कलिवर्ज्य प्रकरण : क्या आप जानते हैं कलयुग में क्या-क्या वर्जित है – kalivarjya

कलिवर्ज्य प्रकरण : क्या आप जानते हैं कलयुग में क्या-क्या वर्जित है - kalivarjya

कलयुग में जीवन जीने का तरीका अन्य युगों से भिन्न है और इसमें अनेकानेक ऐसे वर्ज्य विधान हैं जो अन्य युगों में प्रशस्त थे और इसे कलिवर्ज्य नाम से जाना जाता है। कलिवर्ज्य (kalivarjya) का सीधा तात्पर्य है वो विधान-कर्म-आचरण-व्यवहार जो अन्य युगों में तो प्रशस्त थे, शास्त्राज्ञा थी किन्तु उन्हीं शास्त्रों में कलयुग के लिये निषेध भी किया गया है। धर्म में आस्था रखने वालों के लिये कलिवर्ज्य का ज्ञान होना अत्यावश्यक होता है और इस आलेख में अर्थात कलिवर्ज्य प्रकरण में कलिवर्ज्य का संग्रह प्रस्तुत किया गया है जो कि बहुत ही महत्वपूर्ण है।

बहुधा ऐसा देखा जाता है कि सङ्कलनकर्ता व्यक्ति का नाम छुपाकर, कृतघ्नतापूर्वक लोग सामग्रियां प्रस्तुत करते हैं और उसमें मेरे अनेकों आलेख भी हैं जो “संपूर्ण कर्मकांड विधि” पर प्रकाशित हैं एवं संकलन करना कितना जटिल कार्य होता है यह मुझे ज्ञात है। अस्तु यह संकलन जिनका है श्रेय उनको ही दिया जायेगा।

इस संकलन (कलिवर्ज्य प्रकरण) का श्रेय संकलनकर्त्ता आचार्य दीनदयालमणि त्रिपाठी जी को ही जाता है और इसके लिये हम उनके आभारी हैं कि वो इतना परिश्रम करते हुये ऐसे संकलन सतत अपने व्हाटसप समूह “ब्रह्मसूत्र” में प्रस्तुत करते रहते हैं। यहां उनकी छवि भी प्रस्तुत की गयी है। आगे का भाग यथावत प्रस्तुत किया गया है जैसा की प्राप्त हुआ है।

आचार्य दीनदयालमणि त्रिपाठी जी
आचार्य दीनदयालमणि त्रिपाठी जी

॥ कलिवर्ज्य प्रकरण ॥

कलिवर्ज्य प्रकरण में आचार्य दीनदयालमणि त्रिपाठी जी द्वारा किया गया संकलन अभूतपूर्व है और इसके लिये बारंबार वंदनीय हैं। शास्त्रों में यत्र-तत्र कलिवर्ज्य वर्णित तो हैं किन्तु उनका संकलन न होने से कठिनाई होती है। इस संकलन से एक ही आलेख में सम्पूर्ण कलिवर्ज्य विषय समाहित हो जाता है।

कलिवर्ज्य कृत्य भाग – १

१ : ज्येष्ठांश, उद्धार या उद्धार-विभाग : ज्येष्ठ पुत्र को जब सम्पूर्ण पैतृक सम्पत्ति या कुछ विशिष्ट अंश दिया जाता है तो उसको ज्येष्ठांश या उद्धार या उद्धार-विभाग को संज्ञा मिलती है. यह कलि में वर्ज्य है। (वर्त्तमान में लोग ज्येष्ठांश को भूल भी चुके हैं, वर्ज्य भले ही हो किन्तु ज्ञान होना आवश्यक है।)

२ : नियोग – जब पति या पत्नी पुत्रहीन होते हैं तो पति के भाई अर्थात् देवर या किसी सगोत्र आदि द्वारा पत्नी से सन्तान उत्पन्न की जाती है तो यह प्रथा नियोग कहलाती है। अब यह कलिवर्ज्य है ।

३ : वर्ज्यपुत्र – गौण पुत्रों में औरस एवं दत्तक पुत्र को छोड़कर सभी कलिवर्ज्य हैं ।

४ : विधवाविवाह – कुछ वसिष्ठ (१/ ७१-७४) आदि स्मृति- शास्त्रों ने अक्षत कन्या के पुनर्दान और अन्य विधवाओं (जिनका पति से शरीर सम्बन्ध हो चुका था) के विवाह में अन्तर बतलाया है और प्रथम में पुनर्विवाह उचित और दूसरे में अनुचित ठहराया है। किन्तु कलिवर्ज्य  वचनों ने दोनों को वर्जित माना है।

५ : अन्तर्जातीय विवाह – यह कलिवर्ज्य  है ।

६ : सगोत्र कन्या या मातृसपिण्ड कन्या विवाह – सगोत्र कन्या या मातृसपिण्ड कन्या (यथा मामा की पुत्री) से विवाह कलिवर्ज्य है । कलिवर्ज्य होते हुए भी मामा की पुत्री से विवाह बहुत-सी जातियों में प्रचलित रहा है । नागार्जुनकोण्डा (३री शताब्दी ई० के उपरान्त) के अभिलेख में आया है कि शान्तमूल के पुत्र वीरपुरुषदत्त ने अपने मामा की तीन पुत्रियों से विवाह किया।

७ : आततायी ब्राह्मण हत्या (मृत्युदण्ड) – आततायी रूप में उपस्थित ब्राह्मण को हत्या कलिवर्ज्य  है ।

८ : पिता-पुत्र विवाद में अर्थदण्ड – पिता और पुत्र के विवाद में साक्ष्य देनेवालों को अर्थदण्ड देना कलिवर्ज्य  है।

९ : आपत्तिकाल में चौरान्न या शूद्रान्न ग्रहण – तीन दिनों तक भूखे रहने पर नीच प्रवृत्ति वालों (शूद्रों  से भी) से अन्न ग्रहण (या चुराना) ब्राह्मण के लिए कलिवर्ज्य है । गौतम (१८।२८-२९); मनु (११-१६) एवं याज्ञ० (३३४३) ने इस विषय में छूट दी थी। प्राचीन काल में भूखे रहने पर ब्राह्मण को छोटी-मोटी चोरी करके खा लेने पर छूट मिली थी, किन्तु कालान्तर में ऐसा करना वर्जित  हो गया।

१० : समुद्र लंघन – प्रायश्चित्त कर लेने पर भी समुद्र-यात्रा करनेवाले ब्राह्मण से सम्बन्ध करना कलिवर्ज्य है, प्रायश्चित्त करने पर व्यक्ति पाप-मुक्त तो हो जाता है, किन्तु इस नियम के आधार पर वह लोगों से मिलने-जुलने के लिए अयोग्य ठहरा दिया गया है ।

‘बौधायनधर्मसूत्र’ (१।१।२२) ने समुद्र-संयान (समुद्र-यात्रा) को निन्द्य माना है और उसे महापातकों में सर्वोपरि स्थान दिया है (२)।११५१)। मनु ने समुद्र-यात्रा से लौटे ब्राह्मण को श्राद्ध में निमन्त्रित होने के लिए अयोग्य ठहराया है (३/१५८), किन्तु उन्होंने यह नहीं कहा है कि ऐसा ब्राह्मण जातिच्युत हो जाता है या उसके साथ किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं करना चाहिये। उन्होंने उसे केवल श्राद्ध के लिए अयोग्य सिद्ध किया है। औशनस स्मृति  ने भी ऐसा ही कहा है ।

ब्राह्मण लोग समुद्र पार करके स्थाम, कम्बोडिया, जावा, सुमात्रा, बोर्नियो आदि देशों में जाते थे। राजा और व्यापारी-गण भी वहाँ आते-जाते थे। इसमें इसका सन्दर्भ प्राप्त होता है – मिलिन्दपन्हो, राजतरंगिणी (४५०३-५०६), मनु (८।१५७), याज्ञ० (२।३८), नारद (४।१७९) आदि । ‘वायपुराण’ (४५/७८-८०) ने भारतवर्ष को नो द्वीपों में विभाजित किया है, जिनमें प्रत्येक समुद्र से पृथक् है और वहाँ सरलता से नहीं जाया जा सकता। इन द्वीपों में जम्बूदीप भारत है और अन्य आठ द्वीप ये है-इन्द्र, कसेरु, ताम्रपर्णी, गभस्तिमान, नाग, सौम्य (स्याम ), गन्धर्व, वारुण (बोर्नियो  )।

स्पष्ट है, पौराणिक भूगोल के अनुसार भारतवर्ष में आधुनिक भारत एवं बृहत्तर भारत सम्मिलित थे। यद्यपि प्राचीन ग्रन्थों ने शूद्रों के लिए समुद्र-यात्रा वर्जित नहीं मानी थी।

११ : सत्र – सत्र यज्ञ-सम्बन्धी कालों से सम्बन्धित है। पहले कुछ यज्ञ १२ दिनों, वर्ष भर, १२ वर्षों या उससे भी अधिक अवधियों तक चलते रहते थे। उन्हें केवल ब्राह्मण लोग ही करते थे ( जैमिनी ६।६।१६-२३)। शबर के मत से सत्रों के आरम्भकर्ता को १७ वर्षों से कम का तथा २४ वर्षों से अधिक का नहीं होना चाहिए । सत्र करनेवालों में सभी लोग (चाहे वे यजमान हों या पुरोहित हों) याज्ञिक (यजमान) माने जाते थे। जहाँ सत्रों का वर्णन के सत्रों के कलिवर्ज्य होने का कारण यह है कि उनमें बहुत समय, धन था और लोग परिश्रम-साध्य वैदिक यज्ञों के त्रुटि सम्भवना से  उसके स्थान पर सरल कृत्य सम्पादित  करने का आदेश दिया गया ।

१२ : कमण्डलु धारण –  बौधायन (१।४) ने मिट्टी या काठ के जलपूर्ण पात्रों के विषय में कई सूत्र दिये हैं। प्रत्येक स्नातक को शौच (शुद्धि) के लिए अपने पास जलपूर्ण पात्र रखना पड़ता था। उसे उस पात्र को जल से धोना या हाथ से रगड़ना पड़ता था। ऐसा करना पर्यग्निकरण ( शुद्धि के लिए अग्नि के चारों ओर घुमाने या तपाने) के समान माना जाता था। स्नातक को बिना पात्र या कमण्डलु लिये किसी के घर या ग्राम या यात्रा में जाना वर्जित था।

विश्वरूप ने व्याख्या की है कि स्नातक इसे स्वयं नहीं भी धारण कर सकता है, उसके लिए कोई अन्य भी उसे लेकर चल सकता है। वास्तव में उसे ढोना परिश्रम-साध्य एवं अस्वास्थ्यकर था, अतः ऐसा करना क्रमशः अव्यवहार्य होने से यह कलिवर्ज्य किया गया है।

१३ : महाप्रस्थान-यात्रा – ‘बृहन्नारदीय पुराण’ (पूर्वार्ध २४।१६ ) ने भी इसे वजित माना है । मनु (५।३२) एवं याज्ञ० (३।३५) का कहना है कि वानप्रस्थाश्रमी जब किसी असाध्य रोग से पीड़ित हो जाता था और अपने आश्रम के कर्तव्य का पालन नहीं कर सकता था, तो उस दशा में उसे उत्तर-पश्चिम दिशा में महाप्रस्थान कर देने की अनुमति प्राप्त थी। इस प्रस्थान में व्यक्ति तब तक चला जाता था जब तक कि वह थककर गिर न जाय और फिर न उठ सके ।

इसी प्रकार ब्रह्म-हत्या के अपराधों को धनुर्घरों के बाणों से विद्ध होकर मर जाने या अपने को अग्नि में झोंक देने की अनुमति प्राप्त थी । “अपरार्क ”  ने आदिपुराण को उद्धृत कर कहा है कि यदि कोई व्यक्ति, जो असाध्य रोग से पीड़ित होने के कारण हिमालय की ओर महाप्रस्थान यात्रा करता है या अग्नि-प्रवेश द्वारा आत्महत्या करता है या किसी प्रपात से गिरकर अपने को मार डालता है तो वह पाप नहीं करता, प्रत्युत स्वर्ग को जाता है। ‘आदिपुराण या आदित्यपुराण) एक स्थान पर महाप्रस्थान यात्रा की प्रशंसा करता है तो दूसरे स्थान पर उसे कलिवर्ज्य  मानता है। कलिवर्ज्यविनिर्णय ने इस विषय में पाण्डवों की महाप्रस्थान यात्रा का उल्लेख किया है।

१४ : गोसव यज्ञ – गोसव नामक यज्ञ  कलिवर्ज्य है


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