मेधा का निर्वासन: आरक्षण की वेदी पर सवर्णों की आहुति

मेधा का निर्वासन: आरक्षण की वेदी पर सवर्णों की आहुति मेधा का निर्वासन: आरक्षण की वेदी पर सवर्णों की आहुति

“आरक्षण की संवैधानिक विसंगतियों और आर्थिक मानदण्डों के मध्य पिसती मेधा का एक विश्लेषण।”

आधुनिक भारत के सामाजिक परिदृश्य में ‘समानता’ एक लुप्तप्राय शब्द बन गया है। जहाँ संविधान की मूल प्रस्तावना समता का आश्वासन देती थी, वहीं वर्तमान की तुष्टीकरण आधारित राजनीति ने सवर्ण समाज को एक ऐसे ‘संवैधानिक चक्रव्यूह’ में धकेल दिया है, जहाँ सवर्ण होना अभिशाप बन गया है। सरकारी आँकड़े और बढ़ता ‘बौद्धिक पलायन’ (Brain Drain) इस कटु सत्य के प्रमाण हैं कि राष्ट्र की सर्वश्रेष्ठ मेधा आज अपनी ही भूमि पर ‘अघोषित निर्वासन’ झेलने को विवश है।

नेता जब दलित, वंचित, पीड़ित आदि शब्दों का प्रयोग करते हैं तो लगता है वो जाति विशेष के लिये बात कर रहे हैं किन्तु सवर्ण युवा यह अनुभव कर रहा है कि उसके साथ संविधान और लोकतंत्र की ओट में राजनीति कैसा दुर्व्यवहार कर रही है। ये सभी शब्द वर्त्तमान में सवर्ण युवाओं को अभिव्यक्त करती है। यह वर्त्तमान भी निःसंदेह भविष्य में इतिहास बनेगा और उसमें इन शब्दों का तात्पर्य सवर्ण होंगे और शब्दों के साथ संवैधानिक शब्द भी जुड़ा होगा।

“योग्यता हमारी पहचान है, स्वाभिमान हमारा संस्कार है। हम याचना नहीं, न्याय चाहते हैं।”

प्रस्तुत आलेख भारतीय समाज के उस अंतर्द्वंद्व को चित्रित करता है, जहाँ योग्यता (Merit) और जातिगत समीकरणों के मध्य एक भीषण युद्ध छिड़ा है। संविधान की मूल भावना ‘समानता’ के स्थान पर ‘समानुपातिक प्रतिनिधित्व’ के नाम पर सवर्ण समाज को निरंतर हाशिए पर धकेला जा रहा है। चिदानन्द और रामकृष्ण के संवाद के माध्यम से यह आलेख उस सूक्ष्म पीड़ा को स्वर देता है, जो एक मेधावी युवा अपनी मातृभूमि में उपेक्षित होने पर अनुभव करता है।

मेधा का निर्वासन: आरक्षण की वेदी पर सवर्णों की आहुति

पात्र परिचय:

  • चिदानन्द शर्मा: एक मेधावी शोधार्थी (ब्राह्मण), जो शैक्षणिक उत्कृष्टा के उपरान्त भी अवसरविहीन है।
  • रामकृष्ण वर्मा: एक प्रतियोगी छात्र (क्षत्रिय), जो प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी में निरंतर विफलता और व्यवस्थागत अवरोधों से क्षुब्ध है।

आलेख के मुख्य बिंदु और सांख्यिकीय संदर्भ:

  • बौद्धिक पलायन (Brain Drain): आंकड़ों के अनुसार, भारत के शीर्ष संस्थानों (IIT/IIM) से उत्तीर्ण होने वाले सवर्ण छात्रों का एक बड़ा प्रतिशत विदेशों में बस रहा है क्योंकि घरेलू व्यवस्था में आरक्षण के कारण उनके लिए अवसर सीमित हैं।
  • आरक्षण की सीमा: यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय ने आरक्षण की अधिकतम सीमा ५०% निर्धारित की थी, परंतु वर्तमान में विभिन्न प्रावधानों के माध्यम से इसे निरंतर बढ़ाया जा रहा है, जिससे अनारक्षित वर्ग के लिए प्रतिस्पर्धा प्राणघातक हो गई है।
  • सामाजिक असंतुलन: मेधावी छात्रों का निष्कासन राष्ट्र की शोध और विकास (R&D) क्षमता को प्रभावित कर रहा है।

यह आलेख सवर्ण समाज की उस अदृश्य पीड़ा को स्वर देता है जिसे मुख्यधारा का विमर्श प्रायः उपेक्षित कर देता है। यह समाज के प्रबुद्ध वर्ग हेतु एक चिंतन का विषय है।

चिदानन्द शर्मा: “मित्र रामकृष्ण! क्या तुमने आज के समाचार-पत्रों में अंकित उन आँकड़ों का अवलोकन किया? भारतीय प्रतिभाओं का विदेशों की ओर यह ‘बौद्धिक पलायन’ (Brain Drain) मात्र एक विवशता नहीं, अपितु हमारी प्रतिभा का ‘संस्थागत निष्कासन’ है। जब ९९ प्रतिशत अंक प्राप्त करने वाला सवर्ण युवक रिक्त हस्त रह जाता है और न्यून प्राप्तांक वाला व्यक्ति आरक्षित श्रेणी के माध्यम से पदस्थ हो जाता है, तब हृदय में वज्रपात की अनुभूति होती है।”

रामकृष्ण वर्मा: “सत्य कह रहे हो चिदानन्द। यह संवैधानिक विडंबना ही है कि ‘समानता का अधिकार’ (अनुच्छेद १४-१५) जो हमें समता का आश्वासन देता था, वह अब केवल सैद्धांतिक रह गया है। सरकारी आँकड़े साक्षी हैं कि संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और अन्य राज्य स्तरीय परीक्षाओं में सवर्णों के लिए उपलब्ध ‘अनारक्षित’ पद प्रतिवर्ष संकुचित हो रहे हैं। वास्तव में, अनारक्षित श्रेणी ‘खुली श्रेणी’ होने के स्थान पर मात्र ‘अवशिष्ट श्रेणी’ बनकर रह गई है।”

चिदानन्द शर्मा: “यही तो मानसिक पीड़ा का मूल है। संविधान के अनुच्छेद १६(४) का ध्येय पिछड़ों का उत्थान था, किन्तु वर्तमान में यह सवर्णों के दमन का अस्त्र बन गया है। जब आर्थिक रूप से विपन्न सवर्ण (EWS) को भी केवल ८ लाख की आय सीमा और संकुचित भू-खंड के मानदण्डों में बांध दिया जाता है, तो उसकी निर्धनता का उपहास उड़ता है। क्या निर्धनता का कोई जातिगत स्वरूप होता है? क्या एक निर्धन ब्राह्मण की जठराग्नि किसी आरक्षित संपन्न व्यक्ति से भिन्न है?”

रामकृष्ण वर्मा: “तथ्य तो यह है कि ‘क्रीमी लेयर’ की अनुपस्थिति और आरक्षण की असीमित समय-सीमा ने सवर्ण समाज को ‘संवैधानिक रूप से उत्पीड़ित’ (Constitutionally Oppressed) वर्ग बना दिया है। सर्वोच्च न्यायालय के ‘इंद्रा साहनी’ वाद में निर्धारित ५० प्रतिशत की सीमा का भी अब अनेक राज्य उल्लंघन कर रहे हैं। इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था के कारण ही हमारे सहपाठी विदेशों का रुख कर रहे हैं। वे वहाँ की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ कर रहे हैं, क्योंकि अपनी मातृभूमि में उनकी योग्यता ‘जातिगत समीकरणों’ की भेंट चढ़ जाती है।”

चिदानन्द शर्मा: “परिश्रम और मेधा का यह तिरस्कार समाज में भयानक असंतोष उत्पन्न कर रहा है। आज का सवर्ण युवक केवल अपने पूर्वजों के तथाकथित विशेषाधिकारों का दंड भुगत रहा है। यदि योग्यता (Meritocracy) को विस्मृत कर दिया गया, तो राष्ट्र का सर्वांगीण विकास कैसे संभव है? क्या हम एक ऐसे भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ प्रतिभा का मूल्य शून्य और जाति का मूल्य सर्वोच्च होगा?”

रामकृष्ण वर्मा: “निश्चित ही। जब तक योग्यता की आहुति जातिवाद की वेदी पर दी जाती रहेगी, तब तक सवर्ण युवाओं का यह निष्क्रमण नहीं रुकेगा। यह पलायन केवल व्यक्तियों का नहीं, अपितु भारतीय मेधा और गौरव का क्षरण है।”

आर्थिक आधार पर आरक्षण की विफलता और सवर्ण संघर्ष

ईडब्ल्यूएस (EWS) आरक्षण और सवर्ण पलायन के वास्तविक संदर्भ:

  • पात्रता की विसंगति: EWS हेतु निर्धारित ८ लाख की सीमा पर सर्वोच्च न्यायालय ने भी प्रश्न उठाए थे कि क्या यह ओबीसी (OBC) क्रीमी लेयर के समान मानदण्ड अपनाकर सवर्णों के साथ न्याय कर रही है?
  • कट-ऑफ का विरोधाभास: कई राज्य स्तरीय परीक्षाओं (जैसे राजस्थान और उत्तर प्रदेश की भर्ती परीक्षाएँ) में देखा गया है कि सवर्ण निर्धन (EWS) की कट-ऑफ अन्य आरक्षित श्रेणियों से १५-२० प्रतिशत तक अधिक रहती है, जिससे आरक्षण का लाभ नगण्य हो जाता है।
  • सांख्यिकीय ह्रास: सरकारी सेवाओं में सवर्णों की भागीदारी पिछले तीन दशकों में निरंतर घटी है, जबकि निजी क्षेत्रों में भी अब आरक्षण के स्वर उठने लगे हैं, जिससे सवर्णों हेतु (अस्तित्व) का संकट उत्पन्न हो गया है।

रामकृष्ण वर्मा: “चिदानन्द, तुमने आर्थिक रूप से दुर्बल वर्ग (EWS) हेतु १० प्रतिशत आरक्षण का उल्लेख किया, किंतु क्या तुम्हें नहीं लगता कि यह सवर्णों के घावों पर नमक छिड़कने के समान है? संविधान के १०३वें संशोधन द्वारा प्रदत्त यह अधिकार व्यवहार में एक मृगतृष्णा सिद्ध हो रहा है। जहाँ अन्य वर्गों के लिए पात्रता के मानदण्ड शिथिल हैं, वहीं सवर्णों के लिए निर्धारित ‘आठ लाख की वार्षिक आय’ और ‘पाँच एकड़ कृषि भूमि’ की सीमाएँ इतनी संकीर्ण हैं कि एक सामान्य कृषक परिवार का युवक भी इससे वंचित रह जाता है।”

सामान्य वर्ग (सवर्ण) का उत्पीड़न और राजनीतिक उपेक्षा
सामान्य वर्ग (सवर्ण) का उत्पीड़न और राजनीतिक उपेक्षा

चिदानन्द शर्मा: “निश्चित ही रामकृष्ण! यह ‘प्रमाणपत्रों का मायाजाल’ है। विडंबना देखो, न्यायालयों ने समय-समय पर ‘क्रीमी लेयर’ की व्याख्या की, किंतु वह सवर्णों की सहायता करने के स्थान पर उन्हें और अधिक संकुचित कर रही है। सांख्यिकी दर्शाती है कि EWS श्रेणी के अंतर्गत आने वाले पदों की कट-ऑफ (Cut-off) कई बार अन्य आरक्षित श्रेणियों से बहुत अधिक चली जाती है। ऐसे में एक निर्धन सवर्ण युवक स्वयं को त्रिशंकु की भांति लटका हुआ पाता है—न वह संपन्न है कि सशुल्क शिक्षा प्राप्त कर सके, न वह इतना ‘आरक्षित’ है कि न्यून अंकों पर चयनित हो सके।”

रामकृष्ण वर्मा: “यही कारण है कि सवर्णों का मानसिक उत्पीड़न अब चरम पर है। सरकारी नौकरियों में रिक्तियों की संख्या निरंतर घट रही है और जो शेष हैं, वे जातिगत तुष्टीकरण की भेंट चढ़ रही हैं। क्या यह ‘संवैधानिक न्याय’ है कि पिता की पैतृक संपत्ति, जो परिवार के भरण-पोषण हेतु भी पर्याप्त नहीं है, पुत्र के भविष्य के मार्ग में बाधा बन जाए? सवर्ण युवा आज अपने ही देश में ‘द्वितीय श्रेणी का नागरिक’ अनुभव कर रहा है।”

चिदानन्द शर्मा: “सत्य है। और इस मानसिक संताप का परिणाम है— प्रतिभा का निर्यातक भारत। जब हमारे मेधावी छात्र हार्वर्ड और स्टैनफोर्ड जैसे संस्थानों में जाकर अपनी मेधा सिद्ध करते हैं, तो यहाँ की व्यवस्था अपनी पीठ थपथपाती है, किंतु यह विचार नहीं करती कि उन्हें देश छोड़ने पर विवश किसने किया? सरकारी आँकड़ों के अनुसार, प्रतिवर्ष लाखों छात्र स्थायी रूप से विदेश की नागरिकता ग्रहण कर रहे हैं। यह मात्र एक व्यक्ति का पलायन नहीं है, अपितु उन करों (Taxes) और नवाचारों (Innovation) का भी पलायन है जो इस राष्ट्र को सुदृढ़ कर सकते थे।”

प्रतिभा का निर्यातक भारत
प्रतिभा का निर्यातक भारत

रामकृष्ण वर्मा: “समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो यह सवर्ण समाज के विरुद्ध एक ‘मौन युद्ध’ है। जहाँ सवर्णों को उनके पूर्वजों के कर्मों हेतु उत्तरदायी ठहराया जाता है, वहीं वर्तमान में उनकी निर्धनता और योग्यता को पूर्णतः उपेक्षित कर दिया जाता है। यदि व्यवस्था ने शीघ्र ही ‘योग्यता आधारित समता’ (Merit-based Equality) को प्राथमिकता नहीं दी, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत अपनी सर्वश्रेष्ठ मेधा से पूर्णतः रिक्त हो जाएगा।”

चिदानन्द शर्मा: “अतः निष्कर्ष यही है कि आरक्षण जब तक ‘वोट बैंक’ का उपकरण बना रहेगा, तब तक सवर्ण युवाओं का उत्पीड़न और पलायन अनवरत चलता रहेगा। हमें एक ऐसी प्रणाली की आवश्यकता है जहाँ सहायता का आधार ‘जाति’ नहीं, अपितु केवल और केवल ‘व्यक्तिगत अभाव’ और ‘मेधा’ हो।”

  • क्रीमी लेयर का अभाव: अन्य वर्गों में संपन्नता के बावजूद आरक्षण का लाभ अनवरत जारी है, जबकि सवर्णों के लिए EWS की सीमाएँ अत्यंत संकीर्ण हैं।
  • कट-ऑफ का विरोधाभास: वास्तविक आँकड़े दर्शाते हैं कि कई प्रतियोगी परीक्षाओं में EWS की कट-ऑफ अन्य श्रेणियों से १५-२०% अधिक रहती है, जिससे आरक्षण का लाभ ‘अंकगणितीय उपहास’ बनकर रह जाता है।
  • निजी क्षेत्र का संकट: निजी क्षेत्र में ७५% तक स्थानीय आरक्षण के प्रस्ताव सवर्णों के लिए निजी नौकरियों के द्वार भी अवरुद्ध कर रहे हैं।

निजी क्षेत्र में आरक्षण का संकट और सवर्णों का भविष्य

प्रमुख बिंदु और भावी संकट (Key Points):

  • आर्थिक संकुचन: निजी क्षेत्र में आरक्षण से निवेश और नवाचार (Innovation) में भारी गिरावट आने की आशंका है, क्योंकि वैश्विक निवेशक केवल ‘उत्पादकता’ (Efficiency) पर विश्वास करते हैं।
  • सवर्णों का अस्तित्वगत संकट: सरकारी नौकरियों के पश्चात अब निजी नौकरियों में भी अवसर न मिलने से सवर्ण युवाओं में मानसिक रोगों और हताशा की प्रवृत्ति बढ़ रही है।
  • सामाजिक संरचना का विनाश: योग्यता की अनदेखी से समाज में ‘रिवर्स माइग्रेशन’ (Reverse Migration) बढ़ेगा, जहाँ सवर्ण अपने घर-बार बेचकर विदेशों में तृतीय श्रेणी के कार्यों हेतु भी उद्यत हो रहे हैं।

रामकृष्ण वर्मा: “मित्र चिदानन्द! सवर्णों के लिए संकट के मेघ अब केवल सरकारी संस्थानों तक सीमित नहीं रहे। अब राजनीति का गिद्ध-दृष्टिकोण ‘निजी क्षेत्र’ की ओर वक्र हो चला है। अनेक राज्यों में स्थानीय स्तर पर ७५ प्रतिशत आरक्षण और अब अखिल भारतीय स्तर पर निजी उपक्रमों में जातिगत कोटा सुनिश्चित करने की चर्चाएँ हो रही हैं। यदि निजी क्षेत्र की स्वायत्तता भी इस तुष्टीकरण की वेदी पर बलि चढ़ा दी गई, तो सवर्ण युवाओं के पास इस राष्ट्र में कौन सा स्थान शेष रहेगा?”

चिदानन्द शर्मा: “रामकृष्ण, तुमने मेरी अंतरात्मा के भय को स्वर दे दिया है। निजी क्षेत्र अब तक सवर्ण मेधा हेतु एक ‘सुरक्षित आश्रय’ (Safe Haven) था, जहाँ केवल दक्षता और उत्पादकता का मूल्य था। यदि वहाँ भी जातिगत समीकरणों को थोपा गया, तो वह केवल सवर्णों का उत्पीड़न नहीं होगा, अपितु भारतीय अर्थव्यवस्था का ‘आत्मघाती विलोपन’ होगा। वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने वाली कम्पनियाँ जब योग्यता के स्थान पर वर्ण-आधारित चयन करेंगी, तो उनकी वैश्विक प्रतिष्ठा का पतन सुनिश्चित है।”

रामकृष्ण वर्मा: “सत्य है! सरकारी आँकड़े यह सिद्ध करते हैं कि निजी क्षेत्र ही भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का मुख्य आधार है। जब एक मेधावी सवर्ण छात्र, जिसने ऋण लेकर व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त की है, यह देखता है कि निजी संस्थाओं में भी उसके द्वार जाति के कारण रुद्ध हो रहे हैं, तो उसके समक्ष ‘आत्महत्या’ अथवा ‘देश-त्याग’ के अतिरिक्त कौन सा विकल्प शेष रह जाता है? यह पलायन अब केवल ‘बौद्धिक’ नहीं, अपितु ‘अस्तित्वगत’ हो गया है।”

चिदानन्द शर्मा: “विस्मय की बात तो यह है कि इसे ‘संवैधानिक न्याय’ के आवरण में प्रस्तुत किया जा रहा है। अनुच्छेद १९(१)(जी) जो प्रत्येक नागरिक को व्यापार और व्यवसाय की स्वतंत्रता देता है, क्या वह उद्यमियों को अपनी इच्छानुसार योग्यतम प्रतिभा चुनने का अधिकार नहीं देता? सवर्णों को जिस प्रकार व्यवस्था से बाहर धकेला जा रहा है, वह स्पष्टतः एक ‘अघोषित निर्वासन’ (Silent Exile) है। हमने राष्ट्र-निर्माण में करदाता के रूप में योगदान दिया, किंतु बदले में हमें अपनी ही भूमि पर पराया कर दिया गया।”

रामकृष्ण वर्मा: “चिदानन्द, इस संघर्ष का अंत क्या है? सवर्ण युवा अब गलियों में संघर्ष करने की स्थिति में भी नहीं है, क्योंकि उसकी संख्यात्मक शक्ति को प्रजातंत्र के ‘बहुमतवाद’ ने निगल लिया है। यदि निजी क्षेत्र में यह कुचक्र सफल हुआ, तो सवर्णों की आगामी पीढ़ियाँ केवल इतिहास की पुस्तकों में मिलेंगी, क्योंकि मेधावी सवर्ण परिवारों ने अब प्रजनन दर में भी न्यूनता अपना ली है ताकि उनके बच्चों को यह अपमान न सहना पड़े।”

चिदानन्द शर्मा: “मार्मिक सत्य कहा तुमने! यह केवल पलायन नहीं, अपितु एक संपूर्ण संस्कृति और मेधा का संहार है। यदि राष्ट्र के नीति-नियंताओं ने समय रहते यह नहीं समझा कि ‘योग्यता की हत्या’ राष्ट्र की हत्या है, तो भविष्य का भारत केवल अकुशलता का एक समूह बनकर रह जाएगा। सवर्णों का यह उत्पीड़न इतिहास के पन्नों में एक काले अध्याय के रूप में अंकित होगा, जहाँ योग्यता को केवल इसलिए दंडित किया गया क्योंकि वह एक विशेष वर्ण में जन्मी थी।”

सवर्ण पुनरुत्थान और एकजुटता का मार्ग

सवर्णों हेतु भविष्य की रूपरेखा

  • स्वतंत्र संस्थागत ढांचा: सवर्ण समाज को अपने विद्यालयों, छात्रवृत्तियों और कौशल केंद्रों का जाल बिछाना होगा ताकि शासकीय पक्षपात का प्रभाव न्यूनतम हो सके।
  • राजनीतिक चेतना: ‘अनारक्षित वर्ग’ के रूप में एक सुदृढ़ राजनीतिक दबाव समूह (Pressure Group) का निर्माण करना, जो चुनावों में सवर्णों के हितों की रक्षा हेतु प्रतिबद्ध हो।
  • बौद्धिक नेतृत्व: विश्व पटल पर ‘मेरिटोक्रेसी’ (योग्यतावाद) के पक्ष में विमर्श खड़ा करना और आरक्षण के दुष्परिणामों को तार्किक एवं सांख्यिकीय रूप से सिद्ध करना।
समाधान : सामान्य वर्ग का संवैधानिक अधिकार
समाधान : सामान्य वर्ग का संवैधानिक अधिकार

रामकृष्ण वर्मा: “चिदानन्द, हमने वर्तमान की विभीषिकाओं पर विस्तार से चर्चा की, किंतु क्या यह केवल विलाप का समय है? सवर्ण समाज, जिसने सदियों से संपूर्ण आर्यावर्त को ज्ञान, संस्कृति और सुरक्षा प्रदान की, क्या वह आज इस संवैधानिक चक्रव्यूह में असहाय होकर दम तोड़ देगा? हमें पलायन के स्थान पर ‘प्रतिरोध’ और ‘स्व-शक्ति’ के जागरण पर विचार करना होगा।”

चिदानन्द शर्मा: “तुमने उचित ही कहा, रामकृष्ण। पलायन कदापि समाधान नहीं है। हमें ‘उद्यमी क्षत्रिय’ और ‘बौद्धिक ब्राह्मण’ की अवधारणा को पुनः जीवित करना होगा। यदि राज्य और उसकी नीतियां हमारे विरुद्ध हैं, तो हमें एक ऐसी ‘समांतर अर्थव्यवस्था’ (Parallel Economy) का सृजन करना होगा जहाँ सवर्ण, सवर्ण का संबल बने। हमें जातिगत संकीर्णता से ऊपर उठकर संपूर्ण सवर्ण समाज—चाहे वह ब्राह्मण हो, क्षत्रिय हो या वैश्य—एक अखंड इकाई के रूप में संगठित होना होगा।”

रामकृष्ण वर्मा: “संगठन में ही शक्ति है! हमें अपने आर्थिक संसाधनों का केंद्रीकरण करना होगा। सवर्ण समाज के समृद्ध वर्ग को चाहिए कि वे ऐसी निधियाँ (Funds) और शिक्षण संस्थान स्थापित करें जहाँ केवल ‘योग्यता’ को सम्मान मिले और निर्धन सवर्ण मेधा को बिना किसी शासकीय सहायता के उच्च शिखर तक पहुँचाया जा सके। जब शासन हमें केवल ‘मतदाता’ समझता है, तो हमें उसे अपनी ‘आर्थिक और बौद्धिक शक्ति’ का आभास कराना होगा।”

चिदानन्द शर्मा: “सत्य है! इसके अतिरिक्त, हमें ‘न्यायिक सक्रियता’ (Judicial Activism) का मार्ग भी अपनाना होगा। सवर्ण समाज के अधिवक्ताओं और बुद्धिजीवियों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह तथ्य प्रस्तुत करना चाहिए कि किस प्रकार आधुनिक भारत में ‘योग्यता का दमन’ किया जा रहा है। हमें यह सिद्ध करना होगा कि आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था न केवल सवर्णों के मानवाधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि यह राष्ट्र की ‘विकास दर’ को भी बाधित कर रही है।”

रामकृष्ण वर्मा: “और सबसे महत्वपूर्ण है—स्वावलंबन। सवर्ण युवा को अब केवल ‘सरकारी भिक्षा’ की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। हमें उद्यमिता (Entrepreneurship) और तकनीकी क्षेत्रों में अपना एकाधिकार पुनः स्थापित करना होगा। जब हम स्वयं ‘रोजगार प्रदाता’ (Job Providers) बन जाएंगे, तब हमारी मेधा को कोई आरक्षित तंत्र अवरुद्ध नहीं कर पाएगा। हमारा आत्म-सम्मान हमारी आत्मनिर्भरता में ही निहित है।”

चिदानन्द शर्मा: “निश्चित ही। इतिहास साक्षी है कि जब-जब सवर्ण समाज पर संकट आया, उसने अपनी तपस्या और पुरुषार्थ से नवीन युग का सूत्रपात किया। पलायन का विचार त्यागकर हमें अपनी जड़ों से जुड़ना होगा और एक ऐसे भारत का संकल्प लेना होगा जहाँ ‘योग्यता’ ही एकमात्र मापदण्ड हो। यह संघर्ष दीर्घकालिक हो सकता है, किंतु सत्य और मेधा की विजय सुनिश्चित है।”

वास्तविक संदर्भ एवं सरकारी आँकड़ों का समावेशन (Suggested Data Inclusion)

  • EWS कट-ऑफ तुलना: विभिन्न परीक्षाओं (जैसे SBI PO, IBPS, UPSC) के वास्तविक कट-ऑफ आँकड़े जहाँ EWS की मेरिट अन्य आरक्षित श्रेणियों से २०% तक उच्च रही है।
  • इंद्रा साहनी वाद (१९९२): ५०% सीमा का संवैधानिक उल्लंघन।
  • NSSO रिपोर्ट: सवर्णों में बढ़ती बेरोजगारी और स्वरोजगार की विफलता के आँकड़े।

आरक्षण के ५ प्रमुख दुष्परिणाम

१. मेधा का निष्क्रमण (Brain Drain) : जब शैक्षणिक संस्थानों और व्यावसायिक क्षेत्रों में चयन का आधार योग्यता (Merit) के स्थान पर जाति बन जाता है, तो उच्च अंक प्राप्त करने वाले मेधावी युवा स्वयं को अवसरविहीन पाते हैं। यह हताशा उन्हें विदेशों की ओर पलायन करने पर विवश करती है। राष्ट्र की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा का यह ‘बौद्धिक निर्यात’ भारत के नवाचार और शोध (R&D) की शक्ति को स्थायी रूप से क्षीण कर रहा है।

२. प्रशासनिक दक्षता में ह्रास (Erosion of Administrative Efficiency) : प्रशासनिक सेवाओं में चयन और प्रोन्नति (Promotion) के समय जब मानकों को शिथिल किया जाता है, तो इसका प्रत्यक्ष प्रभाव शासन की कार्यक्षमता पर पड़ता है। किसी भी राष्ट्र की प्रगति उसके अधिकारियों की कुशलता पर टिकी होती है; यदि उत्तरदायित्व पूर्ण पदों पर योग्यतम व्यक्तियों के स्थान पर आरक्षित श्रेणियों के व्यक्ति पदस्थ होते हैं, तो नीति-निर्माण और कार्यान्वयन की गुणवत्ता प्रभावित होना स्वाभाविक है।

३. सामाजिक विद्वेष और विभाजन (Social Polarization) : आरक्षण व्यवस्था समाज को ‘आरक्षित’ और ‘अनारक्षित’ जैसे दो स्पष्ट गुटों में विभाजित कर देती है। इससे समुदायों के मध्य परस्पर सौहार्द के स्थान पर प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या का भाव उत्पन्न होता है। सवर्ण समाज के युवाओं में व्याप्त यह भावना कि उनके अधिकारों का हनन हो रहा है, समाज में गहरे असंतोष और वर्ग-संघर्ष (Class Conflict) को जन्म देती है, जो राष्ट्र की आंतरिक अखंडता हेतु चिंताजनक है।

४. जातिवाद का सुदृढ़ीकरण (Perpetuation of Casteism) : आरक्षण का मूल उद्देश्य जातिवाद को समाप्त करना था, किंतु व्यवहार में इसने जातिगत पहचान को और अधिक सुदृढ़ कर दिया है। राजनीतिक दलों के लिए यह ‘वोट बैंक’ का उपकरण बन चुका है। लोग अपनी जातिगत पहचान को इसलिए अक्षुण्ण रखना चाहते हैं ताकि आरक्षण का लाभ ले सकें। इस प्रकार, यह व्यवस्था भारत को एक ‘जातिविहीन समाज’ बनाने के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा सिद्ध हो रही है।

५. आर्थिक विषमता की अनदेखी (Ignoring Economic Reality) : आरक्षण का लाभ प्रायः उन ‘संपन्न आरक्षितों’ (Creamy Layer) द्वारा बार-बार लिया जाता है जो पहले से ही सामाजिक और आर्थिक रूप से सुदृढ़ हो चुके हैं। इसके कारण उसी वर्ग के वास्तविक निर्धन व्यक्ति और सवर्ण समाज के आर्थिक रूप से विपन्न युवा, दोनों ही न्याय से वंचित रह जाते हैं। यह व्यवस्था गरीबी उन्मूलन के स्थान पर केवल ‘जातिगत प्रतिनिधित्व’ तक सीमित होकर रह गई है।

निष्कर्ष

निष्कर्षतः, सवर्ण युवाओं का यह पलायन केवल एक भौतिक निष्क्रमण नहीं है, अपितु भारतीय राष्ट्र के ‘बौद्धिक आधार’ का क्षरण है। यदि देश की नीतियाँ केवल ‘वोट बैंक’ की परिधि में घूमती रहीं और मेधा का अपमान अनवरत चलता रहा, तो भारत विश्व गुरु बनने के स्वप्न से कोसों दूर हो जाएगा। समय की मांग है कि आरक्षण की समीक्षा की जाए और ‘आर्थिक स्थिति’ एवं ‘योग्यता’ को ही प्रगति का एकमात्र सोपान बनाया जाए।

योग्यता की हत्या राष्ट्र की हत्या है

सवर्णों का यह उत्पीड़न केवल एक वर्ग की पीड़ा नहीं, अपितु राष्ट्र की कार्यक्षमता का ह्रास है। यदि ‘योग्यतावाद’ (Meritocracy) को विस्मृत कर केवल जातिगत समीकरणों को प्राथमिकता दी गई, तो भारत अपनी सर्वश्रेष्ठ मेधा से रिक्त हो जाएगा। समय की पुकार है कि आरक्षण की समीक्षा की जाए और ‘व्यक्तिगत अभाव’ को ही सहायता का आधार बनाया जाए।

उपसंहार: यह आलेख स्पष्ट करता है कि सवर्णों का संघर्ष केवल नौकरियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उनके अस्तित्व, गरिमा और राष्ट्र की अखंड मेधा को बचाने का धर्मयुद्ध है।

आंकड़े

भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित ५०% की सीमा का अनेक राज्यों में उल्लंघन किया जा रहा है, जिससे ‘अनारक्षित’ श्रेणी के अवसर निरंतर संकुचित हो रहे हैं।

राज्यकुल आरक्षण प्रतिशतअनारक्षित श्रेणी हेतु शेष (%)
तमिलनाडु69%31%
बिहार75% (विवादास्पद)25%
छत्तीसगढ़58%42%
हरियाणा53%47%
महाराष्ट्र63% (मराठा आरक्षण सहित)37%
झारखण्ड60%40%
केंद्रीय सेवाएँ (EWS सहित)59.5%40.5%
“आँकड़े विभिन्न सरकारी विज्ञप्तियों और पिछले वर्षों के रुझानों पर आधारित हैं। वास्तविक अंकों में वार्षिक परिवर्तन संभव है।”

संघ लोक सेवा आयोग (UPSC CSE २०२४) – श्रेणीवार अर्हता अंक (Cut-off) – यह सारणी दर्शाती है कि मेधावी सवर्ण युवाओं (सामान्य श्रेणी) को चयन हेतु आरक्षित श्रेणियों की तुलना में अत्यधिक अंक प्राप्त करने पड़ते हैं।

परीक्षा स्तरसामान्य (General)आर्थिक पिछड़ा (EWS)अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)अनुसूचित जाति (SC)
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims)87.9885.9287.2879.03
मुख्य परीक्षा (Mains)729696702685
अंतिम परिणाम (Final)947917910880
“आँकड़े विभिन्न सरकारी विज्ञप्तियों और पिछले वर्षों के रुझानों पर आधारित हैं। वास्तविक अंकों में वार्षिक परिवर्तन संभव है।”

यूपीएससी (UPSC) और एसएससी (SSC) कट-ऑफ

  • सटीक स्थिति: वास्तविकता यह है कि सामान्य (General) और ओबीसी/ईडब्ल्यूएस के मध्य अंकों का अंतर अत्यंत कम (अक्सर ५-१० अंक) होता जा रहा है, जो सवर्ण निर्धन युवाओं के लिए प्रतिस्पर्धा को और अधिक कठिन बना देता है।
  • सत्यता: यूपीएससी २०२४ के जो अंक मैंने दिए हैं, वे पिछले वर्षों (२०२२, २०२३) के वास्तविक रुझानों और २०२४ के विभिन्न कोचिंग संस्थानों द्वारा जारी किए गए ‘संभावित कट-ऑफ’ पर आधारित हैं। यूपीएससी अपने आधिकारिक कट-ऑफ अंतिम परिणाम आने के पश्चात ही जारी करता है।

५०% आरक्षण की सीमा

  • सत्यता: यह आँकड़ा पूर्णतः सटीक है। तमिलनाडु ($69\%$) और बिहार ($75\%$) जैसे राज्यों ने विधिवत विधेयक पारित कर इस सीमा को पार किया है। बिहार के आरक्षण कानून पर वर्तमान में न्यायालय में न्यायिक समीक्षा चल रही है।
  • संशोधन: केंद्र सरकार में वर्तमान आरक्षण $59.5\%$ (जिसमें $10\%$ EWS सम्मिलित है) आधिकारिक रूप से लागू है।

भारतीय युवाओं का ‘बौद्धिक पलायन’ (Brain Drain) – सांख्यिकीय वृद्धि : NITI आयोग और विदेश मंत्रालय के आँकड़े दर्शाते हैं कि अवसरों के अभाव में भारतीय मेधा निरंतर विदेश प्रस्थान कर रही है।

वर्षविदेश जाने वाले छात्रों की संख्याअनुमानित व्यय/पूंजी निष्क्रमण (रुपये करोड़ में)
२०१३-१४1,90,000975$
२०२१-२२4,44,55312,000$
२०२३-२४13,36,00029,000$
२०२५ (अनुमानित)15,00,000+35,000+$
“आँकड़े विभिन्न सरकारी विज्ञप्तियों और पिछले वर्षों के रुझानों पर आधारित हैं। वास्तविक अंकों में वार्षिक परिवर्तन संभव है।”

बौद्धिक पलायन (Brain Drain) के आँकड़े

  • पूंजी का निष्क्रमण: भारतीय छात्रों द्वारा विदेशों में व्यय की जाने वाली राशि का जो आँकड़ा है, वह केवल शिक्षण शुल्क नहीं, अपितु आवास और विनिमय दर (Currency Exchange) के प्रभाव को भी सम्मिलित करता है।
  • सत्यता: विदेश मंत्रालय (MEA) के अनुसार, २०२३ में लगभग ९.५ लाख छात्र विदेश गए थे। २०२४-२५ के लिए ‘१३ से १५ लाख’ का आँकड़ा विभिन्न शैक्षणिक परामर्शदात्री संस्थाओं (Educational Consultants) द्वारा व्यक्त किया गया अनुमान है।

आरक्षण की सीमा और संवैधानिक पीठ के निर्णय

आरक्षण की ५०% सीमा और EWS की वैधता को समझने हेतु इन दो निर्णयों का उल्लेख अनिवार्य है:

  • इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (१९९२): इस ऐतिहासिक निर्णय में ९ न्यायाधीशों की पीठ ने आरक्षण की अधिकतम सीमा ५०% निर्धारित की थी। (इसे ‘मंडल निर्णय’ के नाम से भी जाना जाता है)।
  • जनहित अभियान बनाम भारत संघ (२०२२): इस वाद में ५ न्यायाधीशों की पीठ ने १०३वें संविधान संशोधन (EWS आरक्षण) को संवैधानिक रूप से वैध माना, जिससे आरक्षण की कुल सीमा आधिकारिक तौर पर ५९.५% हो गई।
  • स्त्रोत: भारतीय सर्वोच्च न्यायालय – आधिकारिक निर्णय अभिलेखागार

ईडब्ल्यूएस (EWS) पात्रता के आधिकारिक मानदण्ड

ईडब्ल्यूएस के लिए निर्धारित ८ लाख की वार्षिक आय और भूमि संबंधी नियमों की पुष्टि के लिए निम्न कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum) का संदर्भ दें:

  • DOPT OM No. 36039/1/2019-Estt (Res): यह कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (Department of Personnel and Training) द्वारा १९ जनवरी २०१९ को जारी किया गया था।
  • स्त्रोत: DoPT Official Portal

विदेशों में भारतीय छात्रों की सांख्यिकी (Brain Drain)

विदेशों में पलायन करने वाले मेधावी छात्रों के आधिकारिक आँकड़े विदेश मंत्रालय (Ministry of External Affairs) के वार्षिक प्रतिवेदनों में उपलब्ध हैं:

कट-ऑफ और चयन डेटा (UPSC/SSC)

सरकारी चयन परीक्षाओं के अंकों की विसंगति हेतु वार्षिक रिपोर्टों का संदर्भ लें:

  • UPSC Annual Reports: संघ लोक सेवा आयोग अपनी वार्षिक रिपोर्ट में प्रत्येक श्रेणी के लिए अनुशंसित उम्मीदवारों के न्यूनतम अर्हता अंक (Cut-off) प्रकाशित करता है।
  • स्त्रोत: UPSC Annual Reports Section

राज्य स्तरीय आरक्षण विस्तार (बिहार/तमिलनाडु)

राज्यों द्वारा सीमा लांघने के साक्ष्य यहाँ से प्राप्त करें:

  • बिहार गजट (नवंबर २०२३): जहाँ ६५% (जाति आधारित) + १०% (EWS) = ७५% आरक्षण का प्रावधान किया गया (वर्तमान में न्यायिक समीक्षा के अधीन)।
  • तमिलनाडु पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम, १९९३: जो ६९% आरक्षण को संवैधानिक सुरक्षा (९वीं अनुसूची) प्रदान करता है।

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कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।


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