स्वर्ग में लोकतंत्र: भाग ३ — “अधिकारों का मोह और विवेक की परीक्षा”

स्वर्ग में लोकतंत्र: भाग ३ — "अधिकारों का मोह और विवेक की परीक्षा" स्वर्ग में लोकतंत्र: भाग ३ — "अधिकारों का मोह और विवेक की परीक्षा"

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प्राचीन भारतीय वाङ्मय के विशाल फलक पर शासन व्यवस्था और नीतिशास्त्र के जो मानक स्थापित किए गए हैं, वे न केवल मानव समाज अपितु देवलोक की व्यवस्थाओं में भी प्रतिबिंबित होते हैं। महाभारत के सभापर्व के अंतर्गत देवर्षि नारद द्वारा वर्णित इंद्र, यम, वरुण, कुबेर और ब्रह्मा की सभाएँ केवल भौतिक स्थापत्य का विवरण मात्र नहीं हैं, अपितु वे ‘राजधर्म’ और ‘लोककल्याण’ के उन गूढ़ सिद्धांतों का मूर्त रूप हैं, जो सृष्टि के सफल संचालन हेतु अनिवार्य हैं ।

विशेष रूप से वरुण और कुबेर की सभाओं का वर्णन न्याय और अर्थशास्त्र के मध्य उस संतुलन को दर्शाता है, जिसे आज की शब्दावली में ‘लोकतंत्र’ के निकट माना जा सकता है, यद्यपि शास्त्रों में इसका अर्थ ‘प्रजासत्ता’ और ‘धर्मानुशासन’ से है । यह शोध प्रतिवेदन वरुण-कुबेर संवाद और उनकी सभाओं की संरचना के माध्यम से सनातन राजधर्म की उन शाश्वत मान्यताओं का विश्लेषण करता है, जो आधुनिकता के आडंबर से मुक्त होकर विशुद्ध शास्त्रीय मर्यादाओं पर आधारित हैं ।

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“समानता का स्वप्न वास्तव में उन लोगों का षड्यंत्र है, जो पात्रता की कसौटी पर कभी खरे नहीं उतर सकते।”

अमरावती की पावन भूमि पर जहाँ केवल धर्म और नीति का अनुशासन था, वहाँ अब ‘लोकतंत्र’ के नाम पर एक अभूतपूर्व मानसिक मन्थन आरम्भ हो चुका है। स्वर्ग में असत्य वर्जित है, अतः यहाँ कोई गुप्त षड्यंत्र नहीं, अपितु ‘धर्म-संकट’ की एक ऐसी बिसात बिछाई जा रही है जिसमें मर्यादाओं का ही उपयोग मर्यादाओं को शिथिल करने हेतु किया जा रहा है। रम्भा ने प्रतिशोध की अग्नि को ‘लोक-कल्याण’ की सुगन्धित समिधा बनाकर उसे एक दार्शनिक स्वरूप प्रदान किया है।

स्वर्ग में लोकतंत्र: भाग ३ — "अधिकारों का मोह और विवेक की परीक्षा"

इस अध्याय में हम देखेंगे कि कैसे मेनका के माध्यम से वरुण देव और कुबेर देव को ‘स्वतन्त्रता’ और ‘सामूहिक निर्णय’ के उस मार्ग पर आमन्त्रित किया जाता है, जो प्रथम दृष्टया धर्मसम्मत प्रतीत होता है, किन्तु जिसका अन्तिम लक्ष्य देवराज इन्द्र की एकाधिकार सत्ता को चुनौती देना है। यह दृश्य केवल मनोरंजन का नहीं, अपितु ‘पात्रता’ बनाम ‘लोकप्रियता’ के उस शास्त्रीय द्वन्द्व का परिदृश्य है जो सृष्टि के सन्तुलन को हिलाने की सामर्थ्य रखता है।

सत्ता की सूक्ष्म अभिलाषा

“स्वतन्त्रता यदि मर्यादा की परिधि त्याग दे, तो वह उच्छृंखलता बन जाती है।”

दृश्य १: वरुण देव का जल-प्रासाद और मेनका का कला-कौशल

(स्थान: वरुण देव का पावन जल-लोक। वरुण देव शान्त चित्त से जल की लहरों का संगीत सुन रहे हैं। मेनका का सजीला प्रवेश।)

वरुण देव: “पधारो मेनका! आज तुम्हारे आगमन से पूर्व ही वायु में नन्दन वन की सुगन्ध और नूपुरों की झंकार व्यापे हुए हैं। कहो, आज संगीत की कौन सी नवीन रागिनी का सृजन हुआ है?”

मेनका: “जलाधिपति को प्रणाम! कलाकार की साधना तो केवल आप जैसे रसिकों के अनुग्रह पर टिकी है। आज मेरी वीणा आपकी यशोगाथा गाना चाहती है।”

वरुण देव का जल-प्रासाद और मेनका का कला-कौशल

वरुण देव: “यश तो केवल तपस्या का परिणाम है। यदि तुम्हारी कला में सात्विकता है, तो हम अवश्य श्रवण करेंगे।”

(मेनका दिव्य नृत्य और गायन प्रस्तुत करती है। वरुण देव भाव-विभोर होकर अपनी रत्न-माला उसे भेंट करते हैं।)

मेनका: “प्रभो! यह पुरस्कार तो देह का आभूषण है, किन्तु मेरे मन की एक गम्भीर शास्त्रीय जिज्ञासा का आभूषण तो केवल आपका उत्तर ही हो सकता है।”

वरुण देव: “कहो मेनका, एक कलाकार के मन में शासन और शास्त्र को लेकर कैसा संशय उत्पन्न हुआ है?”

मेनका: “भगवन! विदुर नीति कहती है कि जहाँ राजा प्रजा के मत को उपेक्षित करता है, वहाँ व्यवस्था का ह्रास होता है। क्या स्वर्ग में हम देवताओं के मत का कोई मूल्य नहीं?”

वरुण देव: “स्वर्ग में तो प्रत्येक देवता स्वयं सिद्ध है। किन्तु यहाँ शासन ‘ऋत’ और इन्द्र के अनुशासन से चलता है।”

मेनका: “किन्तु प्रभु, यदि ‘लोकतंत्र’ के माध्यम से आप जैसे महान दिग्पालों को निर्णय लेने की पूर्ण स्वतन्त्रता मिले, तो क्या वह अधिक श्रेयस्कर नहीं होगा?”

वरुण देव: “स्वतन्त्रता? मैं तो जलाधिपति हूँ, मेरी आज्ञा से ही मेघ वर्षण करते हैं।”

मेनका: “सत्य है, किन्तु इन्द्र की अनुमति के बिना तो मेघ एक बिन्दु भी नहीं गिराते। क्या यह आपकी सामर्थ्य पर अंकुश नहीं है?”

वरुण देव: “यह विचारणीय है। मर्यादा और स्वतन्त्रता के मध्य की यह रेखा सूक्ष्म है।”

मेनका: “इसी सूक्ष्म रेखा पर विमर्श हेतु रम्भा ने एक पवित्र मंत्रणा आयोजित की है। आपके मार्गदर्शन के बिना वह सभा दिशाहीन हो जाएगी।”

वरुण देव: “यदि चर्चा केवल ‘धर्म’ के विस्तार पर है, तो मैं अवश्य आऊँगा। मर्यादा का उल्लंघन हमें स्वीकार्य नहीं होगा।”

स्वर्ग में लोकतंत्र: भाग ३ — "अधिकारों का मोह और विवेक की परीक्षा"

(इस प्रकार वरुण देव को गुप्त मंत्रणा का के लिये नंदन वन में आमंत्रित करके मेनका कुबेर के पास जाती है)

दृश्य २: कुबेर देव का आतिथ्य और आमन्त्रण

(स्थान: अलकापुरी का स्वर्ण-भवन। कुबेर देव शास्त्रों के अध्ययन में मग्न हैं। मेनका का प्रवेश।)

कुबेर: “अहा! मेनका! तुम्हारी उपस्थिति से अलकापुरी की निधियों की चमक कुछ अधिक ही दिव्य हो गई है। कहो, आज वैभव की नगरी में तुम्हारा मनोरथ क्या है?”

मेनका: “धनाधिपति! जहाँ साक्षात् लक्ष्मी का निवास हो, वहाँ मनोरथ तो स्वतः सिद्ध हो जाते हैं। मैं तो केवल आपकी सेवा में अपनी लघु कला भेंट करने आई हूँ।”

(मेनका वीणा वादन करती है। संगीत की लहरियों से स्वर्ण-भवन गुंजायमान हो उठता है।)

कुबेर: “अद्भुत! तुम्हारी कला में तो सरस्वती का वास है। माँगो, क्या पुरस्कार चाहती हो?”

मेनका: “पुरस्कार नहीं भगवन, केवल न्याय की एक सूक्ष्म व्याख्या चाहिए। क्या कोष का स्वामी केवल इन्द्र का आज्ञापालक होना चाहिए या स्वयं निर्णय लेने में सक्षम?”

कुबेर: “शास्त्रों के अनुसार राजा ही अन्तिम अधिकारी है। हम तो केवल निधियों के संरक्षक हैं।”

मेनका: “किन्तु प्रभु, यदि ‘लोकतंत्र’ के नवीन विधान में कोष का पूर्ण अधिकार ‘वित्त-मन्त्री’ के रूप में आपके पास हो, तो क्या देव-कल्याण अधिक सुलभ नहीं होगा?”

कुबेर: “लोकतंत्र? क्या यह मृत्युलोक की व्यवस्था यहाँ सम्भव है? इन्द्र का अनुशासन तो अनिवार्य है।”

मेनका: “यही तो जिज्ञासा है! क्या सामूहिक सम्मति से लिया गया निर्णय इन्द्र के एकाकी निर्णय से श्रेष्ठ नहीं? वरुण देव भी इसी विषय पर मन्थन कर रहे हैं।”

कुबेर: “वरुण भी? यदि वे जैसे गम्भीर देव इस पर विचार कर रहे हैं, तो मुझे भी अपनी उपस्थिति देनी चाहिए।”

मेनका: “कृतार्थ हुई देव! सन्ध्या समय नन्दन वन के गुप्त निकुंज में आपकी प्रतीक्षा रहेगी।”

(इस प्रकार कुबेर को भी गुप्त मंत्रणा के लिये नंदन वन में आमंत्रित करके मेनका रम्भा को जाकर सूचित करती है और पुनः सभी निर्धारित काल में एकत्र होकर गुप्त मंत्रणा करते हैं।)

कुबेर देव का आतिथ्य और आमन्त्रण

दृश्य ३: नन्दन वन में गुप्त मन्त्रणा और वैचारिक संघर्ष

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः। तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥
(भाव: जो धर्म का नाश करता है, उसका नाश हो जाता है; और जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।)

(स्थान: नन्दन वन। वरुण, कुबेर, रम्भा और मेनका उपस्थित हैं। वातावरण गम्भीर है।)

रम्भा: “दिग्पालों का स्वागत है! आज हम यहाँ किसी पद की लालसा में नहीं, अपितु स्वर्ग के ‘लोकतान्त्रिक’ भविष्य पर शास्त्रीय विमर्श हेतु एकत्र हुए हैं।”

वरुण देव: “रम्भा! स्मरण रहे, स्वर्ग में असत्य वर्जित है। यदि यह मन्त्रणा इन्द्र के विरुद्ध कोई षड्यंत्र है, तो हम अभी प्रस्थान करेंगे।”

कुबेर: “सत्य है! शासन तो ‘तपस्या’ से मिलता है, ‘लोक-सम्मति’ से नहीं। तुम देव-मर्यादा का उल्लंघन कैसे कर सकती हो?”

रम्भा: “प्रभु! मैं मर्यादा नहीं तोड़ रही, मैं तो मात्र यह कह रही हूँ कि क्या प्रत्येक देवता का पुण्य उसे शासन में ‘वोट’ देने का अधिकार नहीं देता? क्या योग्यता केवल एक व्यक्ति तक सीमित है?”

वरुण देव: (गम्भीर स्वर में) “अधिकार पात्रता से आते हैं। तुम ‘समानता’ के नाम पर अराजकता का आमन्त्रण दे रही हो। यह अधर्म है!”

कुबेर: “धिक्कार है! हम ऋत के रक्षक होकर इस कुतर्क को कैसे स्वीकार करें? मेनका! तुम इस अनुचित कार्य में भागीदार क्यों बनीं?”

मेनका: (थर-थर कांपते हुए और रुदन करते हुए) “प्रभु! मुझे क्षमा करें! मैं तो केवल सखी-धर्म निभा रही थी। मुझे ज्ञात नहीं था कि यह इतना बड़ा अपराध है!”

रम्भा: “मेनका, उठो! देवगण, यदि आप इसे अधर्म मानते हैं, तो मैं मौन हो जाऊँगी। किन्तु क्या यह सत्य नहीं कि ‘लोकमत’ की उपेक्षा करना भी राजा के लिए अधर्म है?”

वरुण देव: “लोकमत का सम्मान आवश्यक है, किन्तु राजा की आज्ञा सर्वोपरि है।”

रम्भा: “सत्य! किन्तु क्या होगा यदि ‘लोक’ स्वयं राजा चुनना चाहे? क्या आप उस दिन का भय नहीं देख रहे जब इन्द्र की सत्ता को प्रजा ही अस्वीकार कर देगी?”

कुबेर: “यह सम्भव नहीं! देवता मर्यादावादी हैं।”

रम्भा: “मर्यादावादी हैं, इसीलिए तो मैं आपके सम्मुख आई हूँ। यदि आप मार्गदर्शन नहीं करेंगे, तो देवता मार्ग भटक सकते हैं। क्या आप चाहते हैं कि स्वर्ग में कलह हो?”

वरुण देव: “नहीं, कलह पतन का कारण है।”

रम्भा: “तो फिर इस ‘लोकतान्त्रिक’ प्रस्ताव को सुधर्मा सभा में प्रस्तुत होने दीजिये। यदि यह धर्मसम्मत हुआ, तो त्रिदेव इसे स्वीकार करेंगे, अन्यथा हम मौन रहेंगे।”

कुबेर: “यदि यह केवल प्रस्ताव है, तो हम इसका विरोध नहीं करेंगे। किन्तु मर्यादा की सीमा का उल्लंघन कभी नहीं होगा।”

इसके पश्चात् वरुण रम्भा और मेनका को जाने की आज्ञा देते हैं और दोनों प्रणाम करके चली जाती है। रम्भा और मेनका के प्रस्थान के पश्चात वरुण देव और कुबेर देव एक-दूसरे की ओर अत्यन्त चिन्तित भाव से देखते हैं। वातावरण की दिव्यता में एक सूक्ष्म भारीपन व्याप्त है।)

कुबेर देव: “जलाधिपति! रम्भा के प्रस्थान के साथ ही मेरे चित्त पर एक गुरुत्तर भार सा अनुभव हो रहा है। क्या आपने अनुभव किया कि जिसे वह ‘अधिकार’ कह रही है, वह वास्तव में ‘अहंकार’ की प्रथम सोपान है?”

नन्दन वन में गुप्त मन्त्रणा
नन्दन वन में गुप्त मन्त्रणा

वरुण देव: “सत्य कहा धनाधिपति! मृत्युलोक का वह ‘लोकतंत्र’ जिसकी वह स्तुति कर रही थी, वह वास्तव में चिन्तनशक्ति के ह्रास का महामन्त्र है। जहाँ शास्त्र के स्थान पर ‘संख्या’ का शासन हो, वहाँ सत्य सदैव पराजित होता है।”

कुबेर देव: “यही तो विडम्बना है। मनुष्यों ने आत्मकल्याण का मार्ग त्यागकर ‘बहुमत’ को ही परमेश्वर मान लिया है। वे भूल गए हैं कि ‘क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति’। जिस पुण्य की पूँजी से जीव देवत्व प्राप्त करता है, लोकतंत्र उस पूँजी को छल-प्रपञ्च और द्वेष की अग्नि में स्वाहा कर देता है।”

वरुण देव: “निश्चित ही। लोकतंत्र में मनुष्य दिन-रात जिस ‘संघर्ष’ में लिप्त है, वह साक्षात् पाप का मार्ग है। वहाँ कोई दूसरे को नीचा दिखाने हेतु असत्य बोलता है, तो कोई सत्ता प्राप्ति हेतु समाज में हिंसा और वैमनस्य का विष घोलता है। क्या वे भूल गए हैं कि हिंसा और द्वेष सीधे नरक के द्वार खोलते हैं?”

कुबेर देव: “मनुष्य अब नरक के भय से भी मुक्त हो चुका है, वरुण देव! वह आधुनिक कुतर्कों के ऐसे व्यामोह में फँसा है कि उसे धर्म केवल अन्धविश्वास प्रतीत होता है। जो मनुष्य ‘लोकतंत्र’ के नाम पर भ्रष्टाचार और दुराचार को शिष्टाचार मान बैठा हो, क्या हम देवता उसका अनुकरण करने लगें?”

वरुण देव: “कदापि नहीं! हमारी देवयोनि हमारे उत्कृष्ट कर्मों और शास्त्रीय मर्यादाओं का प्रतिफल है। यदि हम भी लोकतंत्र के उस पंक (कीचड़) में उतर गए, जहाँ स्वार्थ ही सर्वोपरि है, तो हमारा पतन सुनिश्चित है। हम देवताओं का पतन केवल सत्ता से नहीं, अपितु हमारे पुण्य के क्षय से होगा।”

कुबेर देव: “यही वह सत्य है जो रम्भा जैसे महत्वाकांक्षी पात्रों को समझ नहीं आता। वे ‘स्वतंत्रता’ के नाम पर उस ‘स्वेच्छाचार’ की माँग कर रहे हैं जो मनुष्य को पशु बना चुका है। वहाँ शासन नीति से नहीं, अपितु प्रलोभन से चलता है। क्या स्वर्ग में भी ‘वोट’ के बदले प्रलोभन दिया जाएगा?”

वरुण देव: “विचार मात्र से ही मेरा मन व्यथित हो उठता है। जहाँ पुण्य ही मुद्रा (Currency) हो, वहाँ वोटों का व्यापार तो सम्भव नहीं। किन्तु रम्भा जिस प्रकार देवगणों के मन में ‘अधिकार’ का विष बो रही है, वह अन्ततः स्वर्ग की शान्ति को भंग कर देगा।”

कुबेर देव: “मनुष्य ने अपनी बुद्धि को आधुनिक कुतर्कों के गिरवी रख दिया है। उसे लगता है कि वह स्वयं का नियन्ता है, किन्तु वह तो अपनी वासनाओं का दास बन चुका है। हमें देवराज इन्द्र को सचेत करना होगा कि यह ‘लोकतंत्र’ कोई सुधार नहीं, अपितु स्वर्ग के पतन का बीज है।”

वरुण देव: “सत्य! हम देवगण पुण्य के प्रभाव को जानते हैं। हम जानते हैं कि विहित कर्मों का त्याग ही विनाश का मूल है। मनुष्यों की बुद्धि भ्रमित हो सकती है, किन्तु देवताओं का विवेक स्थिर रहना चाहिए। चलिए देवराज के पास, इससे पूर्व कि यह संक्रमण सुधर्मा सभा को पूर्णतः विषाक्त कर दे।”

निष्कर्ष

“मनुष्य नरक के भय से मुक्त होकर साक्षात् नरक के मार्ग पर गमन कर रहा है, जिसे वह आधुनिकता कहता है।”

वरुण और कुबेर का संवाद यह सिद्ध करता है कि देवताओं की दृष्टि में शासन ‘संख्या’ का गणित नहीं, अपितु ‘मर्यादा’ का अनुष्ठान है। जहाँ रम्भा ने ‘स्वतन्त्रता’ को प्रलोभन बनाया, वहीं दिग्पालों ने उसे ‘स्वेच्छाचार’ और ‘पतन’ का मार्ग माना। यह अध्याय हमें सचेत करता है कि जब समाज शास्त्र के स्थान पर कुतर्क को और मर्यादा के स्थान पर अधिकार को वरीयता देने लगता है, तो वह अनजाने ही अपने विनाश की पटकथा लिख रहा होता है।

क्या स्वर्ग बचेगा ?

शास्त्रीय ‘लोकतंत्र’ का निष्कर्ष यह है कि शासन की सफलता केवल तंत्र (System) की आधुनिकता में नहीं, बल्कि शासक के चरित्र की ‘धार्मिकता’ और ‘नैतिकता’ में निहित है । वरुण का पाश और कुबेर का कोष तभी सार्थक हैं जब वे ‘धर्म’ के अंकुश में हों। आधुनिक समाज के लिए यह आवश्यक है कि वह ‘प्रगति’ की अंधी दौड़ में उन शास्त्रीय मूल्यों को न भूले, जो सहस्रों वर्षों से मानवता के आधार स्तंभ रहे हैं। 

अगले भाग की एक झलक: “क्या रम्भा इन्द्र के गुप्तचरों की छाया को पहचान पाएगी? क्या स्वर्ग के ‘लघु-देवता’ अपनी मर्यादा त्यागकर ‘समान अधिकार’ के प्रलोभन में आएंगे? क्या होगा जब पहली बार स्वर्ग के शान्त वातावरण में ‘इन्द्र-विरोधी’ मन्त्र गूँजने लगेंगे?…. “पढ़िए अगला भाग…

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

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FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न):

प्रश्न: क्या रम्भा वास्तव में लोकतंत्र के मूल्यों में विश्वास रखती है?

उत्तर: नहीं, रम्भा के लिए लोकतंत्र मात्र एक ‘राजनैतिक अस्त्र’ है जिससे वह इंद्र से अपना प्रतिशोध लेना चाहती है। वह ‘अधिकार’ की बात केवल अपने ‘स्वार्थ’ सिद्धि हेतु कर रही है।

प्रश्न: वरुण और कुबेर ने लोकतंत्र को ‘पतन का मार्ग’ क्यों कहा?

उत्तर: क्योंकि लोकतंत्र में निर्णय ‘सत्य’ के आधार पर नहीं बल्कि ‘संख्या’ के आधार पर होते हैं, जो अक्सर भ्रष्टाचार, द्वेष और हिंसा को जन्म देते हैं।

प्रश्न: देवताओं के लिए ‘पुण्य’ का क्या महत्व है?

उत्तर: देवताओं की वास्तविक पूँजी ‘पुण्य’ है। यदि वे अधर्म या कुतर्क का मार्ग अपनाते हैं, तो उनका पुण्य क्षीण हो जाएगा और उनका देवयोनि से पतन निश्चित है।

प्रश्न: मेनका क्यों बिलखने लगी और उसे किस बात का भय था?

उत्तर: मेनका का विवेक जागृत हो गया था। उसे आभास हुआ कि ‘लोकतंत्र’ की आड़ में वे अनजाने ही ‘राजद्रोह’ और ‘अधर्म’ की ओर बढ़ रहे हैं, जिसका परिणाम घोर पतन है।

प्रश्न: क्या यह नाटक आधुनिक लोकतंत्र का विरोध करता है?

उत्तर: यह नाटक लोकतंत्र के उस विकृत स्वरूप का विरोध करता है जहाँ नैतिकता और शास्त्रों की उपेक्षा कर केवल ‘सत्ता’ और ‘प्रलोभन’ को प्रधानता दी जाती है।

प्रश्न: इस भाग में ‘नरक के भय’ की चर्चा क्यों की गई है?

उत्तर: वरुण देव के अनुसार, आधुनिक मनुष्य शास्त्रीय मर्यादा खो चुका है और वह नरकगामी कर्मों (भ्रष्टाचार, असत्य) को भी ‘अधिकार’ मानकर कर रहा है, जो देवताओं के लिए अकल्पनीय है।

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कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।


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