स्त्री धर्म (stri dharm) प्रकरण का यह तृतीय भाग है। वर्त्तमान समय में कलयुग का ऐसा प्रभाव छा रहा है कि सभी स्वधर्म का परित्याग करके समानता-समानता चिल्ला रहे हैं, स्वेच्छाचारी बनकर स्वतंत्रता-स्वतंत्रता चिल्ला रहे हैं, धर्म का त्याग करके संविधान-संविधान, सदाचार-कुलीनता आदि का त्याग करके शिक्षा-शिक्षा चिल्ला रहे हैं। विडम्बना यह भी है कि धर्म-नीति, सदाचार-कुलीनता आदि की चर्चा भी लोग न करें ऐसा दुराग्रह भी पालने लगे हैं और चर्चा करने पर विरोध भी करते हैं। हमें उन लोगों के लिये तो चर्चा करने की आवश्यकता है ही जो इन विषयों को गम्भीरतापूर्वक लेते हैं और स्वधर्म को जानना-समझना चाहते हैं।
स्त्री धर्म को समझें शौच विधान | stri dharm – 3
समानता-स्वतंत्रता-शिक्षा-महिला अधिकार आदि चिल्लाने वालों की संख्या अत्यल्प ही है, भारतीय समाज की स्त्रियां स्वभावतः स्वधर्म का पालन करना चाहती हैं जिनमें से कुछ इन षड्यंत्रों के दलदल में फंस जाती हैं। ये विदेशी षड्यंत्र है जो भारतीय समाज-परिवार के अस्तित्व का छेदन कर रहा है और इसके संरक्षण व सुरक्षा के लिये हमें भारतीय संस्कृति के अनुकूल विमर्श करने की आवश्यकता है। यदि स्वेच्छारियों को अभिव्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर दुराचार तक की स्वतंत्रता है तो हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी सुरक्षित है और हम चर्चा करेंगे ताकि जो स्वधर्म का ज्ञान चाहते हैं उन्हें स्वधर्म का ज्ञान भी प्राप्त हो और इन षड्यंत्रों से बचाव किया जा सके।
सामान्यतः पुरुषों के लिये धर्म, कर्म, मर्यादा, आचरण आदि शास्त्रों में सर्वत्र भरे-परे हैं किन्तु स्त्रियों के लिये नहीं हैं ऐसा नहीं है। स्त्रियों के लिये भी कर्तव्याकर्तव्य का शास्त्रों में निर्धारण किया गया है और जो भी आध्यात्मिक चर्चा करते हैं उनके लिये स्त्रियों के धर्म, कर्म, मर्यादा, आचरण आदि की चर्चा भी आवश्यक है। यदि चर्चा ही नहीं करेंगे तो आधुनिकता के नाम पर दुर्गंध ही फैलता रहेगा।
यहां स्त्री धर्म से संबंधित शास्त्रोक्त चर्चा की गयी है जिसके संकलनकर्त्ता विद्यावारिधि दीनदयालमणि त्रिपाठी जी हैं एवं हम उनका आभार प्रकट करते हैं। यह आलेख कई भागों में है एवं आगे अन्य लेख भी आ सकते हैं, यहां तृतीय भाग दिया गया है।

शौच विधान
“रात्रौ मूत्रपुरीषे तु गृहाभ्याशे समाचरे” दिति स्मरणात्॥ – रात्रि में मूत्र अथवा शौच के लिए जाने पर घर के समीप ही यह क्रिया करनी चाहिए — ऐसा स्मरण ग्रंथों में कहा गया है। तत्र प्रकारमाहाङ्गिराः —
उत्थाय पश्चिमे रात्रौ तत आचम्य चोदकम् ।
अन्तर्धाय तृणैर्भूमिं शिरः प्रावृत्य वाससा।।
वाचं नियम्य यलेन ष्ठीवनोच्छ्वासवर्जितः ।
कुर्यान्मूत्रपुरीषे तु शुचौ देशे समाहितः ॥२८॥
रात्रि के अंतिम प्रहर में उठकर, पहले आचमन करे, फिर पवित्र जल लेकर; तृण आदि से भूमि को ढँक दे, सिर को वस्त्र से ढँके। मौन रहे, ना थूके और न ही अधिक सांस फेंके। फिर पवित्र स्थान पर ध्यानपूर्वक शौच या मूत्र क्रिया सम्पन्न करे।
कालभेदेन दिङ्नियममाह गौतमः —
मूत्रपुरीषे दिवा कुर्यादुदङ्मुखः सन्ध्ययोश्च। रात्रौ तु दक्षिणामुख इति ॥२९॥
गौतम धर्मसूत्र में कहा गया है — दिन में और संध्या के समय मूत्र-पुरीष त्याग उत्तर की ओर मुँह करके करें; रात्रि में दक्षिण की ओर मुँह करके करें। वर्ज्यानाह स एव —
न वाय्वग्निभस्मकरीषकष्टच्छाया पथिकाम्येष्विति ।
विप्रादित्यापो देवता गावः प्रतिपश्यन् वा मूत्रपुरीषम् । मेध्यान्व्युदस्ये’ इति च ॥
उसी ग्रंथ में आगे कहा गया है — वायु, अग्नि, भस्म, गोबर, ईंधन, पेड़ की छाया, पथिक या यात्री आदि की ओर मुँह करके कभी शौच न करें। ब्राह्मण, सूर्य, जल, देवता, गायों को देखकर भी शौच नहीं करना चाहिए। इन पवित्र वस्तुओं को देखकर या उनके सामने यह कर्म करना महापाप है।
“अनन्तरं गन्धलेपक्षयकरं शौचं कुर्यात्” – इसके बाद गन्ध, लेप और अपवित्रता को दूर करने के लिए शुद्धता (शौच) करनी चाहिए।
तथाच गौतमः — लेपगन्धापकर्षणे शौचम् अमेध्यस्य तदद्भिः पूर्वं मृदा चेति॥
गौतम कहते हैं — अपवित्रता की गन्ध और लेप को हटाने के लिए पहले मिट्टी से, फिर जल से शौच करना चाहिए।
स्त्रीणां मृदमाह मरीचिः — ‘कृष्णा स्त्रीशूद्रयोस्तथे’ति ।
उक्तमृत्तिकालाभे या काचन ग्राह्या ॥
मरीचि ऋषि कहते हैं — स्त्रियों और शूद्रों के लिए काली मिट्टी (कृष्णा) उपयुक्त मानी जाती है। यदि बताई गई मिट्टी न मिले, तो कोई अन्य उपलब्ध शुद्ध मिट्टी ग्रहण कर सकते हैं। तथा च मनुः —
यस्मिन् देशे च यत्तोयं या च यत्तैव मृत्तिका ।
सैव तत्र प्रशस्ता स्यात् तया शौचं विधीयते ॥३२॥
मनु स्मृति कहती है — जिस स्थान पर जो जल और जो मिट्टी उपलब्ध हो, वही वहां शुद्ध मानी जाती है, उसी से शौच विधान करना चाहिए।
हस्तनियममाह देवलः —
धर्मविद् दक्षिणं हस्तं अधः शौचे न योजयेत् ।
तथा च वामहस्तेन नाभेरूर्ध्वं न शोधयेत् ॥३३॥
देवल कहते हैं — धर्मज्ञ व्यक्ति शौच के समय दक्षिण हाथ का प्रयोग निचली शुद्धिकरण क्रिया में न करे। नाभि के ऊपर का भाग भी वाम हाथ से न धोए।
मृत्परिमाणमाह शातातपः —
आर्द्रामलकमात्रास्तु ग्रासाः इन्दुवते स्थिताः ।
तथैव आहुतयः सर्वाः शौचार्थे याश्च मृत्तिकाः ॥३४॥
शातातप ऋषि कहते हैं — आर्द्र आमलकी (आंवले) के आकार की तीन-चार मिट्टी की गोलियां, चन्द्रमा की आकृति के समान बनाकर शौच हेतु प्रयुक्त की जानी चाहिए। सभी शुद्धिकरण प्रयोजनों के लिए इसी परिमाण की मिट्टी उपयुक्त है।
मृत्संख्यामाह — शातातपः —
एका लिङ्गे करे सव्ये तिस्रो द्वे हस्तयोर्द्वयोः ।
मूत्रशौचं समाख्यातं शकृति द्विगुणं भवेत् ॥३५॥
स्त्रीशूद्रयोः अर्धमानं शौचं प्रोक्तं मनीषिभिः ॥
शातातप ने शौच की मिट्टी की संख्या बताते हुए कहा है — मूत्र शौच के लिए बाएँ हाथ में एक मिट्टी की गोली, शकृत (मल) शौच के लिए दोनों हाथों में दो गोलियाँ। स्त्रियों और शूद्रों के लिए इस मात्रा की आधी मिट्टी पर्याप्त है।
तत्र क्रममाह व्यासः —
विटुच्छौचं प्रथमं कुर्यात् मूत्रशौचमतः परम् ।
पादशौचं ततः कुर्यात् करशौचमतः परम् ॥३६॥
व्यासजी कहते हैं — सबसे पहले मल शौच करें, उसके बाद मूत्र शौच करें, फिर पैरों को धोएं और अंत में हाथ धोएं।
उक्तशौच करणे प्रत्यवायमाह — बोधायनः —
शौचे यत्नः सदा कार्यः शौचमूलो यतो द्विजः ।
शौचाचारविहीनस्य समस्ता निष्फलाः क्रियाः ॥
बोधायन कहते हैं — शौच में सदा सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि द्विज का मूल शुद्धता है। जो व्यक्ति शौच और आचार में सावधानी नहीं बरतता, उसके सभी धार्मिक कार्य निष्फल हो जाते हैं।
क्रमशः…..
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।
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