कलिवर्ज्य प्रकरण : क्या आप जानते हैं कलयुग में क्या-क्या वर्जित है – kalivarjya

कलिवर्ज्य प्रकरण : क्या आप जानते हैं कलयुग में क्या-क्या वर्जित है - kalivarjya कलिवर्ज्य प्रकरण : क्या आप जानते हैं कलयुग में क्या-क्या वर्जित है - kalivarjya

कलि वर्ज्य कृत्य भाग – ३

२१ : गुप्त प्रायश्चित्त – चोरी के अतिरिक्त अन्य महापातकों के लिए गुप्त प्रायश्चित्त कलिवर्ज्य है। हारीत ने उस ब्राह्मण के लिए गुप्त प्रायश्चित्त की व्यवस्था की है जिसने धर्मशास्त्र का पंडित होते हुए भी कोई ऐसा पाप किया है जिसे कोई अन्य नहीं जानता।

गौतम (अ० २४) ने ब्रह्महत्या, सुरापान, व्यभिचार और सोने की चोरी जैसे महापातकों के लिए गुप्त (छिपे तौर से किये जानेवाले, अर्थात् जिन्हें कोई अन्य न जाने) प्रायश्चित्तों की व्यवस्था की है। वसिष्ठ (अ० २५) ने भी इसका समर्थन किया है और कहा है (२५।२) कि केवल वे ही लोग गुप्त प्रायश्चित्तों के अधिकारी हैं जो वैदिक अग्निहोत्र करते हैं, अनुशासित और वृद्ध या विद्वान् (श्रुति-धर्म, स्मृति-धर्म आदि में विज्ञ) है। विष्णु ध० स० (५५) ने गुप्त प्रायश्चित्तों का विवेचन किया है ।

पराशर (९।६१) ने सामान्य नियम दिया है कि व्यक्ति को अपने अपराध की घोषणा कर देनी चाहिये। कलिवर्ज्य-सम्बन्धी उक्तियों में ऐसा आया है कि महापातकों में से केवल चोरी के लिए गुप्त प्रायश्चित्त करना चाहिये, यद्यपि प्रारंभिक युगों में अन्य महापातकों के लिए भी ऐसी व्यवस्था थी।

“निर्णयसिन्धु’ के मतानुसार गुप्त प्रायश्चित्त की अनुमति केवल ब्राह्मणों को ही मिली है। ‘धर्मसिन्धु’ का कथन है कि कलियुग में ब्रह्महत्या एवं अन्य महापातकों के कारण प्रायश्चित्त करने से व्यक्ति नरक में गिरने से बच नहीं सकता, किन्तु सामाजिक सम्बन्धों के लिए वह योग्य सिद्ध हो जाता है। परन्तु सोने की चोरी जैसे महापातक का प्रायश्चित्त करने से व्यक्ति नरक में गिरने से भी बच जाता है और सामाजिक सम्बन्धों के योग्य भी हो जाता है। कलिवर्ज्यविनिर्णय के मतानुसार कलियुग में सभी गुप्त प्रायश्चित्त निषिद्ध अथवा वर्जित हैं।

२२ : पशूपाकरण – वैदिक मन्त्रों के साथ वर (दूल्हे), अतिथि एवं पितरों के सम्मान में पशूपाकरण कलिवर्ज्य है।

२३ : जाति संसर्ग – असवर्ण स्त्रियों के साथ व्यभिचार करने के उपरान्त प्रायश्चित्त करने पर भी जाति संसर्ग कलिवर्ज्य है ।

गौतम (२३।१४-१५) एवं वसिष्ठ (२१११-३) ने नीच जाति के पुरुष को जब वह किसी उच्च जाति की नारी से व्यभिचार करता है, कई प्रकार से मार डालने की व्यवस्था दी है।

यदि कोई ब्राह्मण किसी चांडाल या श्वपाक नारी से सम्भोग करे तो उसे पराशर (१०१५-७) के मत से तीन दिनों का अनशन, शिखा के साथ शिर-मुण्डन, तीन प्राजापत्य तथा ब्रह्मकूर्च करने पड़ते हैं, ब्राह्मण भोजन कराना पड़ता व्रत है, लगातार गायत्री जप करना पड़ता है, दो गौ दान में देनी पड़ती हैं और तब कहीं वह शुद्ध हो पाता है। किन्तु इसी दुष्कर्म के लिए शूद्र को एक प्राजापत्य एवं दो गायों का दान करना पड़ता है।

यदि कोई नीच जाति का व्यक्ति उच्च जाति की नारी से सम्भोग करे (यथा शूद्र ब्राह्मण नारी से) तो संवर्त (श्लोक १६६-१६७) ने एक महीने तक केवल गोमूत्र एवं यावक (जो की लप्सी) पर रहने के प्रायश्चित्त की व्यवस्था दी है।

यदि ब्राह्मण किसी शद्र या चाण्डाल नारी से व्यभिचार करे तो संवर्त (१६९- १७०) के मत से उसे चान्द्रायण-व्रत करना पड़ता है, किन्तु पराशर (१०।१७-२०) ने इससे अधिक कठिन प्रायश्चित्त की व्यवस्था दी है।

किन्तु कलिवर्ज्य की व्यवस्था ऐसी है कि प्रायश्चित्त के उपरान्त भी असवर्ण नारियों के साथ व्यभिचार के अपराधी व्यक्ति अपनी जाति के लोगों के साथ सम्बन्ध नहीं स्थापित कर सकते, अर्थात् वे जातिच्युत हो जाते हैं । और ‘धर्मसिन्धु’ जहाँ यही बात शूद्रों के लिए कही गयी है। यह कलि-वर्ज्य निस्सन्देह नैतिकता की कठोरता के लिए व्यवस्थापित है. किन्त इससे जाति-गण विशेषकी रक्षा भी हो जाती है।

२४ : सम्मान्य स्त्री परित्याग – किसी नीच जाति के व्यक्ति से सम्भोग करने पर माता (या उसके जैसी सम्मान्य स्त्री) का परित्याग कलिवर्ज्य है। गौतम (२३।१४) एवं मनु (८।३७१) के मत से किसी नीच जाति के पुरुष से सम्भोग करने वाली स्त्री को राजा द्वारा कुत्तों से नोचवा डाला जाना चाहिये।

किन्तु अन्य स्मृतियाँ (स्वयं मनु ११११७७) इतनी कठोर नहीं हैं, प्रत्युत वे व्यभिचारियों से सम्बन्धित व्यवहार (कानून) के विषय में अधिक उदार हैं । मनु (९।५९) एवं याज्ञ० (३२२-५) ने पुरुष के व्यभिचार (पारदार्य) को उपपातक कहा है और सभी उपपातकों के लिए चान्द्रायण व्रत प्रायश्चित्त की व्यवस्था दी है। (मनु ११।११७ एवं याज्ञ० ३।२६५) ।

वशिष्ठ (२१।१२) के मत से तीन उच्च वर्णों की नारियां यदि किसी शूद्र से व्यभिचार करायें और उन्हें कोई संतानोत्पत्ति न हुई हो तो उन्हें प्रायश्चित्त से शुद्ध किया जा सकता है, अन्यथा नहीं। याज्ञ० (१/७२) ने कहा है कि वह नारी व्यभिचार के अपराध से बरी हो जाती है जिसे व्यभिचार के उपरान्त मासिक धर्म हो जाय, किन्तु यदि व्यभिचार से गर्भाधान हो जाय तो वह त्याज्य है ।

‘मिताक्षरा (याज्ञ० १/७२) ने कहा है कि याज्ञ० और वसिष्ठ के मत को एक ही अर्थ में लेना चाहिये और परित्याग का तात्पर्य घर से निकाल देना नहीं है, प्रत्युत उसे धार्मिक कृत्यों तथा उसके साथ सम्भोग से उसे वंचित कर देना मात्र है ।

वसिष्ठ (२१/१०) ने चार प्रकार की स्त्रियों को त्याज्य माना है-पति के शिष्य से या पति के गुरु से सम्भोग करनेवाली तथा पतिहन्ता या नीच जाति के पुरुष से व्यभिचार करनेवाली नारी। याज्ञ० (३।२९६-२९७) ने कहा है कि पतित नारियों के लिए नियम पुरुषों के समान है, किन्तु उन्हें भोजन, वस्त्र एवं रक्षण मिलना चाहिये और नीच जाति के पुरुष से सम्बन्ध करने पर उन्हें जो पाप लगता है, वह स्त्रियों के तीन महापातकों में परिगणित होता है।

“मिताक्षरा’ (याज्ञ. ३/२९७) में कलिवर्ज्य सन्दर्भ में आया है कि वह स्त्री, जो अपने सम्बन्ध (माता, बड़ी बहिन आदि) के कारण व्यक्ति से सम्मान पाने का अधिकार रखती है, वह द्वारा न तो त्याज्य है और न सड़क पर छोड़ दिये जाने के योग्य है, भले ही वह किसी नीच जाति के व्यक्ति के साथ व्यभिचार करने की अपराधिनी हो। स्पष्ट है, यह कलिवर्ज्य वचन स्त्रियों के प्रति प्राचीन वचनों की अपेक्षा अधिक उदार है।

आप० धर्मसू० (१।१०।२८९) ने कहा है कि पुत्र को अपनी माता की सेवा करनी चाहिये और उसकी आज्ञाओं का पालन करना चाहिये, चाहे वह पतित ही क्यों न हो । अत्रि० (१९५-१९६) एवं देवल (५०-५१) का कथन है-“यदि कोई स्त्री असवर्ण पुरुष के सम्भोग से गर्भ धारण कर ले तो वह सन्तानोत्पत्ति तक अशुद्ध है। किन्तु जब वह गर्भ से मुक्त हो जाती है या उसका मासिक धर्म आरम्भ हो जाता है, तब वह सोने के समान पवित्र हो जाती है।”

अत्रि (१९७-१९८) ने आगे कहा है कि यदि स्त्री अपनी इच्छा से किसी अन्य के साथ सम्भोग करे या वह वंचित होकर ऐसा करे या उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई वैसा करे या छिपकर वैसा करे तो वह त्याज्य नहीं होती, मासिक धर्म तक उसे देख लेना चाहिये और वह पुनः रजस्वला होने पर पवित्र हो जाती है । अत्रि एवं देवल की उदारता कलिवर्ज्य वचन से और चमक उठती है, क्योंकि वह व्यभिचारिणी माँ को त्याज्य नहीं कहता, पर नीच जाति से सम्भोग करनेवाली अन्य स्त्रियों के त्याग की अनुमति देता है।

देवल ने म्लेच्छों द्वारा बलपूर्वक संभुक्त एवं गर्भवती बनाई गयी नारियों को संतापन नामक प्रयश्चित्त द्वारा पवित्र बना लेने की व्यवस्था दी है।


Discover more from कर्मकांड सीखें

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *