कर्मकांड और रूढ़िवादिता या पिछड़ापन

कर्मकांड और रूढ़िवादिता या पिछड़ापन

क्या कभी ऐसा हुआ है कि कर्मकांड, धर्माचरण करने में आपको लज्जा की अनुभूति हुयी हो ? आप का प्रथम उत्तर नहीं हो सकता है किन्तु हम यहां अनेक अवसरों का उल्लेख करेंगे जब आपको अपने धर्म का पालन करने में लज्जा की अनुभूति होती है। यह विषय उनके लिये विशेष महत्वपूर्ण है जो कर्मकांड और धर्म में रुचि रखते हैं। यदि आप इन विषयों को गंभीरता से नहीं लेंगे तो आप भली-भांति कर्मकांड करना तो दूर प्रदर्शन मात्र भी नहीं कर सकते। इस आलेख में कर्मकांड या धर्माचरण रूढ़िवादिता/पिछड़ापन नहीं है यह बताया गया है।

त्रिदेव, त्रितत्व, त्रिलोक, त्रिगुण, त्रिताप इत्यादि की भांति ही तीन प्रकार के विचार भी होते हैं जिसे सकारात्मक, नकारात्मक और सम/मध्य/उदासीन भी कहा जा सकता है। इसी का वर्त्तमान में तीन अन्य नाम भी है दक्षिणपंथी, वामपंथी और न्यूट्रल।

दक्षिणपंथ नामकरण भी वामपंथियों और न्यूट्रल के द्वारा ही की गयी है। वास्तव में पंथ ही है और पंथ के विपरीत जो हो वह वामपंथ है और दोनों में से कोई भी न हो अथवा मिला-जुला हो वह मध्यमार्ग है। वामपंथ ने स्वयं का महिमामंडन करने के लिये पंथ को दक्षिणपंथ कहना आरंभ कर दिया। इसके कारण दोनों तुलनात्मक हो गया अन्यथा वामपंथ निन्दित था तुलनात्मक नहीं। यहां वैचारिक वामपंथ का प्रसंग है न कि तंत्रमार्ग का। यदि इसे एक उदाहरण से समझें तो अधिक स्पष्ट होगा :

दिन में जगना, रात में सोना पंथ है पंथ जिसमें थोड़ी विशेषता भी है कि रात्रि का प्रथम प्रहर प्रदोषकाल दिन की भांति ही ग्राह्य है एवं अंतिम चार मुहूर्त भी। यही सिद्धांत है और पंथ है किन्तु दक्षिणपंथ नहीं है। रात में जगना और दिन में सोना इसके विपरीत है अतः वामपंथ है, निन्दित है, किन्तु पंथ से तुलना की जा सके इस कारण पंथ को दक्षिणपंथ कहा जाने लगा। तीसरा दिन में भी जगना-सोना, रात में भी सोना-जगना मध्य है जो न ही पंथ है और न ही वामपंथ, किन्तु उसे भी स्वयं को सम/मध्य/उदासीन सिद्ध करने के लिये पंथ को दक्षिणपंथ कहना आवश्यक है क्योंकि पंथ व वामपंथ में तुलना नहीं किया जा सकता।

सम/मध्य वास्तव में वामपंथ से पृथक नहीं है, वामपंथ का ही एक अन्य स्वरूप है जो पंथ के विरुद्ध है और स्वयं के अस्तित्व की सिद्धि हेतु ही पंथ को इसने दक्षिणपंथ कहना आरंभ किया। क्योंकि पंथ और वामपंथ में सम की सिद्धि नहीं होती है इसलिये दक्षिणपंथ गढ़ा क्योंकि दक्षिणपंथ और वामपंथ में सम/मध्य की भी सिद्धि होती है। किन्तु वास्तविकता यही है कि जो सम/मध्य है वो पंथ विरुद्ध है किन्तु वामपंथ का सहयोगी है। दोनों में नाममात्र का ही भेद है वास्तव में दोनों एक ही हैं। एवं ये विषय पूर्णतः राजनैतिक है जो विचारधारा के रूप में विश्व में पायी जाती है।

विकास की दिशा या धारा

जब आधुनिक सोच, रूढ़िवाद आदि का प्रसंग आता है तो उसमें मुख्य आधार विकास ही होता है।

पंथ है सिला वस्त्र अशुद्ध होता है अतः धारणीय नहीं है, वामपंथ है सिला वस्त्र ही धारण करो पंथ जिसे धारण करने के लिये कहता है उसका (धोती) का त्याग करो और मध्य/सम कहता है धोती के प्रकार से पहनो किन्तु उसे सिलवा लो अर्थात देखने में धोती जैसा लगे (पंथ के जैसा) किन्तु सिलने का निषेध है और वामपंथी कहता है सिला हुआ ही पहनो अतः सिलवा लो। किन्तु वास्तव में यह वामपंथ ही है क्योंकि दिखने में भले ही धोती जैसा लगे किन्तु सिलवा लिया अर्थात पंथ का उल्लंघन किया इस कारण वह वामपंथ ही है, भले ही स्वघोषित सम/मध्य/न्यूट्रल क्यों न हो।

यहां आधार क्या है ? विकास ! वामपंथी और स्वघोषित सम/मध्य/न्यूट्रल धोती धारण करना रूढ़िवादिता, उन्नीसवीं सदी में जीना आदि सिद्ध करते हैं क्योंकि उनकी दृष्टि में पैंट आधुनिक है, सिला धोती आधुनिक है, विकास है। पंथ इसे अस्वीकार करता है और स्वप्न में भी ग्रहण नहीं करता इसलिये वामपंथी और सम दोनों ही पंथ को रूढ़िवादी, उन्नीसवीं सदी की विचार धारा, पुरानी सोच ही नहीं कहते विकास का विरोधी भी कहते हैं। क्योंकि यदि आप धोती पहनते थे और धोती ही पहनते रहेंगे तो विकास क्या करेंगे। विकास दिखाने के लिये आपको पैंट/सिला धोती पहनना होगा।

पंथ और वामपंथ की में अंतर हेतु आगे कुछ और भी उदाहरण प्रस्तुत किये जा रहे हैं और आगे वामपंथ का तात्पर्य जो वामपंथ और स्वघोषित सम/मध्य/न्यूट्रल है दोनों है (ये पूर्व में ही स्पष्ट कर दिया गया है कि यहां वामपंथ का तात्पर्य तंत्रमार्ग नहीं है, राजनीतिक विचारधारा है) :

पंथवामपंथ
धूप अगरबत्ती
दीप मोमबत्ती/इल्क्ट्रिक लाइट
पूजा डिजिटल पूजा/ऑनलाइन पूजा
घर में पकाया हुआ नैवेद्य दुकान में पकाया हुआ
घर में १२ अंगुल की प्रतिमा घर में विशाल प्रतिमा
स्त्री/लड़कियों के लिये शीलप्रदायक वस्त्र स्त्री/लड़कियों के लिये अंगप्रदर्शन करने वाले वस्त्र

इसी प्रकार से और भी ढेरों उदहारण प्रस्तुत किये जा सकते हैं और विकास की इस धारा में बहने का नाम विकासवादी, आधुनिकता आदि सिद्ध किया जाता है एवं विकास की इस दिशा में जो न बढ़ें उसे रूढ़िवादी, उन्नीसवीं सदी का, पुरानी सोच आदि कहकर हंसी का पात्र बनाया जाता है, निंदा की जाती है। इसका मुख्य उद्देश्य अर्थार्जन ही होता है। एवं इसके लिये कुतर्क भी किया जाता है जैसे खड़ाऊं को पुरानी सोच कहा जायेगा और जूते को आधुनिक, जबकि ऐसा नहीं है, खड़ाऊं भी प्राचीन है और जूते भी प्राचीन हैं।

खड़ाऊं और जूते का उदाहरण इसलिये दिया जायेगा कि अगरबत्ती, इलेक्ट्रिक लाइट, होटल का नैवेद्य, उत्तेजक वस्त्र, पैंट, सिले धोती आदि को ग्रहण करने हेतु प्रेरित किया जाय। इसी प्रकार से और भी अनेकों उदाहरण प्रस्तुत करेंगे बैलगाड़ी और ट्रैक्टर/रेलगाड़ी आदि, रथ और चार चक्के करते हुये मोबाइल और लैपटॉप तक भी पहुंच जायेंगे।

इनका उद्देश्य यही होता है कि आप धूप न जलाकर अगरबत्ती जलाओ, दीप न जलाकर इलेक्ट्रिक लाइट जलाओ, शालीनता प्रकट करने वाले वस्त्र न पहनकर अंगप्रदर्शन करने वाले वस्त्र पहनो, स्वस्थ न रहकर रोगी बनो आदि इत्यादि।

रोगी बनाने में भी अर्थ ही छुपा हुआ है और अर्थ ही वह कारण है जिसमें विकास का आवरण ओढ़कर सबको रोगी बनाया जा रहा है क्योंकि रोगी होने पर ही तो मेडिकल में जो विकास किया गया है उसका उपयोग किया जा सकता है, यदि लोग स्वस्थ रहें तो मेडिकल में जो विकास (कथित विकास) किया गया है उसका क्या औचित्य होगा, उसकी क्या उपयोगिता होगी ?

जब आप गंभीरता से सोचेंगे तो ज्ञात होगा कि संसार में जितनी भी वर्त्तमान समस्यायें हैं उनका मुख्य कारण ये अंधविकासवाद ही है और अंधविकासवाद को ही विकासवाद कहा जा रहा है। विकासवाद वो नहीं हो सकता जिससे लोग अस्वस्थ हों, अल्पायु हों, अनैतिकता-दुराचरण-अपराध आदि बढे, घर में भी असुरक्षित हो जाये, सांस लेना भी कठिन हो जाये। यदि ऐसी संभावनों को प्रश्रय देते हुये विकास किया जा रहा हो तो वह अंधविकासवाद है।

विकासवाद वो है जिससे लोगों का स्वास्थ्य उत्तम हो, लोग दीर्घायु हों, प्रकृति का संरक्षण हो, अनैतिकता-दुराचरण-अपराध आदि कम हों, देश की सीमा पर भी किसी को असुरक्षित होने का भय न हो, सभी गहरी नींद ले सकें, स्वच्छ वायु का स्वास ले सकें। और यदि ऐसा परिणाम नहीं हो रहा है तो भी अंधविकासवाद है विपरीत परिणाम देने वाले के लिये तो कहना ही क्या ?

विकासवाद का वर्त्तमान स्वरूप जिसे हम अंधविकासवाद कह रहे हैं इसने हो सकता है कि दो-चार वायरस से मुक्ति दिलाई हो, किन्तु इससे कई गुणा वृद्धि भी तो किया है। ये अंधविकासवाद ही है जिसका सिद्धांत है वायरस फैलाओ, जनता में त्राहिमाम मचाओ, फिर लूटो, टीका बनाओ, फिर टीके के दुष्परिणाम को दिखाओ फिर उसके लिये आगे बढ़ते जाओ। विकासवाद तो वह होगा जो बिना टीके के सुरक्षा प्रदान करे अर्थात कोई ऐसी विधा जो शरीर को ही समर्थ कर दे, जिसका कोई दुष्परिणाम भी न हो।

ये अंधविकासवाद ही है कि लोगों ने कर्मकांड में हाथ से बने दीपक का प्रयोग बंद कर दिया और बाजार से क्रय करके (निषिद्ध) दीप का प्रयोग करने लगे। यदि न करें तो पुरानी सोच, उन्नीसवीं सदी का मानव, रूढ़िवादी आदि से विभूषित किये जायेंगे। इसी प्रकार अन्य वस्तुयें भी जो क्रय नहीं करना चाहिये यथा फूल; वो सब भी क्रय करने लगे हैं।

रूढ़िवादी सोच और आधुनिक सोच

अब हमें किन-किन कारणों से रूढ़िवादिता कहते हुये तिरस्कृत/अपमानित किया जाता है और उसके स्थान पर कब आधुनिकता-वैज्ञानिकता आदि कहकर प्रोत्साहित किया जाता है उसके कुछ उदाहरण भी देखने की आवश्यकता है।

रूढ़िवादिताआधुनिकता
पारम्परिक परिधान जो लज्जारक्षण करेकटे-फटे-छोटे परिधान जो अधिकतम अंगप्रदर्शन करे
तिलक-शिखा-यज्ञोपवीत आदि धारण करनातिलक-शिखा-यज्ञोपवीत आदि त्याग करना
पति-पत्नी का परस्पर नामोच्चारण न करनापति-पत्नी का परस्पर एक दूसरे को नाम से सम्बोधित करना
द्रव्यशुद्धि का विचार करनाद्रव्यशुद्धि का विचार न करना
बड़ों का चरणस्पर्श पूर्वक आशीर्वाद ग्रहण करनागर्मजोशी के साथ एक दूसरे से हाथ मिलाना

इसी प्रकार और भी अनेकानेक परिस्थिति है जिसमें रूढ़िवादिता, पुरानी सोच आदि जिसे कहा जाता है वह भारतीय संस्कृति है और जिसे आधुनिक सोच कहा जाता है वह विदेशी शैली-व्यवहार है।

यदि भारतीय संस्कृति, संस्कार, धर्म आदि का पालन किया जाय तो वह रूढ़िवादिता किस प्रकार से सिद्ध हो जाती है यह समझना कठिन तो है ही और यह समझना और भी कठिन है कि यदि भारतीय संस्कृति, संस्कार, धर्म का त्याग कर विदेशी शैली का अनुगमन किया जाय तो वह आधुनिकता कैसे हो जाती है ?

कर्मकांड और जीवनशैली

ऊपर जीवनशैली से संबंधित चर्चा की गयी है जिसमें स्वसंस्कृति का पालन करना रूढ़िवादिता घोषित किया जाता है और स्वसंस्कृति का त्याग करके विदेशी रंग में रंग जाना आधुनिकता का प्रमाणपत्र होता है। यह ठीक उसी प्रकार है अपनी मां को मां कहोगे तो रूढ़िवादी हो, अपनी मां को वृद्धाश्रम में रख आओ (त्याग दो) और अन्य स्त्रियों को आंटी-आंटी कहकर आगे-पीछे करते रहो।

जीवनशैली में विचार पूर्वक आधुनिकता का समावेश हो सकता है। वाहन, मोबाइल, लैपटॉप, दूरदर्शन आदि के उपयोग को जीवनशैली प्रतिबंधित नहीं करती है। किन्तु कर्मकांड में यह प्रतिबंधित हो जाता है कारण कि यहां वो विज्ञापन भी चलते रहते हैं जो कामोत्तेजक भी होते हैं, यहां की सामग्रियां भावनाओं को दूषित करने वाली ही होती है।

इस आलेख में भी जो विज्ञापन होगा वो किस प्रकार का होगा मेरे अधीन नहीं है और उत्तेजना बढ़ाने वाला अर्थात काम भावना को बढ़ाने वाला भी हो सकता है। जब आप कर्मकांड में स्थित होते हैं तो आपको मानसिक-वैचारिक सभी प्रकार से शुद्ध रहना आवश्यक होता है। यदि पूजा-पाठ करते समय भी आप काम-क्रोध-लोभ-मोह का त्याग कर भी दें तो भी यदि इन सबका प्रयोग करेंगे तो सबका आक्रमण होगा और मन दूषित होगा।

विभिन्न पौराणिक कथाओं से यही ज्ञात होता है कि साधना-तपस्या भंग करने में काम (sex) सबसे ऊपर है। प्रलोभन, भय आदि से भी जो विचलित न होता हो उसकी तपस्या भी कामदेव ने अप्सराओं के माध्यम से काम (sex) भावना को जागृत करके भंग कर दिया। फिर आप एक तरफ कर्मकांड करते रहो और दूसरी तरफ इन सब उपकरणों में उत्तेजक सामग्रियां देखते रहो यह कैसे संभव है। आप नवरात्रा में हो नौ दिनों तक नियमपूर्वक रहना चाहिये, किन्तु सोशलमीडिया पर फोटो-फोटो-फोटो – विडियो-विडियो-विडियो करते रहते हो तो मन साधना में नहीं सोशलमीडिया में लगा है।

इसका सबसे बड़ा और घृणित प्रमाण विवाह में देखने को मिलता है। विवाह में विधियां-मंत्र कब-क्या-कैसे हो इससे कोई लेना देना नहीं किन्तु फोटो और विडियो बनवाना यही सबके मन में रहता है। फोटो-विडियो के चक्कर में पंडित जी (कर्मकांडी) को भी कभी इधर-कभी उधर करते हुये पेंडुलम बनाकर रख दिया जाता है जो कि भयावह और दुष्परिणामकारक होता है।

कैमरामेन ऐसा व्यक्ति होता है जिसे पंडित जी कितना सम्मानीय होते हैं इसका ज्ञान ही नहीं होता, उच्चक्का-लफंगा कहता है पंडित जी थोड़ा इधर डोलिये, थोड़ा हट जाईये, थोड़ा खिसक जाईये। और सारा गुड़ यहीं पर गोबर हो जाता है। अरे यदि कैमरामैन के साथ लाइटमैन न हो तो लाइट पकड़ने के लिये भी पंडित जी को कह सकता है। इसके पश्चात् जो अंतिम विडियो मिलता है उसमें से मंत्र, पारम्परिक गीत हटा दिया जाता है और फिल्मी गाने भर दिये जाते हैं। आधुनिकता है, इसी को तो आधुनिक सोच कहते हैं, मंत्र तो रूढ़िवादिता है, पारम्परिक गीत तो रूढ़िवादिता की पहचान है।

वैसे वर्तमान युग में भी गांव के कर्मकांडी (कुशल) आधुनिक नहीं बन पाये हैं और जो भी कुशल कर्मकांडी होगा वो भविष्य में भी कभी आधुनिकता का प्रमाणपत्र नहीं चाहेगा। कुशल कर्मकांडी सदैव शास्त्र का सम्मान ही करेगा और इस कारण रूढ़िवादी ही कहलायेगा। किन्तु नगरों/महानगरों के पंडित रूढ़िवादी नहीं होते, आधुनिक बन जाते हैं। स्वयं ही धोती धारण नहीं करते तो यजमान को क्या कहेंगे। कुछ काल पूर्व एक ऐसा भी विडियो वायरल हुआ था जिसमें फिल्मी गाने गाकर फेरे लगाये जा रहे थे।

क्या आप कुशल कर्मकांडी बनना चाहते हैं

अब आपसे के प्रश्न है क्या आप एक कुशल कर्मकांडी बनना चाहते हैं ? ये प्रश्न स्वयं से करें तो आपको उन वामपंथियों के आधुनिकता का प्रमाणपत्र आवश्यक नहीं है। वो सभी वामपंथी ही हैं जो पंडितों को भी कहते हैं अब धोती कौन पहनता है, समय के साथ चलिये। यदि आप कुशल कर्मकांडी बनना चाहते हैं तो आपको उन आधुनिक सोच वाले वामपंथियों की दृष्टि में रूढ़िवादी ही बने रहना होगा।

  • कर्मकांड काल में मोबाईल आदि का प्रयोग नहीं करना रूढ़िवादिता नहीं है किन्तु माइक का भी प्रयोग नहीं करना रूढ़िवादिता है।
  • भोजन भूमि पर बिछाये आसन आसन पर बैठकर करना रूढ़िवादिता नहीं है, बफ-सिस्टम में जूते पहनकर खड़े-खड़े व चलते-फिरते भोजन नहीं करना रूढ़िवादिता नहीं है, जूठे प्लेटों के स्थान पर पत्ते का प्रयोग करना रूढ़िवादिता नहीं है अपितु ये आधुनिकता ही पतित बनाने वाली है।
  • ये वामपंथी जो स्वयं को हिन्दू का प्रमाणपत्र भी देते रहते हैं कि मैं भी हिन्दू हूँ स्वयं तो पतित होते ही हैं आपको भी आधुनिकता का प्रमाणपत्र लेने के लिये पतित कर सकते हैं।

यदि आप कुशल कर्मकांडी बनना चाहते हैं तो आपको इस विषय का गांठ बांधना ही होगा कि आधुनिकता का प्रमाणपत्र नहीं चाहिये। वामपंथी जो स्वघोषित रूप से आधुनिक सोच रखते हैं, स्वसंस्कृति-धर्म का परित्याग करके विदेशी व्यवस्था के दलदल में फंस गये हैं वो आपको भी उसी दलदल में गिराने की सोच रखते हैं। कर्मकांड में कैसी आधुनिकता आ सकती है इसके भी कुछ उदाहरण हैं, जिसमें से कुछ ऊपर भी बताये जा चुके हैं :

  • मंत्र पाठ छंद में न करके फिल्मी धुनों पर करना।
  • जप की गणना माला पर न करके डिजिटल माला का प्रयोग करना।
  • पर्युषित (बासी) फूल का प्रयोग करना।
  • पूजा आदि में थर्मोकॉल आदि के बने दोने-प्लेट का प्रयोग करना।
  • पूजा में अन्य अग्राह्य वस्तुओं का भी प्रयोग करना जिसका स्पर्श भी नहीं करना चाहिये।

सारांश : कर्मकांड सीखें का उद्देश्य मंत्र-विधि बताना मात्र नहीं है, इस वेबसाइट पर कर्मकांड के गूढ़ विषयों की गंभीर चर्चा की जाती है जो आपके कुशल कर्मकांडी बनने में सहायक सिद्ध हो सकती है। कुशल कर्मकांडी बनने में एक सबसे बड़ी बाधा है रूढ़िवादी कहलाने का भय। यदि आप एक कुशल कर्मकांडी बनना चाहते हैं तो यह आलेख आपके उसी भय का निवारण करने वाला है। कर्मकांड में रूढ़िवादिता नहीं होती जो शास्त्रों में है वही करना कर्मकांड है, यदि आधुनिकता कहकर उसका त्याग कर दिया जाय तो पतन हो जाता है।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।


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