नारी सशक्तिकरण : नारी ही शक्ति है, उसे सशक्त करना विरोधाभास है

नारी सशक्तिकरण : नारी ही शक्ति है, उसे सशक्त करना विरोधाभास है नारी सशक्तिकरण : नारी ही शक्ति है, उसे सशक्त करना विरोधाभास है

“शक्ति को ‘सशक्त’ करना अज्ञान है, और जो पुरुष से ‘महान’ थी उसे ‘समान’ बनाना उसका अपमान है।”

“नारी सशक्तिकरण” का विरोधाभास : यह एक अत्यंत क्रांतिकारी और शास्त्रीय सिद्धांतों के आधार सत्य विचार है। जब हम कहते हैं कि “नारी स्वयं ‘शक्ति’ है”, तो “नारी सशक्तिकरण” (Women Empowerment) शब्द अपने आप में एक विरोधाभास (Paradox) प्रतीत होने लगता है। शक्ति को किसी अन्य द्वारा ‘सशक्त’ करना वैसा ही है जैसे सूर्य को दीपक दिखाकर उसे प्रकाश देने की चेष्टा करना। हम इस विरोधाभास एवं इसके पीछे के गूढ़ शास्त्रीय और व्यावहारिक कारणों को यहां समझने का प्रयास करेंगे।

क्या स्त्री का ‘पुरुष’ बन जाना ही प्रगति है, या स्त्री का ‘देवी’ बने रहना समाज के लिए अधिक कल्याणकारी है?

क्या हम सुरक्षा के नाम पर नारी को उसके सबसे सुरक्षित दुर्ग ‘निज-धर्म और गृह’ से बाहर लाकर उसे और अधिक असुरक्षित नहीं कर रहे?

प्रश्नों के उत्तर जानने के लिये आलेख को अंत तक पढ़ें

“शक्ति को सशक्त करना अज्ञान है, शक्ति को नमन करना ही ज्ञान है।”

पहले यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि इस विरोधाभास को स्पष्ट करने के पश्चात् “शक्ति” की अवधारणा को ही बदलने का कुप्रयास हो, क्योंकि नेताओं की यही प्रवृत्ति बन गयी है। उनके भीतर नीति ढूंढे तो रत्ती भर न मिले अपितु ऋणात्कम दिखे किन्तु देश के कर्णधार वही लोग हैं और नीति निर्माता हैं। साथ ही वोटबैंक एक ऐसा दलदल है जिसमें कुकर्म-ही-कुकर्म होते हैं और इससे निकलना दुष्कर कार्य है।

आगे शक्ति और चेतना जैसी अवधारणायें मनगढंत रूप से कहे जायेंगे, जनमानस दिग्भ्रमित रहे इसी के लिये प्रयास किये जायेंगे। क्योंकि असत्य के बारे में एक सामान्य ही बात कही जाती है :

“एक झूठ को छुपाने के लिये सैकड़ों झूठ बोलने पड़ते हैं”

चूँकि एक असत्य अवधारणा प्रचारित की जा चुकी है “नारी सशक्तिकरण” तो इसको सत्यापित करने के लिये सैकड़ों असत्य मनगढंत कुतर्क किये जायेंगे। किन्तु हमारा उद्देश्य इस असत्य का उद्भेदन इस प्रकार से करना है कि जनमानस दिग्भ्रमित होने से बचे।

“मैं शक्ति हूँ”

मैं ‘समान’ होने की दौड़ में, अपनी ‘महानता’ खो बैठी
पुरुष बनने की चाह में, अपनी ‘दिव्यता’ खो बैठी॥

शास्त्रों ने जिसे ‘शक्ति’ कहा, महादेव से पहले पूजा
आज का समाज कहता है— “तुझसा नहीं है कोई दूजा।
बस बन जा तू पुरुष जैसी, तभी तेरा उत्थान है”,
पर सत्य तो यही है कि— यह केवल एक ‘अज्ञान’ है॥

बटुक तपता है अग्नि में, तब ‘पूज्य’ कहीं जाकर बनता
मैं तो कन्या रूप में ही ‘देवी’, यह जग मुझको नमन करता।
ममता, करुणा, धीरज मेरा— यह दुर्बलता का प्रमाण नहीं,
यही तो मेरी ‘शक्ति’ है, जिसका पुरुष को भान नहीं॥

सहनशीलता बंधन नहीं, यह ‘सृजन’ का आधार है
मर्यादा कोई बेड़ी नहीं, यह ‘सिद्धियों’ का द्वार है।
मैं ‘समान’ क्यों बनूँ किसी के, जब मैं स्वयं ही ‘प्राण’ हूँ
मैं पुरुष की परछाईं नहीं, मैं साक्षात् ‘ब्रह्माण्ड’ हूँ॥

नारी सशक्तिकरण : नारी ही शक्ति है, उसे सशक्त करना विरोधाभास है

सशक्त मुझे करोगे क्या, स्वयं ही मैं तो ‘शक्ति’ हूँ
मैं ही ‘रण’ की चंडी हूँ, और मैं ही ‘घर’ की भक्ति हूँ।
समानता के शोर में, मेरा ‘सम्मान’ न खोने दो
‘पुरुष’ मत बनाओ तुम, मुझे ‘नारी’ ही रहने दो॥

पदक्रम में सर्वोच्चता (Primacy in Status)

शास्त्रों ने नारी को पुरुष का पूरक, पुरुष का आधार माना है। पत्नी को अर्धांगिनी कहा गया है अर्थात पति स्वयं में अधूरा होता है और उसका आधा भाग पत्नी है जो उसे पूर्ण बनाती है। भारतीय विचारधारा पति कर पत्नी को दो नहीं एक मानता है। गृहस्थों के लिये पत्नी से रहित होकर किसी भी कर्म में प्रवृत्ति का विधान नहीं मिलता क्योंकि वही शक्ति है और शक्ति के बिना कोई कर्म नहीं किया जा सकता।

  • शक्ति के बिना शिव ‘शव’: तन्त्र और दर्शन का यह मूल सिद्धांत बताता है कि पुरुष (शिव) बिना नारी शक्ति के क्रियाशील नहीं हो सकता।
  • नाम की प्राथमिकता: हमारी संस्कृति में ‘सीता-राम’, ‘राधे-श्याम’, ‘लक्ष्मी-नारायण’ में स्त्री का नाम पहले आता है, जो उसके सशक्तिकरण का सबसे बड़ा प्रमाण है।

जन्मजात पूज्यता और शुचिता

नारी को सशक्त होने के लिए किसी ‘संस्कार’ की भी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती, वह जन्मना ही पूज्य होती है, देवी होती है, शक्ति होती है और कुमारी कन्या का पूजन यही सिद्ध करता है। हम उस कुमारी कन्या से भी शक्ति प्राप्ति की ही आकांक्षा रखते हैं और उसे शक्ति प्रदान नहीं कर सकते अपितु उससे शक्ति की प्राप्ति करते हैं। यही भारतीय सांस्कृतिक चेतना है जो निष्प्राण हो गया है और आज के नेता उलटी गंगा बहाने का कुप्रयास कर रहे हैं, शक्ति को ही सशक्त करने की बात कर रहे हैं।

कन्या: जन्मजात देवी और पूज्यता का प्रतीक
कन्या: जन्मजात देवी और पूज्यता का प्रतीक

सशक्तिकरण (Empowerment) शब्द का अर्थ होता है किसी को शक्ति ‘देना’ (To give power)। लेकिन शास्त्र कहते हैं कि नारी तो ‘आद्या शक्ति’ का स्वरूप है।

  • विरोधाभास: जो स्वयं समस्त ऊर्जा का स्रोत है, उसे समाज या कानून शक्ति कैसे दे सकता है?
  • सत्य: नारी को सशक्त करने की आवश्यकता ही नहीं है, अपितु स्वयं के मस्तिष्क से अज्ञानरूपी धुंध को हटाकर उससे शक्ति प्राप्त करने की आवश्यकता है।

यदि हम वास्तविकता देखें तो यही घटित होता हुआ प्रतीत भी होता है, बात इतनी सी है कि राजनीति असत्य के धरातल पर ही की जाती है। “नारी सशक्तिकरण” का विपरीत नारा गढ़कर वास्तव में नारियों को वोटबैंक बनाकर उसके सरकार बनाने की शक्ति प्राप्त की जा रही है।

“नारी को पुरुष जैसा बनाना ‘सशक्तिकरण’ नहीं, बल्कि उसकी ‘विशिष्टता’ की हत्या है।”

पुरुष ‘शक्त’ है, नारी ‘शक्ति’

तंत्र और सांख्य दर्शन के अनुसार:

  • पुरुष ‘शक्त’ (Potent) है, जिसे कार्य करने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
  • नारी ‘शक्ति’ (Energy) है, जिसके बिना पुरुष निष्प्राण है। जब हम सशक्तिकरण की बात करते हैं, तो हम अक्सर नारी को पुरुष के बराबर लाने की कोशिश करते हैं। यह विरोधाभास है क्योंकि आप ‘स्रोत’ को ‘उपकरण’ के बराबर बना रहे हैं। शक्ति को ‘शक्त’ के समान बनाना उसका उत्थान नहीं, उसकी शक्ति को सीमित करना है।
लड़का-लड़की एक समान: सम्मान, महान या अज्ञान?

‘मर्यादा’ ही वास्तविक सामर्थ्य (Power through Boundaries)

आधुनिक जगत जिसे ‘बंधन’ समझता है, शास्त्र उसे ही ‘शक्ति’ का स्रोत बताते हैं।

  • पतिव्रता धर्म और संकल्प शक्ति: सती सावित्री या अनसूया आदि सतियों का उदाहरण यह बताता है कि जब नारी अपनी ऊर्जा को ‘एकनिष्ठ’ (Focused) करती है, तो वह काल (समय) और देवताओं पर भी शासन कर सकती है।
  • गृहस्वामिनी का पद: शास्त्र कहते हैं — “गृहिणी गृहमुच्यते” (गृहिणी ही वास्तव में घर है)। सशक्तिकरण का अर्थ उसे घर से बाहर निकालना ही नहीं, बल्कि घर के भीतर उसे ‘अधिष्ठात्री’ के रूप में प्रतिष्ठित करना है।

न गृहं गृहमित्युक्तं गृहिणीगृहमुच्यते । राधांशया तया स्मृद्धं सतेजस्कं प्रशोभते॥ – लक्ष्मीनारायणसंहिता
भार्याशून्या वनसमाः सभार्याश्च गृहा गृहाः । गृहिणी च गृहं प्रोक्तं न गृहं गृहमुच्यते॥ – ब्रह्मवैवर्त पुराण
न गृहं गृहमित्याहुः गृहणी गृहमुच्यते। गृहे तिष्ठति सा यावतावत्तीर्थसमं गृहं ॥ – प्रजापति स्मृति

यदि शास्त्र को आधार स्वीकार किया जाय तो ऐसे और भी बहुत प्रमाण हैं जो गृहणी और गृह को एक दूसरे पर पूरक सिद्ध करते हैं, परस्पर आश्रित करते हैं और यदि गंभीरता से विचार करें तो गृहिणी की शक्ति गृह है एवं गृह की सिद्धि ही गृहिणी से होती है। शाब्दिक रूप से गृह शब्द के बिना गृहिणी की सिद्धि नहीं हो सकती। यहां अंततः यही सिद्ध होता है कि नारी (गृहिणी) की शक्ति सांसारिक रूप से गृह (गृहकार्य) के लिये और आध्यात्मिक रूप से पति के पूर्णत्व का हेतु है।

'मर्यादा' ही वास्तविक सामर्थ्य (Power through Boundaries)
‘मर्यादा’ ही वास्तविक सामर्थ्य (Power through Boundaries)

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः” – जहाँ नारियों की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं। यह पंक्ति तो सभी दुहराते हैं, किन्तु इसमें यह भाव भी सन्निहित है कि जो गृहणी अपने गृह में मर्यादित है उसकी पूजा अर्थात उसके आदर, सम्मान से ही वह गृह तीर्थस्वरूप हो जाता है और वहां देवता भी आनंदपूर्वक वास करते हैं।

नारी श्रेष्ठता का तात्पर्य सूर्पनखा जैसी की स्वेच्छाचारिणी की भी श्रेष्ठता से नहीं है अपितु शक्ति को धारण करने वाली अर्थात स्त्रीत्व संपन्न स्त्री की श्रेष्ठता से है। पुरुष के पुरुषत्व को सिद्ध ही स्त्री करती है और इसके लिये स्त्री को स्त्रीत्व धारण करने की आवश्यकता होती है न कि पुरुषत्व जो कि संभव भी नहीं है।

विद्या और ज्ञान

वर्तमान में विवाद इन्हीं विषयों को लेकर है और विवाद कारण विद्या व ज्ञान का पर्याय विकृत शिक्षा को समझा जाने लगा है। एक ओर तो “प्राचीन भारत में स्त्रियाँ केवल घर तक सीमित नहीं थीं” और ढेरों उदाहरण प्रस्तुत किये जाते हैं जिसमें स्त्रियों ने शास्त्रार्थ किया था।

किन्तु पुनः इस तथ्य को छुपा लिया जाता है कि शास्त्रार्थ का कारक विद्या और ज्ञान है न की विकृत शिक्षा और उक्त संदर्भ को षड्यंत्रपूर्वक विकृत शिक्षा से जोड़ दिया जाता है।

यदि हम विद्या और ज्ञान की बात करें अर्थात मूल संदर्भ को लें तो वहां पति को ही गुरु कहा गया है अर्थात विद्या और ज्ञान की प्राप्ति पति से ही करे स्कूल/कॉलेजों में नहीं यह भी स्पष्ट होता है और इससे बाल-विवाह की उपयोगिता भी सिद्ध हो जाती है जबकि विकृत शिक्षा के कारण बाल विवाह को ही प्रतिबंधित कर दिया गया है। विकृत शिक्षा ने विवाह का तात्पर्य मात्र सम्भोग क्रिया ग्रहण किया है और इसी कारण बाल विवाह को प्रतिबंधित किया गया है।

पति को जहां पत्नी का गुरु भी बताया गया है तो वहां यह दायित्व भी दिया गया है कि पत्नी सम्भोग के योग्य है अथवा नहीं इसका भी परिक्षण करे और इसी कारण सम्भोग (काम) को ऋतुकाल मात्र तक सीमित किया गया है। यदि हम शास्त्रों का अवलोकन करें तो ऋतुकाल को मैथुन का अनिवार्य शर्त कहा गया है।

अपूर्णे ऋतुकाले तु योऽभिगच्छेद्रजस्वलाम् । रेतःपाः पितरस्तस्य एवमेतन्न संशयः ॥ – वराह पुराण
देवतेव सदा पश्येत्ततः सौख्यतरं नु किम् । ऋतुकाले तु यो गच्छेन्मासेमासे च मैथुनम्॥ – वराह पुराण
ऋतुकाले तु धर्मात्मा पत्नीमुपाश्रयेत्सदा। सदोपवासी नियतः स्वाध्यायनिरतः शुचिः ॥ – ब्रह्म पुराण
ऋतुकाले तु नारीणां सेवनाज्जायते सुतः । सुतात्स्वर्गश्च मोक्षश्च हीत्येवं श्रुतिनोदना ॥ – स्कन्द पुराण
शुक्रोऽन्नाज्जायते शुक्राद्दिव्यदेहस्य संभवः। ऋतुकाले यदा शुक्रं निर्दोषं योनिसंस्थितम्॥ – शिव पुराण
ऋतुकाले तदा भुक्तं निर्दोषं येन संस्थितम् । तदा तद्वायुना स्पृष्टं स्त्रीरक्तेनैकतां व्रजेत् ॥ – भविष्य पुराण
ऋतुकाले स्वकां भार्यां गच्छतां या मनीषिणाम्। परस्त्रीभ्यो निवृत्तानां तां गतिं व्रज पुत्रक ॥ – महाभारत
अयुग्मासु पञ्चमीसप्तम्यादिषु दुहितरः । अतः पुत्रार्थी युग्मासु ऋतुकाले भार्यां गच्छेत् ॥ – मनुस्मृति

यदि हम प्रमाणों को ढूंढने लगें तो इस विषय में सहस्रों प्रमाण प्राप्त हो जायेगें। इससे दो तथ्यों की सिद्धि होती है :

  • प्रथम तो यह कि ऋतुकाल सम्भोग की अनिवार्य शर्त है और
  • द्वितीय यह कि वर्त्तमान में गर्भधारण की जो वैज्ञानिक परिभाषा गढ़ी गयी है वह मनगढंत है और शास्त्र व प्रकृति के विरुद्ध है क्योंकि कोई स्त्री (मनुष्य में ही नहीं सभी जीवों में) गर्भधारण के योग्य है अथवा नहीं इसका निर्धारक तो प्रकृति है।

किन्तु करें क्या “नारी सशक्तिकरण” की मनगढंत अवधारणा हो अथवा गर्भ की योग्यता का वैज्ञानिक निर्धारण करना, सब कुछ शैक्षणिक विकृति का ही दुष्परिणाम है। यह तथ्य ध्यातव्य है कि वर्तमान में जो भी नीति निर्धारण करने वाले हैं वो शैक्षणिक विकार से ग्रसित हैं और स्त्रियों के लिए इसी विकृत शिक्षा का नारा लगाते रहते हैं।

नारी सशक्तिकरण का मनगढंत नारा

इसका विद्या या ज्ञान से कोई संबंध ही नहीं है। इन लोगों ने जीवन का उद्देश्य अर्थसंग्रह, आर्थिक आत्मनिर्भरता, स्वतंत्र पहचान आदि ग्रहण कर लिया है। भारतीय सांस्कृतिक चेतना विलुप्त हो गयी है और “सा विद्या या विमुक्तिदा” का सिद्धांत लुप्तप्राय हो गया है।

शास्त्र के विपरीत धारा

जब कोई शास्त्रों की बात करे, सिद्धांतों की बात करे तो मान्यता, परम्परा, रूढ़िवादिता, पुरानी सोच आदि कहकर उसकी वंचना करते हैं और आधुनिकता के नाम पर धारा के विपरीत चलते हैं और लक्ष्य प्राप्ति की भी आश करते हैं जो कि संभव नहीं। सिद्धांत का तात्पर्य ही है जो प्रमाणित है, सिद्ध है किन्तु शास्त्रों से प्राप्त हो रहा है तो वो मान्यता कर परम्परा आदि कहकर वंचना का अधिकारी हो जाता है।

अरे तुम जो आधुनिकता के नाम पर नित-नूतन कुतर्क गढ़ते उसका तो न कोई सिद्धांत है, न कोई परम्परा है, न कोई मान्यता है अर्थात निराधार है। जब निराधार आधुनिकता के नाम पर सिद्धांत की अवहेलना करते हो तो तत्क्षण ही दुष्परिणाम के अधिकारी बन जाते हो, अधर्मी बन जाते हो। सबसे बड़ा सिद्धांत तो धर्मपालन का ही है जिसका सीधा तात्पर्य है “शास्त्रोक्त विधान के अनुसार जीवन-निर्वहन

इसीलिये धर्म के विषय में एक नियम यह भी है : “शास्त्रों के अनुसार दायित्व निर्वहन करना” और जैसे ही शास्त्रों की बात की जाय तो मान्यता, परम्परा आदि शब्द गढ़ लेते हो, अरे मूर्खों यही आधार है, शास्त्रों में ही सिद्धांत हैं।

सुरक्षा और गरिमा (Safety & Dignity) के संबंध में व्यापक चर्चा की जाती है किन्तु शैक्षणिक विकृति का ही दुष्परिणाम है कि ये एक ओर तो घर से बाहर सुरक्षा की बात कर रहे हैं और दूसरी ओर घर में भी असुरक्षित होने लगी है। विचार जब भी स्त्री के संबंध में सुरक्षा शब्द का प्रयोग किया जाता है तो उसका क्या तात्पर्य होता है ? आधुनिक काल में यह सुरक्षा शब्द मात्र यौन-उत्पीड़न तक केंद्रित है और उसमें भी घटना के पश्चात्, यौन-उत्पीड़न के रोकथाम अर्थात घटना के पूर्व नहीं। सुरक्षा का इससे आगे तो कोई अभिप्राय नहीं लगाया जाता है। अब सोचिये सुरक्षा का क्या इतना ही तात्पर्य हो सकता है ? इसे कहते हैं आधुनिकता जो सिद्धांतविहीन है।

इसी प्रकार गरिमा की बात करें तो गरिमा को स्वतंत्र पहचान से जोड़ दिया गया और मर्यादा की सीमा को समाप्त कर दिया गया है। स्वतंत्र पहचान और आत्मनिर्भर होना अर्थात पति को पोषण के दायित्व से मुक्त कर देना गरिमा कहा जा रहा है जिसके लिये अर्थार्जन की आवश्यकता होती है। नारी को अर्थातुर बनाया जा रहा है और अर्थातुरता के संबंध में जो सिद्धांत है वो है :

  • “अर्थस्य मूलमुत्थानमनर्थस्य विपर्ययः”
  • “अर्थोह्यनर्थस्य मूलं”
  • “अर्थातुराणां न सुहृन्न बन्धुः”

अर्थस्य मूलमुत्थानमनर्थस्य विपर्ययः – जब हम इस सिद्धांत के विरुद्ध हो जाते हैं तो वही अर्थ अनर्थ का मूल होता है।

अर्थस्य मूलं उत्थानं का तात्पर्य है और अधिक उत्थान करना न कि धन मात्र के लिये पतनोन्मुख हो जाना, क्योंकि आगे शर्त्त है “अनर्थस्य विपर्ययः” अर्थात जो अनर्थ के विपरीत हो। किन्तु जब को अर्थातुर हो जाता है तो वह अनर्थकारी कार्यों में ही प्रवृत्त होता है और इसीलिये अगला सिद्धांत है “अर्थोह्यनर्थस्य मूलं” और अंतिम परिणति होती है “अर्थातुराणां न सुहृन्न बन्धुः” अर्थात अर्थातुर का न कोई सुहृद होता है न बन्धु। अब सोचो सुरक्षा कौन करते हैं – स्वजन ही तो करते हैं। कोई भी व्यक्ति अकेले सुरक्षित नहीं होता, स्वजनों से युक्त होने पर सुरक्षित होता है।

अब सोचिये आधुनिक सोच कितना सिद्धांत विहीन है और बड़ी-बड़ी बातें भी करता है जो दिवास्वप्न ही रह जाते हैं क्योंकि निराधार होते हैं न। स्त्री को गरिमा, पहचान, आत्मनिर्भरता के लिये अर्थातुर बना दिया, अर्थातुरता ने उसे एक ओर तो अनर्थकारी कार्यों में प्रवृत्त किया और दूसरी ओर स्वजनों के सुरक्षा से रहित कर दिया, यही तो रात-दिन सभी चिल्लाते रहते हैं – स्वतंत्रता, निजता आदि। यहां वास्तविकता स्वेच्छाचारिता है स्वतंत्रता या निजता नहीं वो तो शब्द मात्र हैं क्योंकि स्वेच्छाचारिता बोल नहीं सकते। अब जब उसे अनर्थ के दलदल में झोंक दिया तो चिल्लाते हैं सुरक्षा-सुरक्षा-सुरक्षा।

अब अगला सिद्धांत “किं न कुर्वन्ति योषितः” इसकी मूल में ही अनदेखी कर दी गयी क्योंकि यदि इसकी बात करेंगे तो अपमान करना होगा न। अरे यही नियम है स्त्रियां जब तक मर्यादा में रही तब तक ही देवी हैं, शक्ति हैं, पूज्य हैं जैसे दो तटों के बीच मर्यादित नदी, जैसे ही तटों का उल्लंघन करती हैं तत्क्षण विभीषिका ला देती है। इसी प्रकार स्त्री यदि मर्यादित रहे तो पूज्य है, देवी है, शक्ति है किन्तु यदि अर्थ-गरिमा-पहचान-आत्मनिर्भरता आदि के नाम पर मर्यादा का उल्लंघन करे तो वह क्या नहीं कर सकती अर्थात अनर्थ ही अनर्थ।

इसे तो धार्मिक या आध्यात्मिक मान्यता कह देंगे, और कुतर्कों के बल पर जो नारे लगाते हैं उसका आधार क्या है किसी को नहीं ज्ञात जबकि यहां सिद्धांत है, प्रमाण है। ; जैसे :

  • लड़का लड़की एक समान
  • नारी सशक्तिकरण
  • जातिवाद मिटाओ

कोई आधार नहीं, कोई सिद्धांत नहीं और जब सैद्धान्तिक चर्चा करें तो उसकी ही वंचना। अरे अंधों तुम अपना सिद्धांत बताओ न, अपना आधार प्रस्तुत करो न। अरे हम कितना बोलें, स्वयं लोकतंत्र ही सिद्धांत विहीन है, निराधार है और जिस संविधान की सभी रट लगाते हैं उसका भी कुछ आधार नहीं अर्थात वो भी निराधार है, सिद्धांतविहीन है। यदि कोई सिद्धांत, कोई आधार है तो प्रस्तुत करो !

जैसे न्यायालय में कोई निर्णय होता है तो उसके पीछे आधार (कानून) है न, कानून के पीछे आधार रूप संविधान है न, संविधान का आधार क्या है, लोकतंत्र का आधार क्या है, सिद्धांत क्या है ? यदि आधार नहीं है तो इसका तात्पर्य है कि निराधार है, यदि सिद्धांत नहीं है तो इसका तात्पर्य है कि सिद्धांतविहीन है।

सुरक्षा और गरिमा का सिद्धांत

ये बकवास करने वाले कभी शास्त्रार्थ करने वाली स्त्रियों का उद्धरण हो प्रस्तुत कर देंगे किन्तु सिद्धांतों को नहीं स्वीकारेंगे अपितु अनर्थ के लिये प्रयोग करेंगे। जैसे शास्त्रार्थ के उदाहरण का प्रयोग शिक्षा के नाम पर अनर्थकारी है। गरिमा के नाम पर बड़ी-बड़ी सतियों का उदाहरण प्रस्तुत तो करेंगे किन्तु उसका कारण क्या है इस सिद्धांत का त्याग कर देंगे।

अरे तुम जिनको भी उदाहरण के लिये प्रस्तुत करते हो वो न तो अर्थातुर थे, न ही विद्यालय/महाविद्यालय गये थे, न ही स्वेच्छाचारिणी/दुराचारिणी थे। धर्म और मर्यादा का पालन करना मूल है जिसके कारण आज तुम उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर लेते हो और उनका उदाहरण देकर धर्म और मर्यादा की विरुद्ध व्यवहार की सिद्धि का कुतर्क रचते हो ये अनर्थ है।

सती सावित्री, अनसूया, गार्गी, मैत्रेयी और लोपामुद्रा आदि का उदाहरण तो देते हो, किन्तु धुंधली, सूर्पनखा आदि के मार्ग पर चलने के लिये, यही तो अनर्थ है। सती सावित्री, अनसूया, गार्गी, मैत्रेयी और लोपामुद्रा आदि का यदि उदाहरण दे रहे हो तो उनका अनुगमन भी करो न, सबका मूल पातिव्रत्य धर्म का पालन करना रहा है, न कि…….. पातिव्रत्य धर्म का पालन और प्रेरित करो न। इनकी पहचान, गरिमा जो भी कहो कारण धर्म और मर्यादा का पालन है न कि धनार्जन या स्वेच्छाचार।

सुरक्षा के संबंध में मात्र शारीरिक, चारित्रिक चर्चा करना अपूर्ण होता है, मानसिक भी होना अनिवार्य होता है। तुम शारीरिक रूप से एकांगी सुरक्षा की बात तो कर रहे हो किन्तु उत्तेजक दृश्य, उत्तेजक आहार, उत्तेजक विचार आदि भी पड़ोस रहे हो जो मानसिक और शारीरिक दोनों ही प्रकार से सुरक्षा त्यागने के लिये बाध्य कर देता है।

अरे धूर्तों तुमने ऐसे वातावरण का निर्माण कर दिया है कि सुरक्षित घर में भी न रहें और सुरक्षा-सुरक्षा चिल्लाते हो। वो सनातनियों के धर्म का ही प्रभाव कहीं न कहीं शेष है कि घर में सुरक्षित है, अन्य विधर्मियों को देख लो वो घर में भी सुरक्षित नहीं हैं।

कई ऐसे प्रकरण न्यायालय तक पहुंचे हैं जिसमें बेटे ने मां का, पिता ने पुत्री का भी बलात्कार किया है, भाई-बहन का तो छोड़ ही दो। एक पाकिस्तानी महिला का वीडियो भी वायरल हुआ था जिसमें उसने भाई, मामा आदि पर भी ऐसे कुकर्म का आरोप लगाया था। क्या सनातनियों को भी घर में असुरक्षित होना है ? यदि हाँ तो जिस प्रकार से आधुनिकता अपना रहे हो और तेजी से अपनाओ यदि न तो शास्त्रों की शरणागति लो, सिद्धांतो से चलो।

कहीं न कहीं ये सनातनियों के धर्म का ही सुरक्षाचक्र है जो बेटी, वहू, पत्नी, माँ घर में तो सुरक्षित है न, ये नारी सशक्तिकरण चिल्लाने वाले, लड़का-लड़की एक समान चिल्लाने वाले उस सुरक्षा चक्र से बाहर लाकर असुरक्षित करने का षड्यंत्र कर रहे हैं। क्योंकि मैं सिद्धांतविहीन, निराधार कुतर्क नहीं कर रहा हूँ इसलिये आओ समझें शास्त्रों का क्या सिद्धांत है :

सुरक्षा

सुरक्षा के विषय में शास्त्र स्पष्ट रूप से सिद्धांत देता है जो इस प्रकार है :

सर्वावस्थासु नारीणां न युक्तं स्यादरक्षणम् । तदेवानुक्रमात्कार्यं पितृभ्रातृ सुतादिभिः॥ – वेदव्यास स्मृति
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने। पुत्रो रक्षति वार्धक्ये न स्त्री स्वातंत्र्यमर्हती ॥ – मनुस्मृति
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने। पुत्रस्तु स्थविरे भावे न स्त्री स्वातंत्र्यमर्हती ॥ न स्त्री स्वातन्त्र्यं विद्यते ॥
– बौधायन स्मृति

इन प्रमाणों से यही सिद्धांत निकलता है कि स्त्री सभी अवस्थाओं (आयु-आधारित) में अरक्षित/असुरक्षित ही होती है अतः पिता, भाई, पति, पुत्र आदि उसकी सुरक्षा सदैव करे। कौमार्यावस्था में पिता और भाई, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र रक्षा करे। स्त्री को वैसी स्वतंत्रता न दे जो स्वेच्छार/दुराचार का द्वार खोलने वाला हो। यही देखने को भी मिल रहा है चाहे वह 6 माह की बच्ची हो या 80 वर्ष की वृद्धा यदि अरक्षित है तो उसके साथ दुराचार होता है और ऐसे ढेरों काण्ड समाचारों के माध्यम से ज्ञात हुये हैं।

सुरक्षा और गरिमा का सिद्धांत
सुरक्षा और गरिमा का सिद्धांत

अब बताओ तुम जो पढ़ने के लिये अकेले हॉस्टल में छोड़ देते हो, नौकरी करने के लिये अकेले छोड़ देते हो तो वो रक्षित है या अरक्षित ? यदि वो अरक्षित है तो दोषी कौन है ? अरे बलात्कार होना ही अरक्षित होने का दुष्परिणाम नहीं है, दुराचार में लिप्त होना भी अरक्षित होने का दुष्परिणाम ही है जिसकी कानून स्वतंत्रता दे रहा है।

लालनीया सदा भार्य्या ताड़नीया तथैव च । लालिता ताड़िता चैव स्त्री श्रीर्भवति नान्यथा ॥ – शंखस्मृति

और भी नारी सम्मान, गरिमा का राग अलापने वाले समझें। यहां यह सिद्धांत है कि पूज्या वो नारी है देवी हो, लक्ष्मी हो और इसका सिद्धांत है लालन और ताडन दोनों होने पर ही लक्ष्मी/देवी बनती है – “लालिता ताड़िता चैव स्त्री श्रीर्भवति नान्यथा”, ताडना को महिला उत्पीड़न भी सिद्ध करो और देवी की गरिमा भी प्राप्त करो ये संभव नहीं है। यह शर्त है कि देवी/लक्ष्मी तब बनती है जब लालन और ताडन दोनों उचित मात्रा में किया जाय। जो दुराचार की स्वतंत्रता चाहते हैं वो देवी/लक्ष्मी बनने की, उस सम्मान की आकांक्षा भी न रखें।

न स्वातन्त्र्यं कर्तव्यं कार्यं किञ्चिद्रहेष्वपि ॥ – मनुस्मृति

स्त्री स्वतंत्रतापूर्वक कोई भी कार्य न करे, सामान्य दिनचर्या के अतिरिक्त अन्य जो भी कार्य हों चाहे वो धार्मिक कृत्य ही क्यों न हो एकांत में भी स्वतंत्रतापूर्वक न करे। धन के लेन-देन की बात तो बड़ी बात है। यदि धन विषयक चर्चा करने लगें तो अनावश्यक विस्तार हो जायेगा। सामान्य रूप से कुछ बिंदुओं को स्पष्ट करना पर्याप्त होगा :

  • स्त्रीधन छह प्रकार के होते हैं जैसे माता, पिता, भाई आदि से प्राप्त, विवाह में प्राप्त, उपहार आदि – अध्यग्न्य, अध्यावह्निक, दत्तं च प्रीतिकर्मणि, मातृ प्राप्तं, भ्रातृ प्राप्तं, पितृ प्राप्तं।
  • यह स्त्री धन होता है और इसका प्रयोग तो वो करेंगी किन्तु स्वतंत्रता पूर्वक नहीं कर सकती। भर्तुराज्ञां विना नैव स्वबन्धुभ्यो दिषेद्धनं – अर्थात पति की आज्ञा के बिना वह धन किसी बन्धु को भी न दे।
  • स्त्री धन के संबंध में पति को प्रयोग की आज्ञा देने का अधिकार तो है किन्तु स्त्रीधन के प्रयोग का अधिकार पति को नहीं है। यह बहुत बड़ा विषय है क्योंकि आज जो धनार्जन करके स्त्रियां पति को प्रदान करती है अथवा घर चलाती है उसका उपभोग तो पति भी करता है और नरक का भागी बनता है। क्या पत्नी का यह कर्तव्य है कि वो पति के पतन का कारण बने या पति को पतन से बचाने का दायित्व है ?

आत्मनिर्भरता/गरिमा/आत्मसम्मान

उपरोक्त सिद्धांतों/प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि

  • ये जो वर्त्तमान में आत्मनिर्भरता/पहचान/गरिमा/आत्मसम्मान आदि कहकर स्त्री के लिये घर से बाहर जाकर अरक्षित होने का कुकर्म कराया जा रहा है यह शास्त्र विरुद्ध है।
  • स्त्री को धनार्जन करने की तो कोई आवश्यकता ही नहीं है। गरिमा/पहचान आदि धर्म और मर्यादा के पालन करने से प्राप्त होता है न कि धनार्जन करके।
  • पत्नी का दायित्व पति को पतन से बचाना है न कि पतनोन्मुख करना, स्त्रीधन का प्रयोग करने वाला पति नरकगामी बनता है अर्थात पतनोन्मुख हो जाता है।
  • स्त्री को पोषण करना पति का दायित्व होता है, परिवार का पोषण करना पत्नी का दायित्व ही नहीं है। और यह भी सिद्धांत है कि पति जितना धनार्जन करे उसी में पत्नी जीवन निर्वहन करे।

शास्त्रों के अनुसार स्त्री स्वभाव

आधुनिकता का दुष्प्रभाव तो ऐसा है कि स्वेछाचारी भी बना रहा है और यदि शास्त्र के सिद्धांत बताये जायें तो शास्त्रों की भी निंदा करने लगते हैं, कुतर्क और झूठ बोलना तो छोटी सी बात है। अब जो शास्त्रों की भी निंदा करे वो स्पष्तः नास्तिक है, नारकीय है और ऐसे नारकीय श्रेणी के लोग समूह बनाकर हो-हल्ला मचाते रहते हैं।

मनुस्मृति, रामायण आदि को स्त्री विरोधी कहते रहते हैं, इसका मूल कारण उनकी नास्तिकता है न कि मनुस्मृति-रामायण आदि ग्रन्थ स्त्रीविरोधी हैं। वो इसे स्त्रीविरोधी सिद्ध करके लोगों की धर्म और शास्त्र में आस्था पर प्रहार कर रहे हैं। आज की चर्चा में एक महत्वपूर्ण तथ्य जो है उसकी चर्चा से पूर्व इन नास्तिकों उद्भेदन आवश्यक था क्योंकि अगली चर्चा को स्त्रीविरोधी (नास्तिकों द्वारा) कहा जा सकता है।

चलस्वभावा दुःसेव्या दुर्ग्राह्या भावतस्तथा। प्राज्ञस्य पुरुषस्येह यथा वाचस्तथा स्त्रियः ॥ – महाभारत, शिवपुराण

अर्थात स्त्री स्वभाव से अत्यंत चंचल, दुःसेव्या, दुर्ग्राह्या, और मायायुक्त होती है ऐसा प्रज्ञावानों ने कहा है।

पौंश्चल्याच्चलचित्ताश्च निःस्नेहाश्च स्वभावतः। रक्षिता यत्नतोऽपीह भर्तृष्वेता विकुर्वते॥
शय्यासनं अलङ्कारं कामं क्रोधमनार्जवं । द्रोहभावं कुचर्यां च स्त्रीभ्यो मनुरकल्पयत्॥

:- मनुस्मृति

मनुस्मृति में कहा गया है कि स्त्रियां स्वभावतः चञ्चलचित्त, निःस्नेहा, और रक्षिता होने पर भी दुराचार में प्रवृत्ति रखने वाली हो सकती है। शय्या, आसन, अलंकार, काम, क्रोध, अनार्जव, द्रोह और दुश्चर्या ये सभी स्त्रियों के प्राकृतिक दोष माने गए हैं।

स्वभाव विषयक और अधिक चर्चा की आवश्यकता नहीं है, यहां स्पष्ट यह करना है कि रक्षिता होने पर भी दुराचार की प्रवृत्ति हो सकती है, ये स्वाभाविक है फिर जब अरक्षित हो जाये अर्थात स्वतंत्र हो जाये तो क्या कहा जा सकता है ? अर्थात सिद्धांत यही है कि स्त्रियों के लिये अरक्षित होने का सीधा तात्पर्य है कि जैसे नदी की बांध टूट जाये।

वो लोग तो कदापि विश्वसनीय नहीं हैं जो “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः” कहते समय शास्त्र का सम्मान करने लगते हैं और जब ये प्राकृतिक स्वभाव की बात आये तो शास्त्रों पर ही प्रश्नचिह्न लगाने लगते हैं, अस्वीकारने लगते हैं। ऐसे लोग केवल स्त्री क्यों ? अरे धूर्त केवल स्त्री नहीं जहां जिसकी चर्चा होती है वहां उसी के गुण-दोष बताये जाते हैं। शास्त्रों में सबके गुण-दोष वर्णित हैं और स्त्री के स्वाभाविक दोषों का वर्णन है तो तुम्हें आपत्ति क्या है, जब तुम नास्तिक ही हो।

यहां आलेख के सन्दर्भ के अनुकूल दोष संबंधी चर्चा का प्रमाण प्रस्तुत करना आवश्यक है तो वो भी किया जायेगा। ये दोष वाला सिद्धांत तो “नारी सशक्तिकरण” का नारा देने वाले को शास्त्र और सनातन विरुद्ध सिद्ध कर रहा है और सनातनियों का प्रच्छन्न शत्रु सिद्ध कर रहा है।

वेश्यावृत्ति नहीं दुराचार बड़ा अपराध है

उपरोक्त दोषों की सिद्धि वेश्यावृत्ति करती है और वेश्यावृत्ति भी बहुत प्राचीन काल से ही है किन्तु ये अपराध की श्रेणी में नहीं आता है। किसी अरक्षिता स्त्री के लिये जीवन निर्वहन का सरल उपाय वेश्यावृत्ति में सन्निहित होता है यह एक कड़वा सच है एवं इसके अन्य पक्ष भी हैं।

किन्तु दुराचार वो करती है जो अरक्षिता नहीं होती, चोरी-चुपके कुकर्म करती है। अपने स्वजनों के साथ विश्वासघात करती है, स्वजनों को मानसिक पीड़ा पहुंचाती है। वेश्या के तो स्वजन होते ही नहीं, वह चोरी-चुपके भी तो नहीं करती है।

तो इस प्रकार दुराचार बड़ा अपराध, पाप है न कि वेश्यावृत्ति।

किन्तु जिसने आंखों पर पट्टी बांध रखी है वो दुराचार की स्वतंत्रता दे रहा है किन्तु वेश्यावृत्ति को अपराध घोषित कर रहा है, इसीलिए तो पट्टी बांध रखी है। सिद्धांतों के अनुसार लिव-एण्ड-रिलेशनशिप दुराचार नहीं तो क्या है, विवाहिता का परपुरुषों/परस्त्रियों से संबंध दुराचार नहीं तो क्या है किन्तु इसमें सहमति होने पर इसको अपराध नहीं माना जाता क्योंकि वो स्वयं भी तो दुराचारी ही हैं न।

हां नया विषय पति को भी बलात्कारी सिद्ध करने का आ रहा है; वाह देश के कर्णधारों! वाह ! अरे चुल्लू भर पानी ढूंढ कर डूब मरो

नारी शक्तिकरण : नारी का लोकतांत्रिक उपहास

जब भी मैं “नारी सशक्तिकरण” शब्द सुनता हूँ मुझे यह नारी का लोकतांत्रिक उपहास प्रतीत होता है। इस लोकतांत्रिक उपहास के जो मुख्य बिन्दु/आधार स्पष्ट होते हैं वो इस प्रकार हैं :

  • शैक्षिक आधार (Educational Foundation): शिक्षा संबंधी तथ्य तो ऊपर स्पष्ट हो ही चुके हैं कि ये विकृत शिक्षा से जोड़ने का प्रयास है, ज्ञान का विकास नहीं।
  • आर्थिक आत्मनिर्भरता (Economic Autonomy): नारी को अपनी मौलिक दक्षताओं (जैसे हस्तशिल्प, प्रबंधन, शिक्षण) के माध्यम से आर्थिक रूप से स्वतंत्र करना। ताकि वह ‘याचक’ नहीं, बल्कि ‘पालक’ की भूमिका निभा सके। ये याचक और पालक की अवधारणा ही भारतीय संस्कृति के विरुद्ध है जो ऊपर स्पष्ट हो चुका है। स्त्री के लिये अर्थार्जन का सिद्धांत भारतीय संस्कृति के विपरीत है।
  • सुरक्षा और गरिमा (Safety & Dignity): एक ऐसा वातावरण निर्मित करना जहाँ नारी की ‘मर्यादा’ सुरक्षित रहे। बिना भय के अपनी शक्ति का विस्तार करने के लिए सुरक्षा अनिवार्य है। कितनी विसंगति है गृहिणी और गृह एक-दूसरे को सुरक्षित करते हैं, किन्तु ये गृहत्याग कराके असुरक्षित भी करता है और सुरक्षा की बात भी करता है, स्वेच्छाचारिणी भी बनाता है और गरिमा की बात भी करता है।
  • स्वास्थ्य और पोषण (Health & Nutrition): सशक्त मन के लिए सशक्त शरीर आवश्यक है। विशेषकर ‘मातृत्व’ के समय उचित पोषण प्रदान करना, क्योंकि वह आने वाली पीढ़ी की निर्माता है। इस विषय में तो हमें परिणाम प्राप्त हो रहे हैं और नए बच्चे जन्म से ही दवाओं/इंजेक्शनों पर निर्भर रहने लगे हैं, अधिकांश प्रसव के लिये उदर को चीर-फाड़ देते हैं और बात करते हैं स्वास्थ्य की। स्वास्थ्य का तात्पर्य यह है कि यदा-कदा अस्वस्थ होने पर दवा/इंजेक्शन की आवश्यकता हो न कि अस्पताल घर जैसा बन जाये। वर्त्तमान में जितने भी नवदम्पति हैं वो स्वयं सोचें क्या विवाह होते ही अस्पतालों के चक्कर नहीं लगाने लगे ?

निष्कर्ष: सम्मान की पुनर्व्याख्या

निष्कर्षतः, “नारी सशक्तिकरण” का नारा एक गहरे ‘सांस्कृतिक अज्ञान’ की उपज है। यह नारा स्त्री को अधिकार देने के स्थान पर उसकी उस नैसर्गिक दिव्यता और विशिष्टता को छीन रहा है, जो उसे पुरुष से ‘महान’ बनाती थी। शास्त्रों के अनुसार नारी स्वयं ‘शक्ति’ है, और शक्ति को किसी बाहरी माध्यम से ‘सशक्त’ करना वैसा ही है जैसे सूर्य को दीपक दिखाना।

नारी शक्तिकरण : नारी का लोकतांत्रिक उपहास
नारी शक्तिकरण : नारी का लोकतांत्रिक उपहास

सच्चा उत्थान नारी को पुरुष की ‘नकल’ बनाने में नहीं, अपितु उसके ‘स्त्रीत्व’ को सुरक्षित रखने और उसे घर की ‘अधिष्ठात्री’ (लक्ष्मी/देवी) के रूप में पुनः प्रतिष्ठित करने में है। जब तक समाज नारी को ‘वोटबैंक’ या ‘आर्थिक इकाई’ के रूप में देखेगा, तब तक ‘अर्थ’ अनर्थ का ही कारण बनेगा। वास्तविक कल्याण तभी संभव है जब हम आधुनिक कुतर्कों को त्यागकर पुनः “शक्ति को नमन” करने की उस सनातन परंपरा की ओर लौटें, जहाँ मर्यादा ही नारी का वास्तविक सामर्थ्य और सिद्धि का द्वार है।

विशेष घोषणा (Disclaimer & Critical Note) : “यह आलेख किसी आधुनिक विमर्श के प्रति द्वेषपूर्ण नहीं, बल्कि उस शाश्वत सत्य के प्रति समर्पित है जिसे राजनीति और विकृत शिक्षा की धुंध ने ढंक दिया है। हमारा उद्देश्य नारी को कमतर दिखाना नहीं, बल्कि उसे उस ‘परमोच्च’ सिंहासन पर पुनः प्रतिष्ठित देखना है, जहाँ से उसे उतारकर ‘समानता’ की धूल भरी गलियों में खड़ा कर दिया गया है।”

“यह आलेख उन लोगों के लिए है जो नारों की भीड़ में नहीं, अपितु शास्त्रों की प्रकाशपुञ्ज में सत्य को ढूंढने का साहस रखते हैं।”

“पाठकों की जिज्ञासा” (FAQs)

प्रश्न 1: शास्त्रों के अनुसार स्त्री और पुरुष में कौन अधिक महान है?

उत्तर: भारतीय शास्त्रों के अनुसार, आध्यात्मिक और नैसर्गिक दृष्टि से स्त्री पुरुष से महान है। जहाँ पुरुष (बटुक) को पूजनीय होने के लिए कठिन तपस्या और ब्रह्मचर्य की आवश्यकता होती है, वहीं कन्या जन्म से ही ‘देवी’ और ‘शक्ति’ का स्वरूप मानी गई है। उसे महान से ‘समान’ बनाना वास्तव में उसकी गरिमा को कम करना है।

प्रश्न 2: “नारी सशक्तिकरण” एक विरोधाभास क्यों है?

उत्तर: नारी स्वयं ‘शक्ति’ का पर्याय है। जो स्वयं ऊर्जा का स्रोत है, उसे समाज या कानून द्वारा ‘शक्ति प्रदान करना’ (Empowerment) एक वैचारिक विरोधाभास है। यह सूर्य को दीपक दिखाने के समान है। वास्तविक आवश्यकता शक्ति को सशक्त करने की नहीं, बल्कि नारी की नैसर्गिक महानता को पहचानकर उसे नमन करने की है।

प्रश्न 3: क्या आधुनिक समानता नारी का पतन है?

उत्तर: यदि समानता का अर्थ नारी को उसकी विशिष्टता (करुणा, ममता, मर्यादा) से दूर कर उसे पुरुष की नकल बनाना है, तो यह निश्चित रूप से पतन है। शास्त्रों के अनुसार, नारी का उत्थान उसकी ‘मर्यादा’ और ‘स्त्रीत्व’ को सुरक्षित रखने में है, न कि पुरुषोचित कठोरता और स्वच्छंदता अपनाने में।

प्रश्न 4: “अर्थोह्यनर्थस्य” का नारी सशक्तिकरण से क्या संबंध है?

उत्तर: जब नारी सशक्तिकरण का एकमात्र आधार ‘अर्थ’ (Paisa) और आर्थिक आत्मनिर्भरता को मान लिया जाता है, तो वह ‘अनर्थ’ का कारण बनता है। इससे पारिवारिक ढांचे का विघटन होता है और नारी अपनी उस ‘आध्यात्मिक पूंजी’ को खो देती है जो उसे समाज में सर्वोच्च स्थान दिलाती थी।

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कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।


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