swarg me loktantra part-1, narad indra sanwad
आज के युग में जिस ‘लोकतंत्र’ को हम सर्वोपरि मानते हैं, वह वास्तव में शाश्वत मूल्यों के पतन की कथा है। हमारे शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि शासन वही श्रेष्ठ है जो ‘धर्म’ द्वारा संचालित हो, न कि ‘इच्छाओं’ द्वारा। वर्तमान लोकतंत्र १०% गुणों की आड़ में ९०% दोषों को छिपाए हुए है। यह कुतर्कों पर खड़ा एक ऐसा भवन है जहाँ प्रज्ञा (Intelligence) की बलि चढ़ाकर केवल संख्या (Numbers) की पूजा की जाती है।
स्वर्ग में विद्रोह: क्या बहुमत के आगे झुकेंगे देवराज इंद्र?
“लोकतंत्र वह तंत्र है जहाँ १०% लाभ की आड़ में ९०% अराजकता बेची जाती है।”
शास्त्र कहते हैं— “अराजके हि लोकेऽस्मिन्सर्वतो विद्रुते भयात्” (बिना राजा के संसार भय से नष्ट हो जाता है)। परंतु जब विवेकहीनता जागती है, तो मनुष्य (या देवता) व्यवस्था को ही बेड़ी समझने लगता है। नारद जी का उद्देश्य तो पृथ्वी की दुर्दशा बताना था, किंतु नियति ने उसे स्वर्ग के विनाश का बीज बना दिया। चाणक्य नीति में संकेत है:
“वरमेको गुणी पुत्रो न च मूर्खशतान्यपि।” ~ हजारों मूर्खों की अपेक्षा एक गुणी ही श्रेष्ठ है।
किन्तु लोकतंत्र में हजार मूर्ख मिलकर एक विवेकशील व्यक्ति के निर्णय को शून्य कर देते हैं। यही स्थिति जब स्वर्ग में उत्पन्न हुई, तो परिणाम क्या हुआ? आइए देखते हैं।
स्वर्ग में लोकतंत्र की आहट
“जहाँ वोट की महिमा हो, वहाँ पद की गरिमा समाप्त हो जाती है।”
दृश्य १ : इंद्र की सुधर्मा सभा
(स्वर्ग की सभा अपने पूर्ण वैभव में है। देवराज इंद्र सिंहासन पर विराजमान हैं, गन्धर्व गान कर रहे हैं और अप्सरायें नृत्य, देवता गण आनंदित हो रहे हैं। सभी दिव्य पेयों का पान कर रहे हैं एवं अन्य दिव्य भोगों को भोग रहे हैं। तभी वीणा की मधुर तान के साथ देवर्षि नारद का प्रवेश होता है। इंद्र स्वयं उठकर उनका स्वागत करते हैं। अर्घ्य और पाद्य आदि पूजा के पश्चात संवाद प्रारंभ होता है।)

इंद्र: “देवर्षि नारद! बड़ी कृपा करके आपने दर्शन दिया किन्तु आज आपके मुखमंडल पर वह चिर-परिचित हास्य कुछ मंद लग रहा है, इसका क्या कारण है? कृपया बतायें लिये कोई आज्ञा हो तो प्रदान करें।
नारद: (लंबी श्वास लेकर) “क्या कहूँ देवेंद्र! पृथ्वी पर अब धर्म की मर्यादा नहीं, ‘मतों की संख्या’ का शासन है। जिसे वे ‘लोकतंत्र’ कहते हैं, किन्तु उसमें तंत्र नाम की कोई वस्तु देखने को नहीं मिलती, वह वास्तव में कुतर्कों का जाल है।
वहाँ अब कोई पराक्रमी राजा नहीं होता, अपितु जनता जिसे चुनती है भले ही वह पापी-दुराचारी ही क्यों न हो, वही सत्तासीन होता है। वही नीतियां निर्धारित करता है, अब सोचिये देवराज यदि दुराचारी-पापी यदि नीति निर्धारण करेगा तो वह नीति और धर्म की रक्षा के लिये करेगा या अनीति और पाप के संरक्षण हेतु।
इंद्र: (आश्चर्य से) “जनता चुनती है? क्या प्रजा अब योग्य और अयोग्य का भेद करने में सक्षम हो गई है?”

नारद: “यही तो विडंबना है महाराज! ९०% दोषों के बाद भी उसे महान बताया जा रहा है। वहाँ शासक स्थायी नहीं होता। आज जो राजा है, कल वह साधारण नागरिक बन जाता है और जो कल तक तुच्छ था, वह वोट की शक्ति से सिंहासन पर बैठ जाता है। इसी ‘परिवर्तन’ ने पृथ्वी पर भारी अव्यवस्था और असुरक्षा उत्पन्न कर दी है।”
इंद्र: (चिंतित भाव में) “हां; यह तो गंभीर चिंता का विषय है। क्योंकि संख्याबल के आधार पर विचार करें तो स्वाभाविक रूप से कलयुग में पापियों की ही संख्या अधिक होती है। धर्म और शास्त्र में आस्था निष्ठा मंद होती है। यदि कुछ लोग धर्म और शास्त्र में निष्ठा रखने वाले होते भी हैं तो उनकी संख्या ही अपर्याप्त होगी जो सत्ता प्राप्त कर सकें।”
नारद: “हां देवराज, धर्म और शास्त्र में रूचि का मंद होना और पाप में रूचि बढ़ना तो कलयुग का स्वाभाविक लक्षण है किन्तु यदि राजा योग्य हो तो नियंत्रित कर सकता है। विडम्बना तो ये है कि लोकतंत्र में राजा योग्य हो कैसे सकता है ?”
इंद्र: “फिर तो राजा अयोग्य ही होते हैं आप यही कहना चाहते हैं न देवर्षि नारद!”
नारद: “हां देवराज, और मुझे तो चिंता है भी कि यह मानसिक संक्रमण कहीं अन्य लोकों में भी न फैल जाए।”
इंद्र: “कहीं आप ये तो नहीं कहना चाहते हैं कि लोकतंत्र का यह मानसिक संक्रमण स्वर्गलोक, यमलोक आदि में भी न फैल जाये।”
नारद: “नारायण नारायण; आपने मेरी चिंता को गहराई से समझ लिया।”
(ऐसा कहकर नारद जी विदा होते हैं और देवराज इन्द्र चिंता के गहरे सागर में डूब जाते हैं, अपने राजसिंहासन को गंभीर और चिंताजनक भाव से देखते हैं मानो यह भी कि कोई छीन न ले। देवता, अप्सरा, गन्धर्व सब कानाफूसी करने लगे। कुछ क्षण रुककर देवराज फिर सिंहासन पर बैठते हैं, किन्तु अब सभा में शांति नहीं है।)

इंद्र: (गंभीर स्वर में) “शांत हों! देवताओं, यह उच्छृंखलता अमरावती की मर्यादा के विरुद्ध है। ये स्वर्गलोक है और हमें पृथ्वीलोक की चिंता करनी चाहिये। वहां पुनः धर्म और नीति की स्थापना कैसे हो इसका विचार करना चाहिये जिससे सब-कुछ व्यवस्थित हो सके।”
देवगुरु बृहस्पति : अब तो हमें स्वर्गलोक की चिंता होने लगी है देवराज। कहीं यहां भी ….
इंद्र: (चिंतित स्वर में) “हां गुरुवर, हमारे मन में भी यही चिंता उत्पन्न हो रही है जो हमें व्याकुल कर रही है।”
(इतने में कुछ देवता बाहर जाते हैं और कुछ काल पश्चात् हाथों में तख्तियां लेकर वापस आते हैं। गुरु बृहस्पति और देवराज आपस में विमर्श कर ही रहे होते हैं कि कुछ देवता और गंधर्व हाथों में तख्तियां लिए ‘समान अधिकार’ और ‘स्वतंत्रता’ के नारे लगाने लगते हैं।)
इंद्र: (गंभीर स्वर में) शांत हों! देवताओं, यह उच्छृंखलता अमरावती की मर्यादा के विरुद्ध है। आप लोग किस अधिकार की बात कर रहे हैं?
एक देवता (कुतर्क करते हुए): “महाराज! युग बदल रहा है। हम कब तक एक ही राजा के अधीन रहेंगे? क्या स्वर्ग केवल आपका है? यहाँ भी ‘देवताओं’ का मत होना चाहिए। जो बहुसंख्यक चाहेंगे, वही शासन चलेगा। यदि पृथ्वी पर लोकतंत्र से चलता है तो स्वर्ग में भी देवतंत्र अर्थात स्वर्ग के लोकतंत्र से चलना चाहिये।”
इंद्र: (चेतावनी देते हुये) : “कैसी बातें कर रहे हो, तुमलोग ऐसा सोच भी कैसे सकते हो ! तुमलोग मंदबुद्धि मानव थोड़ी न हो देवता हो देवता।”
देवगुरु बृहस्पति : देवेंद्र, इन देवताओं का तर्क है कि ‘बहुमत’ ही सत्य है। भले ही वह बहुमत वासनाओं से भरा हो या अज्ञान से।
इंद्र: गुरुवर! गीता में तो ये भी कहा गया है ..
“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।” जब व्यवस्था बिगड़ती है, तो धर्म की स्थापना हेतु अनुशासन अनिवार्य है। बिना किसी योग्य नायक (King) के, यह सृष्टि दिशाहीन हो जाएगी।
कुछ देवता: (विद्रोह के स्वर में) नहीं! हमें अनुशासन नहीं, ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ चाहिए, “पराधीनता नहीं स्वाधीनता” चाहिए। यदि मृत्युलोक का मानव अपना राजा स्वयं चुन सकता है, तो हम देवता क्यों नहीं? हमें लोकतंत्र चाहिए! हमें चुनाव चाहिए!
इंद्र: (निराशा से): “जिस लोकतंत्र की तुम बात कर रहे हो, वह गुणों का नहीं, दोषों की खान और कुतर्कों का खेल है। जहाँ १०% लाभ दिखाकर ९०% अव्यवस्था बेची जाती है। क्या तुम तैयार हो उस अराजकता के लिए जहाँ पद की गरिमा नहीं ‘वोट’ की महिमा होगी?”
एक देवता: (विद्रोह के स्वर में) “हम लोग क्या गाजर-मूली की हैं, पिसते ही रहें, युगों-युगों से बनाये नियमों को धर्म के नाम पर धोते रहें। मनुष्य तो चन्द्रमा तक पहुंच गये और हम वही युगों पुरानी राग अलापते रहें। ऐसा कब तक चलेगा, हमें भी प्रगति करना होगा, आधुनिक बनना होगा।”
इंद्र: (निराशा से): “असंभव! यहां का राजा मैं हूँ और मेरे पास यह वज्र है जिससे मैं अपनी सत्ता की रक्षा करने में सक्षम हूँ, जिसे लोकतंत्र चाहिये उसे हमसे युद्ध करना होगा।”
एक देवता: “ये तो मत्स्य-न्याय अर्थात जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली बात हो गयी, जिसे पृथ्वी पर जंगलरराज भी माना जाता है।””
इंद्र: (उपेक्षा के भाव से): “असंभव! यहां का राजा मैं हूँ और मेरे पास यह वज्र है जिससे मैं अपनी सत्ता की रक्षा करने में सक्षम हूँ, जिसे लोकतंत्र चाहिये उसे हमसे युद्ध करना होगा। आज की सभा समाप्त….”
इस प्रकार सभा का समापन करके देवराज सभागार से निकल गये। चूंकि कुछ ही देवताओं के मन में लोकतंत्र का संक्रमण हुआ था और ऊपर से वज्र का भी भय समाहित हो गया अस्तु सबने सिर झुका लिया। सभा के अंत में एक दृश्य जोड़ें जहाँ रम्भा इंद्र के वज्र को भय नहीं, बल्कि ‘अन्याय’ की तरह देख रही है। वह अन्य देवताओं के कान भरते हुए कहे —

“वज्र का भय दिखाकर जो शासन करे, क्या वह देवराज कहलाने योग्य है? हमें बल नहीं, बहुमत चाहिए।”
निष्कर्ष
“हज़ारों मूर्खों के मत मिलकर भी एक ज्ञानी के विवेक की बराबरी नहीं कर सकते।”
स्वर्ग की सुधर्मा सभा आज विचलित है। जिस वज्र से असुर कांपते थे, आज उसे ही ‘तानाशाही’ का प्रतीक बताया जा रहा है। नारद जी द्वारा बोया गया ‘लोकतंत्र’ का बीज रम्भा जैसी महत्वाकांक्षाओं की खाद पाकर अंकुरित होने लगा है। इन्द्र ने सभा तो समाप्त कर दी, किन्तु देवताओं के मन में उठी ‘स्वाधीनता’ की यह चिनगारी क्या अमरावती को भस्म कर देगी?

अगले भाग की एक झलक: रम्भा का गुप्त षड्यंत्र! कैसे एक अप्सरा ने देवताओं को ‘स्वर्ग का संविधान’ बदलने के लिए उकसाया? क्या होगा जब इंद्र के विरुद्ध पहली ‘गुप्त सभा’ आयोजित होगी? पढ़िए अगला भाग…
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
अस्वीकरण: यह नाटक पूर्णतः काल्पनिक है और पौराणिक पात्रों के माध्यम से समकालीन राजनीतिक व्यवस्था एवं लोकतंत्र की विसंगतियों पर एक तीखा कटाक्ष (Satire) प्रस्तुत करने का प्रयास है। इस नाटक का उद्देश्य किसी धर्म, संप्रदाय या विशिष्ट वर्ग की भावनाओं को आहत करना नहीं है, बल्कि शास्त्रसम्मत ‘विवेक’ और आधुनिक ‘भीड़तंत्र’ के मध्य के अंतर को स्पष्ट करना है। यहाँ वर्णित पात्रों के संवाद और तर्क लेखकीय कल्पना का परिणाम हैं, जिसका उद्देश्य समाज में व्यवस्था और अनुशासन के महत्व पर वैचारिक विमर्श को प्रोत्साहन देना है।

भ्रम और यथार्थ (FAQ)
FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न):
प्रश्न: यह नाटक किस विषय पर आधारित है?
उत्तर: यह नाटक स्वर्ग की पौराणिक पृष्ठभूमि में आधुनिक लोकतंत्र की विसंगतियों और मर्यादा के पतन पर आधारित एक व्यंग्यात्मक चित्रण है।
प्रश्न: क्या यह नाटक लोकतंत्र के विरुद्ध है?
उत्तर: यह नाटक लोकतंत्र के उस स्वरूप पर प्रहार करता है जो केवल ‘संख्या बल’ और ‘कुतर्कों’ पर आधारित है, जहाँ योग्यता की अपेक्षा भीड़ को महत्व दिया जाता है।
प्रश्न: ‘स्वर्ग में लोकतंत्र’ का मुख्य पात्र कौन है?
उत्तर: इसके मुख्य पात्र देवराज इंद्र, देवर्षि नारद और विद्रोही देवता हैं, जो व्यवस्था और अराजकता के बीच संघर्ष को दर्शाते हैं।
प्रश्न: क्या स्वर्ग में चुनाव संभव है?
उत्तर: शास्त्रीय दृष्टि से स्वर्ग एक भोग-भूमि है जो कर्मों के आधार पर प्राप्त होती है, न कि चुनाव से। यह नाटक एक ‘काल्पनिक स्थिति’ पैदा करता है कि यदि दिव्य लोकों में भी मृत्युलोक जैसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा घुस जाए, तो ब्रह्मांड की व्यवस्था कैसे चरमरा जाएगी।
प्रश्न: इंद्र का वज्र यहाँ किसका प्रतीक है?
उत्तर: यहाँ इंद्र का वज्र उस ‘दंड-शक्ति’ और ‘राजकीय अनुशासन’ का प्रतीक है जो समाज को पतन से रोकने के लिए अनिवार्य है, जिसे अक्सर आधुनिक राजनीति में ‘तानाशाही’ कहकर बदनाम करने की कोशिश की जाती है।
प्रश्न: इस नाटक का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: इसका संदेश है कि सत्ता केवल अधिकार नहीं, बल्कि एक कठिन उत्तरदायित्व है। बिना पात्रता (Qualification) के केवल मांग (Demand) के आधार पर मिली सत्ता विनाश का कारण बनती है।
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कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।
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