stri dharm – स्त्री धर्म को समझें भाग – २

stri dharm - स्त्री धर्म को समझें भाग - २

स्त्रीधर्म में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य गृह सम्मार्जन एवं गृह अलंकरण विषयक हैं जो नित्य हैं और इसके लिये प्रतिदिन करने का उल्लेख मिलता है। स्त्रियों को प्रतिदिन सूर्योदयपूर्व गृह सम्मार्जन, द्वार सिंचन आदि करके स्वास्तिक-रंगोली आदि से गृह को सुशोभित करना चाहिये। उदुम्बर वृक्ष के पूजा का भी बहुत महत्व बताया गया है और स्त्रियों को प्रतिदिन उदुम्बर (गुल्लर) वृक्ष की पूजा भी करनी चाहिये। यहां स्त्री धर्म संबंधी उपरोक्त विषयों की शास्त्रोक्त चर्चा की गयी है।

शास्त्रों के अनुसार गृहस्थाश्रम का आरंभ विवाह से ही होता है और जिस घर में गृहिणी हो उसी को गृह कहा जाता है। गृहिणी को बोलचाल में घर की लक्ष्मी आदि भी कहकर सम्मानित किया जाता है। गृहिणी कथन का तात्पर्य गृह सञ्चालन के दायित्व से जुड़ा हुआ है अर्थात गृह संचालन स्त्रियों का ही कार्य है। वो अवश्य ही सोचनीय हैं जो गृह संचालन तो नहीं करती देश को संचालित करके अहंकार पालती हैं और यहां गीता के वचन “स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः” का स्मरण करते हुये विचार करना होगा कि स्त्री यदि स्वधर्म का त्याग कर रही है तो उसका दुष्परिणाम क्या होगा ?

सामान्यतः पुरुषों के लिये धर्म, कर्म, मर्यादा, आचरण आदि शास्त्रों में सर्वत्र भरे-परे हैं किन्तु स्त्रियों के लिये नहीं हैं ऐसा नहीं है। स्त्रियों के लिये भी कर्तव्याकर्तव्य का शास्त्रों में निर्धारण किया गया है और जो भी आध्यात्मिक चर्चा करते हैं उनके लिये स्त्रियों के धर्म, कर्म, मर्यादा, आचरण आदि की चर्चा भी आवश्यक है। यदि चर्चा ही नहीं करेंगे तो आधुनिकता के नाम पर दुर्गंध ही फैलता रहेगा।

यहां स्त्री धर्म से संबंधित शास्त्रोक्त चर्चा की गयी है जिसके संकलनकर्त्ता विद्यावारिधि दीनदयालमणि त्रिपाठी जी हैं एवं हम उनका आभार प्रकट करते हैं। यह आलेख कई भागों में है एवं आगे अन्य लेख भी आ सकते हैं, यहां द्वितीय भाग दिया गया है।

आचार्य दीनदयालमणि त्रिपाठी जी
आचार्य दीनदयालमणि त्रिपाठी जी

गृह सम्मार्जन

यस्याः शून्या भवेत्सा तु शून्यं तस्याः कुलं भवेत् ॥१९॥

देहली (चौखट) को विशेष रूप से प्रातःकाल अशून्य (रिक्त नहीं) रखना चाहिए। जिसके घर की देहली शून्य होती है, उसका कुल (परिवार) भी अंततः शून्य हो जाता है।

उदुंबरे वसेन्नित्यं भवानी सर्वदेवता । ततस्सा प्रत्यहं पूज्या गंधपुष्पाक्षतादिभिः ॥२०॥

उदुंबर (गूलर) वृक्ष में भवानी और समस्त देवताएँ नित्य निवास करती हैं।
इसलिए उसे प्रतिदिन गंध, पुष्प, अक्षत आदि से पूजना चाहिए।

पादस्य स्पर्शनं तत्र असंपूज्य च लंघनम् । कुर्वन् सुखमाप्नोति तस्मात्तत्परिवर्जयेत् ॥२१॥

उदुंबर वृक्ष का पाद (तना) बिना पूजन के स्पर्श करना और उसे लांघना नहीं चाहिए।
जो ऐसा करता है, वह दोष से ग्रस्त होता है, इसलिए यह आचरण त्याज्य है।

अकृतस्वस्तिकां या तु क्रमेल्लितां च मेदिनीम् । तस्यास्त्रीणि विनश्यन्ति वित्तमायुर्यशस्तथा ॥२२॥

जो भूमि स्वस्तिक से चिह्नित नहीं होती, अथवा जो अस्तव्यस्त एवं गन्दी होती है, उस घर में धन, आयु और यश, ये तीनों नष्ट हो जाते हैं।

यद्गृहं राजते नित्यं रङ्गवल्ल्या अनुलेपनैः । तद्गृहे वसते लक्ष्मीः नित्यं पूर्णकलान्विता इति ॥२३॥

वह गृह जो प्रतिदिन रंगोली और गोमय-लेपन से सुशोभित रहता है, उसमें पूर्ण कलाओं से युक्त महालक्ष्मी नित्य निवास करती हैं।

धान्यवहन, उपलेपन, संमार्जनादिकं यथाशक्ति स्वयं कुर्यात् वा कारयेत् वा । तथा च अनुशासनिके शाण्डिलं प्रति सुमनाः —

कुटुम्बार्थे समानीतं यत्किञ्चित्कार्यमेव तु । प्रातरुत्थाय तत्सर्वं कारयामि करोमि इति ॥२४॥

धान्य को स्थान पर लाना, गोमय से लेपन करना, घर की सफाई करना आदि कार्यों को स्त्री को अपने सामर्थ्यानुसार स्वयं करना चाहिए या दूसरों से कराना चाहिए। महाभारत के अनुशासन पर्व में सुमना स्त्री शाण्डिलि से कहती है — “परिवार की रक्षा हेतु जो भी कार्य आवश्यक होता है, उसे मैं प्रातःकाल उठकर स्वयं करती हूँ।”

अग्निपरिचर्यां, देवपूजोपकरण-साधनादीनि तु स्वयं कुर्यात् । नियमोदकबर्हीषि, पत्रपुष्पाक्षतादिकं । वचनात् — पूजोपकरणं सर्वं अनुक्तं साधयेत् स्वयं । इति स्कान्दे ॥२५॥

अग्नि की सेवा, देवपूजा की सामग्री जैसे जल, पात्र, पत्र-पुष्प, अक्षत आदि का संग्रह स्त्री को स्वयं करना चाहिए। स्कन्दपुराण कहता है — “जो भी पूजन-सामग्री ग्रन्थों में वर्णित न हो, वह भी स्वयं साधनी चाहिए।”

“नोपरुद्धः क्रियां चरे” इति वचनेन मूत्रादि उपरुद्धस्य क्रियानधिकारदर्शनात् उत्सर्गः कर्तव्यः । शास्त्र में कहा गया है — “जो व्यक्ति किसी भी कारण से (जैसे मूत्र-त्याग की आवश्यकता के कारण) शुद्ध नहीं है, वह किसी भी धार्मिक क्रिया में अधिकार नहीं रखता। इसलिए ऐसे में पहले उत्सर्ग (शौचक्रिया) करना अनिवार्य है।”

तत्र देशविशेषमाह — आपस्तम्बः —

दूरादावसथात् मूत्रपुरीषे कुर्यात् दक्षिणां दिशं, दक्षिणापरां वेति, एतच्च दिवाविषयम् ॥२६॥

इस विषय में आपस्तम्ब कहते हैं — मूत्र-पुरीष का त्याग निवास स्थान से दूर जाकर करना चाहिए, और उसे दक्षिण या दक्षिण-पश्चिम दिशा में करना चाहिए। यह नियम दिवा (दिन) काल के लिए विशेषरूप से मान्य है।

क्रमशः…..

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।


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