शम्बूक वध विवाद: एक बड़ा षडयंत्र

शम्बूक वध विवाद: एक बड़ा षडयंत्र शम्बूक वध विवाद: एक बड़ा षडयंत्र

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वर्तमान समय में ‘शम्बूक वध’ के प्रसंग को आधार बनाकर भगवान श्रीराम की छवि धूमिल करने और हिंदू समाज में विभाजन करने का एक अंतरराष्ट्रीय प्रयास चल रहा है। वामपंथी और म्लेच्छ विचारधारा से प्रेरित इतिहासकारों ने इसे “जातिगत अत्याचार” का रूप दे दिया है। किंतु यदि हम वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड और अन्य ग्रंथों का अवलोकन करें, तो स्पष्ट होता है कि शम्बूक वध किसी द्वेष के कारण नहीं, अपितु धर्म-मर्यादा की रक्षा और न्याय के लिए किया गया था। इस विषय में हम यहां विस्तृत चर्चा करेंगे और इस षड्यंत्र का समूल उन्मूलन (वैचारिक) करेंगे।

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शास्त्रोक्त किसी भी प्रसंग की चर्चा करनी हो तो उसके लिये सर्वप्रथम जिस नियम का पालन करना अनिवार्य है वो है आधुनिक विचारधारा के दृष्टिकोण का परित्याग करना, क्योंकि ये मूलतः सनातन के विरुद्ध ही दिखता है, एवं इसके पास न कोई प्रमाण होता है न कोई सिद्धांत है। यह एक निराधार विचारधारा है जो कुतर्क पर आश्रित है। तथापि यहां हम उन प्रश्नों के भी शास्त्रसम्मत उत्तर देने का प्रयास करेंगे, भले ही इनके कुतर्कों में वो सही बैठे अथवा न बैठे।

सीधा-सीधा सोचो गणित के सूत्रों-सिद्धांतों की व्याख्या गणितीय नियमों से की जाएगी या जीवविज्ञान के नियमों से। जीवविज्ञान के सूत्रों की व्याख्या उसी के नियमों से करेंगे या कानूनी प्रावधानों से ? ठीक इसी प्रकार जो शास्त्र का विषय है उसकी व्याख्या पूर्णरूपेण शास्त्रों के सिद्धांत से करेंगे न कि आधुनिक विचारधारा या कानूनी प्रावधान सिद्धांतों से। और ये स्पष्ट घोषित करता हूँ की जो कोई भी आधुनिक विचारधारा के अनुसार, कुतर्कों के आधार पर, कानूनी प्रावधानों, विज्ञान आदि के आधार पर इस विषय की व्याख्या करता है वही विवाद उत्पन्न कर रहा है।

उसकी आलोचना होनी चाहिये और यदि संभव हो तो उसको दण्डित करने का भी प्रयास करना चाहिये क्योंकि ये सनातनियों के धार्मिक आस्था पर किया गया प्रहार है।

वाल्मीकि रामायण: शम्बूक की कथा और शास्त्रीय संदर्भ

वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड (सर्ग ७३-७६) में यह वृत्तांत विस्तार से आता है। कथा के अनुसार, अयोध्या में एक वृद्ध ब्राह्मण अपने मृत बालक का शरीर लेकर राजद्वार पर आता है और विलाप करता है कि राजा के किसी अधर्म के कारण ही उसके पुत्र की अकाल मृत्यु हुई है। भगवान राम जब ऋषियों से इसका कारण पूछते हैं, तो देवर्षि नारद उन्हें युग-धर्म का ज्ञान कराते हैं। नारद मुनि समझाते हैं कि सतयुग में केवल ब्राह्मण, त्रेता में ब्राह्मण और क्षत्रिय, तथा द्वापर में वैश्य भी तपस्या के अधिकारी थे।

गर्व से कहो सवर्ण (savarna) हूँ! क्या आप जानते हैं कि शास्त्रों के अनुसार 'शूद्र' (shudra) भी सवर्ण है? एक राजनैतिक षड्यंत्र का पर्दाफाश!

किंतु वर्तमान त्रेता युग में किसी शूद्र का कठोर तपस्या में लीन होना मर्यादा के विरुद्ध है और यही अकाल मृत्यु का कारण है।

जब श्रीराम जांच के लिए निकलते हैं, तो वे एक सरोवर के तट पर एक व्यक्ति को अधोमुख (पैर ऊपर करके) लटककर घोर तप करते हुए पाते हैं। श्रीराम उससे पूछते हैं:

कस्य वर्णस्य सम्भूतो धर्मतः परिपृच्छतः। कौतूहलात्त्वां पृच्छामि तपसा च दमेन च॥ (उत्तरकाण्ड, ७५.१६)
अर्थ : “हे तपस्वी! मैं कौतूहलवश पूछता हूँ कि तुम किस वर्ण में उत्पन्न हुए हो और किस उद्देश्य से यह तप कर रहे हो?”

शम्बूक उत्तर देता है:

शूद्रयोण्यां प्रसूतोऽस्मि तप उग्रं समास्थितः। देवत्वं प्रार्थये राम सशरीरो महायशः॥ (उत्तरकाण्ड, ७६.२)
अर्थ : “हे राम! मैं शूद्र योनि में उत्पन्न हुआ हूँ। मैं सशरीर स्वर्ग (देवत्व) प्राप्त करने की इच्छा से यह उग्र तप कर रहा हूँ।”

जैसे ही वह यह स्वीकार करता है कि वह अनधिकृत रूप से देवत्व प्राप्त करने के लिए मर्यादा का उल्लंघन कर रहा है, राम अपनी तलवार से उसका वध कर देते हैं। तत्काल वह ब्राह्मण बालक जीवित हो उठता है।

तो ये संक्षेप में शम्बूक वध की कथा है जो वाल्मीकि रामायण में वर्णित है। ध्यातव्य दो विषय और भी हैं :

  • एक: यदि कर्मणा वर्ण निर्धारित होता है तो शम्बूक ब्राह्मण क्यों नहीं हो गया?”
  • दूसरा: “यदि उत्तरकाण्ड प्रक्षिप्त ही है तो इसको क्यों सही मानते हो अथवा यदि यह स्वीकार्य है तो उत्तरकाण्ड को प्रक्षिप्त नहीं मानोगे एवं इसी प्रकार अन्यान्य ग्रंथों को भी प्रक्षिप्त कहना बंद करोगे ?”

शम्बूक वध की कथा केवल वाल्मीकि रामायण तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इस घटना की पुष्टि पद्म पुराण और अन्य गौण संदर्भों में भी मिलती है। ‘ग्रंथांतर प्रमाण’ के नियम के अनुसार, जब एक ही घटना की पुष्टि एक से अधिक प्रामाणिक शास्त्रों में होती है, तो उसकी ऐतिहासिक और शास्त्रीय सत्यता निर्विवाद हो जाती है।

पद्म पुराण (पाताल खण्ड, अध्याय १०) के आधार पर शम्बूक वध का वृत्तांत

पद्म पुराण में यह प्रसंग उत्तरकाण्ड की घटना के समान ही वर्णित है, जो यह सिद्ध करता है कि यह कोई बाद में जोड़ा गया प्रक्षिप्त अंश नहीं, बल्कि एक सुसंगत शास्त्रीय परंपरा है।

  • अकाल मृत्यु का संकट: पद्म पुराण में उल्लेख है कि रामराज्य में एक ब्राह्मण का युवा पुत्र अचानक मर जाता है। ब्राह्मण विलाप करते हुए कहता है कि राम के राज्य में कोई ऐसा अधर्म हो रहा है जिसने यमराज को समय से पहले आने का अवसर दिया।
  • ऋषियों का परामर्श: जब श्रीराम वशिष्ठ और अन्य ऋषियों से परामर्श करते हैं, तो वे बताते हैं कि ‘शूद्रो हि तप्यते तपः’ अर्थात् कोई शूद्र मर्यादा के विरुद्ध तपस्या कर रहा है। शास्त्रों के अनुसार, त्रेता युग में तपस्या का अधिकार केवल द्विजों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) तक ही सीमित था।
  • राम का प्रस्थान और शम्बूक से भेंट: श्रीराम दंडकारण्य की ओर प्रस्थान करते हैं और वहाँ ‘शम्बूक’ नामक शूद्र को घोर तपस्या में लीन पाते हैं।
  • वध का कारण और न्याय: पद्म पुराण में भी स्पष्ट किया गया है कि शम्बूक का उद्देश्य ‘सशरीर स्वर्ग विजय’ था। वह प्रकृति और शास्त्र की उस मर्यादा को तोड़ना चाहता था जो सिद्धांत (सदेह स्वर्गगमन), कर्मों और संस्कारों के आधार पर विभाजित थी। श्रीराम ने लोक-कल्याण और धर्म-मर्यादा की पुनः स्थापना हेतु उसका वध किया।

‘उत्तररामचरितम्’ (द्वितीय अंक) में शम्बूक वध

इसी प्रकार संस्कृत साहित्य के महान कवि भवभूति ने अपने सुप्रसिद्ध नाटक ‘उत्तररामचरितम्’ (द्वितीय अंक) में भी शम्बूक वध का बहुत मार्मिक और शास्त्रीय वर्णन किया है।

  • भवभूति ने शम्बूक को वध के पश्चात ‘दिव्य पुरुष’ के रूप में प्रकट होते दिखाया है। वध होने के बाद शम्बूक की आत्मा मुक्त हो जाती है और वह स्वयं स्वीकार करता है कि श्रीराम के हाथों मृत्यु प्राप्त करना उसके लिए परम सौभाग्य और न्याय था।
  • यहाँ यह तर्क सिद्ध होता है कि वध दंड नहीं, बल्कि उद्धार था। उस समय की शास्त्रीय मर्यादा के अनुसार अनधिकृत तपस्या का फल मृत्यु दंड ही था, जिसे देकर श्रीराम ने उस शूद्र को पापमुक्त किया और ब्राह्मण बालक को जीवनदान दिया।
आत्मकल्याण का मार्ग
आत्मकल्याण का मार्ग

इस प्रकार यदि हम शास्त्रीय रूप से शम्बूक वध को समझने का प्रयास करें तो ही भलीभांति समझ सकते है, राजनीतिक आदि दृष्टिकोणों से नहीं। यदि ऐसा करते हैं तो यह शास्त्रों के अनुसार पाप भी है, क्योंकि हम आस्था के कारण नहीं राजनीतिक स्वार्थ के कारण कुतर्कों पर आधारित विवाद करने लगते हैं और दूसरे की धार्मिक आस्था पर भी आघात करते हैं एवं इस दृष्टिकोण से यह अपराध भी सिद्ध होता है। ऐसे अपराधों के लिये एक पृथक कानून बनना चाहिये अथवा न्यायपालिका स्वतः संज्ञान लेकर दण्डित करना आरम्भ करे।

“मर्यादा पुरुषोत्तम राम का खड्ग जब शम्बूक पर चला, तो वह केवल एक शरीर का अंत नहीं था, बल्कि उन आसुरी प्रवृत्तियों पर प्रहार था जो सशरीर स्वर्ग विजय का अहंकार पालती हैं।”

वर्णों के सहज कर्म की प्रामाणिक व्याख्या

भगवान राम का यह कार्य क्रूरता नहीं, बल्कि शास्त्रोक्त मर्यादा का पालन था। ‘सहज कर्म’ का अर्थ है वह कर्तव्य जो व्यक्ति के जन्म और प्रकृति के साथ जुड़ा है।

  • गीता का प्रमाण: श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। (१८.४७) – अपना धर्म, चाहे वह गुणरहित ही क्यों न हो, दूसरे के सुचारु रूप से किए गए धर्म से श्रेष्ठ है। शम्बूक ने परधर्म का आश्रय लिया था और गीता में ही एक अन्य प्रमाण भी है : “स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः”
  • मनुस्मृति और अनुशासन: शास्त्रों में प्रत्येक वर्ण के लिए कार्य निर्धारित हैं। शूद्र का धर्म ‘परिचर्या’ और ‘शिल्प’ आदि है, न कि वेदोक्त मंत्रों के साथ उग्र तपस्या।
  • अधिकार की बात: जैसे एक सैनिक का धर्म युद्ध करना है और न्यायाधीश का धर्म न्याय करना। यदि सैनिक न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठकर निर्णय करने लगे, तो वह न्याय नहीं, बल्कि अराजकता होगी। शम्बूक ने अध्यात्म के क्षेत्र में वही अराजकता उत्पन्न कर दिया था।

न्याय की मांग: वध क्यों आवश्यक था?

सनातन राजधर्म में राजा केवल मनुष्यों का नहीं, बल्कि ‘ऋत’ (Universal Order) का रक्षक होता है।

  • मर्यादा भंग: यदि कोई व्यक्ति अपनी सीमाएं तोड़कर वह शक्ति प्राप्त करना चाहे जिसका वह पात्र नहीं है, तो ब्रह्मांड का संतुलन बिगड़ जाता है। ब्राह्मण बालक की मृत्यु उसी असंतुलन का संकेत थी।
  • सशरीर स्वर्ग का अहंकार: शम्बूक का उद्देश्य मोक्ष नहीं, बल्कि ‘सशरीर देवत्व’ पाना था, जो कि अहंकार और प्रकृति के नियमों के विरुद्ध था।
  • राजधर्म: राजा का कर्तव्य है कि वह वर्ण-संकरता और धर्म-संकरता को रोके। यदि राम शम्बूक को दंड न देते, तो त्रेता युग की संपूर्ण सामाजिक और आध्यात्मिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाती।
चितपावन ब्राह्मणों के ४०० गावों में आगजनी
चितपावन ब्राह्मणों के ४०० गावों में आगजनी

कर्मणा वर्णव्यवस्था के ठेकेदारों से प्रश्न

यद्यपि शास्त्र से वर्णव्यवस्था जन्मना ही सिद्ध होता है किन्तु जो सनातन धर्म को लेकर विवाद करते रहते हैं वो कर्मणा-कर्मणा चिल्लाते रहते हैं। आज कई आधुनिक दिग्भ्रमित विद्वान, समूह, संगठन, प्रगतिशील सोच रखने वाले, आधुनिक विचारधारा के लोग आदि चिल्ला-चिल्लाकर कहते हैं कि “वर्ण कर्म से होता है, जन्म से नहीं”। शम्बूक वध का प्रसंग उनके इस पाखंड की धज्जियां उड़ा देता है। यहां पर उनकी गति “भई गति सांप छुछंदर केरी” वाली हो जाती है।

यदि कर्मणा वर्ण सिद्ध करें तो शम्बूक शूद्र सिद्ध नहीं हो पाता और यदि शम्बूक को शूद्र सिद्ध करें तो कर्मणा वाली मान्यता समाप्त हो जाती है।

उन सभी विवादप्रेमियों से मेरा सीधा प्रश्न है:

  1. यदि आप मानते हैं कि वर्ण कर्म से होता है, तो शम्बूक तो “तपस्या” (जो कि ब्राह्मण का कर्म है) कर रहा था। तो फिर आपके ‘कर्मणा’ सिद्धांत के अनुसार वह ब्राह्मण हो जाना चाहिए था?
  2. यदि वह तपस्या करने के कारण ब्राह्मण बन गया था, तो फिर आप उसे “शूद्र शम्बूक” कहकर सहानुभूति क्यों बटोरते हैं?
  3. यदि वह ब्राह्मण था, तो उसका वध “शूद्र वध” कैसे हुआ? और यदि वह शूद्र था, तो यह सिद्ध हो गया कि तपस्या करने के बावजूद उसका वर्ण नहीं बदला, वह ‘जन्म’ से ही शूद्र रहा।

शास्त्रों और शास्त्रीय सिद्धांतों को तिलांजलि देकर जो कुतर्क का आश्रय लेते हैं, उनकी सदैव ऐसी ही दुर्गति होती रहती है किन्तु बड़े स्तर के निर्लज्ज होते हैं फिर भी कुतर्क करना नहीं छोड़ते अर्थात यह सिद्ध होता है कि उनका उद्देश्य ही कुछ और है शास्त्रों का वास्तविक ज्ञान प्राप्त करना है ही नहीं।

अतः, यह स्पष्ट है कि वर्ण का आधार जन्म ही है। कर्म उस जन्मगत वर्ण के कर्तव्यों का निर्वाह मात्र है। शम्बूक जन्म से शूद्र था और उसने पर-धर्म (ब्राह्मण कर्म) को अपनाया, जो शास्त्रों के अनुसार निषिद्ध है, स्वधर्म का त्याग है।

षड्यंत्र का पटाक्षेप: म्लेच्छ और वामपंथी राजनीति

“शम्बूक का वध किसी व्यक्ति के प्रति घृणा नहीं, बल्कि उस अधर्म का अंत था जिसने प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ कर एक निर्दोष बालक के प्राण हर लिए थे।”

शम्बूक की कथा को एक “उत्पीड़न की कहानी” बनाकर प्रस्तुत करना वास्तव में सनातन द्रोहियों और देशद्रोहियों का एक सुनियोजित षड्यंत्र है। इसके पीछे के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:

जातीय संघर्ष: दलितों और पिछड़ों को यह समझाना कि हिंदू धर्म और उनके आराध्य देव (राम) उनके शत्रु रहे हैं। सवर्ण-दलित कार्ड खेलकर जातीय उन्माद और विद्वेष को बढ़ावा देते हैं। जब हिंदू अपने ही शास्त्रों और नायकों से, अन्य वर्ण-जातियों से द्वेष करने लगेगा, निंदा करने लगेगा और जातीय संघर्ष होगा। सोचने का विषय यह भी है कि ऐसा विवाद करने वाले हैं कौन अर्थात कहीं नेता तो नहीं, किसी संगठन/संस्था/NGO गैंग आदि के षड्यंत्रकारी तो नहीं, क्योंकि यह विषय शास्त्र का है, धर्म का है।

जातीय संघर्ष

धर्मांतरण का मार्ग: यदि जातीय संघर्ष को किसी प्रकार रोक भी लें तो भी म्लेच्छों (ईसाई मिशनरियों और कट्टरपंथियों) के लिए उसे धर्मच्युत करना (मतांतरित करना) सरल हो जाएगा, क्योंकि वह अन्यान्य वर्ण-जातियों से विभाजित हो जायेगा। तत्काल मतान्तरिक करें या न करें वह नास्तिक तो बन ही जायेगा, मतांतरित उचित समय पर किया जायेगा।

राजनीतिक अधिपत्य: भारत को भीतर से खोखला करने के लिए ‘जाति’ को एक हथियार की तरह उपयोग करना, ताकि देश कभी एकीकृत न हो सके। यदि जातीय संघर्ष न भी हो तो भी कम से कम हिदुत्व का जागरण तो नहीं हो पायेगा क्योंकि यदि हिंदुत्व का जागरण हो जाये तो वो म्लेच्छों को असह्य होता है। आप देखते होंगे मदिरों में घंटा-शंख ध्वनि तक असह्य हो जाती है, तो कहीं शोभयात्रा असह्य हो जाती है, तो कहीं पहाड़ी पर दीप जलना असह्य हो जाता है और रोकने के लिये समर्थक सरकारें उच्च न्यायालय तक ही नहीं सर्वोच्च न्यायालय तक भी जाती है, न्यायमूर्ति के लिये महाभियोग लाने का भी प्रयास करती है।

इतिहास का विकृतीकरण: मुगलों और अंग्रेजों के अत्याचारों से ध्यान हटाकर कल्पित “ब्राह्मणवादी अत्याचार” की कहानियां गढ़ना, ताकि हिंदू समाज स्वयं ही ग्लानि (Guilt) से ग्रसित रहे, मुगलों, अंग्रेजों के अत्याचारों की चर्चा ही न हो ।

यदि धर्म में आस्था है तो उसका सीधा तात्पर्य है कि शास्त्रों में भी आस्था रखना होगा, क्योंकि धर्म शब्द भी तो शास्त्र से ही ज्ञात होते हैं। यदि शूद्र को स्वीकार किया जाय तो भी शास्त्र को स्वीकार करना होगा।

निष्कर्ष: मर्यादा की विजय और षड्यंत्र का अंत

मर्यादा की रक्षा हेतु, राघव ने जो खड्ग उठाया था,
वध नहीं, वह न्याय था, जो मृत को जीवित लाया था।
जो अधम त्याग निज धर्म कर्म, पर-पथ पर पाँव बढ़ाते हैं,
वे योग नहीं, वे भोग हेतु, जग में अनर्थ फैलाते हैं।
षड्यंत्रों के घेरों में अब, सत्य को न तुम खोने दो,
मर्यादा ही आधार धर्म का, इसे न ओझल होने दो।

शम्बूक वध की यह घटना केवल एक ऐतिहासिक वृत्तांत नहीं, बल्कि सनातन धर्म की उस अटल मर्यादा का प्रतीक है जहाँ व्यक्तिगत आकांक्षाओं से ऊपर ‘लोक-संग्रह’ और ‘शास्त्र-विधि’ को रखा जाता है। भगवान श्रीराम ने शम्बूक का वध किसी द्वेष वश नहीं, बल्कि उस ‘ऋत’ (सृष्टि के नियम) की रक्षा के लिए किया था, जिसे शम्बूक का अनधिकृत तप छिन्न-भिन्न कर रहा था।

आज जो आधुनिक व्याख्याकार ‘कर्मणा वर्णव्यवस्था’ का ढोल पीटते हैं, वे स्वयं अपने ही तर्कों के जाल में फँस जाते हैं। यदि कर्म ही वर्ण का आधार होता, तो तपस्या करने वाले शम्बूक को वे ‘ब्राह्मण’ स्वीकार करते, किंतु उसे ‘शूद्र’ कहकर प्रचारित करना ही यह सिद्ध करता है कि वर्ण का आधार जन्म ही है। यह दोहरा मापदंड केवल हिंदू समाज में फूट डालने और ‘जातीय संघर्ष’ की अग्नि को प्रज्वलित करने के लिए म्लेच्छों और वामपंथियों द्वारा रचा गया एक बौद्धिक षड्यंत्र है।

सनातन के प्रेमियों और शास्त्र-अनुरागियों को यह समझना होगा कि हमारे नायक और हमारे शास्त्र पूर्णतः सुसंगत हैं। शम्बूक का वध उस समय की न्याय-व्यवस्था की मांग थी, जिसने एक निर्दोष ब्राह्मण बालक को जीवनदान दिया और समाज में अराजकता को रोका। हमें इन विदेशी और राष्ट्र-विरोधी नैरेटिव्स को त्यागकर अपने मूल ग्रंथों (वाल्मीकि रामायण, पद्म पुराण आदि) के प्रमाणों पर अटूट विश्वास करना चाहिए।

सत्य यही है कि मर्यादा पुरुषोत्तम का हर कार्य धर्म की स्थापना के लिए था। इस लेख का उद्देश्य उस सत्य को पुनः स्थापित करना है जिसे दशकों से मिथ्या प्रचार की धूल तले दबाने का प्रयास किया गया।

भ्रम और यथार्थ (FAQ)

FAQ

प्रश्न 1: क्या शम्बूक का वध केवल उसकी जाति के कारण किया गया था?

उत्तर: नहीं, शास्त्रों के अनुसार शम्बूक का वध उसकी जाति के कारण नहीं, बल्कि उसके ‘अनधिकृत कर्म’ के कारण किया गया था। त्रेता युग की मर्यादा के विरुद्ध, वह सशरीर स्वर्ग प्राप्त करने के लिए उग्र तपस्या कर रहा था, जो कि शास्त्रीय विधान के अनुसार वर्जित था और समाज में अकाल मृत्यु का कारण बन रहा था।

प्रश्न 2: क्या शम्बूक वध की कथा वाल्मीकि रामायण के अलावा अन्य ग्रंथों में भी है?

उत्तर: हाँ, ‘ग्रंथांतर प्रमाण’ के अनुसार इस कथा की पुष्टि पद्म पुराण (पाताल खण्ड) में भी मिलती है। इसके अतिरिक्त महाकवि भवभूति के ‘उत्तररामचरितम्’ में भी इस घटना का वर्णन है, जो इसे एक सुसंगत ऐतिहासिक और शास्त्रीय घटना सिद्ध करता है।

प्रश्न 3: ‘कर्मणा वर्णव्यवस्था’ (कर्म से वर्ण) के समर्थक शम्बूक के विषय में कहाँ चूकते हैं?

उत्तर: यदि वर्ण केवल कर्म से होता, तो तपस्या (ब्राह्मण कर्म) करने के कारण शम्बूक को ‘ब्राह्मण’ मान लेना चाहिए था। किंतु षड्यंत्रकारी उसे ‘शूद्र’ भी कहते हैं और उसके ‘तप’ का समर्थन भी करते हैं। यह विरोधाभास सिद्ध करता है कि वर्ण का आधार जन्म ही है, और अनधिकृत कर्म करना मर्यादा का उल्लंघन है।

प्रश्न 4: शम्बूक वध को “षड्यंत्र” क्यों कहा जाता है?

उत्तर: इसे आधुनिक वामपंथी और म्लेच्छ विचारधारा वाले इतिहासकारों द्वारा एक षड्यंत्र की तरह पेश किया जाता है ताकि हिंदू समाज में जातीय संघर्ष पैदा किया जा सके। वे शास्त्रों के ‘बहुमत सिद्धांत’ को नकार कर एक न्यायपूर्ण घटना को “अत्याचार” के रूप में प्रचारित करते हैं।

प्रश्न 5: क्या शम्बूक का वध राम की छवि के विपरीत नहीं है?

उत्तर: बिल्कुल नहीं। राम ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ हैं। उनका कार्य शास्त्र की मर्यादा और ऋत (Universal Law) की रक्षा करना है। जब शम्बूक के अनधिकृत तप से प्रकृति का नियम टूटा और एक ब्राह्मण बालक की अकाल मृत्यु हुई, तब न्याय की मांग यही थी कि उस अराजकता को रोका जाए।

प्रश्न 6: क्या शम्बूक को अपनी गलती सुधारने का मौका नहीं मिलना चाहिए था?

उत्तर: शास्त्रानुसार, त्रेता युग में किसी शूद्र द्वारा सशरीर स्वर्ग प्राप्ति के उद्देश्य से किया गया उग्र तप एक महापाप था। जिनके प्राण चले गये उसके पुनर्जीवित होने का यही निदान था। मर्यादा का ऐसा गंभीर उल्लंघन तत्काल दंड का पात्र होता है ताकि समाज में धर्म की पुनः स्थापना हो सके और निर्दोषों (जैसे वह ब्राह्मण बालक) की रक्षा हो।

प्रश्न 7: क्या धर्म का पालन करना अपराध हो सकता है?

उत्तर : यदि आपके पास शास्त्र का ज्ञान नहीं है और बस कुतर्क से विचार करके ही प्रश्न करते हैं तो स्वाभाविक रूप से वह प्रश्न ही गलत होता है। ऑपरेशन करते समय डॉक्टर चाकू चलाता है और वह अपराध नहीं होता, किन्तु उसके अतिरिक्त यदि सड़कों पर चलाने लगे तो अपराध होगा या नहीं, या कोई ऐसा व्यक्ति जो डॉक्टर नहीं है किसी को चाकू मारे तो अपराध होगा या नहीं। इस प्रश्न में कर्म को ही धर्म कहा जा रहा है। धर्म का ज्ञान शास्त्रों से होता है और उसमें क्या करना है एवं क्या नहीं करना है अर्थात विहित और निषिद्ध दोनों पालनीय होता है।

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कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।


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