्हारे शरीर के किस अंग में निवास करूँ?
गाव ऊचुः – अवश्यं मानना कार्या तवास्माभिर्यशस्विनि । शकृन्मूत्रे वस त्वं हि पुण्यमेतद्धि नः शुभे ॥१६॥
गायों ने कहा — हे यशस्विनी (लक्ष्मी)! तुम्हारी बात मानना हमारे लिए आवश्यक है। तुम हमारे गोमूत्र और गोमय में वास करो, क्योंकि वह हमारे लिए अत्यन्त पुण्यमय और शुभ है।
श्रीरुवाच – दिष्ट्या प्रसादो युष्याभिः कृतो मेऽनुग्रहात्मकः । एवं भवतु भद्रं वः पूजिताऽस्मि सुखप्रदाः ॥१७॥
श्री (लक्ष्मी) ने कहा — धन्य है! तुम लोगों ने मुझ पर प्रसन्नता और अनुग्रह किया। ऐसा ही हो। कल्याण हो। तुमने मेरी पूजा की है, मैं तुमको सुख देने वाली हूँ।
एवं गोशकृतः पुत्र माहात्म्यं तेऽनुवर्णितम् । गवां मूत्रपुरीषस्य नोद्विजेत कथञ्चन ॥१८॥
इस प्रकार हे पुत्र! मैंने तुम्हें गोमूत्र और गोमय (गोशकृत) का माहात्म्य बताया। गाय के मूत्र और गोबर से कभी भी घृणा नहीं करनी चाहिए।
अत एव गोमयेनानुलिप्तो देशः शुचिः लक्ष्म्याः आयतनम् इति सर्वजनानुभवसिद्धम् ॥
इसीलिए गोबर से लिपे हुए स्थान को पवित्र और लक्ष्मी का निवास स्थान माना गया है — यह सर्वसामान्य अनुभव से सिद्ध है।
निष्कर्ष : इस प्रकार स्त्री धर्म से संबंधित इस प्रथम भाग में स्त्रीधर्म का आरम्भ कब से होता है इसको समझते हुये स्त्रियों के जगने व धान्यसंस्कार, गृहशुद्धि आदि विषयों को समझने का प्रयास किया गया है। इसके आगे के अन्य और भी विषय हैं जो स्त्री धर्म भाग २ में समझेंगे।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।
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