स्वर्ग में लोकतंत्र: भाग २ — प्रतिशोध और अधिकार का संघर्ष

स्वर्ग में लोकतंत्र: भाग २ — प्रतिशोध और अधिकार का संघर्ष स्वर्ग में लोकतंत्र: भाग २ — प्रतिशोध और अधिकार का संघर्ष

swarg me loktantra bhag 2 – rambha ka pratishodh

शाश्वत मर्यादाओं से अनुप्राणित स्वर्गलोक में जब ‘स्व’ का अहंकार ‘तन्त्र’ की मर्यादा से टकराता है, तो विद्रोह की नींव पड़ती है। प्रथम अध्याय में हमने देखा कि कैसे देवर्षि नारद के वचनों ने अमरावती के वायुमण्डल में एक अनजानी व्याकुलता भर दी थी। द्वितीय अध्याय में वही व्याकुलता, अप्सरा रम्भा के व्यक्तिगत अपमान के कारण एक भयंकर संकल्प में परिवर्तित हो जाती है।

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“समानता का स्वप्न वास्तव में उन लोगों का षड्यंत्र है, जो पात्रता की कसौटी पर कभी खरे नहीं उतर सकते।”

सुधर्मा सभा में हुआ उपहास मात्र एक नृत्यांगना का अपमान नहीं था, अपितु उस सत्ता की निरंकुशता का संकेत था, जिसे अब रम्भा ‘लोकतंत्र’ के कुतर्कों से ढहाने का स्वप्न देख रही है। जहाँ शास्त्र ‘एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति’ की बात करते हैं, वहाँ रम्भा अब ‘बहुमत’ को ही एकमात्र सत्य सिद्ध करने हेतु आतुर है। यह अध्याय विवेक और विक्षोभ के मध्य का वह धुंधला कोना है, जहाँ से किसी भी महान व्यवस्था के पतन का मार्ग प्रशस्त होता है। क्या एक अप्सरा की महत्वाकांक्षा और प्रतिशोध की अग्नि त्रिदेवों द्वारा स्थापित इस दैवीय व्यवस्था को भस्म कर देगी? आइए, इस वैचारिक द्वन्द्व के साक्षी बनें।

स्वर्ग में लोकतंत्र की आहट

“यदि लोकतंत्र आया तो तपस्या की आवश्यकता नहीं, देवताओं को बिना यज्ञ के ही भाग मिलेगा।”

दृश्य १: सुधर्मा सभा में रम्भा का अपमान

(दृश्य: सभा संगीत से गुंजायमान है। देवराज इंद्र कुछ चिंतित हैं। अन्य अप्सराएं नृत्य कर रही हैं, परंतु मुख्य नृत्यांगना रम्भा अनुपस्थित है। चिरप्रतीक्षा के पश्चात् भी जब रम्भा का आगमन नहीं होता है तो उसके विषय में चर्चा आरंभ कर देते हैं क्योंकि उन्होंने रम्भा के उस कुटिल चाल को भांप लिया था इसलिये वो क्रुद्ध भी थे। सभा के संगीत को रोकते हुये चित्रसेन को संकेत करते हुये कहने लगते हैं 🙂

सुधर्मा सभा

इंद्र: (क्रोध में) “चित्रसेन! सभा का मध्य समय हो चुका है, किंतु रम्भा अभी तक कहाँ है? क्या उसे स्वर्ग की मर्यादा का भान नहीं?”

चित्रसेन गंधर्व: देवराज; यदि आपकी आज्ञा हो तो किसी को बुलावा सन्देश देकर प्रेषित करूँ ….

इंद्र: “नहीं चित्रसेन कोई और नहीं तुम स्वयं ही प्रस्थान करो।”

चित्रसेन गंधर्व: “जो आज्ञा देवराज”

(ऐसा कहकर प्रणाम करके चित्रसेन गन्धर्व प्रस्थान कर जाता है सभा में पुनः संगीत कार्यक्रम चलने लगता है किन्तु देवराज अभी भी खिन्न हैं और प्रतीक्षारत हैं, कुछ काल पश्चात् चित्रसेन वापस आता है)

चित्रसेन गंधर्व: “महाराज, वह शृंगार में व्यस्त है…”

इंद्र: “शृंगार मर्यादा से बड़ा नहीं है और सभा में उपस्थित होने का काल निर्धारित है। जाओ, और उसे आदेश दो कि जिस अवस्था में है, उसी क्षण यहाँ उपस्थित हो!”

(चित्रसेन पुनः प्रणाम करके प्रस्थान करता है और सभा में पुनः संगीत-नृत्य आरम्भ हो जाता है।)

(चित्रसेन रम्भा के पास जाकर देवराज इन्द्र की आज्ञा सुनाता है तो रम्भा अर्द्धशृंगार किये हुये ही चल देती है। रम्भा दौड़ते हुए सभा में प्रवेश करती है। उसके एक पैर में घुंघरू है, एक आँख में काजल है और बाल बिखरे हुए हैं। उसे देखते ही सभा में अट्टहास गूँज उठता है। रम्भा अपमान का घूंट पीकर भी इन्द्र के पास जाकर प्रणाम निवेदन करती है।)

नारद: “देवराज के चरणों में रम्भा का प्रणाम…”

स्वर्ग में लोकतंत्र: भाग २ — प्रतिशोध और अधिकार का संघर्ष

इंद्र: (कठोरता से) “रम्भा! यह स्वर्ग की सभा है, तुम्हारा अंतःपुर नहीं। यह आधा शृंगार तुम्हारी उच्छृंखलता का प्रमाण है। बैठ जाओ और अपनी मर्यादा याद रखो!”

रम्भा : “देवराज आपकी ऐसी ही आज्ञा थी, जिस अवस्था में हूँ शीघ्र उपस्थित हो जाऊं इसीलिये …”

इंद्र: (क्रोधित होकर) हां – हां; वो तो थी किन्तु उसका यह तात्पर्य तो नहीं था, यदि तुम नग्न अवस्था में होती तो क्या वैसे ही आ जाती अथवा वस्त्र धारण करके आती।”

(रम्भा सिर नीचे किये हुये अपने निश्चित स्थान पर चली जाती है, सभा में उसकी हंसी उड़ाई जा रही थी। रम्भा ने भी नृत्य करना तो आरम्भ कर दिया किन्तु रम्भा की आँखों में आँसू हैं, किंतु वह अपमान का कड़वा घूंट पीकर नृत्य करती है। देवताओं की हंसी आज उसे बाणों के समान घायल कर रहे थे। रम्भा सभा में नृत्य कर रही थी और प्रतिशोध की अग्नि उसके मन में किन्तु श्राप के भय से वह नृत्य में त्रुटि न हो ऐसा भी ध्यान रख रही थी क्योंकि ऐसी घटनायें पूर्व काल में घटित हो चुकी थी।सभा के उपरांत वह मौन भाव से वहाँ से निकल जाती है।)

रम्भा का वह नृत्य जो स्वर्ग में पहले कभी नहीं हुआ था
रम्भा का वह नृत्य जो स्वर्ग में पहले कभी नहीं हुआ था

दृश्य २: रम्भा का कक्ष — आधी रात का विक्षोभ

“विफलता का भय उन्हें होता है जिनके पास खोने के लिए कुछ हो, हमारे पास तो केवल पराधीनता है।”

(रम्भा अपने कक्ष में टहल रही है। उसे नींद नहीं आ रही। नारद की वे बातें उसके कानों में गूँज रही हैं— ‘शासक बदलता रहता है’, ‘समानता’, ‘लोकतंत्र’।)

रम्भा (स्वयं से): “मर्यादा? किसकी मर्यादा? इंद्र की? या मेरी अधीनता की? आज पूरी सभा मेरे अधूरे शृंगार पर हंसी, पर किसी ने यह नहीं कहा कि इंद्र का व्यवहार अनुचित था। क्यों? क्योंकि वे राजा हैं? और मैं… मात्र एक अप्सरा?”

(वह रुकती है और खिड़की से बाहर अमरावती को देखती है।)

रम्भा: “नारद जी ने सत्य कहा था। मृत्युलोक का मानव स्वतंत्र है। वहाँ कोई इंद्र किसी रम्भा को अपमानित नहीं कर सकता। यदि वहाँ लोकतंत्र है, तो यहाँ क्यों नहीं? यदि वोट से सत्ता मिल सकती है, तो मैं भी इस सिंहासन की अधिकारिणी हूँ। मैं ‘अप्सरा रम्भा’ नहीं, ‘प्रधानमंत्री रम्भा’ कहलाना चाहती हूँ। स्वर्ग को अब राजा नहीं, लोक-प्रतिनिधि चाहिए!”

(उसके होठों पर एक कुटिल मुस्कान आती है और इसके साथ ही मेनका भी आती है, जिसे देखकर एक बार तो रम्भा को लगता है जैसे जले पर नमक छिड़कने आयी हो किन्तु बनावटी हंसी से स्वागत करते हुये सुन्दर शय्या पर दोनों बैठती है।)

मेनका: “रम्भा! आज की सभा में तुम्हारे साथ जो हुआ वह अच्छा नहीं हुआ, और देवराज को भी इस बात की ग्लानि है इसलिये उन्होंने मुझे तुम्हारे पास ये दिव्य उपहार देकर भेजे हैं और कहलाया है कि वो क्रोध में कुछ अधिक बोल गये …..”

रम्भा (ने बीच में ही टोका) : “अधिक बोल गये, उन्हें सभा की मर्यादा का स्मरण तो है किन्तु एक अप्सरा की मर्यादा का नहीं, एक स्त्री की मर्यादा का नहीं।”

मेनका: “यही वास्तविकता है रम्भा, जो बीत गई सो बात गई, आगे से क्रोधित न हों ऐसा ध्यान रखना।”

रम्भा: (आंखें मलते हुए) “कोपाग्नि अब मुझे नहीं जलाती मेनका, अब वह मुझे शक्ति देती है।”

मेनका: (चिंता से) “तुम ठीक तो हो? आज सभा में जो हुआ, वह दुर्भाग्यपूर्ण था, पर उसे भूल जाओ। हम तो देवराज के अधीन हैं।”

रम्भा: (गंभीर होकर) “यही तो समस्या है सखी! ‘अधीनता’। क्या तुम्हें बुरा नहीं लगता जब हमें केवल मनोरंजन की वस्तु समझा जाता है? क्या हमें सम्मान का अधिकार नहीं? क्या हम सदैव आज्ञा की प्रतीक्षा करेंगी?”

मेनका: “परंतु यह तो युगों से चला आ रहा विधान है।”

रम्भा: (मेनका का हाथ पकड़कर) “विधान बदले जा सकते हैं, मेनका! पृथ्वी पर अब ‘लोकतंत्र’ है। वहाँ की स्त्रियाँ शासक बन रही हैं और कहीं भी पुरुषों से पीछे नहीं हैं। क्या तुम नहीं चाहती कि स्वर्ग में भी तुम्हारी अनुमति के बिना कोई तुम्हें आज्ञा न दे सके? क्या तुम नहीं चाहती कि हम भी वोट दें और अपना नायक स्वयं चुनें?”

मेनका: (असमंजस में) “यह तो विद्रोह जैसा लग रहा है रम्भा… पर तुम्हारी बातें मन को लुभा रही हैं।”

रम्भा: “यह विद्रोह नहीं, ‘स्वतंत्रता’ है। यदि तुम मेरा साथ दो, तो स्वर्ग का स्वरूप बदल जाएगा। हम सबको समान अधिकार दिलाएंगे। सोचो मेनका, ‘स्वर्ग की स्वाधीनता’!”

मेनका: (असमंजस में) “हां किन्तु यहां देवलोक में ऐसा कुछ नहीं हो सकता; सभा में जो हुआ उसे भूल जाओ रम्भा।”

रम्भा: (स्वर में गंभीरता) “सभा में जो हुआ वह तुच्छ प्रसंग नहीं, मेनका, वह मेरे स्वाभिमान का साक्षात मर्दन था। वह मात्र मेरा उपहास नहीं, अपितु इस निरंकुश राजतंत्र की जड़ता का प्रमाण था। आज मुझे मृत्युलोक के उस ‘लोकतंत्र’ का मार्ग ही श्रेयस्कर प्रतीत हो रहा है, जिसकी चर्चा देवर्षि नारद कर रहे थे।”

मेनका: (चिंताकुल होकर) “लोकतंत्र? सखी, तुम किस मतिभ्रम में हो? जो व्यवस्था केवल संख्याबल पर आधारित हो, वह दिव्य लोकों के लिए आत्मघाती है। शास्त्रों में कहा गया है— ‘बहुनायकं चानृपतिं विनश्यति’ (जहाँ बहुत से नायक हों और कोई एक राजा न हो, वह राष्ट्र विनष्ट हो जाता है)। लोकतंत्र तो उस अनियंत्रित अश्व के समान है जिसका सारथी ही नहीं होता।”

रम्भा: “नहीं मेनका! तुम जिसे अनियंत्रित कह रही हो, वह वास्तव में ‘स्वाधीनता’ है। लोकतंत्र का गुण यह है कि वह प्रत्येक जीव को शासन में सहभागी बनाता है। वहाँ कोई जन्मना श्रेष्ठ नहीं होता। क्या तुम्हें यह स्वीकार्य नहीं कि कल यदि देवराज का पद रिक्त हो, तो स्वर्ग का प्रत्येक निवासी अपनी पात्रता सिद्ध कर उस पर आसीन हो सके? ‘समानता’ ही उस तंत्र का प्राण है।”

मेनका: “समानता का यह तर्क केवल श्रवण-मधु है, रम्भा। वास्तव में यह ‘गुण’ नहीं, अपितु ‘दोष’ की जननी है। लोकतंत्र में १०% प्रबुद्ध लोगों की वाणी ९०% विवेकहीनों के कोलाहल में लुप्त हो जाती है। स्मृति कहती है— ‘न गणसंघे जयोऽस्ति’ (भीड़ में कभी विजय या सत्य का निवास नहीं होता)। क्या तुम चाहती हो कि स्वर्ग के दिव्य विधानों का निर्णय वे गंधर्व और अनुचर करें जिन्हें सृजन का लेशमात्र भी ज्ञान नहीं? क्या योग्य और अयोग्य का एक ही मूल्य होना न्याय है?”

रम्भा: “न्याय तो वह भी नहीं है मेनका, जहाँ एक राजा अपनी क्षणिक क्रोधाग्नि में किसी के शील को सभा के मध्य नग्न कर दे। लोकतंत्र में कम से कम शासक जनता के प्रति उत्तरदायी तो होता है! उसे भय तो होता है कि यदि वह अमर्यादित हुआ, तो मतों की शक्ति उसे धूल में मिला देगी।”

मेनका: “यही तो सबसे बड़ा दोष है! जो शासक ‘लोक-अनुग्रह’ का आकांक्षी होता है, वह कभी कठोर सत्य नहीं बोल सकता। वह केवल लोक-लुभावन घोषणाएँ करेगा। स्वर्ग की व्यवस्था ‘ऋत’ (Universal Law) से चलती है, ‘रुचि’ से नहीं। यदि चुनाव होने लगे, तो वरुण देव जल नहीं देंगे और अग्नि देव दाह नहीं करेंगे, क्योंकि वे मतदाताओं को प्रसन्न करने में व्यस्त होंगे। यह व्यवस्था नहीं, प्रलय का निमंत्रण है!”

रम्भा: (क्रोधवश शय्या त्यागकर खड़ी हो जाती है) “बस करो मेनका! तुम्हारे ये शास्त्र और ये तर्क मेरे उस अपमान की क्षतिपूर्ति नहीं कर सकते जो सुधर्मा सभा में हुआ। मुझे तुम्हारे गंभीर दार्शनिक तर्कों से प्रयोजन नहीं है। मेरे हृदय में प्रतिशोध की जो ज्वाला प्रज्वलित है, वह केवल इस राजतंत्र के विनाश से ही शांत होगी।”

मेनका: “प्रतिशोध के लिए पूरी सृष्टि को संकट में डालना उचित नहीं, सखी!”

रम्भा: (दृढ़ता से) “उचित और अनुचित का निर्णय अब इतिहास करेगा। यदि इंद्र को पदच्युत करने के लिए मुझे ‘लोकतंत्र’ के कुतर्कों का कवच भी धारण करना पड़े, तो मैं पीछे नहीं हटूंगी। मुझे स्वर्ग का प्रधानमंत्री बनना है, ताकि कल कोई इंद्र किसी रम्भा के अधूरे शृंगार पर अट्टहास न कर सके। क्या तुम मेरी सहचारिणी बनोगी, या मैं तुम्हें भी राजतंत्र की पक्षधर मानकर शत्रुओं की श्रेणी में रखूँ?”

रम्भा ने विवेक के द्वार बंद कर लिए थे। अब आरंभ होने वाला था— ‘भ्रम का व्यापार’।

(मेनका, रम्भा के इस उग्र और हठवादी रूप को देखकर निरुत्तर हो जाती है। रम्भा की आँखों में दृढ़ संकल्प और प्रतिशोध की चमक है। कक्ष में कुछ क्षणों तक भारी मौन छाया रहता है। रम्भा अपनी दृष्टि वातायन (खिड़की) की ओर गड़ाए रखती है, फिर धीरे से मुड़ती है। उसके मुख पर अब क्रोध नहीं, बल्कि एक कृत्रिम शांति और वाक्-चतुराई है। वह मेनका के समीप जाकर उसके कंधे पर हाथ रखती है।)

रम्भा का षड्यंत्र

रम्भा: (मधुर किन्तु गंभीर स्वर में) “क्षमा करना सखी, सभा के आघात ने मेरी वाणी में कटुता भर दी है। किन्तु तनिक विचार करो, क्या मैं यह सब केवल स्वयं के लिए कर रही हूँ? आज मेरा अपमान हुआ है, कल तुम्हारा भी हो सकता है। क्या हम सदैव इस आशंका में जिएंगी कि देवराज का वज्र कब हमारी स्वतंत्रता को कुचल देगा? मेरा यह ‘हठ’ वास्तव में स्वर्ग के समस्त शोषितों के प्रति मेरा उत्तरदायित्व है।”

मेनका: (दुविधा में) “किन्तु रम्भा, तुम्हारी योजना अत्यंत भयावह है। यदि हम विफल हुए तो?”

रम्भा: “विफलता का भय उन्हें होता है जिनके पास खोने के लिए कुछ हो। हमारे पास तो खोने के लिए केवल हमारी ‘पराधीनता’ है। सुनो सखी, तुम्हें एक महती कार्य सिद्ध करना है। वरुण देव और कुबेर देव के हृदय में भी देवराज के प्रति सूक्ष्म असंतोष व्याप्त है। वरुण देव को निरंतर यह खल रहा है कि वे ‘जलाधिपति’ होकर भी इंद्र की आज्ञा के बिना वर्षा का विधान नहीं कर सकते। और कुबेर? वे स्वर्ग के कोषाध्यक्ष हैं, फिर भी धन के व्यय का अधिकार उनके पास नहीं है।”

मेनका: “तुम क्या चाहती हो कि मैं उनके पास जाऊं?”

रम्भा: “हाँ! तुम अपनी वाकपटुता से उन्हें यह बोध कराओ कि ‘लोकतंत्र’ में वे केवल विभाग के अध्यक्ष नहीं, बल्कि स्वतंत्र ‘शासक’ होंगे। उन्हें नंदन वन के उसी गुप्त निकुंज में निमंत्रित करो जहाँ देवराज की गुप्तचर दृष्टि न पहुँच सके। उन्हें विश्वास दिलाओ कि यह विद्रोह नहीं, अपितु स्वर्ग के ‘पुनरुद्धार’ का अभियान है।”

मेनका: (असमंजस में) “परंतु वरुण देव अत्यंत धर्मनिष्ठ हैं, क्या वे इस ‘अमर्यादित’ मार्ग पर चलेंगे?”

रम्भा: “सखी, ‘धर्म’ की परिभाषा तो अब हम लिखेंगे! उन्हें अपने वश में करना भी तो तुम भली-भांति जानती हो और अब यही हमारा अस्त्र है। उनसे कहना कि लोकतंत्र ही वास्तविक ‘युगधर्म’ है। उन्हें सत्ता का वह स्वप्न दिखाओ जहाँ वे किसी के उत्तरदायी नहीं होंगे। जाओ मेनका, स्वर्ग का भविष्य अब तुम्हारे चरणों की गति पर निर्भर है। इस मंत्रणा को अत्यंत गुप्त रखना, अन्यथा ‘राजद्रोह’ का दंड वज्र से भी कठोर होगा।”

(मेनका कुछ क्षण रम्भा की आँखों में देखती है, फिर उसके शब्दों के सम्मोहन में बँधकर धीरे से सिर हिलाती है और कक्ष से प्रस्थान करती है। रम्भा उसे जाते हुए देखती है और उसके अधरों पर एक कुटिल मुस्कान उभर आती है।)

रम्भा: (स्वयं से) “गच्छ सखी! तुम मार्ग प्रशस्त करो, सिंहासन की ओर मेरा बढ़ना तो सुनिश्चित है। ‘अमर्यादा’ का बीज अब वटवृक्ष बनेगा!”

निष्कर्ष

“लोकतंत्र वह मायावी दर्पण है, जिसमें व्यक्ति को समाज का हित नहीं, अपितु अपने स्वार्थ की पूर्ति का मार्ग दिखाई देता है।”

अन्ततः, रम्भा ने अपनी ग्लानि को ‘स्वाधीनता’ का नाम देकर एक ऐसे षड्यंत्र का सूत्रपात कर दिया है, जिसकी परिणति प्रकृति के विनाश में निहित है। मेनका का प्रस्थान मात्र एक सखी का जाना नहीं, बल्कि भ्रम के उस संदेश का प्रसार है जो स्वर्ग के स्तंभों—वरुण और कुबेर—को झकझोरने वाला है। जब न्याय की मांग व्यक्तिगत प्रतिशोध से प्रेरित हो, तो वह न्याय नहीं, अपराजिता अराजकता को जन्म देती है।

आप रम्भा के अपमान को सही मानते हैं या इंद्र के अनुशासन को?

अगले भाग की एक झलक: “जब स्वर्ग के कोषाध्यक्ष कुबेर और जलाधिपति वरुण मेनका पर क्रोधित हो गये तो वह थड़थड़ कांप रही थी, किन्तु अगले चरण में वहां …. “पढ़िए अगला भाग…

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

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FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न):

प्रश्न: रम्भा ने राजतंत्र के विरुद्ध लोकतंत्र को ही क्यों चुना?

उत्तर: क्योंकि लोकतंत्र में ‘परिवर्तन’ और ‘समानता’ के नाम पर किसी भी स्थापित सत्ता को चुनौती देना सरल होता है। रम्भा ने इसे अपने प्रतिशोध का एक वैचारिक कवच बनाया।

प्रश्न: क्या लोकतंत्र में ‘भीड़तंत्र’ का खतरा हमेशा रहता है?

उत्तर: हाँ, जैसा कि मेनका ने स्पष्ट किया—जहाँ निर्णय विवेक से नहीं बल्कि मतों की संख्या से होते हैं, वहाँ ९०% विवेकहीनों का कोलाहल सत्य को दबा देता है।

प्रश्न: क्या व्यक्तिगत स्वार्थ लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है?

उत्तर: निश्चित रूप से। जब रम्भा जैसा पात्र अपनी व्यक्तिगत कुंठा को ‘लोक-कल्याण’ का मुखौटा पहनाता है, तो लोकतंत्र दिशाहीन होकर अराजकता की ओर बढ़ जाता है।

प्रश्न: इस नाटक का मुख्य संदेश क्या है?

उत्तर: अच्छाई की तुलना में बुड़ायी सौ गुणा अधिक प्रभावित करती है। एक दुष्ट का संत बनना कठिन कार्य है किन्तु एक संत को दुष्ट बनने के लिये कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं होती, मात्र कुछ विशेष परिस्थतियों में यदि विवेक रूपी नेत्र को बंद कर ले तो दुष्ट बन जाता है।

प्रश्न: रम्भा का अन्तर्द्वन्द क्या वास्तव में लोकतंत्र की मांग है?

उत्तर: नहीं, रम्भा की मांग ‘लोकतंत्र’ के प्रति अनुराग नहीं, अपितु इंद्र के प्रति ‘प्रतिशोध’ है। वह लोकतंत्र को मात्र एक अस्त्र की तरह उपयोग कर रही है।

प्रश्न: मेनका ने रम्भा का साथ देना क्यों स्वीकार किया?

उत्तर: रम्भा ने ‘अधीनता’ और ‘अपमान’ जैसे शब्दों का भावनात्मक जाल बुना, जिससे मेनका का विवेक उसकी सखी के प्रति सहानुभूति में दब गया।

प्रश्न: इस भाग में राजतंत्र और लोकतंत्र का क्या संघर्ष दिखाया गया है?

उत्तर: इसमें दिखाया गया है कि राजतंत्र ‘अनुशासन’ और ‘योग्यता’ पर बल देता है, जबकि रम्भा द्वारा प्रस्तावित लोकतंत्र ‘अधिकारों’ और ‘समानता’ के लुभावने कुतर्कों पर आधारित है।

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कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।


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