गर्व से कहो सवर्ण (savarna) हूँ! क्या आप जानते हैं कि शास्त्रों के अनुसार ‘शूद्र’ (shudra) भी सवर्ण है? एक राजनैतिक षड्यंत्र का पर्दाफाश!

गर्व से कहो सवर्ण (savarna) हूँ! क्या आप जानते हैं कि शास्त्रों के अनुसार 'शूद्र' (shudra) भी सवर्ण है? एक राजनैतिक षड्यंत्र का पर्दाफाश! गर्व से कहो सवर्ण (savarna) हूँ! क्या आप जानते हैं कि शास्त्रों के अनुसार 'शूद्र' (shudra) भी सवर्ण है? एक राजनैतिक षड्यंत्र का पर्दाफाश!

real meaning of savarna and political conspiracy shudra is also savarna

मैं बारम्बार कहता हूँ कि एक सुनियोजित षडयंत्र चल रहा है और इसकी अगली पंक्ति है कि उसकी बंदूक को स्वार्थसिद्धि के लिये देश के कर्णधारों ने अपना कंधा दे रखा है। आज इस तथ्य को “सवर्ण” शब्द के परिप्रेक्ष्य, वास्तविक तात्पर्य और इसके राजनीतिक दुरुपयोग को समझेंगे जो देश को जातीय संघर्ष के गृहयुद्ध में धकेल रही है। पूरा आलेख “सवर्ण” के चतुर्दिक ही रहेगा जो कि देश के वास्तविक कर्णधार हैं, जिन्होंने देश के लिये बलिदान दिया, त्याग किया और आज देश की राजनीति उनको बलिवेदी पर चढ़ा रहा है।

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“विभाजन नहीं, व्यवस्था चुनें; भ्रम नहीं, शास्त्र चुनें। चारों वर्णों का एक ही आधार—सवर्ण गौरव, अखंड राष्ट्र का विचार!”

भारतीय संविधान, संसद के अधिनियमों या भारतीय न्यायपालिका के आधिकारिक दस्तावेजों में “सवर्ण” शब्द को कहीं भी परिभाषित नहीं किया गया है। यहाँ तक कि पूरे भारत के संविधान (Constitution of India) में भी इस शब्द का एक बार भी उल्लेख नहीं है। संविधान केवल दो ही श्रेणियों को मान्यता देता है:

  • आरक्षित वर्ग (Reserved Category): जैसे अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग (OBC)।
  • अनारक्षित वर्ग (Unreserved/General Category): वे लोग जो उपरोक्त श्रेणियों में नहीं आते।

सामान्य बोलचाल में अनारक्षित वर्ग (General Category) को ही “सवर्ण” मान लिया जाता है, लेकिन संवैधानिक रूप से “सवर्ण” जैसी कोई कानूनी परिभाषा नहीं मिलती। माननीय उच्चतम न्यायालय ने भी कई निर्णयों (जैसे इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ) में ‘जाति’ और ‘वर्ग’ पर चर्चा की है, लेकिन “सवर्ण” शब्द को परिभाषित करने से परहेज किया है। वर्ष 2019 में जब 103वां संविधान संशोधन (EWS – आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए आरक्षण) लागू हुआ, तब मीडिया और राजनैतिक चर्चाओं में इसे “सवर्ण आरक्षण” कहा गया।

सामान्य वर्ग ही सवर्ण ?
सामान्य वर्ग ही सवर्ण ?

किंतु, संसद द्वारा पारित कानून में कहीं भी ‘सवर्ण’ शब्द नहीं लिखा गया। वहाँ शब्द प्रयोग किया गया: “Economically Weaker Sections other than SC, ST, and OBC” (अर्थात वे गरीब जो आरक्षित श्रेणियों में शामिल नहीं हैं)। सरकारी फॉर्म, जनगणना या किसी भी कानूनी हलफनामे में “सवर्ण” का विकल्प नहीं होता। वहाँ केवल जातियों के नाम या मुख्य श्रेणियाँ (SC, ST, OBC, General) होती हैं।

किन्तु ये अर्द्धसत्य है, परोक्षतः सामान्य वर्ग को ही सवर्ण समझा जाता है और इसका राजनीतिक संदर्भ यही है। जातिवाद की घृणित राजनीति करने वाले नेताओं ने सामान्य वर्ग को सवर्ण सिद्ध करने में कोई कमी नहीं छोड़ी है और सामान्य वर्ग के अतिरिक्त जो भी हैं वो सवर्ण नहीं हैं ऐसा भी कभी नहीं कहा है; किन्तु सवर्णों के विरोध हेतु उन जातियों को जिन्हें सामान्य वर्ग से अलग घोषित करते हैं भले ही अवर्ण कहें अथवा नहीं, इसके पीछे उनके वोटबैंक की राजनीति है।

किन्तु इसका दुष्परिणाम वो नहीं देख पा रहे हैं क्योंकि स्वार्थ में अंधे हो चुके हैं और देश की जातीय संघर्ष के द्वार पर खड़ा कर दिया है। दुर्बुद्धि ग्रस्त ये दुष्ट नेता जो स्वार्थ में अंधे हो चुके हैं और देश-समाज के हित से इनका कोई संबंध नहीं रहा, बस सत्ता सुख, धन, पद आदि के लिये देश को जातीय संघर्ष की अग्नि में झोंकने के लिये तत्पर हैं और इन्हें यह भी नहीं दिखता कि इस आग में वो स्वयं भी दग्ध होंगे, उनके घर भी जलेंगे।

जातीय संघर्ष

ये सभी दुष्ट नेता एक और षड्यंत्र करते हैं और वो यह कि अपने वोटबैंक को ब्राह्मणों का कट्टर विरोधी बना रहे हैं, इसका कारण यह है कि यदि ये ब्राह्मणों के संपर्क में रहे तो ब्राह्मण इनके विवेकचक्षु को खोल देंगे और इन दुष्टों का अनावरण करके वास्तविक स्वरूप का दर्शन करा देंगे। ये ब्राह्मणों की विशेषता है जो प्रकृति प्रदत्त होती है।

देश में हो रहे ब्राह्मण और शास्त्र विरोध के पीछे का यही षड्यंत्र है। क्योंकि यदि धर्म के नाम पर शास्त्र से भी जुड़े तो शास्त्र पुनः ब्राह्मण से जोड़ देगा, या ब्राह्मण से जुड़े तो ब्राह्मण शास्त्र से जोड़ देगा जिससे इनका पटाक्षेप हो जायेगा और ये नग्न हो जायेंगे, निंदा और घृणा के पात्र हो जायेंगे। और इसी कारण अपना सुरक्षा कवच बनाने के लिये अनारक्षित वर्गों के मन में सवर्ण विरोध और विशेष रूप से ब्राह्मण और शास्त्र के विरोध का विष भर रहे हैं। स्वाभाविक है ये विष अपना प्रभाव तो दिखायेगा ही और देश में दिखाई दे रहा है।

आगे की चर्चा से पूर्व यह अनिवार्य है कि हम पहले सवर्ण को ही भलीभांति समझ लें, सवर्ण का क्या तात्पर्य है, कौन सवर्ण है और कौन अवर्ण है अर्थात सवर्ण नहीं है आदि।

सवर्ण का तात्पर्य

यदि हम शास्त्रों की बात करें तो शास्त्रों में यत्र-तत्र सवर्ण शब्द का प्रयोग मिलता है और सवर्ण के वास्तविक तात्पर्यों को समझने के लिये यह आवश्यक है कि शास्त्रों में हुये प्रयोग के कुछ अंशों का अवलोकन किया जाय :

स्मृतियों में “सवर्ण” का प्रयोग और तात्पर्य

स्मृति ग्रंथों (जैसे मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति) में “सवर्ण” का मुख्य रूप से दो अर्थों में वर्णन मिलता है:

  • समान वर्ण (Same Caste): मनुस्मृति में विवाह और संस्कारों के संदर्भ में “सवर्ण” शब्द का प्रयोग किया गया है। इसका अर्थ है—अपने ही वर्ण का (जैसे ब्राह्मण का ब्राह्मण स्त्री से, क्षत्रिय का क्षत्रिय से)।
    • उदाहरण: मनुस्मृति (3.12) के अनुसार, द्विजातियों के लिए पहली शादी के लिए “सवर्णा” (अपने ही वर्ण की) स्त्री ही श्रेष्ठ मानी गई है।
  • चातुर्वर्ण्य के भीतर: स्मृतियों के अनुसार, जो व्यक्ति ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—इन चारों में से किसी भी वर्ण के अंतर्गत आता है, वह तकनीकी रूप से “सवर्ण” (वर्ण सहित) है। जो इन चारों से बाहर थे, उन्हें ‘अवर्ण’ या ‘पंचम’ कहा गया।
स्मृतियों में "सवर्ण" का प्रयोग और तात्पर्य
स्मृतियों में “सवर्ण” का प्रयोग और तात्पर्य

सवर्णाग्रे द्विजातीनां प्रशस्ता दारकर्मणि। कामतस्तु प्रवृत्तानां इमाः स्युः क्रमशो वराः॥ (मनुस्मृति – अध्याय 3, श्लोक 12)

सवर्णेभ्यः सवर्णासु जायन्ते हि सजातयः। अनिन्द्येषु विवाहेषु पुत्राः सन्तानवर्धनाः॥ (याज्ञवल्क्य स्मृति – आचाराध्याय, श्लोक 90)

सवर्णासु च ये पुत्राः सवर्णानां प्रजज्ञिरे। तेषां अंशविकल्पोऽयं यथाधर्मं उदाहृतः ॥ (नारद स्मृति – दायभाग, श्लोक 13)

सवर्णायां तु यो जातः सवर्णेन स एव हि॥ – पराशर स्मृति, आचार संहिता

सवर्णो यस्य यो वर्णः स तेनैव विधीयते॥ – अत्रि स्मृति

पुराणों में “सवर्ण” के विशेष संदर्भ

पुराणों में “सवर्ण” शब्द का प्रयोग ऐतिहासिक और वंशानुगत नामों के रूप में अधिक मिलता है:

  • सवर्णा (सूर्य की पत्नी): विष्णु पुराण और मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, भगवान सूर्य की पत्नी ‘संज्ञा’ ने जब सूर्य का तेज न सह पाने के कारण तपस्या करने का निर्णय लिया, तो उन्होंने अपनी ही जैसी दिखने वाली एक छाया उत्पन्न की। उस छाया का नाम “सवर्णा” (समान वर्ण या रूप वाली) था, जिसे “छाया” भी कहा जाता है।
  • सावर्णि मनु (Sāvarṇi Manu): पुराणों में आगामी मन्वन्तरों का वर्णन है। ‘सवर्णा’ (छाया) के पुत्र होने के कारण आठवें मनु को “सावर्णि मनु” कहा जाता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण और मार्कण्डेय पुराण में इनका विस्तृत उल्लेख है।

ततः स्वदेहात् सा नारी निर्ममे सदृशीं तदा। सवर्णां नामतश्चैव संज्ञामाह ततः शुभाम्॥ (विष्णु पुराण – अंश 3, अध्याय 2)

राजन् सावर्णिरायातः सूर्यपुत्रोऽष्टमो मनुः। निर्मोकविरजस्कद्याः सावर्णेस्तनया नृप॥ (श्रीमद्भागवत – स्कंध 8, अध्याय 13, श्लोक 11)

सवर्णा सा ततस्तस्मै रूपं स्वं प्रददौ शुभम्। यस्मात् सा सदृशी तस्यास्तेन सा सा सवर्णाभवत् ॥ (मार्कण्डेय पुराण – 77.34)

सवर्णाभ्यः सवर्णास्तु जायन्ते वै न संशयः। आनन्तर्यात्तु संभूताः सवर्णा इति निश्वयः ॥ (महाभारत – अनुशासन पर्व, 48.4)

व्युत्पत्तिपरक अर्थ (Etymological Meaning)

संस्कृत व्याकरण के अनुसार, ‘सवर्ण’ शब्द ‘स’ (समान/सहित) और ‘वर्ण’ के मेल से बना है।

  • सहित: वह व्यक्ति जो किसी निश्चित ‘वर्ण’ (Social Order) के अंतर्गत आता हो, अर्थात वर्णव्यवस्था से बहिर्गत न हो।
  • समान: वह जो अपने ही जैसे गुण, स्वभाव और कर्म वाले समूह (वर्ण) से संबंध रखता हो।

सामाजिक-शास्त्रीय तात्पर्य (Social Context)

स्मृतियों (विशेषकर मनुस्मृति और पाराशर स्मृति) के अनुसार, सवर्ण का तात्पर्य उन लोगों से है जो “चातुर्वर्ण्य” व्यवस्था का हिस्सा हैं।

  • प्राचीन काल में समाज को चार वर्णों में विभाजित किया गया था: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, जो आज भी विद्यमान है।
  • चूंकि ये चारों एक ही व्यवस्था (वर्ण-व्यवस्था) के अंग थे, इसलिए शास्त्रीय अर्थ में ये सभी ‘सवर्ण’ कहलाते थे, इसलिये ये आज भी सवर्ण ही हैं।
  • जो लोग इस व्यवस्था से बाहर थे (जैसे अंत्यज या म्लेच्छ), उन्हें ‘अवर्ण’ (बिना वर्ण वाला) कहा जाता था।

शूद्र का सवर्ण होना: एक अकाट्य शास्त्रीय सत्य

“यदि शूद्र वर्ण-व्यवस्था का चौथा स्तंभ है, तो वह ‘अवर्ण’ कैसे हो सकता है?”

इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि आज सवर्ण के विषय में जनमानस को जो दिग्भ्रमित किया गया है, मूलतः शूद्र को वो भ्रामक ही निंदनीय कुकर्म और जघन्य पाप है भले ही कानून के अनुसार अपराध हो अथवा न हो, क्योंकि शूद्र भी सवर्ण ही है। किन्तु शूद्रों को सामान्य वर्ग के विरुद्ध खड़ा करने के उद्देश्य से सवर्ण और सामान्य वर्ग को एक प्रकार से पर्यायवाची (मात्र राजनीतिक व्यवहार में) बना दिया गया, किन्तु शास्त्रीय नियम से शूद्र भी सवर्ण ही सिद्ध होते हैं और जो सवर्ण सिद्ध नहीं होते वो स्वतः अवर्ण या वर्णसंकर सिद्ध हो जाते हैं।

शूद्र का सवर्ण होना: एक अकाट्य शास्त्रीय सत्य
शूद्र का सवर्ण होना: एक अकाट्य शास्त्रीय सत्य

ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के सवर्ण होने का तो कोई प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता, वर्त्तमान राजनीतिक और सामाजिक स्थिति में शूद्र के लिये सवर्ण होने संबंधी प्रश्न उत्पन्न होना स्वाभाविक है। तो पहले यह भी स्पष्ट होना चाहिये कि सवर्ण कौन-कौन नहीं हैं ?

“सवर्ण वो नहीं हैं जो अन्त्यज, वर्णसंकर या विधर्मी (म्लेच्छादि) हैं”

इनके अतिरिक्त वो सभी सवर्ण हैं जो चारों वर्णों में से किसी भी वर्ण के हैं।

इसलिये शूद्रों के लिये भी यह आवश्यक है कि वो वास्तविक तथ्यों को समझें और अपने वर्ण का ज्ञान प्राप्त करके गर्व से स्वयं को भी सवर्ण कहें। अपने वर्णधर्म का पालन करते हुये देश, समाज के कल्याण का भागी बनते हुये आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करें, न कि नेताओं की घृणित राजनीति में फंसें।

ध्यातव्य : जो सवर्ण नहीं है अर्थात चारों वर्णों में से किसी भी वर्ण के अंतर्गत नहीं आता वही अवर्ण है; या तो अन्त्यज है या वर्णसंकर है या म्लेच्छादि है। वो शूद्र सवर्ण ही हैं जो इनमें नहीं आते और उनके लिये भी शास्त्रोक्त नियम और विधान है जिससे वो आत्मकल्याण के भागी बन सकें। यदि वो भी अंतर्जातीय विवाह (वर्णभेद से) करते हैं तो उनकी संताने भी वर्णसंकर कहलायेगी, वो भी कुलघाती ही कहलायेंगे ये मेरा व्यक्तिगत विचार नहीं अपितु गीता का कथन है।

वर्णसंकर और कुलघाती
वर्णसंकर और कुलघाती

संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च। पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥ (अध्याय १, श्लोक ४२)

जिसका वर्ण ही नहीं है अर्थात अवर्ण है उसके लिये शास्त्रोक्त विधान का भी कोई औचित्य शेष नहीं रहता, यद्यपि यदि वो आत्मकल्याण चाहे तो उसके लिये भी है किन्तु आत्मकल्याण न चाहे तो ब्राह्मण के लिये भी शास्त्रोक्त विधान का क्या औचित्य रहेगा ? किन्तु जो पूर्व से ही अवर्ण है वह यदि अंतर्जातीय विवाह (वर्णभेदपरक) करता भी है तो उसका क्या पतन होगा, जो पहले से ही गड्ढे में हो उसके लिये थोड़ा अधिक होने से ही क्या अनिष्ट हो जायेगा।

अर्थविवरण
स-वर्ण (With Varna)जिसका कोई निश्चित वर्ण हो। शास्त्रानुसार चारों वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) सवर्ण कहलाते हैं क्योंकि वे वर्ण-व्यवस्था का हिस्सा हैं।
समान रंग/रूप‘समान वर्ण’ का अर्थ है एक जैसा रंग या समान गुण-धर्म वाला।
समान अक्षर (व्याकरण)संस्कृत व्याकरण (पाणिनी) में, जिन अक्षरों का उच्चारण स्थान और प्रयत्न समान होता है, उन्हें ‘सवर्ण’ (Homogeneous) कहा जाता है (जैसे ‘अ’ और ‘आ’)।

शूद्र भी यदि सवर्ण है तो आगे क्या करे ?

शास्त्रों के अनुसार, “सवर्ण” वह है जो चातुर्वर्ण्य व्यवस्था (चारों वर्णों) के भीतर आता है अर्थात किसी न किसी एक वर्ण को धारण करता हो । आधुनिक समय में भले ही इसका विद्वेषात्मक प्रयोग केवल द्विज जातियों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) के लिए होने लगा हो, लेकिन प्राचीन स्मृति और पुराणों के अनुसार शूद्र भी सवर्ण (वर्ण सहित) की श्रेणी में ही आते थे, क्योंकि वे व्यवस्था का चौथा अनिवार्य अंग थे।

सवर्णा से विवाह का सिद्धांत शूद्र वर्ण के लिए भी है और इस प्रकार शूद्र भी सवर्ण ही सिद्ध होते हैं। किन्तु वर्णसंकर किसी वर्ण में नहीं आते और उनके लिये अवर्ण शब्द का भी प्रयोग नहीं किया गया है अपितु वर्णशंकर शब्द ही प्रयुक्त हुआ है तथापि सवर्णों में नहीं गिने जा सकते और उनके लिये इस व्यवस्था से बहिर्गत अनेकानेक जाति और कर्म व्यवस्था का प्रावधान मिलता है।

ये जो कुछ स्वघोषित राष्ट्रवादी जाति व्यवस्था को अंग्रेजों या मुगल आक्रांताओं का कुकर्म सिद्ध करते रहते हैं वो स्वयं में ही हास्यास्पद है। स्मृतियों – पुराणों में इसके पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध हैं।

जब शूद्र को यह ज्ञात हो जाये कि वह भी सवर्ण ही है, उसे भी आत्मकल्याण का अधिकार है, शास्त्रों में उसके लिये भी धर्माचरण का विधान है तो वह स्वधर्म में स्थित हो जाये। यदि दिग्भ्रमित होकर उसने अपने वर्णोचित कर्मों का परित्याग कर दिया था, तो सर्वप्रथम उसके लिये प्रायश्चित्त करे और प्रायश्चित्त के लिये अपने आस-पास के विद्वान ब्राह्मणों की आज्ञा ले।

ब्राह्मण-विरोध: विवेक के मार्ग को अवरुद्ध करना

ध्यान देने का विषय यह है कि शास्त्रीय दृष्टिकोण से ब्राह्मण का विरोध करना, ब्राह्मणों से द्वेष करना भी पाप है और नरक भेजने वाला कुकर्म है। इसलिये दुष्ट नेताओं और वामपंथियों ने जो ब्राह्मणद्वेष का विष बोया है उसको भलीभांति त्यागे। ये दुष्ट नेता और वामपंथी स्वयं तो नरकगामी हैं ही एवं निजी स्वार्थ के कारण जनमानस को भी दिग्भ्रमित करके नरकगामी बना रहे हैं, इनसे दूरी रखें अथवा पहले इनकी ही क्लास ले लें ?

ब्राह्मण-विरोध: विवेक के मार्ग को अवरुद्ध करना

क्योंकि इन्होंने उन सवर्ण शूद्रों के साथ छल किया है, प्रपञ्च किया है, विश्वासघात करके नरक ले वाले मार्ग में धकेल दिया है। उनकी अच्छी क्लास लो कि तुम स्वयं नरकगामी हो तो रहो किन्तु मुझे क्यों इस मार्ग में धकेला, मुझे शास्त्र और ब्राह्मण से द्वेष करना क्यों सिखाया ?

“ब्राह्मण वह सेतु है जो व्यक्ति को उसके कर्तव्यों (Dharma) और शास्त्रों के ज्ञान से जोड़ता है।”

आत्मकल्याण का मार्ग: प्रायश्चित्त और स्वधर्म

विद्वान ब्राह्मण के उपदेश से प्रायश्चित्त करके फिर स्वधर्म का ज्ञान प्राप्त करो, कर्तव्याकर्तव्य के संबंध में ज्ञान प्राप्त करो, आत्मकल्याण कैसे हो इसका प्रयास करो न कि दुष्ट और नरकगामी, कुकर्मी नेताओं का अनुसरण करो – “धर्मो रक्षति रक्षितः” यदि धर्म की रक्षा करोगे तो ही रक्षित होओगे, नेताओं के राजनीति की रक्षा करके नहीं।

आत्मकल्याण का मार्ग
आत्मकल्याण का मार्ग

समाधान: संघर्ष का अंत ‘सवर्ण’ होने के गौरव को पुनः प्राप्त करने में है। जब समाज के चारों अंग (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) स्वयं को एक ही व्यवस्था का ‘सवर्ण’ अंग मानेंगे, तभी गृहयुद्ध की आशंका समाप्त होगी।

निष्कर्ष

“अंततः, यह स्पष्ट है कि ‘सवर्ण’ कोई भेदभावपूर्ण शब्द नहीं, बल्कि एक व्यवस्था का नाम है जिसमें ब्राह्मण से लेकर शूद्र तक, चारों वर्ण गौरवशाली सदस्य हैं। हमें उस राजनैतिक और वामपंथी विष, कुकर्मी नेताओं की घृणित राजनीति को पहचानना होगा जो हमें अपनों से ही लड़वा रहा है। जब तक हम शास्त्रों की शरण में नहीं जाएंगे और ब्राह्मण के मार्गदर्शन में अपने ‘स्वधर्म’ को नहीं पहचानेंगे, तब तक हम इन दुष्ट नेताओं के हाथों की कठपुतली बने रहेंगे। जागो सवर्णों (चारों वर्णों), और अपने गौरवशाली अतीत को पहचानकर राष्ट्र निर्माण में जुट जाओ!”

सवर्ण विमर्श: भ्रम और यथार्थ (FAQ)

FAQ

प्रश्न १: यदि शूद्र भी ‘सवर्ण’ है, तो आज उसे सवर्ण क्यों नहीं माना जाता?

उत्तर: यह विशुद्ध रूप से आधुनिक राजनीति और ‘बाँटो और राज करो’ की नीति का दुष्परिणाम है। शास्त्रों (मनुस्मृति १०.४-५) के अनुसार, जो भी चतुर्वर्ण्य का हिस्सा है, वह सवर्ण है। राजनीति ने ‘सवर्ण’ शब्द को केवल ‘सामान्य वर्ग’ (General Category) तक सीमित कर दिया है ताकि शेष समाज को उनके सांस्कृतिक मूल से काटकर उन्हें वोटबैंक बनाया जा सके।

प्रश्न २: क्या ‘सवर्ण’ होने का अर्थ ‘ऊँची जाति’ का होना है?

उत्तर: बिल्कुल नहीं। ‘सवर्ण’ का अर्थ ऊँच-नीच नहीं, बल्कि ‘व्यवस्था के भीतर होना’ है। जैसे शरीर का हर अंग (हाथ, पैर, मुख) महत्वपूर्ण है और शरीर का हिस्सा है, वैसे ही चारों वर्ण समाज के अंग होने के कारण सवर्ण हैं। सवर्ण होने का अर्थ है—संस्कारों और मर्यादाओं के अनुशासन को स्वीकार करना।

प्रश्न ३: क्या कोई ‘सवर्ण’ से ‘अवर्ण’ (जाति-बाहर) हो सकता है?

उत्तर: हाँ, शास्त्रों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति अपने वर्णोचित कर्तव्यों का त्याग कर देता है तो उसका पतन हो जाता है और वह पतित कहलाता है। नास्तिक हो जाता है या कुलघाती कर्म (जैसे वर्णसंकर पैदा करना) करता है, तो वह पतित होकर अपनी सवर्ण संज्ञा खो सकता है। इसीलिए गीता में कुल-धर्म की रक्षा पर बल दिया गया है।

प्रश्न ४: ब्राह्मणों का विरोध करने से ‘सवर्ण एकता’ को क्या खतरा है?

उत्तर: ब्राह्मण समाज का ‘मस्तिष्क’ और ‘विवेक’ है। ब्राह्मणों का विरोध वास्तव में उस ज्ञान और शास्त्र का विरोध है जो हमें हमारे कर्तव्यों का बोध कराते हैं। यदि मस्तिष्क ही काट दिया जाए, तो शरीर (बाकी समाज) दिशाहीन होकर विनाश की ओर बढ़ेगा। यही कारण है कि षड्यंत्रकारी सबसे पहले ब्राह्मणों को निशाना बनाते हैं।

प्रश्न ५: ‘अवर्ण’ वास्तव में कौन हैं?

उत्तर: शास्त्रीय दृष्टि से ‘अवर्ण’ वे हैं जो भारत की वर्ण-व्यवस्था और वैदिक जीवन पद्धति को नहीं मानते, इसका परित्याग कर चुके हैं, वर्णधर्म से भ्रष्ट हो गये हैं, (जैसे म्लेच्छ, अ-धार्मिक या वे जो पूर्णतः संस्कारों से रहित हैं)। जो हिन्दू अपनी जाति या वर्ण को पहचानता है और शास्त्र और शास्त्रीय परंपरा का पालन करता है, वह अवर्ण नहीं हो सकता।

प्रश्न ६: ब्राह्मण-विरोध से अंततः किसका नुकसान है?

उत्तर: ब्राह्मण वह ‘चेतावनी’ है जो समाज को पतन से बचाती है, वह प्रकाश है जो अंधेरे में भी मार्ग दर्शाती है। यदि ब्राह्मण को अपमानित कर चुप करा दिया जाएगा, तो समाज को शास्त्र और अधर्म के बीच का अंतर बताने वाला कोई नहीं बचेगा। इससे अंततः उन जातियों का सबसे अधिक नुकसान होगा जिन्हें ‘पिछड़ा’ , ‘दलित’ आदि कहकर उकसाया जा रहा है, क्योंकि वे अपने वास्तविक मार्गदर्शक से भटक जाएंगे।

प्रश्न ७: यदि शूद्र सवर्ण है, तो क्या उसे भी जनेऊ (यज्ञोपवीत) और वेदमंत्रों का अधिकार है?

उत्तर: ‘सवर्ण’ होने का अर्थ ‘एक समान अधिकार’ होना नहीं, बल्कि ‘एक समान व्यवस्था’ का हिस्सा होना है। जैसे एक सेना में ‘सैनिक’ और ‘सेनापति’ दोनों सवर्ण (वर्दीधारी) हैं, पर दोनों के कर्तव्य और अधिकार भिन्न हैं। शूद्र सवर्ण है क्योंकि वह वर्ण-मर्यादा का पालन करता है, लेकिन उसके लिए ‘पुराणोक्त’ और ‘तांत्रोक्त’ विधि से आत्मकल्याण का मार्ग बताया गया है। सवर्ण होने का गौरव उसके ‘अधिकारों’ के संघर्ष में नहीं, बल्कि उसके ‘स्वधर्म’ की गरिमा में है।

प्रश्न ८: क्या आज की जातियों को प्राचीन वर्णों से जोड़ना संभव है?

उत्तर: राजनीति ने जातियों को हज़ारों टुकड़ों में बाँट दिया है, लेकिन शास्त्र कहते हैं कि मूलतः हम सब किसी न किसी ‘गोत्र’ और ‘वंश’ से जुड़े हैं। यदि कोई व्यक्ति अपने पैतृक कर्म, संस्कार और कुल-मर्यादा को पहचानता है, तो वह स्वतः ही चारों वर्णों में से एक का सदस्य (अर्थात सवर्ण) सिद्ध हो जाता है। जो अपनी जड़ों को नहीं पहचानता, वही दिग्भ्रमित होकर ‘अवर्ण’ या ‘वर्ग-संघर्ष’ का हिस्सा बनता है।

प्रश्न ९: आधुनिक राजनीति में ‘सवर्ण’ शब्द का प्रयोग गाली की तरह क्यों किया जाता है?

उत्तर: यह मनोवैज्ञानिक युद्ध (Psychological Warfare) का हिस्सा है। जब आप किसी शब्द को ‘शोषक’ या ‘बुरा’ घोषित कर देते हैं, तो उस वर्ग के लोग आत्मग्लानि (Guilt) में जीने लगते हैं। आपके आलेख का उद्देश्य इसी आत्मग्लानि को समाप्त कर ‘सवर्ण’ शब्द को पुनः उसकी शास्त्रीय प्रतिष्ठा दिलाना है। जब शूद्र भी स्वयं को गर्व से सवर्ण कहेगा, तो “सवर्ण-विरोधी राजनीति” का आधार ही समाप्त हो जाएगा।

यदि आज का शूद्र स्वयं को ‘सवर्ण’ के रूप में पहचान ले, तो जातिगत वैमनस्य की राजनीति करने वालों की दुकान बंद हो जाएगी। इसीलिए उन्हें “दलित” या “पिछड़ा” जैसे राजनैतिक शब्दों में उलझाकर रखा जाता है, ताकि वे अपने ‘स्वधर्म’, ‘शास्त्र’ और ‘ब्राह्मणों’ (विवेक के स्रोत) से दूर रहें।

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कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।


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