“जिस घर में रसोई की शुद्धि और स्त्री की मर्यादा समाप्त हो गई, समझो उस कुल में म्लेच्छाचार ने प्रवेश कर लिया है।”
कालचक्र के भीषण प्रभावस्वरूप भारतीय समाज में एक ऐसी प्रवृति ने जन्म लिया है, जिसे ‘प्रगतिशीलता’ के मोहक सम्बोधन से अलंकृत किया जा रहा है, किन्तु शास्त्रीय धरातल पर यह विशुद्ध ‘म्लेच्छाचार’ सिद्ध होता है। सनातन धर्म की आधारशिला जिन शास्त्रीय सिद्धांतों पर टिकी है, उनमें वर्णित मर्यादाओं को आज ‘रूढ़िवादिता’ का लांछन लगाकर तिरस्कृत किया जा रहा है।
आधुनिक विचारधारा और पश्चिमी समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण ने मानवीय विवेक को इस सीमा तक आच्छादित कर दिया है कि शास्त्र-निषिद्ध आचरण, अभक्ष्य भक्षण और अमर्यादित जीवनशैली को ‘आधुनिकता’ का पर्याय माना जाने लगा है। यह न केवल वैयक्तिक पतन का कारण है, अपितु सम्पूर्ण सामाजिक संरचना के ध्वंस का उपक्रम है।
ये शब्द कटाक्ष जैसे लग सकते हैं किन्तु “आंखों से पट्टी उतारने के लिये हैं”, तीखे हो सकते हैं किन्तु तिरष्कार नहीं सत्यबोध कराने वाले हैं।
जागो सनातनियों … प्रगतिशीलता की पट्टी बांधकर आधुनिकता के नाम पर म्लेच्छाचार थोपा जा रहा है
“जब तक व्यक्तिगत जीवन में शास्त्रोक्त मर्यादा पुनः स्थापित नहीं होती, तब तक राष्ट्रवाद केवल एक राजनीतिक नारा है, म्लेच्छाचार के दलदल में खड़े होकर धर्म की ध्वजा नहीं थामी जा सकती।”
भारतीय मनीषा के अनुसार, धर्म का मूलाधार ऋषियों द्वारा दृष्ट वेदों के वे सत्य हैं, जिन्हें स्मृतियों ने व्यवहार में परिणत किया है। जब कोई समाज इन शास्त्र-सम्मत मर्यादाओं का परित्याग कर स्वेच्छाचार को ही जीवन का ध्येय बना लेता है, तो उसे ‘म्लेच्छाचार’ की संज्ञा दी जाती है। आधुनिकता के नाम पर थोपे जा रहे इस छद्म आचार का मूल हेतु यह है कि उन लोगों को भी जो शास्त्रों में निष्ठा रखते हैं, प्रगतिशीलता के नाम पर धर्मच्युत किया जा सके। यदि वे इसका विरोध करते हैं, तो उन्हें ‘अन्धविश्वासी’ या ‘पिछड़ा’ कहकर तिरस्कृत किया जाता है।

यह एक अत्यंत गंभीर और विचारणीय विषय है। वर्तमान समय में ‘प्रगतिशीलता’ (Progressiveness) को एक ऐसे आवरण के रूप में प्रयोग किया जा रहा है, जिसके पीछे शास्त्र-विरुद्ध आचरण और म्लेच्छाचार को बड़ी चतुराई से छिपाया गया है। जब अधर्म को ‘फैशन’ या ‘न्यू नॉर्मल’ बना दिया जाता है, तो धर्मनिष्ठ व्यक्ति के लिए भी अपनी मर्यादा बचाना कठिन हो जाता है।
यहाँ शास्त्रोक्त प्रमाणों के आधार पर यह सिद्ध किया गया है कि वर्त्तमान में प्रगतिशीलता की पट्टी बांधकर हम आधुनिक होने का जो दम्भ भर रहे हैं वो वास्तव में म्लेच्छाचार है, पतन है। म्लेच्छाचार के निवारण और धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझने हेतु मनुस्मृति का यह श्लोक अत्यन्त प्रासंगिक और आधारभूत है:
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥ (मनुस्मृति ६.९२)
इस श्लोक में वर्णित धैर्य, क्षमा, मन का दमन, चोरी न करना, बाह्य और आंतरिक पवित्रता, इंद्रियों पर नियंत्रण, बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध का अभाव—ये दस लक्षण धर्म के मूल आधार हैं। वर्तमान आधुनिकता इन्हीं दस लक्षणों के विपरीत आचरण को ‘स्वतंत्रता’ मानती है, जो वस्तुतः स्वेच्छाचार ही है जो मूलतः म्लेच्छाचार का बीजारोपण है।
म्लेच्छाचार और शास्त्र-विरुद्ध आचरण पर शास्त्रीय प्रमाण
“शास्त्रों की मर्यादा कोई बंधन नहीं, बल्कि वह तटबंध (Dam) है जो समाज को म्लेच्छाचार की बाढ़ में बहने से बचाता है।”
शास्त्रों में ‘म्लेच्छ’ शब्द का प्रयोग किसी जाति विशेष के लिए नहीं, अपितु उन समुदायों के लिए किया गया है जो वर्णाश्रम मर्यादा, शौच-विधि और यज्ञ-संस्कृति से विमुख हैं। विष्णु पुराण के अनुसार, कलियुग में म्लेच्छ राजाओं और प्रजा का बाहुल्य होगा जो असत्यवादी, अल्प-पराक्रमी और अत्यन्त क्रोधी होंगे।
विष्णु पुराण में वर्णित है: अल्पप्रसादाः सत्वस्थाः सुदुर्मर्षास्तथा। म्लेच्छाश्चाचारिणो भूपाः प्रजास्तेषां च तच्छीलाः॥ (विष्णु पुराण ६.१.३५)
अर्थात, कलियुग में सत्ता पर आसीन व्यक्ति म्लेच्छ आचरण वाले होंगे, और प्रजा भी उन्हीं के शील का अनुकरण करेगी। वर्तमान समय में जिस प्रकार पश्चिमी जीवनशैली को ही सभ्य माना जा रहा है, वह इसी ‘म्लेच्छ’ प्रवृति का विस्तार है। आधुनिक शिक्षा पद्धति ने व्यक्ति के भीतर ‘विवेक की अचेतावस्था’ उत्पन्न कर दी है, जिससे वह अपने गौरवशाली अतीत को त्यागकर म्लेच्छों के पदचिन्हों पर चलने में गर्व अनुभव करता है।
निश्चित रूप से, शास्त्रों में म्लेच्छाचार और कलयुग के दूषित आचरण को लेकर बहुत स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं। यहाँ प्रमुख स्मृति ग्रंथों और पुराणों से संदर्भ (अध्याय एवं श्लोक संख्या) सहित उद्धरण दिए जा रहे हैं, जो आधुनिक जीवनशैली के विकारों को म्लेच्छाचार सिद्ध करते हैं। संभवतः शास्त्रों के ऑउटडेटेड होने की जो बात कही गयी है वो इन्हीं संदर्भों में है ताकि शास्त्रों से इन सिद्धांतों का लोप करके म्लेच्छाचारी को भी हिन्दू सिद्ध किया जाय। स्मृति और पुराणों के माध्यम से यहाँ स्पष्ट किया गया है कि आधुनिक जीवनशैली के अंग बन चुके व्यवहार वास्तव में म्लेच्छाचार हैं:
कलि के लक्षणों का शास्त्रीय विवरण
पुराणों में कलियुग के लक्षणों का जो सूक्ष्म चित्रण किया गया है, वह वर्तमान कालखंड की ‘प्रगतिशीलता’ का वास्तविक चेहरा प्रकट करता है। विष्णु पुराण के छठे अंश के प्रथम अध्याय में महर्षि पराशर मैत्रेय जी से कहते हैं कि कलियुग में व्यक्ति के गुणों का निर्धारण केवल उसके धन से होगा ।
| कलियुग का लक्षण | शास्त्रीय सन्दर्भ | वर्तमान स्वरूप (म्लेच्छाचार) |
| धन ही कुल का प्रमाण | विष्णु पुराण ६.१ | जिस व्यक्ति के पास अधिक धन है, उसे ही गुणी और कुलीन माना जा रहा है, चाहे उसका चरित्र कितना भी पतित हो । |
| विवाह केवल समझौता | विष्णु पुराण ६.१ | विवाह अब संस्कार न रहकर केवल शारीरिक आकर्षण और कानूनी समझौता बन गया है । |
| पाखंड ही धर्म | मनुस्मृति/विष्णु पुराण | जो जितना बड़ा पाखंड रचता है, वही साधु-संत कहलाने लगता है । |
| शौच का पूर्ण अभाव | भागवत पुराण १२.२ | लोग बिना स्नान किए भोजन करते हैं और अपवित्रता को ही ‘मॉडर्निटी’ कहते हैं । |
| राजा द्वारा प्रजा का शोषण | विष्णु पुराण ६.१ | शासक प्रजा की रक्षा करने के स्थान पर केवल कर (Tax) के बहाने उनका धन लूटेंगे । |
इन लक्षणों का गहन विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि हम जिस ‘स्वतंत्रता’ और ‘प्रगति’ की ओर बढ़ रहे हैं, वह वस्तुतः कलि के द्वारा बुना गया एक मायाजाल है, जिसमें मनुष्य अपनी आध्यात्मिक पहचान खो रहा है।
आधुनिक जीवनशैली और शास्त्रीय पद्धति के ९ प्रमुख विरोधाभास
१. अभक्ष्य भक्षण और मदिरापान (खान-पान का दोष)
शास्त्रों में अन्न की शुद्धि को चित्त की शुद्धि का अनिवार्य कारण माना गया है। याज्ञवल्क्य स्मृति में विस्तार से बताया गया है कि किन पदार्थों का भक्षण करना चाहिए और किनका नहीं ।
नवान्नमद्यात्मांसं वा दीर्घमायुर्जिजीविषुः। (मनुस्मृति ४.२७)
आधुनिक प्रगतिशीलता में होटल-संस्कृति, बासी भोजन (Frozen Food), और अपवित्र स्थानों पर बने मांस-मदिरा युक्त आहार को ‘स्टेटस सिंबल’ बना दिया गया है। शास्त्रों के अनुसार, जो भोजन देवताओं को अर्पित न किया गया हो या जो कुत्ते अथवा अन्य अपवित्र जीवों द्वारा देखा गया हो, वह ‘अभक्ष्य’ है। वर्तमान में बिना स्नान किए और बिना ईश्वर को नैवेद्य अर्पित किए भोजन करना एक सामान्य म्लेच्छाचार बन गया है, जिसे आधुनिकता की पट्टी बांधकर स्वीकार कर लिया गया है।

आधुनिक युग में बाहर का खाना, तामसी भोजन और मदिरा को ‘प्रगतिशीलता’ माना जाता है, जबकि शास्त्र इसे म्लेच्छ लक्षण मानते हैं।
अव्युत्पन्नमतिश्चैव म्लेच्छभाषां तथैव च। अभक्ष्यभक्षणं चैव म्लेच्छानां लक्षणं स्मृतम्॥ — बृहस्पति स्मृति
अर्थ: जिसकी बुद्धि भ्रष्ट हो, जो म्लेच्छ भाषा बोले और अभक्ष्य भक्षण करे, वही म्लेच्छ है।
२. विवाह संस्कार बनाम स्वेच्छाचारी काम-संबंध
भारतीय परम्परा में विवाह एक ‘ऋण’ और ‘यज्ञ’ है, न कि केवल शारीरिक तृप्ति का साधन। मनुस्मृति में आठ प्रकार के विवाहों का वर्णन है, जिनमें ‘ब्रह्म विवाह’ को श्रेष्ठतम माना गया है।
एकं गोमिथुनं द्वे वा वरादादाय धर्मतः। कन्याप्रदानं विधिवदार्षो धर्मः स उच्यते॥ (मनुस्मृति ३.२९)
किन्तु आज ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ और विवाह पूर्व यौन संबंधों को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर महिमामण्डित किया जा रहा है । विष्णु पुराण की भविष्यवाणी है कि कलयुग में स्त्री-पुरुष केवल सतही आकर्षण के कारण साथ रहेंगे और परिवार का अर्थ केवल विवाह की शारीरिक सीमा तक सीमित रह जाएगा । यह शास्त्रीय दृष्टि से ‘वर्ण-संकर’ की स्थिति है, जो समाज के नैतिक पतन का बीज है। जिन्होंने राष्ट्रवाद का झंडा उठाया है पर आचरण म्लेच्छों जैसा है, उनके लिए श्रीमद्भागवत का यह श्लोक सटीक है :
स्वीकार एव चोद्वाहे पाण्डित्यं च मृषाभाषणम्। धाष्ट्र्यं पाण्डित्यं प्रकटेऽसाधुत्वे साधुता स्मृता॥
— श्रीमद्भागवत पुराण, १२वां स्कन्ध, अध्याय २, श्लोक ३-४
अर्थ: कलियुग में विवाह केवल ‘सहमति’ (Contract) होगा, पाखण्ड ही पाण्डित्य माना जाएगा और जो जितना अधिक छल-कपट करेगा, वह उतना ही बड़ा साधु कहलाएगा।
३. शारीरिक और मानसिक शौच का लोप
आधुनिकता में ‘क्लीनलीनेस’ (स्वच्छता) को केवल बाह्य चकाचौंध तक सीमित कर दिया गया है, जबकि शास्त्र ‘शौच’ (पूरी शुद्धि) पर बल देते हैं ।
अद्भिरगात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति। (मनुस्मृति ५.१०९)
अर्थात शरीर की शुद्धि जल से होती है, किन्तु मन की शुद्धि सत्य के आचरण से होती है। वर्तमान में लोग दुर्गंधनाशक रसायनों (Perfumes) का प्रयोग करके स्वयं को स्वच्छ मानते हैं, किन्तु वे स्नान और शुद्धाचमन की शास्त्रीय विधि को त्याग चुके हैं। पाराशर स्मृति के अनुसार, जो द्विज सन्ध्या-स्नान और शौच विधि का परित्याग करता है, वह पतित माना जाता है
रजस्वला मर्यादा का उल्लंघन (पारिवारिक शुद्धि का नाश)
आधुनिकता के नाम पर स्त्रियाँ ऋतुचर्या के नियमों को ‘रुढ़िवादिता’ कहकर त्याग रही हैं। सामान्य सी बात कही जाती है, विज्ञान के तराजू पर तौला जाता है और देखने में तो यह भी आया है कि वो भगवाधारी जो सत्ता द्वारा स्थापित किये गए हैं, प्रसिद्ध किये गए हैं वो “मासिकधर्म” पद में धर्म के लिये यह अर्थ करते हैं कि जब वहां धर्म पद है तो अपवित्रता कैसी ?
अरे मूढ़ जैसे ब्राह्मणधर्म पद में धर्म का तात्पर्य ब्राह्मण के धर्म (कर्तव्य/दायित्व) से है उसी प्रकार मासिकधर्म में धर्म का तात्पर्य उस विशेष कालखण्ड के विशेष नियमों से है।
कितने चिंता का विषय है कि ऐसे मूढ़ों को राष्ट्रीय स्तर की प्रसिद्धि प्रदान की गयी है। एक भगवाधारी को मैंने किसी प्रवचन में ऐसा कहते स्वयं देखा है और वो इसकी पुनर्व्याख्या, शास्त्र संशोधन की भी बात कर रहा था अर्थात उसकी शास्त्र निष्ठा तो समाप्त हो ही चुकी है अन्यों के शास्त्रनिष्ठा को भी भंग कर रहा है।
प्रथमेऽह्नि च चण्डाली द्वितीये ब्रह्मघातिनी। तृतीये रजकी प्रोक्ता चतुर्थेऽहनि शुध्यति॥
— पाराशर स्मृति, अध्याय ७, श्लोक १५
अर्थ: रजस्वला स्त्री पहले दिन चाण्डालिनी, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी और तीसरे दिन धोबिन के समान अपवित्र होती है; वह चौथे दिन स्नान के पश्चात ही शुद्ध होती है। इस मर्यादा का उल्लंघन म्लेच्छाचार है।
४. धन की प्रधानता बनाम धर्म की महत्ता
विष्णु पुराण का स्पष्ट निर्देश है कि कलियुग में जिसके पास जितना अधिक धन होगा, उसे उतना ही अधिक गुणी माना जाएगा।
विप्रत्वं सूत्रमेव हि। लिङ्गमेवाश्रमख्यातावन्योन्यापत्तिलक्षणम्॥ (भागवत पुराण १२.२.३)
आज के म्लेच्छ समाज में न्याय और कानून भी शक्ति और धन के अधीन हो गए हैं । शास्त्रीय व्यवस्था में ब्राह्मण का सम्मान उसकी विद्या से और शूद्र का सम्मान उसकी आयु से होता था, किन्तु आज धन ने सभी मानवीय मर्यादाओं को ध्वस्त कर दिया है । धर्म का स्थान अब अर्थ (धन-संग्रह) ने ले लिया है, जो कि म्लेच्छाचार का प्रबल लक्षण है ।
५. विद्या का विकृत स्वरूप और म्लेच्छ शिक्षा
वर्तमान शिक्षा पद्धति केवल ‘उदर-पूर्ति’ का साधन मात्र रह गई है। इसमें न तो आत्मिक उत्थान का कोई स्थान है और न ही सदाचार की शिक्षा । पाराशर स्मृति में अशिक्षित और आचरणहीन व्यक्ति को नाममात्र का मनुष्य माना गया है । अपनी संस्कृति और भाषा को छोड़कर म्लेच्छ भाषा के आश्रित होना पतन का कारण है। यहां भाव को इस प्रकार के उदाहरण से समझें कि एक बार सर्वोच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति द्वारा कहा गया कि “अंग्रेजी में कहो, मैं हिन्दी नहीं समझता”
यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः। यश्च विप्रोऽनधीयानस्त्रयस्ते नाम बिभ्रति॥ (पाराशर स्मृति ८.२५)
आधुनिक काल में वेदों और स्मृतियों के अध्ययन को ‘अप्रासंगिक’ मानकर केवल भौतिक विलास की तकनीक को ही शिक्षा समझा जा रहा है, जो कि म्लेच्छ विचारधारा का एक बड़ा षड्यंत्र है ।
न म्लेच्छभाषां शिक्षेत न म्लेच्छान् गन्तुमुत्सहेत्। — वसिष्ठ धर्मसूत्र, अध्याय ६, सूत्र ४१
अर्थ: न म्लेच्छ भाषा सीखनी चाहिए और न ही म्लेच्छों (संस्कारहीनों) के सान्निध्य में जाने को उत्सुक होना चाहिए।
आज तो म्लेच्छों के साथ, म्लेच्छों के द्वारा, म्लेच्छों की भाषा में ही शिक्षा दी जा रही है और ये हिन्दूराष्ट्र बन रहा है। सनातन का पुनर्जागरण हो रहा है।
अरे कैसे हो रहा है कुछ नारे ही तो लगा रहे हो, इससे अधिक कुछ कर रहे हो तो कभी मंदिर चले जाते हो, या घर में अगरबत्ती जला लेते हो। क्या कोई भी राष्ट्रवादी जो रातदिन “सनातन-सनातन” चिल्ला रहा है, शिखा-सूत्र-तिलक धारण मात्र भी करता है ? अधिकांशतः सोशलमीडिया पर दिखते हैं और प्रतिदिन आप उनको देखते हैं, कितने दिन उनके ललाट में तिलक मिलता है ?
६. अतिथि सत्कार और सामाजिक शुचिता का ह्रास
स्मृति ग्रंथों में ‘अतिथि’ को साक्षात विष्णु का रूप मानकर पूजनीय बताया गया है ।
आसनाशनशय्याभिरद्भिर्मूलफलेन वा। नास्य कश्चिद् वसेद् गेहे शक्तितोऽनर्चितोऽतिथिः॥ (मनुस्मृति ४.२९)
आधुनिक ‘फ्लैट संस्कृति’ में लोग अपने सगे माता-पिता को भी भार समझने लगे हैं, अतिथियों का सत्कार तो दूर की बात है। विष्णु पुराण में वर्णित है कि कलयुग के लोग केवल अपना पेट भरने से प्रयोजन रखेंगे और दूसरों के प्रति उनके मन में कोई दया नहीं होगी।
७. राजधर्म का पतन और कर-उत्पीड़न
प्राचीन ऋषियों ने राजा को प्रजा का रक्षक बताया था, किन्तु कलियुग के शासक केवल धन लूटने वाले होंगे।
प्रजा भक्षयिष्यन्ति करव्याजेन पार्थिवाः। (विष्णु पुराण)
आज ‘प्रगतिशीलता’ के नाम पर जनता पर अत्यधिक करों का बोझ लादकर शासक वर्ग अपनी विलासिता पूर्ण कर रहा है ।न्याय व्यवस्था इतनी जटिल और खर्चीली है कि वह निर्धन के लिए अप्राप्य है, जो कि म्लेच्छ शासकों की विशेषता है ।
८. इन्द्रिय-लोलुपता और उपभोक्तावाद
शास्त्रीय दृष्टि से इन्द्रियों का संयम ही वास्तविक पुरुषार्थ है 。
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते। तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥ (मनुस्मृति २.६७)
आधुनिक समाज ‘उपभोक्तावाद’ (Consumerism) पर आधारित है, जहाँ काम और लोभ को ही जीवन की सफलता का मापदंड माना जाता है । विज्ञापनों और आधुनिक संचार माध्यमों द्वारा अश्लीलता को घर-घर तक पहुँचाया जा रहा है, जिसे ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का नाम दिया गया है, जबकि यह विशुद्ध म्लेच्छाचार है ।
९. वर्ण-धर्म का त्याग और स्वधर्म विमुखता
प्रत्येक मनुष्य का अपना एक स्वधर्म होता है, जिसका पालन करना ही उसका श्रेय है ।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। (गीता/स्मृति वचन)
कलियुग में सभी वर्ण मर्यादाएं समाप्त हो जाएंगी और लोग अपने मूल कर्तव्यों को त्यागकर केवल अर्थ-प्राप्ति के लिए म्लेच्छों के समान व्यवहार करेंगे । आज प्रगतिशीलता के नाम पर वर्ण व्यवस्था का उपहास उड़ाया जाता है और स्वधर्म के त्याग को ‘करियर की उन्नति’ माना जाता है।
शिखा-यज्ञोपवीत का त्याग (धार्मिक पहचान का लोप)
आधुनिक दिखने के लिए धार्मिक प्रतीकों का त्याग म्लेच्छ धर्म की शरण लेना है। यद्यपि प्रतीकात्मक रूप से इस दिशा में कुछ सकारात्मक प्रयास देखने को मिल रहे हैं।
शिखाचूड़ां परित्यज्य उपवीतं च वै द्विजः। म्लेच्छधर्मं समाश्रित्य नरकं प्रतिपद्यते॥
— बृहन्नारदीय पुराण, अध्याय १४
अर्थ: जो द्विज शिखा और यज्ञोपवीत का त्याग कर म्लेच्छों के आचरण को अपनाता है, वह नरकगामी होता है।
संध्यावंदन और शुद्धि का त्याग
सन्ध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्हः सर्वकर्मसु। यदन्यत्कुरुते कर्म न तस्य फलभाग्भवेत्॥
— दक्ष स्मृति, अध्याय २, श्लोक २३
अर्थ: जो संध्या नहीं करता वह सदैव अपवित्र और म्लेच्छ के समान है, उसके द्वारा किए गए किसी भी पुण्य कार्य का फल प्राप्त नहीं होता।
भाईचारा और सांप्रदायिक सौहार्द्र का विष
म्लेच्छैः सह संस्पर्शं संलापं च विवर्जयेत्। तुल्यशौचाचारहीनान् न संवसेत् कदाचन॥
— अत्रि स्मृति, श्लोक १८३
अर्थ: जिनके शौच (पवित्रता) और आचार श्रेष्ठ नहीं हैं, ऐसे म्लेच्छों के साथ संलाप और संसर्ग का त्याग करना चाहिए।
इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि वर्तमान में जो “प्रगतिशीलता” है, वह वास्तव में शास्त्रों में वर्णित “म्लेच्छ लक्षण” ही है। म्लेच्छ केवल वह नहीं जो दूसरे के आचरण-व्यवहार में है, बल्कि वह भी है जो “आचारहीन” है। यदि कोई हिन्दू राष्ट्र की बात करता है लेकिन उसकी दिनचर्या में संध्यावंदन नहीं है, आहार की मर्यादा नहीं है, घर में ऋतुचर्या के नियमों का पालन नहीं होता, वाणी-परिधान आदि शास्त्र सम्मत नहीं है, शास्त्र में निष्ठा नहीं है तो वह केवल ‘नाम’ का हिन्दू है, ‘आचरण’ से वह म्लेच्छ ही है।
ऐसे आचरण के साथ हिन्दू राष्ट्र की कल्पना करना एक ढोंग के समान है, क्योंकि “धर्मो रक्षति रक्षितः”—धर्म की रक्षा उसके पालन से होती है, केवल नारों से नहीं।
“रूढ़िवादिता का ठप्पा लगने के भय से धर्म का त्याग कर देना, कायरता की पराकाष्ठा है।”
कलयुग के धर्म-प्रणेता: पाराशर ऋषि का निर्देश
विभिन्न युगों के लिए अलग-अलग स्मृतियाँ निर्धारित हैं। कलियुग के लिए पाराशर स्मृति को ही सर्वोच्च प्रमाण माना गया है ।
कृते तु मानवो धर्मस्त्रेतायां गौतमः स्मृतः। द्वापरे शंखलिखितः कलौ पाराशरः स्मृतः॥ (पाराशर स्मृति १.२४)
इसका अर्थ है कि सतयुग में मनु, त्रेता में गौतम, द्वापर में शंख-लिखित और कलियुग में पाराशर ऋषि के धर्म-निर्देश ही मान्य हैं । पाराशर ऋषि ने कलियुग की विषम परिस्थितियों और मनुष्यों की अल्पायु को ध्यान में रखते हुए धर्म के सरल किन्तु अनिवार्य मार्ग प्रशस्त किए हैं । वे स्पष्ट करते हैं कि इस युग में ‘दान’ ही वह सेतु है जो मनुष्य का पारलौकिक कल्याण सुनिश्चित करता है ।

पाराशर स्मृति के १२ अध्यायों में आचार और प्रायश्चित का जो विधान दिया गया है, वह आधुनिक म्लेच्छाचार से बचने का एकमात्र अचूक मार्ग है । किन्तु वर्तमान शिक्षा और विचारधारा के कारण लोग पाराशर स्मृति के इन जीवनोपयोगी सूत्रों से पूर्णतः अनभिज्ञ हैं।
आधुनिक वैचारिक षड्यंत्र का शास्त्रीय खण्डन
वामपंथी और पश्चिमी विद्वानों ने ‘प्रगतिशीलता’ के आवरण में भारतीय स्मृति-ग्रंथों का जो विकृत भाष्य प्रस्तुत किया है, वह एक गम्भीर ऐतिहासिक षड्यंत्र है । वे मनुस्मृति जैसी संहिताओं को ‘विभेदकारी’ और ‘अन्यायपूर्ण’ सिद्ध करने के लिए श्लोकों के अर्थ का अनर्थ करते हैं ।
वास्तव में, मनुस्मृति का ऋषियों का मूल अभिप्राय समाज को अनुशासित और सुव्यवस्थित करना था । उदाहरणस्वरूप, शूद्रों के नामों के विषय में जो निर्देश दिए गए, उनका उद्देश्य घृणा फैलाना नहीं, बल्कि सेवा-धर्म की सहज पहचान सुनिश्चित करना था । आधुनिक विचारधारा ने इन मर्यादाओं को ‘अधिकारों का हनन’ बताकर समाज में विद्रोह और कलह का बीजारोपण किया है ।
| आधुनिक कुतर्क | शास्त्रीय यथार्थ |
| स्मृति ग्रन्थ पुराने और अप्रासंगिक हैं। | शास्त्र ‘नित्य’ हैं, वे काल की सीमाओं से परे मानवीय प्रकृति के सत्य को उद्घाटित करते हैं । |
| खान-पान व्यक्तिगत अधिकार है। | जैसा अन्न वैसा मन; अपवित्र भोजन बुद्धि को तामसिक बनाता है और विवेक का नाश करता है । |
| आधुनिकता से ही मानवता का विकास संभव है। | बिना नैतिक मूल्यों के भौतिक विकास विनाश की ओर ले जाता है; कलियुग का विकास वस्तुतः अधर्म का विस्तार है । |
प्रगतिशीलता की पट्टी बांधकर आधुनिकता के नाम पर जो म्लेच्छाचार थोपा जा रहा है, वह वस्तुतः एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक ध्वंस का उपक्रम है। स्मृति और पुराणों के प्रमाणों से यह निर्विवाद रूप से सिद्ध होता है कि जिसे आधुनिक समाज उन्नति मान रहा है, वह कलि के प्रभाववश उत्पन्न नैतिक और धार्मिक पतन है। आहार की अशुद्धि, विवाह संस्था का विघटन, धन की लोलुपता और शास्त्रों का तिरस्कार—ये सभी एक ऐसे समाज के लक्षण हैं जो अपनी पहचान खो चुका है।
अतः प्रत्येक सनातनधर्मी का यह परम कर्तव्य है कि वह इस ‘प्रगतिशीलता’ के मायाजाल से बाहर निकलकर पाराशर स्मृति और मनुस्मृति जैसे प्रमाणिक ग्रंथों के आलोक में अपने जीवन को व्यवस्थित करे। केवल शास्त्र-मर्यादा ही वह नौका है जो हमें इस कलियुग रूपी म्लेच्छ-सागर से पार उतार कर आत्मिक शांति और सामाजिक सुव्यवस्था प्रदान कर सकती है ।
आधुनिकतावादियों का अनावरण
अंत में आधुनिकतावादियों के कुतर्कों का किञ्चित अनावरण अनिवार्य है :
आधुनिकतावादियों का एक कुतर्क होता है कि “मर्दों के बनाये इस समाज में स्त्रियां कही भी सुरक्षित नहीं हैं” और इसका खंडन शास्त्र के सिद्धांत से इस प्रकार हो जाता है कि जब स्वयं ही सुरक्षाचक्र का भेदन कर देती है तो फिर सुरक्षा की अपेक्षा कैसे करती है। शास्त्रों में सिद्धांत है कि स्त्रियों को कभी भी अरक्षित न करे किन्तु स्वतंत्रता की रट लगाकर पारिवारिक सुरक्षाचक्र का भेदन भी तो स्वयं ही करती है न। क्या आपको ये नहीं लगता कि एक ओर स्वतंत्रता का नारा लगाकर स्वेच्छाचारिता के दलदल में फंसना और दूसरी ओर असुरक्षित होने का हंगामा करना परस्पर विरोधी है।
अवश्य ही स्मरण होगा कि ये आधुनिकतावादी कुछ वर्षों पूर्व तक आतंकवाद का कारण अशिक्षा, बेरोजगारी आदि बताया करते थे, किन्तु अब जबकि डॉक्टर, इंजीनियर भी आतंकवादी निकल रहे हैं। अब न तो उसे अशिक्षित कहा जा सकता है न ही बेरोजगार। इनकी पोल-पट्टी खुल गयी न। अब फिर ये कोई नया कुतर्क गढ़ेंगे और गढ़ते ही रहेंगे किन्तु इनके पास कोई आधार तो होता ही नहीं है।
आधुनिकतावादी ईसाइयों की वाणी, परिधान, व्यवहार, जीवनशैली को थोप रहे हैं। जरा सोचिये तो सही हम सनातनी वाणी, परिधान, व्यवहार, जीवनशैली को अपनाएं तो रूढ़िवादी और ईसाइयों का अपना लें तो आधुनिक हो जाते हैं, किन्तु कैसे ?
मानसिक शुद्धि और आत्मकल्याण का प्रयास करना पिछड़ापन या रूढ़िवादिता कैसे है।
निष्कर्ष
निष्कर्षतः, आज जिसे हम ‘प्रगतिशीलता’ कहकर गर्व कर रहे हैं, वह वस्तुतः हमारे सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पतन का मार्ग है। शास्त्रों में जिसे ‘म्लेच्छाचार’ कहा गया, उसे ही आज ‘आधुनिकता’ का नाम देकर महिमामंडित किया जा रहा है।
यदि हम अपने आहार, वेशभूषा, भाषा और व्यक्तिगत शुद्धि (शौच) को शास्त्रों के अनुरूप नहीं रख सकते, तो ‘हिन्दू राष्ट्र’ का नारा केवल एक खोखली राजनीतिक महत्वाकांक्षा बनकर रह जाएगा। राष्ट्र का निर्माण ईंट-पत्थरों से नहीं, बल्कि नागरिक के ‘चरित्र’ और ‘धर्म-निष्ठा’ से होता है। जब तक हम म्लेच्छाचार के इस मानसिक दलदल से बाहर नहीं निकलेंगे, तब तक वास्तविक सनातन पुनरुत्थान संभव नहीं है।

“प्रगतिशीलता का अर्थ जड़ों से कटना नहीं, बल्कि जड़ों को सींचकर ऊँचा उठना है; जो जड़ें काट दे वह प्रगति नहीं, आत्मघात है।”
भ्रम और यथार्थ (FAQ)
FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न):
प्रश्न: ‘म्लेच्छाचार’ का वास्तविक अर्थ क्या है?
उत्तर: शास्त्रों के अनुसार, म्लेच्छाचार का अर्थ केवल किसी विशेष समुदाय का आचरण नहीं, बल्कि वह जीवनशैली है जो शौच (पवित्रता), संध्यावंदन, वेदोक्त आहार और कुल-मर्यादा आदि से रहित हो।
प्रश्न: क्या आधुनिक होने का अर्थ अधर्मी होना है?
उत्तर: नहीं। आधुनिकता यदि तकनीक और सुविधा तक सीमित है तो बाधा नहीं, परंतु यदि वह शास्त्र-निषिद्ध कार्यों (जैसे अभक्ष्य भक्षण, संस्कारहीनता) को ‘प्रगतिशीलता’ कहे, तो वह अधर्म की श्रेणी में आता है।
प्रश्न: क्या शास्त्रों के नियम आज के समय में प्रासंगिक हैं?
उत्तर: बिल्कुल। जिस प्रकार प्रकृति के नियम (जैसे गुरुत्वाकर्षण) नहीं बदलते, उसी प्रकार मन और शरीर की शुद्धि के शास्त्रीय नियम भी अपरिवर्तनीय हैं। काल के अनुसार जो परिवर्तनशील होता है उसका वर्णन भी शास्त्रों में किया जा चुका है जैसे “कलिवर्ज्य प्रकरण”
प्रश्न: यदि हम शास्त्रों का पालन करते हैं, तो समाज हमें ‘पिछड़ा’ कहता है, क्या करें?
उत्तर: शास्त्रों में इसे ‘लांछना’ कहा गया है। सत्य के मार्ग पर चलने वालों को हमेशा विरोध का सामना करना पड़ता है। ‘पिछड़ा’ कहलाना म्लेच्छाचारी बनने से कहीं बेहतर है। उद्देश्य आत्मकल्याण होना चाहिये और पिछड़ा वह नहीं जो आत्मकल्याण के पथ पर अग्रसर हो अपितु वह पिछड़ा ही नहीं पतित या म्लेच्छाचारी है जो आत्मकल्याण के पथ से भ्रष्ट हो।
प्रश्न: बिना व्यक्तिगत सुधार के ‘हिन्दू राष्ट्र’ क्यों संभव नहीं है?
उत्तर: क्योंकि राष्ट्र अपनी संस्कृति का प्रतिरूप होता है। यदि राष्ट्र के लोग स्वयं म्लेच्छों जैसा आचरण करेंगे, तो वह राष्ट्र अपनी पहचान खो देगा। धर्म की रक्षा करने वालों की ही धर्म रक्षा करता है।
प्रश्न: क्या आधुनिक तकनीक का प्रयोग भी म्लेच्छाचार है?
उत्तर: नहीं, तकनीक का प्रयोग करना म्लेच्छाचार नहीं है। म्लेच्छाचार तब होता है जब तकनीक के प्रभाव में आकर व्यक्ति अपने शास्त्र-सम्मत सदाचार, शौच विधि और आहार-विहार की मर्यादाओं का परित्याग कर देता है ।
प्रश्न: कलियुग में किस स्मृति को आधार बनाना चाहिए?
उत्तर: कलियुग के लिए महर्षि पाराशर द्वारा प्रणीत ‘पाराशर स्मृति’ को ही मुख्य आधार बनाना चाहिए, क्योंकि इसमें कलयुगी मनुष्यों की सीमाओं को ध्यान में रखते हुए धर्म का सरल निरूपण किया गया है ।
प्रश्न: आधुनिक विचारधारा शास्त्रों का विरोध क्यों करती है?
उत्तर: आधुनिक विचारधारा मुख्यतः पश्चिमी उपभोक्तावाद और वामपंथी भौतिकवाद से प्रभावित है, जो मनुष्य को केवल एक आर्थिक प्राणी मानती है। जबकि शास्त्र मनुष्य को एक आध्यात्मिक इकाई मानते हैं। इसी आधारभूत भिन्नता के कारण टकराव होता है ।
प्रश्न: प्रगतिशीलता के नाम पर धर्म का खण्डन करने वालों को कैसे उत्तर दें?
उत्तर: उन्हें कुतर्कों के स्थान पर स्मृतियों और पुराणों के वास्तविक प्रमाण प्रस्तुत करने चाहिए। उन्हें यह समझाना चाहिए कि जिसे वे प्रगति कह रहे हैं, वह वस्तुतः मानवीय मूल्यों का ह्रास है, जिसका चित्रण हज़ारों वर्ष पूर्व ही हमारे ऋषियों ने कर दिया था ।
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कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।
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