लड़का-लड़की एक समान: सम्मान, महान या अज्ञान?

लड़का-लड़की एक समान: सम्मान, महान या अज्ञान?

“लड़का तपस्या से ‘पूज्य’ बनता है जबकि लड़की जन्मजात ‘देवी’ है”

वर्तमान सामाजिक विमर्श में “लड़का-लड़की एक समान” का नारा बहुत लोकप्रिय है। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि क्या यह समानता ‘समान अवसर’ तक सीमित है, या हम दोनों की मूल प्रकृति और आध्यात्मिक गरिमा के अंतर को मिटाकर एक ‘अज्ञान’ की ओर बढ़ रहे हैं? यदि हम शास्त्रों के दर्पण में देखें, तो स्त्री का स्थान पुरुष से कहीं अधिक ऊंचा और सहज पवित्र बताया गया है। आज इसी विषय को भारतीय विचारधारा, शास्त्रीय दृष्टिकोण के आधार पर समझने का प्रयास करेंगे कि मूढ़ राजनीतिज्ञों का यह नारा लड़की का उत्थान कर रहा है या पतन ?

“राजनीतिज्ञों की मूढ़ता के कारण परिवार में मात्र कलह नहीं उत्पन्न हो रहा है उससे बड़ा विषय तो सांस्कृतिक क्षरण है और भविष्य का इतिहास इन मूढ़ राजनीतिज्ञों, स्वघोषित बौद्धिकों, मीडिया को विदेशी विचारधारा के दलदल में फंसा हुआ ही सिद्ध करेगा एवं २१वीं सदी को भारत का सांस्कृतिक आपातकाल ही कहेगा।”

यह विषय बहुत ही गंभीर है; समझने की बात यह है कि यदि लड़की को लड़के से ऊपर स्थान दिया गया है, स्त्री को पुरुषों से ऊपर स्थान प्राप्त ही है तो समान होने का राग क्यों लगाना, ये तो पुरुष वर्ग को लगाना चाहिये था। लड़की का पतन होगा तभी तो लड़के के समान होगी क्योंकि उच्च स्थान पर है, स्त्रियों का पतन होगा तभी तो पुरुषों के समान होगी क्योंकि उच्च स्थान पर है।

“लड़का लड़की एक समान” का नारा सुनने में तो न्यायसंगत लगता है, लेकिन जब हम इसकी गहराई में जाते हैं, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यह समानता वास्तव में स्त्री का उत्थान कर रही है या उसे उसकी मौलिक गरिमा से नीचे गिराकर अज्ञान की ओर ले जा रही है।

कन्या: जन्मजात देवी और पूज्यता का प्रतीक

“स्त्री को पुरुष की अपेक्षा अधिक पवित्र और महान इसलिए कहा गया है क्योंकि वह ‘सृजन’ (Creation) की धुरी है। पुरुष ‘कर्ता’ हो सकता है, लेकिन स्त्री ‘आधार’ (Base) है।”

शास्त्रों की व्यवस्था अत्यंत स्पष्ट है। पुरुष का पूजन तब तक वर्जित है जब तक वह ‘बटुक’ या ‘ब्रह्मचारी’ न हो, ब्राह्मण, सन्यासी आदि न हो । पुरुष को पूजनीय बनने के लिए अपनी इंद्रियों का दमन करना पड़ता है, कठोर अनुष्ठान करने पड़ते हैं और संस्कारों की अग्नि में तपना पड़ता है।

इसके विपरीत, कन्या पूजन के लिए किसी तपस्या की शर्त नहीं है। कन्या साक्षात् ‘प्रकृति’ है। जैसे गंगा को पवित्र होने के लिए किसी मंत्र की आवश्यकता नहीं है, वैसे ही कन्या अपनी मूल अवस्था में ही वंदनीय है। कुमारी पूजन के समय जब हम कन्या के चरण पखारते हैं, तो हम किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस ‘आदि शक्ति’ की पूजा कर रहे होते हैं जो उसमें सहज रूप से विद्यमान है।

सच्चा उत्थान तब होगा जब समाज कन्या को ‘देवी’ मानकर उसकी पूजा भी करे और उसे वह सुरक्षित वातावरण भी दे जिसमें उसकी ‘पवित्रता’ और ‘मर्यादा’ अक्षुण्ण रहे। पुरुष को ‘बटुक’ बनने के लिए तप करना ही होगा, और स्त्री को अपनी ‘जन्मजात दिव्यता’ को आधुनिकता की चकाचौंध से बचाना होगा।

भारतीय शास्त्रों में जन्म के आधार पर ही स्त्री को जो गरिमा प्राप्त है, वह पुरुष को अर्जित करनी पड़ती है। भारतीय शास्त्रों में कन्या को ‘साक्षात् शक्ति’ का रूप माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, एक कन्या को पूजनीय होने के लिए किसी कठिन तपस्या की आवश्यकता नहीं होती; उसका कन्या होना ही उसकी पवित्रता का प्रमाण है। नवरात्र आदि में सभी पूजा-अनुष्ठानों से ऊपर कन्या पूजन को रखा गया है, यहां से ब्राह्मण से तुलना भी नहीं की जा सकती, “लड़कों से तुलना” की बात तो दूर की कौड़ी है। कुछ शास्त्रोक्त प्रमाण का अवलोकन करते हैं जो कुमारी कन्या की महिमा का वर्णन करता है :

कन्या: जन्मजात देवी और पूज्यता का प्रतीक
कन्या: जन्मजात देवी और पूज्यता का प्रतीक

पूजिताः प्रतिपूज्यन्ते निर्दहन्त्यवमानिताः । कुमारी योगिनी साक्षात् कुमारी परदेवता ॥
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च ईश्वरश्च सदाशिवः । ते तुष्टा सर्वदेवाश्च यस्तु कन्यां प्रपूजयेत् ॥

देवीभागवत में कुमारी महिमा किस प्रकार मिलता है थोड़ा समझें :

कुमारी चाष्टवर्षीया वस्त्रालङ्‌कारचन्दनैः। पूजिता येन विप्रस्य प्रकृतिस्तेन पूजिता ॥

  • बटुक vs कन्या: जहाँ एक बालक को ‘बटुक’ (पूजनीय) कहलाने के लिए ब्रह्मचर्य, जनेऊ संस्कार और कठोर तप की अग्नि से गुजरना पड़ता है, वहीं कन्या जन्म से ही देवी स्वरूपा है।
  • कन्या पूजन: नवरात्रों में हम नौ वर्ष तक की कन्याओं का पूजन करते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि स्त्री तत्व में शुचिता और दिव्यता नैसर्गिक (Natural) है, जबकि पुरुष को इसे अर्जित (Earn) करना पड़ता है। कुमारिका पूजन में किसी भी जाति या कुल की कन्या हो, उसे साक्षात् जगदम्बा मानकर उसके चरण स्पर्श किए जाते हैं।
  • पुरुष के लिए तप की अनिवार्यता: एक बालक को ‘पूज्य’ बनने के लिए उपनयन संस्कार, वेदाध्ययन और ब्रह्मचर्य जैसे कठिन अनुशासन से गुजरना पड़ता है। बिना तपस्या के पुरुष केवल ‘साधारण’ है, जबकि कन्या बिना किसी अतिरिक्त कर्मकाण्ड के भी ‘वंदनीय’ है। यह सिद्ध करता है कि आध्यात्मिक धरातल पर स्त्री का स्थान जन्मजात उच्च है और सांसारिक धरातल पर इसी का अनुपालन करना धर्म है, यदि इसका उल्लंघन करें तो वह अधर्म होगा।।

अब सोचिये कहां लड़के को पूज्य होने के लिये ब्रह्मचारी बनना होगा अर्थात कठिन नियमों को धारण करना होगा, तपस्वी जैसे जीवन जीना होगा तब वह पूज्य सिद्ध होगा, किन्तु कन्या बिना किसी विशेष नियम के ही देवी स्वरूपा होती है। अर्थात यदि लड़का तपस्वी जैसा जीवन नहीं जी रहा है, ब्रह्मचर्य धारण नहीं कर रहा है तो वह पूज्य नहीं है। क्या लड़की इसीलिये समान हो जिससे उसकी महानता, देवी स्वरूप होने का गौरव समाप्त हो जाये अथवा उसे देवी कहलाने के लिये बाल्यावस्था में कठोर तप करना पड़े !

स्त्री की नैसर्गिक पवित्रता और ‘पतिव्रता’ का नियम

शास्त्रों के अनुसार पुरुष का मन और शरीर बाहरी संघर्षों के कारण मलिन हो सकता है, लेकिन स्त्री को ईश्वर ने ‘सोम’ और ‘पावक’ (अग्नि) जैसी शुचिता दी है। शास्त्रों ने स्त्रियों को पुरुषों की तुलना में अधिक पवित्र और श्रेष्ठ माना है, स्त्रियों को ‘अत्यंत पवित्र’ कहा गया है। मनुस्मृति और अन्य पुराणों में उल्लेख है कि स्त्रियों के दोषों को चंद्रमा, गंधर्व और अग्नि ने समय-समय पर धोकर उन्हें सदैव पवित्र बनाए रखा है। स्कन्दपुराण, विष्णुधर्मोत्तर पुराण, लक्ष्मीनारायणसंहिता व विभिन्न स्मृतियों में स्त्री की पवित्रता का प्रमाण इस प्रकार मिलता है :

लड़का-लड़की एक समान: सम्मान, महान या अज्ञान?
लड़का-लड़की एक समान: सम्मान, महान या अज्ञान?

ब्राह्मणाः पादतो मेध्या गावो मेध्यास्तु पृष्ठतः। अजाश्वा मुखतो मेध्या स्त्रियो मेध्याश्च सर्वतः ॥

अर्थात ब्राह्मण के चरण पवित्र होते हैं (ब्राह्मण के दक्षिण चरण में तीर्थों का वास कहा गया है), गाय जिसके शरीर में सभी देवताओं का वास कहा गया है परम पवित्र माना गया है उसका भी मुख भाग अपवित्र ही कहा गया है और गाय का पृष्ठ भाग ही पवित्र होता है, बकड़ा और घोड़े का मुख पवित्र कहा गया है किन्तु स्त्रियों को सम्पूर्ण रूप से पवित्र कहा गया है। स्त्रियों के सभी अंग पवित्र होते हैं, सभी प्रकार से पवित्र होती है। इसकी सिद्धि अंगिरा स्मृति के एक अन्य प्रमाण से भी होती है :

ऋतौ तु गर्भशंकायां स्नानं मैथुनिनः स्मृतः। अनृतो तु सदा कुर्याच्छौचं मूत्रपुरीषवत् ॥

अर्थात ऋतुकाल में जब दम्पति सम्भोग करते हैं तो गर्भ होने की शंका हो तभी स्त्रियों के लिये स्नान का नियम है अन्यथा मात्र मल-मूत्र त्याग की भांति ही शुद्धि विधान से पवित्र हो जाती है।

द्वावेतावशुची स्यातां दम्पति शयनं गतौ। शयनादुत्थिता नारी शुचिः स्यादशुचिः पुमान् ॥

अंगिरा स्मृति में ही पुनः और स्पष्ट किया गया है जब दम्पती शयन करते हैं तो दोनों ही अपवित्र हो जाते हैं किन्तु नारी उठने पर पवित्र होती है किन्तु पुरुष अपवित्र ही होता है उसे स्नान करने की आवश्यकता होती है।

स्त्रियः पवित्रमतुलं नैता दुष्यन्ति कर्हिचित् । मासिमासि रजो ह्यासां दुष्कृतान्यपकर्षति ॥

अर्थात स्त्रियों की पवित्रता अतुल्य है और वह कभी भी दूषित नहीं होती (रजस्वला अवस्था के अतिरिक्त)। रजस्वला होना ही उसकी अतुल्य पवित्रता का भी कारक है क्योंकि इसी प्रक्रिया से प्रत्येक मास उसे दोष रक्त के माध्यम से स्रवित हो जाते हैं। वसिष्ठ धर्मशास्त्र, बौधायन स्मृति एवं अन्यान्य स्मृतियों में ऐसा प्रमाण मिलता है।

शास्त्रों ने स्त्री को ‘महान’ और ‘पवित्र’ कहने के साथ ‘पतिव्रता’ होने का जो अनुशासन दिया, वह उसकी शक्ति को बांधने के लिए नहीं, बल्कि उसे ‘सिद्ध’ करने के लिए था। स्त्री के लिये एक मात्र पातिव्रत्य धर्म ही धारणीय कहा गया है, इससे बढ़कर स्त्रियों के लिये और कुछ भी नहीं है। भुक्ति, मुक्ति, आत्मानंद सब कुछ पातिव्रत्य धर्म से ही स्त्रियों के लिये सुलभ हो जाता है।

स्त्रीणां धर्माः पातिव्रत्यं नाऽस्मात्परोऽस्ति कश्चन । तत्र भुक्तिर्महामुक्तिरात्मानन्दश्च शाश्वतः ॥

पतिव्रता धर्म: शास्त्रों ने स्त्री की महानता के साथ एक मर्यादा जोड़ी—’पतिव्रता’ होना। यहाँ ‘पतिव्रता’ का अर्थ केवल गुलामी नहीं, बल्कि अपनी ऊर्जा को केंद्रित करना है। जिस प्रकार एक नदी तटों के बीच रहकर ही वेगवती और पूजनीय होती है, उसी प्रकार एक निष्ठ आचरण स्त्री को वह शक्ति देता है कि वह यमराज से भी अपने पति के प्राण छीन लाए (सती सावित्री का उदाहरण)।

पतिव्रता: दासता नहीं, एकाग्रता: स्त्री को महान कहने के साथ ‘पतिव्रता’ होने का जो नियम है, वह वास्तव में उसकी ऊर्जा के संरक्षण (Energy Conservation) का विज्ञान है। जिस प्रकार एक ‘लेजर’ (Laser) किरण अपनी एकाग्रता के कारण लोहे को काट सकती है, उसी प्रकार पतिव्रता स्त्री की संकल्प शक्ति इतनी महान हो जाती है कि वह प्रकृति के नियमों को बदल सकती है (जैसे सती अनसूया ने त्रिदेवों को बालक बना दिया था)।

पतिव्रता: दासता नहीं, एकाग्रता

पातिव्रत्य धर्म की महत्ता: एक पतिव्रता स्त्री का सामर्थ्य ऋषि-मुनियों की तपस्या से भी बड़ा माना गया है। अनसूया और सावित्री के उदाहरण सिद्ध करते हैं कि जब स्त्री अपनी मर्यादा में स्थित होती है, तो वह काल के चक्र को भी मोड़ सकती है। यह ‘नियम’ स्त्री को पुरुष से कमतर करने के लिए नहीं, बल्कि उसे उसकी ‘पराशक्ति’ का बोध कराने के लिए है।

महानता और समानता: यदि हम कहते हैं कि स्त्री पुरुष के ‘समान’ है, तो हम अनजाने में पुरुष को ही ‘मानक’ (Standard) मान लेते हैं। शास्त्र कहते हैं कि स्त्री पुरुष से ‘महान’ है। उसे समान कहना उसे नीचे लाना है।

देवीभागवत में उत्तम, मध्यम और अधम का वर्णन

जब स्त्री अपनी स्त्रीत्व की गरिमा को पहचानती है, तब वह महान होती है। जब पुरुष उसे उसकी गरिमा लौटाता है, तब वह सम्मान होता है।

लड़की हो अथवा स्त्री हो उनके लिये जो जानना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है वो श्रीमद्देवीभागवतपुराण से यहां प्रस्तुत कर रहे हैं और इसके आधार पर उनको विचार करना चाहिये कि उनको उत्तम बनना है अथवा मध्यम या अधम !

देवीभागवत में उत्तम, मध्यम और अधम का वर्णन इस प्रकार मिलता है :

सर्वाः प्रकृतिसम्भूता उत्तमाधममध्यमाः। सत्त्वांशाश्चोत्तमा ज्ञेयाः सुशीलाश्च पतिव्रताः ॥
मध्यमा रजसश्चांशास्ताश्च भोग्याः प्रकीर्तिताः। सुखसम्भोगवश्याश्च स्वकार्ये तत्पराः सदा ॥
अधमास्तमसश्चांशा अज्ञातकुलसम्भवाः। दुर्मुखाः कुलटा धूर्ताः स्वतन्त्राः कलहप्रियाः ॥

  1. उत्तम : सत्वगुण प्रधान, शुशीला, पतिव्रता आदि गुणों से संपन्न।
  2. मध्यम : रजोगुण प्रधान, भोगिनी, सुख, सम्भोग, स्वकार्य (गृहकार्य) में तत्पर।
  3. अधम : तमोगुण प्रधान, अज्ञात कुल वाली, दुर्मुखी, कुलटा, स्वभाव से धूर्त्ता, स्वतंत्र (स्वेच्छाचारिणी), कलह करने वाली अर्थात कलहप्रिया आदि दुर्गुणों से युक्त होती है।

अब यहां एक और विषय भी विचारणीय है, यद्यपि जो अधम श्रेणी की हैं उनके लिये अप्रिय पंक्ति होगी इसलिये स्वयं ही विचार कर लें। जिनके ऊपर तमोगुण का प्रभाव है और तामसी स्वभाव के कारण जो स्वेच्छाचारिता, स्वतंत्रता-समानता के लिये कलह करती हैं जबकि वो वास्तव में श्रेष्ठ हैं समानता की मांग तो अज्ञानता है जो तमोगुण को भी सिद्ध कर रहा है एवं अन्यान्य अधिक चर्चा नहीं करनी है। यह उनके लिये स्वयं ही विचार करने का विषय है कि वो उत्तम हैं, मध्यम हैं अथवा अधम, हां अपनी बच्चियों को इन गुणों के बारे में अवश्य अवगत करें और अधम होने से बचने की सीख दें यह आवश्यक है।

उत्तम, मध्यम और अधम स्त्री
उत्तम, मध्यम और अधम स्त्री

देवीभागवत में स्त्रियों के अपमान को सम्पूर्ण प्रकृति के अपमान से भी अधिक कहा गया है : योषितामवमानेन प्रकृतेश्च पराभवः ।

समानता का भ्रम: उत्थान या पतन?

नारी तू नारायणी : हम सभी इसका प्रयोग करते हैं यह स्त्रियों की महानता को ही सिद्ध करता है। समस्या लोकतांत्रिक और संविधानिक समानता के झगड़े का है, अज्ञान का है, राजनीतिक मूढ़ता का है, आधुनिकता के प्रपंच का है।

जब स्त्रीवर्ग प्रामाणिक रूप से पुरुष वर्ग की तुलना में अधिक पवित्र हैं, श्रेष्ठ हैं, पूज्य हैं तो आज जब हम “लड़का-लड़की एक समान” कहते हैं क्या ये उनका अपमान नहीं होता है। यह अपमान समग्र प्रकृति (सृष्टि) का अपमान शास्त्रोक्त प्रमाणों के आधार पर सिद्ध होता है। क्योंकि हम स्त्री को पुरुष जैसा बनाने की चेष्टा करते हैं। यहीं से ‘अज्ञान’ का आरम्भ होता है।

  • पतन का भय: यदि एक स्वर्ण मुद्रा को लोहे के सिक्के के ‘समान’ घोषित कर दिया जाए, तो यह स्वर्ण का उत्थान नहीं, बल्कि उसका अवमूल्यन (Devaluation) है। यदि साक्षात् देवी स्वरूप स्त्री को पुरुष की आदतों, व्यसनों और उसकी कठोरता की नकल करने को कहा जाए, तो यह उसका पतन है। यदि एक स्वर्ण कलश (स्त्री) को मिट्टी के घड़े (पुरुष) के समान बनने की होड़ करनी पड़े, तो यह उसका पतन है। पुरुष स्वभाव से ‘कठोर’ और ‘बाह्यमुखी’ है, जबकि स्त्री ‘करुणा’ और ‘अंतर्मुखी’ शक्ति है। पुरुष की नकल करना स्त्री के लिए आत्मघाती है।
  • समान अधिकार : सामाजिक और कानूनी अधिकारों में भी समानता (जैसे स्वास्थ्य, सम्मान) अनिवार्य नहीं है अपितु श्रेष्ठत्व, पूज्यत्व आदि का क्षरण न हो इसलिये वरीयता देना अपेक्षित है। क्योंकि आध्यात्मिक रूप से स्त्री पुरुष से ‘महान’ है श्रेष्ठ है। उसे पुरुष के बराबर लाकर खड़ा करना उसे उसकी ऊँचाई से नीचे गिराने जैसा है। शास्त्र कहते हैं कि पुरुष का पतन केवल उसका पतन है, परंतु एक स्त्री का मर्यादा से गिरना पूरी संस्कृति और आने वाली पीढ़ियों का पतन है। इसलिए, उसे पुरुष जैसा ‘स्वतंत्र’ (स्वच्छंद) बनाने की चेष्ठा उसे उसकी महानता से च्युत करना है।

यदि हम सामाजिक, कानूनी आदि विचार से भी उन्हें समानता के सिद्धांत पर कसेंगे तो अवमानना ही होती है। पूज्य हैं तो पूज्य ही बनाकर रखना उचित है।

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः” – जहाँ नारियों की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं। यह पंक्ति तो सभी दुहराते हैं वो भी जो समानता की बात करते हैं किन्तु इसमें समानता कहां है, यहां तो श्रेष्ठता है, दिव्यता है, पवित्रता है।

“सृजन की शक्ति और मर्यादा का संगम ही स्त्रीत्व है। इसे पुरुष के सांचे में ढालना, मानवता के आधे आकाश को अंधकार में धकेलने जैसा है।”

दृष्टिकोणप्रभावपरिणाम
शास्त्रोक्त (महानता)स्त्री को देवी मानकर उसे संरक्षण और सर्वोच्च सम्मान देना।समाज में नैतिकता और सात्विकता का उदय।
आधुनिक (समानता)स्त्री को पुरुष के समान संघर्ष, प्रतियोगिता और बाहरी कठोरता में झोंकना।स्त्री की कोमलता और उसकी आध्यात्मिक शक्ति का ह्रास।
अज्ञानपुरुष की बुराइयों (धूम्रपान, उग्रता, अभद्रता) की नकल करना।पारिवारिक और सामाजिक संरचना का पतन।
समानता का भ्रम: उत्थान या पतन?

मर्यादा ही शक्ति है

पतिव्रता के नियमों, सांस्कृतिक मर्यादाओं पर आधुनिकता की कुल्हाड़ी से प्रहार किया जा रहा है, समानता के अज्ञान से जो जन्मजात श्रेष्ठ होती है उसे पतनोन्मुख किया जा रहा है। जो मर्यादायें हैं वो स्त्रीत्व की रक्षा और संवर्द्धन के लिये है किन्तु इसे कुरीति, पुरानी सोच, रूढ़िवादिता आदि घोषित करके वास्तव में स्त्रियों की महानता का अवमूल्यन किया जा रहा है।

जैसे नदी का दो तटों के मध्य रहना उसकी मर्यादा है और इसी से वह सम्मान प्राप्त करती है और जब तटों का उल्लंघन करती है तो बाढ़ की विभीषिका बनती है, सांसारिक व्यवधान भी उत्पन्न करती है एवं पूजा से स्वयं भी वंचित हो जाती है। जो स्थापित मर्यादायें वो सांसारिक उत्कर्ष के ही साधन हैं न कि पिछड़ेपन की, रूढ़िवादिता की पहचान।

आयातित विचारों ने हमारे मनन करने की शक्ति का ह्रास कर दिया है और हम अपनी सांस्कृतिक परम्परा को, मर्यादाओं को रूढ़िवादिता मानने लगे हैं, पिछड़ापन स्वीकारने लगे हैं। हम उन लोगों की दृष्टि में श्रेष्ठ कहलाने का प्रयास कर रहे हैं जो पहले से ही पतित हैं तो हम पतित होंगे है श्रेष्ठ बनेंगे। हम श्रेष्ठ थे, यदि उन पतितों का अनुकरण करेंगे तो श्रेष्ठता से च्युत होकर पतित होंगे।

स्वाभाविक दक्षता: प्रकृति का श्रम-विभाजन

प्रकृति ने स्त्री और पुरुष के शरीरों का ही नहीं, बल्कि उनके स्वभाव (Temperament) का भी निर्माण अलग-अलग उद्देश्यों के लिए किया है। सांसारिक दृष्टिकोण से देखें तो स्त्री उन गुणों की स्वामिनी है, जिन्हें पुरुष कठिन परिश्रम के बाद भी पूर्णतः आत्मसात नहीं कर सकता।

कोमल गुणों की अधिष्ठात्री :

स्त्री के भीतर ममता, करुणा, दया और सहनशीलता जैसे गुण ‘सॉफ्टवेयर’ की तरह जन्मजात होते हैं।

  • सहनशीलता: सृजन की पीड़ा (प्रसव) से लेकर परिवार के सामंजस्य तक, स्त्री की सहनशक्ति एक पुरुष की तुलना में कहीं अधिक विस्तृत और गहरी होती है।
  • ममता और करुणा: ये गुण केवल भावनाएं नहीं, बल्कि परिवार को जोड़े रखने वाला ‘गोंद’ हैं। पुरुष स्वभाव से ‘तार्किक’ और ‘कठोर’ (Rational & Hard) होता है, जबकि स्त्री ‘भावुक’ और ‘कोमल’ (Emotional & Soft) होती है। संसार को चलाने के लिए तर्क से अधिक करुणा की आवश्यकता होती है।

पालन-पोषण: सहजता बनाम बाध्यता :

आज के युग में पुरुष भी बच्चों का पालन-पोषण कर रहे हैं, लेकिन रेखांकित किया गया अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है— ‘सहजता’ और ‘दक्षता’ का अंतर

  • सहजता (Spontaneity): एक शिशु के रोने पर स्त्री की जो प्रतिक्रिया होती है, वह नैसर्गिक है। उसके भीतर का मातृत्व स्वतः सक्रिय हो जाता है।
  • दक्षता (Efficiency): पुरुष यदि बच्चे को संभालता है, तो वह उसके लिए एक ‘कार्य’ (Task) या ‘जिम्मेदारी’ की तरह होता है। वह उसे ‘मैनेज’ करता है, लेकिन स्त्री उसे ‘जीती’ है।
  • प्रकृति का प्रमाण: चिकित्सा विज्ञान भी मानता है कि स्त्री का मस्तिष्क मल्टी-टास्किंग और भावनात्मक बुद्धिमत्ता (EQ) में पुरुष से कहीं आगे है। गृहकार्य और शिशु पालन के लिए जिस धैर्य की आवश्यकता होती है, वह पुरुष के डीएनए (DNA) में उस मात्रा में उपलब्ध नहीं है।

गृहकार्य: व्यवस्था या संस्कार?

जिसे आधुनिक समाज ‘घरेलू काम’ कहकर छोटा दिखाने की कोशिश करता है, वास्तव में वह ‘संस्कार-निर्माण’ की पाठशाला है।

  • रसोई में अन्नपूर्णा का भाव, घर की स्वच्छता में लक्ष्मी का भाव और बच्चों की शिक्षा में सरस्वती का भाव—ये तीनों भूमिकाएं स्त्रियां ही स्वाभाविक दक्षता से निभाती हैं।
  • पुरुष घर को ‘संसाधन’ (Resources) दे सकता है, लेकिन उन संसाधनों को ‘संसार’ (Home) केवल स्त्री ही बना सकती है।

समानता का अज्ञान और भूमिकाओं का संकट

जब हम कहते हैं कि “स्त्री वह सब कर सकती है जो पुरुष कर सकता है,” तो हम यह भूल जाते हैं कि “पुरुष वह सब कभी नहीं कर सकता जो स्त्री सहज ही कर लेती है।” समानता के नाम पर स्त्री को बाहर के संघर्षों में धकेलना और उसे उसके ‘सहज गुणों’ से दूर करना, वास्तव में उसकी उस विशेषज्ञता (Specialization) को नष्ट करना है जो समाज के अस्तित्व के लिए अनिवार्य है।

“सांसारिक दृष्टि से भी स्त्री ‘विशेषज्ञ’ (Specialist) है और पुरुष केवल ‘सहायक’। सृजन और पालन के जिन कार्यों को स्त्री अपनी मुस्कान के साथ सहजता से कर लेती है, उन्हीं कार्यों में पुरुष थककर हार जाता है। अतः स्त्री को पुरुष के समान बनाने की जिद्द, एक कुशल कलाकार को मज़दूर बनाने जैसी भूल है।”

लोकतंत्र : एक अभिशाप

जब कभी भी धर्म और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से किसी भी विषय पर चर्चा करते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि वर्त्तमान काल में लोगों के चिंतन-मनन की शक्ति ही विलुप्तप्राय हो गयी है। लोगों की सोच अर्थार्जन से आरम्भ होती है और राजनीति पर जाकर समाप्त होती है, मीडिया हो या सोशल मीडिया (डिजिटल स्क्रीन) चुम्बक की तरह लोगों को खींच लेती है और सम्पूर्ण संसार उसी में समाहित सा हो गया है।

जनमानस भी जब परस्पर बात करते हैं तो यह स्वीकारते हैं किन्तु दुविधा तो ये है कि इसका त्याग नहीं कर पाते, लोहखण्ड के समान चुम्बक से सटे हुये हैं। और इसी कड़ी में एक महत्वपूर्ण विषय आ जाता है कि इसका मूल कारण क्या है तो वह कारण निकलता है “लोकतंत्र”

“लोकतंत्र अभिशाप है – दुस्सह इसका संताप है”

हम जिस विषय की चर्चा कर रहे हैं इस चर्चा का कारण भी जो मूल विवाद “लड़का-लड़की एक समान” का नारा है वह लोकतंत्र की ही ऊपज है। लोकतंत्र ने ही लोगों के चिंतन-मनन की शक्ति का अपहरण कर लिया है, शास्त्र से विमुख कर दिया है और आधुनिक सोच के नाम पर मानसिक विकृति उत्पन्न कर दिया है। राजनीति करने वाले यह जानते और समझते हैं कि यदि लोग चिंतन-मनन करने लगे, शास्त्र की ओर मुड़ गए तो लोकतंत्र का अस्तित्व ही नहीं बचेगा क्योंकि इसका अस्तित्व ही असत्य धारणाओं पर टिका है। लोकतंत्र का न तो कोई सिद्धांत है, न ही शास्त्रीय प्रमाण, न ही ऐतिहासिक पृष्टभूमि।

"लोकतंत्र अभिशाप है - दुस्सह इसका संताप है"
“लोकतंत्र अभिशाप है – दुस्सह इसका संताप है”

ये लोकतंत्र ही है जिसने अपना अस्तित्व बचाये रखने के लिये हमें चिंतन के मुख्य विषयों से विमुख करके विवादों की चिंता में उलझा कर रख दिया है। नेताओं को अपनी घृणित रजनीति को बचाये रखने के लिये यह आवश्यक है कि जनमानस को दिग्भ्रमित करते रहें, विवादों में उलझाए रखें, कुतर्कों के निराधार जाल में फंसाये रखें।

हम सभी देख रहे हैं कि देश का वर्त्तमान शासक जिसे लोग धर्म और संस्कृति से जुड़ा हुआ भी समझते हैं “नारी सशक्तिकरण” का नारा लगा रहा है, इसके लिये ढेरों योजनायें ला रहा है। यदि लोगों के पास चिंतन-मनन की शक्ति थोड़ी भी शेष हो तो विचार करे जो नारी स्वयं ही शक्ति स्वीकारी गयी है उसके सशक्तिकरण का क्या तात्पर्य हो सकता है ? उसकी शक्ति का अपहरण किया जा सकता है किन्तु शक्ति प्रदान नहीं कर सकते।

पूर्व के शासक की तो कोई चर्चा ही नहीं की जा सकती ये वर्त्तमान शासक की बात है, जिसे लोग धर्म और संस्कृति से जुड़ा हुआ समझते हैं। ये भी अपने वोटबैंक के लिये “नारी सशक्तिकरण” का मनगढंत नारा गढ़ लेता है और लोगों को दिग्भ्रमित कर रहा है, उलझा रहा है ताकि लोग चिंतन-मनन ही न करें। और इसी कारण से लोकतंत्र एक अभिशाप है क्योंकि ये लोगों के चिंतन-मनन की शक्ति का ही अपहरण कर लेता है।

नारी सशक्तिकरण का मनगढंत नारा

शासक के लिये कुछ अनिवार्य गुण होते हैं जैसे : दूरदर्शिता, संस्कृति प्रेम, धर्म के प्रति प्रतिबद्धता, निर्णय का विवेक आदि किन्तु लोकतंत्र में हम जिसे नीति निर्माता बनाते हैं वो इन गुणों को धारण ही नहीं करता है और घृणित राजनीति करते हुये जनमानस को दिग्भ्रमित करता है और लोकतंत्र के अभिशाप होने का यह मूल कारण है।

सोचिये छात्रों के लिये समाचार पत्र पढ़ना अनिवार्य किया जा रहा है किन्तु भारतीय ग्रन्थ को पढ़ने की बात नहीं की जा रही है। ये अभिशाप नहीं तो क्या है, नेताओं की अदूरदर्शिता नहीं तो क्या है ?

निष्कर्ष: सम्मान की पुनर्व्याख्या

लड़का और लड़की का ‘समान’ होना इस अर्थ में सही है कि दोनों ही ईश्वर की संतान हैं। लेकिन उनकी भूमिकाएं अलग हैं। शास्त्र पुरुष को ‘अधिकारी’ बनने के लिए तप की सलाह देते हैं, जबकि स्त्री को ‘मर्यादा’ में रहकर अपनी जन्मजात दिव्यता को सुरक्षित रखने की। अर्थात स्त्रियों को नैसर्गिक रूप से ही पवित्रता, श्रेष्ठता आदि प्राप्त होती है बस उसका संरक्षण मात्र करना ही उनके लिये तप है।

शास्त्रोक्त सत्य यह है कि स्त्री पुरुष की पूरक ही नहीं, उसकी आधारशिला है। पुरुष को महान ‘बनना’ पड़ता है, जबकि स्त्री महान ‘होती’ है। यदि हम उसे पुरुष की फोटोकॉपी बनाने का प्रयास कर रहे हैं, तो हम एक ‘महान’ तत्व को ‘समान’ बनाकर उसे छोटा कर रहे हैं। यह समानता नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता का सबसे बड़ा ‘अज्ञान’ है।

अतः, यदि समानता का अर्थ स्त्री को पुरुष जैसी स्वतंत्रता (स्वच्छंदता) देना है, तो यह ‘अज्ञान’ है। और यदि इसका अर्थ स्त्री की गरिमा को पहचान कर उसे वही उच्च स्थान देना है जो शास्त्रों ने दिया है, तो यह वास्तविक ‘सम्मान’ है।

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“क्या आप भी मानते हैं कि स्त्री को पुरुष के बराबर खड़ा करने की कोशिश में हम उसकी वह ‘दैवीय श्रेष्ठता’ छीन रहे हैं जो शास्त्रों ने उसे दी है? अपने विचार साझा करें।”

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।


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