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वोट दिया, अब गाय खा : मिथुन है गाय नहीं…mithun is cow or not

वोट दिया, अब गाय खा : मिथुन है गाय नहीं... वोट दिया, अब गाय खा : मिथुन है गाय नहीं...

mithun is cow or not

सनातन आर्य परम्परा में गोवंश केवल एक पशु मात्र नहीं, अपितु वह साक्षात् धर्म का विग्रह और चराचर जगत की आधारशिला है। भारतीय वाङ्मय, विशेषतः श्रुति, स्मृति और पुराणों में गोवंश की महत्ता को जिस उच्च धरातल पर स्थापित किया गया है, वह विश्व के अन्य किसी भी साहित्य में अलभ्य है। सम्प्रति, कतिपय आधुनिक विचारधाराओं, वामपंथी इतिहासविदों और पाश्चात्य दृष्टिदोष से ग्रस्त व्यक्तियों द्वारा ‘मिथुन’ (Bos frontalis) अथवा ‘गवय’ को गोवंश से पृथक सिद्ध करके उसके मांस भक्षण को वैधानिक और धार्मिक रूप से उचित ठहराने का कुप्रयास किया जा रहा है।

यह विमर्श पूर्णतः शास्त्रीय प्रमाणों, नैयायिक परिभाषाओं और ऋषियों के मूल अभिप्राय के आलोक में प्रस्तुत है, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि गोत्व की परिभाषा क्या है और शास्त्रानुसार भक्ष्याभक्ष्य का वास्तविक विधान क्या है।

Table of Contents

गावः स्वर्गस्य सोपानं गावो धन्यास्सनातनाः। गौएँ स्वर्ग प्राप्ति की प्रत्यक्ष सीढ़ी हैं और वे ही समस्त सनातन धन-समृद्धि की आधारशिला हैं ।

भाजपा से इस प्रकार जुड़ जाता है क्योंकि भाजपा नेता किरण रिजिजू का वीडियो वायरल हुआ जिसमें लिखते हैं “This is a mithun not cow 🐃 – यह गाय नहीं मिथुन है” और यह देशभर में विमर्श होने लगता है और इसी कड़ी में भाजपा सांसद और भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी का भी एक वीडियो दिखने लगता है।

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खाद्य सुरक्षा मानक (FSSAI): हाल ही में भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने मिथुन को ‘भोजन के स्रोत’ (Food Animal) के रूप में मान्यता दी है, जिससे इसके व्यावसायिक उपयोग का रास्ता साफ हुआ है। और इससे स्पष्ट होता है कि भाजपा की सनातन में कितनी आस्था है ? किन्तु अंधभक्तों को राष्ट्रवाद का ऐसा नशा चढ़ाया कि उनको कहीं भी कुछ भी सनातन के विरुद्ध नहीं दिखता अथवा उन्हें सनातन सिद्धांतों का ज्ञान ही नहीं है।

गोवंश की महत्ता

आर्यावर्तीय संस्कृति में गौ को ‘अघ्न्या’ कहा गया है, जिसका अर्थ है जिसका किसी भी काल या परिस्थिति में वध न किया जा सके। वेदों से लेकर पुराणों तक, गौ की स्तुति में सहस्त्रों श्लोक प्राप्त होते हैं जो उसकी पावनता और अवधित्व की घोषणा करते हैं। इस प्रतिवेदन का उद्देश्य ‘गवय’ और ‘मिथुन’ की शास्त्रीय स्थिति को स्पष्ट करना है, जो वर्तमान में राजनीतिक और सामाजिक वितण्डा का केंद्र बने हुए हैं।

शास्त्रीय दृष्टि से जब हम किसी पशु के भक्षण या रक्षण की चर्चा करते हैं, तो हमें ‘जाति’ और ‘लक्षण’ के सिद्धांतों को समझना अनिवार्य होता है। न्याय दर्शन के अनुसार, किसी भी पदार्थ का बोध उसके लक्षणों के आधार पर होता है। यदि किसी पशु में गोत्व के लक्षण घटित होते हैं, तो वह ‘गौ’ की श्रेणी में ही परिगणित होगा, चाहे उसे स्थानीय भाषा में किसी भी नाम से पुकारा जाए।

शास्त्रीय सूत्र एवं घोषणा

गोवंश की सर्वव्यापकता और पूजनीयता के सन्दर्भ में ऋग्वेद का यह मन्त्र अत्यन्त प्रासंगिक है:

माता रुद्राणां दुहिता वसूनां स्वसादित्यानां अमृतस्य नाभिः। प्र नु वोचं चिकितुषे जनाय मा गामनागामदितिं वधिष्ट॥ (ऋग्वेद ८.१०१.१५)

इस मन्त्र में गौ को रुद्रों की माता, वसुओं की पुत्री, आदित्यों की बहन और अमृत का केंद्र (नाभि) कहा गया है। ऋषि स्पष्ट निर्देश देते हैं कि उस निरपराध और अदिति (अखण्डनीय) गौ का वध मत करो। यहाँ ‘अदिति’ शब्द का प्रयोग गौ की अखण्डनीयता और दिव्यता को सिद्ध करता है। यह निर्देश केवल एक विशिष्ट गाय के लिए नहीं, अपितु उस सम्पूर्ण गो-जाति के लिए है जो सृष्टि के पोषण का आधार है।

गोत्व का शास्त्रीय लक्षण: न्याय एवं वैशेषिक दृष्टि

किसी भी जीव को ‘गौ’ की संज्ञा देने के लिए नैयायिकों ने अत्यन्त सूक्ष्म लक्षणों का निर्धारण किया है। ‘गौ’ पद की शक्ति उस अर्थ में निहित है जिसमें ‘गोत्व’ जाति का वास हो।

सास्नादि लक्षण और गोत्व जाति

तर्कसंग्रह और न्याय दर्शन के अनुसार, गौ का निर्दुष्ट लक्षण ‘सास्नादिमत्त्वम्’ है। जिस प्राणी में सास्ना (गले के नीचे लटकने वाला मांस या गलकम्बल), लांगूल (पूंछ), ककुद (कूबड़), खुर और विषाण (सींग) पाए जाते हैं, उसे ‘गौ’ की संज्ञा दी जाती है ।   

न्याय शास्त्र के अनुसार, लक्षण वह होता है जो ‘अव्याप्ति’, ‘अतिव्याप्ति’ और ‘असंभव’ नामक तीन दोषों से रहित हो । गौ के सन्दर्भ में ‘सास्ना’ (Dewlap) एक ऐसा असाधारण लक्षण है जो उसे महिष (भैंस) या अश्व (घोड़ा) से पृथक करता है।

लक्षण घटकशास्त्रीय संज्ञाविवरण एवं तात्त्विक महत्ता
सास्नागलकम्बलग्रीवा के अधोभाग में लटकती हुई त्वचा, जो केवल गोवंश में पाई जाती है 
लांगूलपुच्छगुच्छेदार बालों वाली लम्बी पूंछ, जो कीट-पतंगों से रक्षा और संतुलन हेतु होती है 
ककुदस्कन्ध-उन्नतिकन्धों के मध्य स्थित उठा हुआ भाग, जो सौर ऊर्जा के अवशोषण (सूर्यकेतु नाड़ी) का केंद्र माना जाता है 
विषाणशृंगशीर्ष पर स्थित दो सुदृढ़ सींग, जो रक्षा और ऊर्जा संवहन के उपकरण हैं 
खुरखुरद्वि-विभक्त पाद-नख, जो पृथ्वी के साथ घर्षण कम करते हैं 

यदि हम ‘मिथुन’ (Bos frontalis) या ‘गवय’ का सूक्ष्म निरीक्षण करें, तो उसमें ये सभी लक्षण पूर्णतः या अंशतः विद्यमान होते हैं। विशेषतः सास्ना और द्वि-विभक्त खुरों की उपस्थिति उसे शास्त्रीय रूप से ‘गौ’ की श्रेणी में ही रखती है।

जाति, आकृति और व्यक्ति का सम्बन्ध

नैयायिकों के अनुसार, जब हम ‘गौ’ शब्द का उच्चारण करते हैं, तो उससे तीन वस्तुओं का बोध होता है: व्यक्ति, आकृति और जाति । 

  • व्यक्ति: वह प्रत्यक्ष पिण्ड (पशु) जो हमारे सम्मुख है।
  • आकृति: उसका अवयव-संस्थान (Structure) जिसके आधार पर हम पहचानते हैं कि यह कौन सा पशु है।
  • जाति: ‘गोत्व’ जो सभी गायों में अनुगत (Common) रूप से रहता है ।   

‘गो’ पद की शक्ति ‘गोत्व’ में है। यदि मिथुन में गोत्व जाति के लक्षण (सास्ना आदि) विद्यमान हैं, तो उसे ‘गौ’ न मानना शास्त्रीय दृष्टि से ‘व्याघात’ दोष उत्पन्न करता है। व्यक्ति-शक्तिवाद के अनुसार, यदि हम प्रत्येक व्यक्ति में अलग शक्ति मानेंगे तो ‘आनन्त्य’ दोष उत्पन्न होगा । अतः, गोत्व जाति की व्याप्ति जहाँ भी होगी, वह पशु अभक्ष्य और पूजनीय होगा।

उपमान प्रमाण और गवय (मिथुन) की शास्त्रीय स्थिति

भारतीय दर्शन में ‘उपमान’ एक स्वतंत्र प्रमाण के रूप में स्वीकृत है। ‘गवय’ (जिसे आज नीलगाय या मिथुन के सदृश माना जाता है) की पहचान हेतु उपमान प्रमाण का ही आश्रय लिया जाता है 4

“यथा गौस्तथा गवयः” का विश्लेषण

न्याय सूत्र १.१.६ के अनुसार, “प्रसिद्धसाधर्म्यात् साध्यसाधनमुपमानम्” 4। जब कोई व्यक्ति वन में जाकर गाय के समान किसी पशु को देखता है, तो उसे उस ‘सादृश्य’ (Similarity) के आधार पर यह बोध होता है कि “यही वह गवय है जिसे गाय के समान बताया गया था” 4

यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि ऋषियों ने गवय की परिभाषा ‘गाय’ के माध्यम से ही दी है। यदि गवय और गाय में तात्विक भेद होता, तो उनके बीच ‘साधर्म्य’ (Similarity) का सम्बन्ध स्थापित नहीं हो सकता था।

गवय और मिथुन के मध्य सादृश्य के प्रमुख बिंदु:

  • शारीरिक बनावट: गवय की ग्रीवा, खुर और सींग गाय के समान ही होते हैं।
  • आहार: गौ के समान गवय भी पूर्णतः शाकाहारी और तृणभक्षी होता है।
  • स्वभाव: दोनों में ही अहिंसक और सौम्य प्रवृत्ति देखी जाती है।
यथा गौस्तथा गवयः

जो लोग यह कुतर्क देते हैं कि “मिथुन गाय नहीं है”, वे वास्तव में ‘संज्ञा-संज्ञी’ सम्बन्ध को नहीं समझते 5। यदि आकृति और जाति एक ही है, तो केवल नाम के बदल जाने से धर्म का स्वरूप नहीं बदल जाता। शास्त्र स्पष्ट करते हैं कि जो वस्तु पहले लिंग के साथ देखी जाती है वह प्रसिद्ध कहलाती है, और साध्य (गवय) को उस प्रसिद्ध (गौ) के आधार पर ही सिद्ध किया जाता है 6

स्मृतियों में भक्ष्याभक्ष्य का विस्तृत विवेचन

स्मृतिकारों ने मानव जीवन की शुद्धि हेतु आहार-विहार के कठोर नियम बनाए हैं। मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति में पशुओं के मांस भक्षण पर व्यापक चर्चा की गई है, जिसमें अहिंसा को ही सर्वोच्च स्थान दिया गया है 7

मनुस्मृति के अभक्ष्य पशु और मांस निषेध

मनु महाराज ने स्पष्ट रूप से उन पशुओं का उल्लेख किया है जिनका मांस भक्षण सर्वथा वर्जित है। वे कहते हैं:

योऽहिंसकानि भूतानि हिनस्त्यात्मसुखेच्छया। स जीवंश्च मृतश्चैव न क्वचित्सुखमेधते॥ (मनुस्मृति ५.४५)

जो व्यक्ति अपने सुख के लिए निरपराध प्राणियों की हत्या करता है, वह कभी सुख नहीं पा सकता। आगे मनु कहते हैं:

न कश्चित् कुरुते पापं परस्यामिषमिच्छति। यथा स कुरुते पापं भक्षयन्न्मिषमव्ययम्॥ (मनुस्मृति ५.५२)

मांस खाने वाले के समान कोई पापी नहीं है, क्योंकि वह दूसरे के मांस से अपने मांस को पुष्ट करना चाहता है। यहाँ ‘अव्ययम्’ शब्द गौ के लिए प्रयुक्त होता है, जिसका अर्थ है जिसका व्यय या विनाश न किया जा सके।

गवय और ग्राम्य-आरण्यक भेद

शास्त्रों में पशुओं के दो विभाग किए गए हैं – ग्राम्य (पालतू) और आरण्यक (जंगली)। गौ को ग्राम्य पशुओं में गिना जाता है, जबकि गवय को आरण्यक। किन्तु, भक्ष्याभक्ष्य के नियम में ‘गो-सदृश’ होने के कारण गवय का मांस भी वर्जित है।

पशु श्रेणीशास्त्रीय मर्यादाकारण
ग्राम्य गौसर्वथा अवध्यदुग्ध प्रदाता, यज्ञीय आधार
आरण्यक गवय (मिथुन)अभक्ष्यगो-सादृश्य एवं अहिंसा
पञ्चनख पशुविशेष निषेधतामसिक प्रवृत्ति कारक

मनुस्मृति ५.१८ के अनुसार, “पञ्चनखा भक्ष्याः…” अर्थात् पाँच नाखूनों वाले कुछ विशिष्ट पशुओं (जैसे खरगोश) के मांस का उल्लेख मिलता है, किन्तु उसमें ‘गवय’ या ‘गो-सदृश’ पशुओं का कहीं भी भक्षण के लिए विधान नहीं है। इसके विपरीत, गौ और उसके वर्ग के पशुओं को सदैव रक्षित रखने का आदेश दिया गया है।

कलिवर्ज्य और मांस निषेध

शास्त्रों की एक विशिष्ट विधा है ‘कलिवर्ज्य’ अर्थात् वे कर्म जो सतयुग आदि में सम्भव थे किन्तु कलियुग में वर्जित हैं। कलियुग में मांस भक्षण और पशु बलि का पूर्ण निषेध किया गया है।

अश्वमेधं गवालम्भं संन्यासं पलपैतृकम्। देवराच्च सुतोत्पत्तिं कलौ पञ्च विवर्जयेत्॥ (स्मृति चन्द्रिका)

इस प्रमाण के अनुसार, ‘गवालम्भ’ (गौ या उसके सदृश पशु की बलि) कलियुग में महापाप है। जो लोग प्राचीन काल के किसी सन्दर्भ का सहारा लेकर आज मिथुन या गौ का मांस खाने का समर्थन करते हैं, वे ‘युग धर्म’ की अवहेलना कर रहे हैं।

आधुनिक विचारधारा और ऐतिहासिक षड्यन्त्रों का शास्त्रीय प्रतिवाद

गावः पवित्रं परमं गावो मङ्गलमुत्तमम्। (स्कन्द पुराण/अनुशासन पर्व) गौएँ इस संसार में सर्वाधिक पवित्र हैं और समस्त मंगलों का मूल कारण हैं ।

वर्तमान में ‘मिथुन’ को गोवंश से पृथक बताने के पीछे दो मुख्य कारक हैं: पाश्चात्य जीवविज्ञान का वर्गीकरण और वामपंथी समाजशास्त्र।

जीवविज्ञानी बनाम शास्त्रीय वर्गीकरण

आधुनिक विज्ञान मिथुन को ‘Bos frontalis’ कहता है और गाय को ‘Bos indicus’। किन्तु शास्त्रीय दृष्टि ‘जाति’ और ‘लक्षण’ पर आधारित है। यदि किसी पशु में ‘सास्ना’ (Dewlap) है, तो वह ‘गौ’ है 2

आधुनिक कुतर्क: “मिथुन का डीएनए भिन्न है।”

शास्त्रीय प्रतिवाद: धर्म का आधार डीएनए (DNA) नहीं, अपितु ‘अभिधा’ और ‘शक्ति’ है। ‘गौ’ शब्द जिस आकृति का बोध कराता है, मिथुन उस आकृति में पूर्णतः समाहित है 2

आधुनिक तर्कशास्त्रीय खण्डनप्रमाण
यह जंगली पशु है।आरण्यक होने से अभक्ष्यता समाप्त नहीं होती।मनुस्मृति ५.१७
यह गाय से अलग दिखता है।आकृति के सूक्ष्म भेद से ‘जाति’ नहीं बदलती।न्याय सूत्र २.२.७१ 1
स्थानीय संस्कृति में इसका मांस चलता है।संस्कृति का आधार ‘आचार’ है, और आचार का आधार ‘श्रुति’ है।मनुस्मृति २.६
  • आपके समक्ष अनेकों देशों के लोग खड़े हों, आदिवासी भी हों, तो क्या आप उन सबको लोग समझेंगे या अपने समान DNA होने और दिखने पर।
  • जैसे आप सर्प की विभिन्न प्रजातियों को देखते ही पहचान जाते हैं उसी प्रकार क्या गाय को नहीं पहचान सकते ?
  • गाय की भी अनेकों प्रजातियां होती हैं और जैसे शहर के व्यक्ति से जंगल का व्यक्ति भिन्न दिखता है आकार, रंग, बोली सभी मानकों पर तो भी वह लोग है ऐसा पहचान ही जाते हैं तो गाय को कैसे नहीं पहचान सकते ?
  • विज्ञान और राजनीति को अपनी सीमा समझना अत्यावश्यक है और धार्मिक सिद्धांतों के विरुद्ध कुछ कुतर्क करके निर्णय नहीं लेना चाहिए।
  • आधुनिकता के नाम पर कुतर्कों का आश्रय लेकर धार्मिक सिद्धांतों और मान्यताओं को विवादित करना एक दुराग्रह है जो इसे म्लेच्छप्रेरित भी सिद्ध करता है।

वामपंथी ऐतिहासिक षड्यन्त्र

वामपंथी इतिहासकारों ने ‘गौघ्न’ जैसे शब्दों का अनर्थ किया है। पाणिनीय व्याकरण के अनुसार ‘गौघ्न’ का अर्थ है ‘जिसके लिए गाय का दान किया जाए’। अतिथि को ‘गौघ्न’ इसलिए कहा जाता था क्योंकि उसके आगमन पर उसे गौ दान दी जाती थी, न कि उसे गौ का मांस खिलाया जाता था। इसी प्रकार ‘अघ्न्या’ शब्द का अर्थ वेदों में २८ बार आया है, जो स्पष्ट रूप से गौ के वध का निषेध करता है।

गवय (मिथुन) के मांस भक्षण को बढ़ावा देना वास्तव में भारतीय संस्कृति की जड़ों पर प्रहार करने का एक षड्यन्त्र है, ताकि ‘गो-माता’ की अवधारणा को खंडित किया जा सके। 7 के अनुसार, पशु को मारकर खाना उसका ‘दुरुपयोग’ है, जबकि उससे प्राप्त होने वाले उत्पादों (दूध, गोमय, मूत्र) का उपयोग करना ‘सदुपयोग’ है।

मिथुन (गवय) और गो-तुल्यता की तात्विक सिद्धि

न्याय दर्शन में ‘सामान्यतोदृष्ट’ अनुमान के माध्यम से यह सिद्ध किया जाता है कि जहाँ-जहाँ गाय के लक्षण होंगे, वहाँ-वहाँ गोत्व होगा 6। मिथुन में सास्ना, ककुद और द्वि-विभक्त खुरों की उपस्थिति उसे ‘गो-वर्ग’ में स्थापित करती है।

द्रव्य और गुण का सम्बन्ध

वैशेषिक मत के अनुसार, द्रव्य वही है जिसमें क्रिया और गुण आश्रित हों 3। गौ एक ऐसा द्रव्य है जिसके दूध और अन्य उप-उत्पाद सात्विक गुणों से युक्त होते हैं। मिथुन के सन्दर्भ में भी उसके गुण गो-तुल्य ही पाए जाते हैं। अतः, जो गुण गौ में है, वही मिथुन में भी सूक्ष्म रूप से विद्यमान है।

जब हम ‘अभिधा’ शक्ति की बात करते हैं, तो ‘गौ’ कहने से जो अर्थ स्मरण में आता है, वह ‘सास्ना-लांगूल-ककुद-खुर-विषाण’ युक्त पशु है 2। मिथुन को देखने पर भी इन्हीं अवयवों का स्मरण होता है। अतः भाषाई और तार्किक दृष्टि से मिथुन ‘गौ’ ही है।

अहिंसा और सात्विक आहार

धर्मशास्त्रों का मूल उद्देश्य मनुष्य को तामसिकता से निकालकर सात्विकता की ओर ले जाना है। मांस भक्षण, चाहे वह किसी भी पशु का हो, चित्त में विक्षेप उत्पन्न करता है। 7 के अनुसार, मांसाहार मनुष्य की शारीरिक संरचना के विरुद्ध है। मांसाहारी प्राणियों के दांत और आंतें अलग होती हैं, जबकि मनुष्य के दांत और आंत शाकाहार हेतु निर्मित हैं।

यदि कोई व्यक्ति यह तर्क देता है कि “मिथुन खाने से प्रोटीन मिलता है”, तो उसे यह समझना चाहिए कि एक जीवित पशु अपने पूरे जीवन में जो खाद और पोषक तत्व कृषि को प्रदान करता है, वह उसके मांस से प्राप्त होने वाले क्षणिक पोषण से कहीं अधिक मूल्यवान है 7

शास्त्रीय निष्कर्ष एवं निर्देश

उपरोक्त सम्पूर्ण विवेचन के पश्चात निम्नलिखित शास्त्रीय निष्कर्ष निर्विवाद रूप से सिद्ध होते हैं:

१. लक्षण की प्रधानता: शास्त्रीय दृष्टि से ‘सास्ना’ (Dewlap) ही गोत्व का मुख्य लक्षण है। चूंकि मिथुन (गवय) में यह लक्षण स्पष्टतः विद्यमान है, अतः वह गोवंश का ही एक अभिन्न अंग है 1

२. उपमान प्रमाण की सत्यता: “यथा गौस्तथा गवयः” का सूत्र यह सिद्ध करता है कि गवय और गौ में तात्विक साधर्म्य है। अतः जो नियम गौ पर लागू होते हैं, वही गवय (मिथुन) पर भी लागू होंगे 4

३. मांस भक्षण का निषेध: स्मृतियों और पुराणों ने स्पष्ट रूप से गोवंश (ग्राम्य और आरण्यक दोनों) के वध और मांस भक्षण को निषिद्ध किया है। कलियुग में यह वर्जना और भी अधिक कठोर है।

४. भ्रान्तियों का निराकरण: आधुनिक जीवविज्ञान या राजनीतिक लाभ हेतु दिए गए तर्क शास्त्रीय ‘प्रमाण’ की कसौटी पर टिक नहीं सकते। शास्त्र केवल ‘प्रत्यक्ष’, ‘अनुमान’, ‘उपमान’ और ‘शब्द’ को ही प्रमाण मानते हैं, और ये चारों ही मिथुन को गो-सदृश और पूजनीय सिद्ध करते हैं 4

अतः, यह स्पष्ट है कि जो लोग मिथुन के मांस भक्षण का समर्थन करते हैं, वे न केवल शास्त्रों की आज्ञा का उल्लंघन कर रहे हैं, बल्कि वे भारतीय संस्कृति के उस मूल आधार (गोवंश) को भी क्षति पहुँचा रहे हैं जो हमारी आध्यात्मिक और आर्थिक समृद्धि का स्रोत है। गौ और मिथुन के मध्य भेद करना केवल एक ‘दृष्टिदोष’ है, जिसे शास्त्रीय ज्ञान के आलोक में दूर करना अनिवार्य है।

सनातन धर्म का प्रत्येक अनुयायी यह भली-भांति जानता है कि “गावो विश्वस्य मातरः”। इस ‘विश्व’ में वन और पर्वत भी सम्मिलित हैं, और वहाँ रहने वाला ‘गवय’ या ‘मिथुन’ भी उसी गो-माता का स्वरूप है। अतः उसकी रक्षा करना हमारा परम धर्म है।

इस प्रकार से यहां इस विमर्श का मूल विषय इस प्रकार स्थापित होता है कि हमारा विवेक ऐसा अचेत है कि आक्रांताओं के पश्चात् अब जो हमारा अगला भक्षक “संघ और भाजपा” है उसे हम अपना रक्षक मान रहे हैं। “धर्मो रक्षति रक्षितः” तो संघ भी कहता है किन्तु हम स्वयं ही इसका चिंतन नहीं कर पा रहे हैं और धर्म उसे समझ रहे हैं जो संघ समझा रहा है चाहे स्वयं या अपने स्थापित भगवाधारियों के माध्यम से।

धर्मो रक्षति रक्षितः

वोट दिया, अब गाय खा

“वोट दिया, अब गाय खा” यह ऐसी पंक्ति है जो हो सकता है न पचे, किन्तु जब सरकार मिथुन का गाय से भिन्न भक्ष्य पशु की श्रेणी में रखती है तो इसका तात्पर्य यह भी है कि आगे जिन वस्तुओं में मांस, चर्बी आदि का प्रयोग किया जाता है, उनमें मिथुन (जिसे सरकार गाय नहीं मानती) के मांस, चर्बी आदि का भी प्रयोग किया जायेगा। हिन्दू भी मांसाहारी होता है किन्तु गोमांस नहीं खाता तथापि आगे उसे यह पता भी नहीं होगा कि वो गोमांस ही खा रहा है। इस प्रकार “वोट दिया, अब गाय खा” का भाव पूर्णतः स्पष्ट हो गया।

शास्त्रीय निष्कर्ष एवं निर्देश

निष्कर्षतः, यह सिद्ध होता है कि गौ और मिथुन के मध्य भेद करना केवल एक आधुनिक ‘दृष्टिदोष’ और राजनीतिक विवशता का परिणाम है। शास्त्रों, विशेषकर न्याय और स्मृतियों में, आकृति और जाति के आधार पर मिथुन को गोवंश का ही अंग स्वीकार किया गया है। ऋषियों की वाणी में “गावो विश्वस्य मातरः” की घोषणा केवल एक विशिष्ट भूभाग या नस्ल के लिए नहीं, अपितु सम्पूर्ण गो-कुल के लिए है। अतः मिथुन का भक्षण भी उतना ही वर्जित और अधार्मिक है जितना किसी अन्य गौ का। सनातन धर्मावलम्बियों को राजनीतिक वक्तव्यों के स्थान पर ऋषियों के ‘सास्नादि लक्षण’ और ‘उपमान प्रमाण’ को ही आधार बनाना चाहिए।

भ्रम और यथार्थ (FAQ)

FAQ

प्रश्न: क्या मिथुन (गवय) को शास्त्रों में गौ माना गया है?

उत्तर : हाँ, न्याय दर्शन के ‘उपमान प्रमाण’ के अनुसार “यथा गौस्तथा गवयः” कहकर मिथुन को गौ के सदृश और उसी जाति का माना गया है।

प्रश्न: क्या राजनीतिक दल मिथुन को गौ से अलग बता रहे हैं?

उत्तर : हाँ, कतिपय राजनीतिक संगठनों द्वारा पूर्वोत्तर राज्यों में अपनी पैठ बनाए रखने और स्थानीय खान-पान की आदतों को संरक्षण देने हेतु मिथुन को गौ से भिन्न बताया जा रहा है।

प्रश्न: मिथुन के भक्षण के विषय में स्मृतियों का क्या मत है?

उत्तर : गौतम और आपस्तम्ब धर्मसूत्रों के अनुसार, गवय (मिथुन) जैसे आरण्यक पशुओं का मांस सर्वथा वर्जित है क्योंकि वे गो-कुल के अंतर्गत आते हैं।

प्रश्न: गोत्व की पहचान का मुख्य शास्त्रीय आधार क्या है?

उत्तर : शास्त्रीय आधार ‘सास्नादिमत्त्वम्’ है, अर्थात जिसमें गलकम्बल, ककुद (कूबड़) और द्वि-विभक्त खुर हों, वह गौ है।

प्रश्न: क्या विदेशी नस्ल (जैसे जर्सी) को गौ मानना चाहिए?

उत्तर : यद्यपि राजनीतिक रूप से इनमें भेद किया जा रहा है, किन्तु यदि उनमें गोत्व के मूलभूत लक्षण विद्यमान हैं, तो वे भी रक्षण के ही पात्र हैं, भक्षण के नहीं।

“श्रुतिस्मृतिपुराणानां विरोधो यत्र दृश्यते। तत्र श्रोत्रं प्रमाणं स्यात्…” (जहाँ भी विवाद हो, वहां केवल शास्त्र और श्रुति ही अंतिम प्रमाण हैं, न कि किसी नेता या संगठन का भाषण।)

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कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।


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