कलिवर्ज्य कृत्य भाग २
१५ : सौत्रामणी में मद्यपान – सौत्रामणी में मद्यपान का प्रयोग कलिवर्ज्य है। सौत्रामणी सोमयज्ञ नहीं है, प्रत्युत यह पशुयज्ञ के साथ एक इष्टि है। यह शब्द सुत्रामन् ( इन्द्र के एक नाम ) से बना है। आजकल इसके स्थान पर दूध दिया जाता है, जिसे ‘आपस्तम्बश्रौतसूत्र’ ने प्राचीन काल में भी प्रतिपादित किया था। गौतम (८/२०) ने सौत्रामणी को सात हविर्यज्ञों में रखा था। राजसूय के अन्त में या अग्निचयन में या जब तक कोई व्यक्ति अत्यधिक सोमपान करने से वमन करने लगता था या अधिक मलत्याग करने लगता था, तो इसका सम्पादन होता था।
१६ : अग्निहोत्रहवणी का चाटना – अग्निहोत्रहवणी का चाटना तथा चाटने के उपरान्त भी उसका प्रयोग कलिवर्ज्य है।*अग्निहोत्र में स्रुव को दाहिने हाथ में तथा स्रुच( अग्निहोत्रहवणी) को बायें हाथ में रखा जाता था तथा अग्निहोत्रहवणी में स्रुव द्वारा दुग्धपात्र से दूध निकालकर डाला जाता था। अग्निहोत्र होम के उपरान्त अग्निहोत्रहवणी को दो बार चाट लिया जाता था जिससे दुग्ध के अवशिष्ट अंश साफ हो जायें। इस प्रकार चाटने के उपरान्त उसे कुश के अंकुरों से पोंछकर उसका प्रयोग पुनः किया जाता था।
सामान्यतः यदि कोई पात्र एक बार चाट लिया जाता है तो किसी धार्मिक कृत्य में उसे फिर से प्रयोग करने के पूर्व पुनः शुद्ध कर लेना आवश्यक है। किन्तु यह नियम अग्निहोत्रहवणी एवं सोम के चमसों (पात्र प्यालों) के विषय में लागू नहीं था। किन्तु अब यह कृत्य कलिवर्ज्य है।
१७ : वानप्रस्थ आश्रम – वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करना अब कलिवर्ज्य है। गौतम (३।२५-३४), आप० घ० सू० (२।९।२१।१८ से २।९।२३।२ तक), मनु (६।१-३२), वसिष्ठ (९।१-११) एवं याज्ञः (३।४५-५५)।
१८ : अशौच संकोच – वैदिक अध्ययन एवं व्यक्ति *को जीवन-विधि के आधार पर अशौचावधि में छूट अब कलिवर्ज्य है। अघ का अर्थ है अशौच, वृत्त ( जीवन-विधि) का सम्बन्ध है पवित्र अग्निहोत्र करने या शास्त्रानुमोदित नियमों के अनुसार जीवन-यापन करने से (मन ४/७-१०)। किसी सपिण्ड को मृत्यु पर ब्राह्मण के लिए अशौचावधि दस दिनों की होती है। (गौतम १४।१; मनु ५।५९ एवं ८३), किन्तु अंगिरा (मिताक्षरा, याज्ञ० ३।२२) ने सभी वर्गों के लिए इस विषय में दस दिनों की अशौचावधि प्रतिपादित की है।
दक्ष (६६) एवं पराशर (३५) का कहना है कि वह श्रोत्रिय ब्राह्मण जो वैदिक अग्निहोत्र करता है और वेदज्ञ है, अशौच से एक दिन में मुक्त हो जाता है, अग्निहोत्र न करनेवाला वेदज्ञ ब्राह्मण तीन दिनों में; किन्तु जो दोनों गुणों से हीन है, दस दिनों में मुक्त होता है । अपरार्क ( पृ० १९४) एवं हरदत्त (गौतम १४।१) ने इसी विषय में बहस्पति के वचन दिये है।
मिताक्षरा’ (याज्ञ० ३।२८-२९) का कथन है कि अशौचावधि का संकोच (कम करना) सब बातों के लिए सिद्ध नहीं है, इसका प्रयोग केवल विशिष्ट बातों तक ही सीमित है। यथा – दानग्रहण, अग्निहोत्र-सम्पादन, वेदाध्ययन तथा वे कृत्य जिनके सम्पादन में अशोचावधि में संकोच न करने के कारण कष्ट या कोई विपत्ति आ सकती है। ”
१९ : ब्राह्मणों के लिए मृत्युदण्ड – ब्राह्मणों के लिए प्रायश्चित्तस्वरूप मृत्यु-दण्ड कलिवर्ज्य है।* मनु (११३८९) ने व्यवस्था दी है कि यदि कोई व्यक्ति जान-बूझकर ब्रह्म हत्या करता है तो उसके लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं है। उन्होंने (११।९०) सुरापान के पापमोचन के लिए खौलती सुरा पीकर मर जाने की व्यवस्था दी है, और कहा है (११/१४६) कि यदि कोई जान बूझकर सुरापान करे तो उसके लिए मृत्यु के अतिरिक्त कोई दूसरा प्रायश्चित्त नहीं है।
‘विष्णुधर्मसूत्र’ (अ० ३४) का कथन है कि माता, पुत्री या पुत्र-वधू के साथ व्यभिचार अतिपातक (महापातक) है, ऐसे पापियों के लिए अग्निप्रवेश से बड़ा कोई अन्य प्रायश्चित्त नहीं है । कुछ स्मतियों ने ऐसे महान अपराधों के लिए प्रपात से गिरकर मरने या अग्निप्रवेश के अतिरिक्त अन्य किसी प्रायश्चित्त की व्यवस्था नहीं दी है। किन्तु आगे चलकर ब्राह्मण का शरीर क्रमशः अधिक पवित्र माना जाने लगा, अतः ब्राह्मण पापी के लिए मृत्यु का दण्ड प्रायश्चित्त रूप में वर्जनीय समझा गया, चाहे उसका पाप कितना भी गम्भीर क्यों न हो। किन्तु यह छट क्षत्रियों आदि के लिए नहीं थी।
२० : पतितसंगजन्य अपवित्रता – पतित को संगति (सहाचरण) से प्राप्त अपवित्रता या पाप कलिवर्ज्य है। मनु ११।१८० शान्ति १६५।३७ , बौधायन ध० सू० १।८८) तथा ‘विष्णुधर्मसूत्र’ (३५।२-५) ने कहा है कि वह व्यक्ति पतित हो जाता है जो किसी महापातकी के संसर्ग में एक वर्ष तक रहता है, उसके साथ एक ही आसन या वाहन पर बैठता है या उसके साथ बैठकर एक ही पंक्ति में खाता है। किन्तु वह व्यक्ति उसी क्षण पतित हो जाता है जो किसी पापी का पुरोहित बनता है या उसे गायत्री या वेद पढ़ाने के लिए उसका उपनयन-संस्कार करता है या उसके साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करता है ।
पराशर (१/२५-२६) का कहना है कि कृतयुग में पतित से बोलने, त्रेता में उसको देखने, द्वापर में पतित के घर में बना भोजन खाने से व्यक्ति पतित हो जाता है, किन्तु कलियुग में अपराध-कर्म करने से व्यक्ति पतित होता है। कृतयुग में वह जनपद, जहां पतित निवास करता है, छोड़ देना पड़ता है और त्रेता में पतित के ग्राम को, द्वापर में उसके केवल कुछ को एवं कलि में केवल पतित को छोड़ देना पड़ता है।
पराशर (१२।७९) ने निस्सन्देह यह कहा कि ‘बैठने या साथ सोने या एक ही वाहन या आसन का प्रयोग करने, उससे बोलने या एक ही पंक्ति में पतित के साथ खाने से पाप उसी प्रकार अपने में आ जाते हैं जैसे जल में तेल की एक बूंद फैल जाती है। किन्तु इसका तात्पर्य केवल इतना ही है कि पतित का संसर्ग बुरा है, इससे यह न समझना चाहिये कि पतित के संसर्ग से कोई व्यक्ति उसी समय अपवित्र अथवा पापी हो जाता है ।
‘मिताक्षरा (याज्ञ० ३।२६१) ने देवल एवं वृद्ध-बहस्पति को उद्धृत कर संसर्ग की उत्पत्ति निम्न नौ प्रकारों में बाँटी है, यथा-संलाप से, स्पर्श से, निःश्वास से (एक ही कक्ष में रहने से), सहयान से, सहआसन से, सहाशन (एक पंक्ति में साथ बैठकर खाने) से, याजन (पुरोहिती) से या वेदाध्ययन से या वैवाहिक सम्बन्ध स्थापन से –
- संवत्सरेण पतति पतितेन सहाचरन् । याजनाध्यापनाद्यौनान्न तु यानासनाशनात् ॥ मनु (११।१८०); बौ० ध० सू० (२।१। ८८) । त्यजेद् देशं कृतयुगे त्रेताया ग्राममुत्सृजेत् ।
- द्वापरे कुलमेकं तु कर्तारं च कलौ युगे ॥
- कृते सम्भाषणात्पापं त्रेतायां चैव दर्शनात् । द्वापरे चान्नमादाय कलौ पतित कर्मणा ॥ पराशर (१।२५-२६) ।
- आसनाच्छयनाद्यानात्सम्भाषात् सहभोजनात् । संक्रामन्ति हि पापानि तैलबिन्दुरिवाम्भसि ॥ पराशर (१२।७९)।
- संलापस्पर्शनिःश्वाससहयानासनाशनात् । याजनाध्यापनाद्यौनात्पापं संक्रमते नृणाम् ॥ देवल (मिता०, याज्ञ०, ३।२६१; अपरार्क पृ० १०८७)।
पराशर ने कलि में कई प्रकार के संसर्गों में पातित्य नहीं माना है, अतः उन्होंने संसर्ग के लिए कोई प्रायश्चित्त निर्धारित नहीं किया। यही बात निर्णयसिन्धु एवं भट्टोजि दीक्षित ने भी कही है (उद्वाहतत्त्व) ।
अधिकांश में सभी निबन्ध इस विषय में एकमत हैं कि मनु एवं बौधायन द्वारा प्रतिपादित संसर्ग-सम्बन्धी कठिन नियम कालान्तर में संशोधित हो गये, क्योंकि कलियुग में पापी से बातचीत करना या उसे देखना पाप-कर्म नहीं समझा गया है।
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