“न खाता न बही आधुनिक विचारधारा जो कहे वही सही”
बाल विवाह भारत की ही नहीं वैश्विक सामाजिक परिदृश्य का प्राचीन परम्परा रही है जो भारतीय संस्कृति का तो सिद्धांत रहा है किन्तु वर्त्तमान में इसे एक ऐसा गहरा घाव कहा जाता है, दूषित प्रथा कही जाती है। एक झूठ यह भी है कि इसे लेकर समाज दो ध्रुवों में बंटा दिखता है। कुछ आधुनिक विचारधारा वाले जिसका आधार ही कुतर्क और मात्र कुतर्क है इसे ‘दूषित प्रथा’ मानकर जड़ से मिटाने की बहस करते हैं, कानून बनाकर थोप देते हैं तो दूसरी ओर समाज इसे स्वीकारने के लिये तैयार नहीं है, भले ही निंदा का पात्र क्यों न बने।
यह एक स्वस्थ समीक्षा का विषय है किन्तु चिंताजनक यह है कि कुतर्क के आधारों पर टिकी सिद्धांतविहीन आधुनिक विचारधारा इसके लिये तैयार भी नहीं है।
- क्या आपको लगता है कि कुतर्कों और केवल कुतर्क पर आधारित सिद्धांतविहीन आधुनिक विचारधारा जो कहती है उसे आंख मूंदकर स्वीकार कर लेना चाहिये।
- क्या क्या आपको लगता है कि कुतर्कों और केवल कुतर्क पर आधारित सिद्धांतविहीन आधुनिक विचारधारा को सैद्धांतिक पक्ष की निंदा या आलोचना करने का अधिकार है ?
- क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि ये कुतर्कों और केवल कुतर्क पर आधारित सिद्धांतविहीन आधुनिक विचारधारा के विचारों की सैद्धांतिक समीक्षा होनी चाहिये ?
प्रश्नों के उत्तर जानने के लिये आलेख को अंत तक पढ़ें
कर्णधारों का दृष्टिदोष या समाज का कोढ़? बाल विवाह की कड़वी सच्चाई
“यह मात्र एक भ्रम है कि आधुनिक विचारधारा सत्य को जानती और स्वीकारती है एवं ये जो बताये वही सही होता है”
आगे बढ़ने से पूर्व सर्वप्रथम तो आपको इस विचार का परित्याग करना होगा कि ये जो सिद्धांतविहीन विचारधारा है जो स्वयं को आधुनिक विचारधारा कहती है, प्रगतिशीलता और न जाने क्या-क्या दम्भ भरती है यह सत्य से किसी प्रकार का संबंध रखती है और इसे आंख मूंदकर स्वीकार कर लेना चाहिये। क्योंकि सिद्धांत का तात्पर्य होता है जो अंत में सिद्ध हो जाये और ये आधुनिक विचारधारा तो सिद्धांतविहीन है एवं सैद्धांतिक पक्ष की विरोधी है। क्या इसकी ही समीक्षा नहीं की जानी चाहिये कि आधुनिक विचारधारा मान्य है अथवा नहीं ? हम इसकी भी समीक्षा करेंगे किन्तु पृथक से करेंगे।
यद्यपि संक्षिप्त रूप से यहां भी सिद्ध होगा ही कि आधुनिक विचारधारा स्वयं समीक्षा के योग्य है कि उसे मान्यता दी जाय या अमान्य घोषित किया जाय। क्योंकि चर्चा का जो विषय “बाल विवाह” है इसमें भी आधुनिक विचारधारा की सिद्धान्तविहीनता ही सिद्ध होगी, कुतर्कों पर आश्रित है यही सिद्ध होगा। एवं इसके पश्चात् शेष बचेगा कि सैद्धांतिक विचार मान्य है अथवा कुतर्कों पर आश्रित आधुनिक विचारधारा।
बाल विवाह पर आधुनिक और प्रगतिशील विचारधारा के जो कुतर्क होते हैं वो इस प्रकार हैं और यहाँ इस विषय की गहन समीक्षा दी गई है और यहां हम एक-एक कुतर्क का खण्डन करेंगे एवं अंत में सैद्धांतिक पक्ष स्थापित करेंगे:
- दूषित प्रथा: एक सामाजिक अभिशाप
- ‘कर्णधारों’ का दृष्टिदोष: परंपरा या विवशता?
- वर्तमान स्थिति और कानूनी प्रावधान
दूषित प्रथा: एक सामाजिक अभिशाप
आधुनिक संदर्भ में बाल विवाह को ‘दूषित’ इसलिए माना जाता है क्योंकि यह मानवाधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है :
- स्वास्थ्य पर प्रहार: कम उम्र में विवाह का अर्थ है—कम उम्र में मातृत्व। यह किशोरियों के शारीरिक विकास को बाधित करता है और मातृ मृत्यु दर (MMR) व शिशु मृत्यु दर (IMR) में वृद्धि का प्रमुख कारण बनता है।
- शिक्षा और स्वावलंबन का अंत: विवाह होते ही बच्चों (विशेषकर लड़कियों) की शिक्षा रुक जाती है। यह उन्हें आर्थिक रूप से दूसरों पर निर्भर बना देता है, जिससे गरीबी का चक्र पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहता है।
- मानसिक शोषण: जिस उम्र में बच्चों को खेल-कूद और दुनिया की समझ विकसित करनी चाहिए, उस उम्र में उन पर गृहस्थी का बोझ डालना उनके मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तित्व विकास को कुचल देता है।

खण्डन
सर्वप्रथम तो यह मानवाधिकार की बात करता है और इसे हम मानवाधिकार से ही खण्डित करते हैं। भूख लगने पर भोजन मानवाधिकार है अथवा नहीं यदि हाँ तो जिस प्रकार भूख लगने पर भोजन का अधिकार मानवाधिकार ही नहीं सभी जीवों का अधिकार है उसी प्रकार काम की भूख लगने पर उसकी तृप्ति भी मानवाधिकार है।
फिर तुमने ऐसा कौन से मानवाधिकार गढ़ लिया जो प्रकृति के ही विरुद्ध है ? अरे ये मानव मात्र का मानवाधिकार नहीं सभी जीवों का प्राकृतिक अधिकार है।

यह सिद्ध हो जाता है कि तुमने जो मानवाधिकार के कुछ नियम बनाये हैं वो कुतर्कों पर आश्रित हैं और पूरा-का-पूरा मानवाधिकार भी कुतर्क पर ही आश्रित है।
मानवाधिकार को परिभाषित करने से पूर्व क्या तुमने मानव, मानवीय गुण और लक्षण आदि को परिभाषित किया है ? मैंने तो जहां तक अनुभव किया है जो मानवता के कलंक हैं जैसे आतंकवादी, वो भी मानवाधिकार-मानवाधिकार चिल्लाते हैं।
यह सिद्ध करता है कि तुम जो मानवाधिकार का राग अलापते हो वो स्वयं में ही कुतर्क है। क्योंकि मानवाधिकार से पूर्व मानव और मानवता की सैद्धान्तिक परिभाषा करना अनिवार्य है। अन्यथा जो मानवता के शत्रु हैं, जैसे आतंकवादी वो मानवाधिकार चिल्लाते रहेंगे, ये हम देख रहे हैं, अनुभव कर रहे हैं जिससे यह सिद्ध हो जाता है कि मानवाधिकार ही कुतर्क पर आश्रित है अथवा ये मानवता के शत्रुओं हेतु ही किया गया प्रपञ्च है। क्योंकि मानवों जो अहिंसक हैं, न्याय चाहते हैं, पीड़ित-प्रताड़ित हैं, के लिये तो हमने तुम्हें कभी जगा नहीं पाया है।
प्रथम कुतर्क “स्वास्थ्य पर प्रहार”: ठीक है बाल विवाह से स्वास्थ्य पर बुड़ा प्रभाव पड़ता था एक बार को तुम्हारा कुतर्क स्वीकार कर लेते हैं तो इसका तात्पर्य यह होना चाहिये कि जिनका बाल विवाह हुआ था वो अस्वस्थ होते, शीघ्र मरते और जिसका बाल-विवाह नहीं हुआ है वो अधिक स्वस्थ होते है दीर्घायु होते।
परन्तु धरातल पर तो विपरीत दिखता है जिनका बाल-विवाह हुआ था वही अधिक स्वस्थ मिलते हैं और दीर्घायु होते हैं, जिनका बाल विवाह नहीं हो रहा है वो दवाओं पर निर्भर हो गये हैं अर्थात स्वस्थ नहीं हैं और अल्पायु में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। तुम्हारे कुतर्क की धरातल पर पुष्टि नहीं होती है। हां मृत्युदर वाली जो बात है वो अपवाद के रूप में कुछ सत्य हैं किन्तु अपवाद हैं, नियम अपवाद के आधार पर नहीं बनते।
द्वितीय कुतर्क “शिक्षा और स्वावलंबन का अंत” : ये तो धूर्तता की पराकष्ठा है, बाल-विवाह से शिक्षा और स्वावलंबन का अंत हो जाता है तो तुम्हीं लोग जब नारी अधिकार की बात करते हो तो प्राचीन काल के कुछ नाम गिनाते हो : “सती सावित्री, अनसूया, गार्गी, मैत्रेयी, लोपामुद्रा” आदि तो फिर यह भी तुम्हारा कुतर्क ही सिद्ध हो जाता है क्योंकि बाल-विवाह तो अभी भी प्रचलित है भले ही कितने ही कठोर कानून क्यों न बनाये गए हों। इन सबका भी बाल-विवाह ही हुआ था तो इनकी शिक्षा और स्वावलंबन का अंत क्यों नहीं हुआ ?

यह कुतर्क एकांगी है और मात्र स्त्री के शिक्षा और स्वावलंबन का अंत बताता है जो असत्य है। स्त्री का गुरु पति ही होता है यह सिद्धांत है और पुत्री को पिता, भ्राता व पत्नी को पति ही ज्ञान प्रदान करता है। जितने भी नाम गिनाओगे वो किसी स्कूल-कॉलेज नहीं गयी थी। रही बात स्वावलंबन की तो प्रश्न है क्यों, परिवार का अस्तित्व समाप्त करने के लिये?
स्त्रियों के स्वावलंबन से परिवार का अस्तित्व संकट में आ जाता है और धरातल पर भी देख लो जहां जितना स्वावलंबन है वहां परिवार का अस्तित्व उतना ही संकट में है। भारत में भी ये प्रवृत्ति बढती जा रही है और इसका दुष्परिणाम भी उसी प्रकार देखा जा रहा है, परिवार का अस्तित्व कब तक है और कब परिवार ही समाप्त हो जाता है पता ही नहीं चलता। शादी और तलाक एक खेल जैसा खेला जा रहा है, यहां दुराचार और शारीरिक भूख का दुष्परिणाम भी दिखता है जो बाल-विवाह नहीं करने का दुष्परिणाम है।
बाल विवाह नहीं होने का तात्पर्य यह नहीं है कि वो काम-भोग नहीं करता है, यौन तृप्ति नहीं करता है अपितु दुराचार करता है और दुराचार के दलदल में फंस जाता है एवं परिवार नहीं बसा पाता बस शादी और तलाक का खेल खेलता है, यदि बच्चे हो जायें तो उनका जीवन दुःखमय हो जाता है। और यदि समझौते के आधार पर परिवार न भी टूटें तो भी वो परस्पर पारिवारिक चेतना नहीं रखते, पारिवारिक सुख प्राप्त नहीं कर पाते, उनके परिवारों में परिवार का एक भी गुण और लक्षण नहीं दिखता।
परिवार का सूत्र : “प्रेम से त्याग तक, सेवा से समर्पण तक”
तुम्हें ये बातें समझ ही नहीं आयेगी क्योंकि तुम्हारे पास परिवार की कोई अवधारणा ही तो नहीं है,जिसे फैमिली कहते हो वह तो एक व्यावसायिक अनुबंध के समान होता है जिसे जब चाहें तोड़ सकें। परस्पर स्वार्थपूर्ति का अनुबंध करके जैसे ही बड़ा स्वार्थ दिखा उसे तोड़कर दूसरे से अनुबंध करने के व्यवसाय को परिवार नहीं कहा जाता है।
परिवार का तो सूत्र ही होता है : “प्रेम से त्याग तक, सेवा से समर्पण तक” और इसे ही तुम पीड़ा बताते हो। यदि मैं अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिये कष्टपूर्वक धनार्जन करता हूँ, और प्राप्त धन में ही कष्टपूर्वक मेरा परिवार निर्वहन कर रहा है तो यही “प्रेम से त्याग तक की भावना है, सेवा से समर्पण तक का भाव है”
तुम्हारा कुतर्क यदि सही होता अर्थात कुतर्क न होकर सही तर्क होता तो धरातल पर उसके दुष्परिणाम नहीं उत्पन्न होते, अपितु जो दुष्परिणाम थे वो समाप्त होते। धरातल पर सुख-समृद्धि-शांति की वृद्धि होती, न की ह्रास। यदि विश्वास न हो तो सर्वेक्षण करके सिद्ध करो। जितने भी शिक्षित और स्वावलम्बी महिलायें हैं और उनका बाल विवाह न हुआ हो तो उनका सर्वेक्षण करो और सिद्ध करो कि उनका स्वास्थ्य औसत से उत्तम है, पारिवारिक जीवन में सुख-शांति है।

ध्यातव्य : इस सर्वेक्षण का भाग शहरी लोग जी हो सकते हैं जो आधुनिक विचारधारा के वशीभूत हैं, वो ग्रामीण दंपत्ति नहीं जो आधुनिक विचारधारा को आंख मूंदकर नहीं स्वीकारते और सैद्धांतिक पक्ष से जुड़े हुये हैं।
सिद्धांतविहीन कुतर्काधारित आधुनिक विचारधारा के अंधभक्तों तुम्हें यह चुनौती है, यदि तुम्हें लगता है कि तुम सही हो तो ऐसा सर्वेक्षण करके सिद्ध करो कि तुम्हारी विचारधारा से धरातल पर अच्छे परिणाम मिल रहे हैं।
तृतीय कुतर्क “मानसिक शोषण”: ये बच्चों के विषय में कहा गया है कि बाल्यावस्था में विवाह होने से उनके ऊपर गृहस्थी का दबाव आ जाता है जो उनका मानसिक शोषण है। ये भी धूर्तता की ही पराकाष्ठा है। अरे यदि यह मानसिक शोषण है तब तो तुम्हारी विचारधारा का जो परिणाम है वो मानसिक हत्या है और भ्रूण हत्या तो करते ही हो।
बच्चों को यह भी नहीं ज्ञात होता कि परिवार क्या है और उसका परिवार टूट जाता है एवं माता कर पिता का सम्मिलित सुख प्राप्त नहीं कर पाते किसी एक का ही सुख मिलता है और मानसिक रूप से बाल्यावस्था में ही दुराचार का पाठ पढ़ा दिया जाता है जो समाज में दुराचार के पर्याय बन जाते हैं।
वास्तव में तो तुम बाल्यावस्था से ही उसके ऊपर बोझ दे रहे हो कि इतना प्रतिशत अंक लाओ, ये करके दिखाओ। बाल्यावस्था के आनंद को ही छीन लेते हो, आजीविका और गृहस्थी आरम्भ होने से पूर्व ही ऋणी बना देते हो और EMI के पैरों तले रौंदते रहते हो।
तुम जिसे मानसिक शोषण कहते हो, गृहस्थी का दबाव कहते हो वह देखने को तो नहीं मिलता है तो इतना झूठ क्यों बोलते हो। बाल-विवाह होने पर ही संस्कार और उचित शिक्षा मिलती थी, गृहस्थी का दबाव नहीं होता था क्योंकि परिवार का अस्तित्व था, निकम्मे का भी परिवार पालन-पोषण करती थी, आज निकम्मे का तो कोई पालन-पोषण नहीं कर रहा है।
तुम जिसे मानसिक शोषण कहते हो वही मानसिक पोषण था जो परिवार के अस्तित्व का मूल था। “प्रेम से त्याग तक, सेवा से समर्पण तक” का भाव उचित अवस्था में जगाया जाता था, कैसे जीना है उचित अवस्था में सिखाया जाता था। आज अवस्था व्यतीत होने के बाद बस रोना-रोते हैं सीख नहीं पाते, समझौता निवाहते हैं संबंध नहीं, क्योंकि सीखा ही नहीं।
जिसे तुम कुतर्कों के आधार पर व्यक्तिगत दुःख/कष्ट सिद्ध करते हो वो परिवार का आधार है। तुम्हारे पास कुतर्क है, दुष्परिणाम है और हमारे पास सिद्धांत है एवं तुलनात्मक प्रभाव का ज्ञान है।
‘कर्णधारों’ का दृष्टिदोष: परंपरा या विवशता?
आधुनिक विचारों का प्रतिनिधित्व करते हुये AI बताता है कि “जब हम इतिहास के पन्नों को पलटते हैं, तो कुछ लोग इसे ‘कर्णधारों’ (समाज के मार्गदर्शकों) की दूरदर्शिता की कमी या उस समय की परिस्थितियों का परिणाम मानते हैं”
- सुरक्षा की झूठी धारणा: मध्यकाल में आक्रमणों और सामाजिक असुरक्षा के दौर में, लड़कियों के ‘सम्मान’ की रक्षा के लिए जल्द विवाह की प्रथा शुरू हुई। पूर्वजों का यह ‘दृष्टिदोष’ आज के सुरक्षित समाज में तर्कहीन है।
- रूढ़िवादिता का चश्मा: समाज के कर्णधारों ने शास्त्रों के गलत अर्थ या संकुचित सामाजिक मान्यताओं (जैसे ‘कन्यादान’ का पुण्य प्राप्त करना) को प्राथमिकता दी, जिससे व्यक्ति की स्वतंत्रता गौण हो गई।
- आर्थिक लाभ की संकीर्णता: कई समाजों में इसे केवल दो परिवारों के बीच ‘संपत्ति के बंटवारे’ या ‘दहेज के बोझ’ से बचने के माध्यम के रूप में देखा गया, जो बच्चों के भविष्य की बलि चढ़ा देता है।

खण्डन
अरे धूर्त दूरदर्शिता की कमी तो तुम्हारे पास है कि कुतर्क गढ़ लेते हो और उसकी समीक्षा तक के लिये तैयार नहीं हो, उसके दुष्परिणामों की अनदेखी करते हो। इतिहास के पन्नों में दूरदर्शिता ही दिखती है जहां सुख-शांति-समृद्धि थी, प्रेम था, त्याग था, सेवा थी, समर्पण था, परिवार में स्थायित्व था।
तुम्हारी दूरदर्शिता का अभाव तो सिद्ध हो रहा है कि आज परिवार का अस्तित्व ही संकट में है, स्वार्थों का समझौता करते हैं जैसे व्यावसायिक अनुबंध और जब मन करे तोड़ देते हैं, शादी-तलाक एक खेल बन गया है। ये परिस्थितियों का परिणाम नहीं यही सिद्धांत है, तुम अपना सिद्धांत बताओ, सिद्धांत के नाम पर तुम्हारे पास फूटी कौड़ी भी है क्या ?
ये सिद्धांत मात्र व्यक्तिगत आधार पर स्थापित नहीं किये गये हैं अपितु व्यापक आयाम पर किये गए हैं अर्थात बहुआयामी होते हैं और ये सिद्धांत एक मात्र सनातन संस्कृति के पास ही है जिनके पास नहीं है वो इसको भी छिन्न-भिन्न करना चाहते हैं। सिद्धांत व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व के लिये कल्याणकारी होते हैं, आधुनिक विचारधारा के कुतर्क व्यक्तिवादी तो होते हैं किन्तु उसके लिये भी कल्याणकारी नहीं अपितु पतन का मार्ग ही प्रशस्त करते हैं, परिवार, समाज, राष्ट्र, संस्कृति, विश्व सबके लिये घातक हैं। इस आधुनिक विचारधारा का वध मैं अगले आलेखों में करूँगा।
प्रथम कुतर्क सुरक्षा की झूठी धारणा: “मध्यकाल में आक्रमणों और सामाजिक असुरक्षा के दौर में, लड़कियों के ‘सम्मान’ की रक्षा के लिए जल्द विवाह की प्रथा शुरू हुई” यह पूर्णतः भ्रामक तथ्य है। रामायण और महाभारत आदि ग्रन्थ में ऐसे प्रसंग भी हैं और प्रमाण भी है एवं सिद्धांत भी है जो आगे विचार करेंगे।
ये पूर्वजों का ‘दृष्टिदोष’ नहीं था तुम्हारा दृष्टिदोष है और आज के समाज को सुरक्षित मानना ही तर्कहीन है, अब तो परिवार भी सुरक्षित नहीं है, समाज की शक्ति अपहृत हो चुकी है। प्रत्येक कुलीन और सभ्य परिवार अपने बच्चों को लेकर भय के वातावरण में जी रहा है कि कहीं उसके बच्चे भी इस आधुनिकता के दलदल में फंसकर दुराचारी न बन जायें, कुलघाती न बन जायें।
द्वितीय कुतर्क रूढ़िवादिता का चश्मा: “समाज के कर्णधारों ने शास्त्रों के गलत अर्थ या संकुचित सामाजिक मान्यताओं (जैसे ‘कन्यादान’ का पुण्य प्राप्त करना) को प्राथमिकता दी, जिससे व्यक्ति की स्वतंत्रता गौण हो गई” ये आधुनिक विचार है जो पूर्णतः भ्रामक है।
सर्वप्रथम सिद्धांत को रूढ़िवादिता कहना मूर्खता है, शास्त्रों के गलत अर्थात और सामाजिक मान्यता की बात है तो वो प्रमाण मैं आगे प्रस्तुत करूँगा जो सिद्धांत हैं और रही बात व्यक्तिगत स्वतंत्रता की तो ये स्वेच्छाचारिता और स्वतंत्रता के अंतर को नहीं समझता है, सिद्धांत स्वतंत्रता तो देता है किन्तु स्वेच्छाचारिता पर अंकुश भी लगाता है। स्वतंत्रता का तात्पर्य निरंकुशता या स्वेच्छाचारिता नहीं है और ये तुम्हारा दृष्टिदोष है, भ्रम है अथवा जनमानस को दिग्भ्रमित करने का षडयंत्र है।
तृतीय कुतर्क आर्थिक लाभ की संकीर्णता: “कई समाजों में इसे केवल दो परिवारों के बीच ‘संपत्ति के बंटवारे’ या ‘दहेज के बोझ’ से बचने के माध्यम के रूप में देखा गया, जो बच्चों के भविष्य की बलि चढ़ा देता है” ये AI (आधुनिक विचारधारा का प्रतिनिधि) का कहना है कर इसका कोई अर्थ ही प्रतीत नहीं होता मात्र इतना छोड़कर कि बच्चों के भविष्य की बलि चढ़ा देता है। कैसे बच्चों के भविष्य की बलि चढ़ा देता है भाई ये तो सिद्ध करो, सिद्धांत तो दो, या कम से कम वर्त्तमान में भी हो रहे हैं उनका सर्वेक्षण करके तो तथ्य को सत्यापित करो।

50 वर्ष पूर्व की बात करें तो ९९ प्रतिशत बाल विवाह होते थे अर्थात सबके भविष्य की बलि चढ़ा दी गयी, या दी जाती थी तो उससे भी पहले “भारत सोने की चिड़ियां” था कैसे ? यदि बाल-विवाह से बच्चों का भविष्य नष्ट हो जाता है तो जब शत-प्रतिशत (अपवादों को छोड़कर) बाल विवाह ही होता था उस काल में समाज, परिवार, व्यक्ति सभी सुखी थे, सर्वत्र शांति-समृद्धि थी वो कैसे ? भविष्य की बलि तो ये आधुनिक विचारधारा चढ़ा रहा है जो दुराचार के दलदल में धकेल रहा है, नरक का पथिक बना रहा है।
तुमने सबको इतना स्वार्थी बना दिया कि किसी भी संबंध का कोई औचित्य ही नहीं है बस स्वार्थ सिद्धि का संबंध है। जिधर देखो सब एक-दूसरे को लूटने/ठगने में जुटे हुये हैं। और यही शिक्षा देने की बात करते हो, अरे नहीं चाहिये ऐसी शिक्षा जो विवेक को हर ले, लुटेरा बना दे, दुराचारी बना दे, नरकगामी बनाये। ऐसा ज्ञान चाहिये जो नरक से बचाये, कल्याण का मार्ग प्रशस्त करे, विवेक प्रदान करे।
इसी सिद्धांतविहीन और कुतर्काश्रित आधुनिक सोच ने देश के कर्णधारों का भी विवेक हर लिया और अपनी ही संस्कृति, अपनी ही सभ्यता पर प्रहार करने लगे, भारत अविवेकी कर्णधारों ने बाल विवाह को रोकने के लिए कड़े कानून हैं :
| पहलू | विवरण |
| कानून | बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 (Prohibition of Child Marriage Act) |
| विवाह की आयु | पुरुष: 21 वर्ष, महिला: 18 वर्ष (वर्तमान में महिलाओं की आयु बढ़ाने पर चर्चा जारी) |
| दंड | 2 साल तक का कठोर कारावास और ₹1 लाख तक का जुर्माना |
फिर भी यह प्रथा आज भी कई ग्रामीण क्षेत्रों में जीवित है, जिसका तात्पर्य यह है कि लोग इसे स्वीकारने के लिये तैयार ही नहीं हैं, यह सिद्धांत के विरुद्ध है, कानून बनाकर थोपा गया है और यदि इसे सैद्धांतिक अत्याचार कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
सिद्धांत, तर्क और कुतर्क
इस विषय को, कर्णधारों के अविवेक या अदूरदर्शिता आदि को समझने के लिये हमें सर्वप्रथम सिद्धांत, तर्क और कुतर्क को सही-सही समझना आवश्यक है। यद्यपि इसकी विस्तृत चर्चा पृथक आलेख “आधुनिक विचार वध” में करूँगा किन्तु यहां संक्षेपतः समझना आवश्यक है :
- सिद्धांत : सिद्धांत का तात्पर्य है जो व्यापक विमर्श के पश्चात् अंत में सिद्ध हुआ। अर्थात वह सूत्र जिसको हम समझें या न समझें किन्तु वो सत्य है जैसे जल का रासायनिक सूत्र H₂O (एच-टू-ओ), यदि कोई इसको न स्वीकारे या न समझे तो भी यही सत्य रहेगा।
- तर्क : तर्क का तात्पर्य है जो विमर्श में सत्य तक पहुंचने के प्रयास हेतु विचार-विमर्श का अंग था। जैसे जल का रासायनिक सूत्र H₂O (एच-टू-ओ) को सत्यापित करने के लिये अन्यान्य प्रकार से प्रस्तुत किया जाने वाला तथ्य।
- कुतर्क : कुतर्क का तात्पर्य यह है कि जो सिद्धांत को भी नहीं स्वीकारता और सिद्धांत का खंडन भी नहीं करता, कोई सिद्धांत भी स्थापित नहीं करता, केवल और केवल बहस का माध्यम बनता है, बहस को भी सत्य से भटकाने का प्रयास करता है। जैसे जल का रासायनिक सूत्र H₂O (एच-टू-ओ) को खण्डित तो न कर पाये किन्तु इसके विषय में भ्रम उत्पन्न करने का प्रयास करे। कोई नया सूत्र भी न दे किन्तु बहस का वो भाग हो जो इसके विरुद्ध मनगढंत रूप से किया गया हो।
अब जबकि सिद्धांत, तर्क और कुतर्क को स्पष्ट किया जा चुका है तो ऊपर बाल विवाह के विरुद्ध आधुनिक विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हुये AI द्वारा जितने भी तथ्य प्रस्तुत किये गए वो सभी कुतर्क थे और इनका खंडन तो तर्क और धरातल की वास्तविक स्थिति के आधार पर ही किया जा चुका है और बात अब सिद्धांतो की आती है जो आगे प्रस्तुत किये जायेंगे। यदि AI के प्रस्तुत तथ्य सिद्धांतों के विरुद्ध लगे तो समझ लीजिये कि वो कुतर्क था।
आधुनिक विचारधारा अथवा प्रतिनिधित्व करने वाली AI के पास ये अपने तथ्यों को सिद्ध करने का और सिद्धांत प्रस्तुत करने का, सत्यापित करने का एक अवसर और दूंगा और दूंगा एवं पुनः पूछूंगा।
ध्यातव्य : ये आधुनिक विचारधारा वाले कितने बड़े धूर्त होते हैं इसको भी थोड़ा स्पष्ट कर ही दूँ, प्रथम तो ये सिद्धांत को सिद्धांत्त नहीं कहते मान्यता कह देते हैं, प्रामाणिक सिद्धांतों पर आधारित शास्त्रोक्त विधानों मर्यादाओं को प्राचीन सोच, मान्यता, परम्परा आदि कह देते हैं, फिर चालाकी से परम्परा को परिवर्तनशील बताते हैं और आगे प्राचीन परम्परा/मान्यता और आधुनिक विचारधारा में सामंजस्य कैसे बिठायें अर्थात सिद्धांत और कुतर्क के मध्य सामजस्य कैसे बिठायें ऐसा प्रश्न करते हैं।
ऐसा ही षडयंत्री AI को भी बना दिया है और मैंने यह अनुभव किया है। आलेखों की विषय वस्तु का जब वीडियो बनाने के लिये AI का प्रयोग करता हूँ तो निरंतर ऐसा ही षड्यंत्र होता है जो कुछ वीडियो में आपको देखने को भी मिल सकता है। संभव है इस आलेख का वीडियो बनाऊं तो इस अंश की कोई चर्चा ही न करे क्योंकि ऐसा भी करता है, जिस सिद्धांत से आधुनिक सोच पूर्णतः असिद्ध होता है उस सिद्धांत की चर्चा नहीं करता, ये मेरा अनुभव है।
बाल विवाह के विषय में शास्त्रोक्त प्रमाण और सैद्धांतिक पक्ष
बाल विवाह के विषय में शास्त्रोक्त प्रमाण और सैद्धांतिक पक्ष की बात आती है तभी तो आधुनिक विचारधारा के जो तथ्य हैं तो कुतर्क सिद्ध होंगे। ये भिन्न विषय है कि वो इन प्रमाणों को पुनः परम्परा/मान्यता आदि कहते रहें किन्तु यह वास्तविकता है कि भारतीय जनमानस (उन शहरी लोगों को छोड़कर जो आधुनिक विचार के दलदल में फंस चुके हैं) वर्तमान में भी शास्त्र वचन को प्रमाण मानता है, शास्त्रीय विधान का पालन करने का भी यथासम्भव प्रयास करता है और इसे न तो मान्यता और न ही परम्परा मानता है अर्थात शास्त्रीय विधान प्रामाणिक और सैद्धांतिक हैं, परम्परा या मान्यता मात्र नहीं।
आधुनिक सोच रखने वाले सिद्धांत का महत्व कैसे समझे जब उनके पास कोई सिद्धांत ही नहीं है, सिद्धांतों के लिये उनकों भी भारतीय शास्त्रों की ही शरणागति करनी होगी और दुराग्रही ऐसे हैं कि भारतीय शास्त्रों और प्रमाणों को भी षड्यंत्र पूर्वक विवादित बना देते हैं। ये सिद्धांत एक विशेष परिस्थिति में स्वयं ही मुक्त भी कर देते हैं और वो विशेष परिस्थिति है लोकविरुद्ध होना, अर्थात जिसे सिद्धांत, विधान आदि से सांसारिक हानि भी होने लगे उससे मुक्त कर देता है – “यद्यपि शुद्धं लोक विरुद्धम्- नाऽचरणीयं नाऽचरणीयं”
ये नियम बाल विवाह पर भी प्रभावी है कि यदि पति और परिवार जब तक नवविवाहिता को गर्भधारण में अक्षम पाये तब तक ऋतुकाल में भी सम्भोग की अनुमति नहीं देता था और पति को अलग रखता था। विश्वास न हो तो वृद्ध जनों से इस विषय में जानकारी लो ज्ञात हो जायेगा, जब तक ज्ञात न करोगे ये आधुनिक विचार के नाम पर दिग्भ्रमित ही करते रहेंगे। सबसे बड़ा तर्क जो स्वास्थ्य और गर्भधारण की अयोग्यता का दिया जाता है वह तो मनगढंत है।
अरक्षित का सिद्धांत और स्वतंत्रता का खण्डन
सर्वावस्थासु नारीणां न युक्तं स्यादरक्षणम् । तदेवानुक्रमात्कार्यं पितृभ्रातृ सुतादिभिः॥ – वेदव्यास स्मृति
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने। पुत्रो रक्षति वार्धक्ये न स्त्री स्वातंत्र्यमर्हती ॥ – मनुस्मृति
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने। पुत्रस्तु स्थविरे भावे न स्त्री स्वातंत्र्यमर्हती ॥ न स्त्री स्वातन्त्र्यं विद्यते ॥
– बौधायन स्मृति
स्त्री सभी अवस्थाओं (आयु-आधारित) में अरक्षित/असुरक्षित ही होती है अतः पिता, भाई, पति, पुत्र आदि उसकी सुरक्षा सदैव करे। कौमार्यावस्था में पिता और भाई, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र रक्षा करे। स्त्री को वैसी स्वतंत्रता न दे जो स्वेच्छाचार/दुराचार का द्वार खोलने वाला हो।
स्वेच्छाचार/दुराचार कितना अनर्थकारी होता है ये सभ्यों के समझने का विषय है, जिनके पास संस्कार हों और उसका संवर्धन करना चाहते हों उनके समझने का विषय है। असभ्यों को इसमें कोई अनर्थ नहीं दिखता है और ये आधुनिक विचारधारा जिसे कहते हैं उन असभ्यों की ही तो विचारधारा है, जिन देशों से ये विचार आये हैं वहां न तो संस्कार है, न कुलीनता, न सभ्यता तो वो इनके मूल्यों को कैसे समझेंगे ? आध्यात्मिक दृष्टिकोण हो या सामाजिक व्यवस्था हो दुराचार बहुत ही घातक होता है, न मानो तो उन देशों में जाकर देख लो जहां से ये आधुनिक विचार आते हैं।
सोचिये कितने मूढ़ हैं ये आधुनिक विचारधारा वाले जो दुराचार को न तो अनैतिक मानते हैं, न हानिकारक भले ही उसके भुक्तभोगी क्यों हों। बस व्यक्तिगत स्वतंत्रता जो वास्तव में स्वेच्छाचारिता/निरंकुशता है की लड़ाई लड़ते रहते हैं। अरे धूर्तों व्यक्ति-परिवार-समाज-देश-संस्कृति सभी परस्पर सूत्र में बंधे हुये हैं और किसी की भी स्वतंत्रता उतनी ही हो सकती है जिससे ये पूरी व्यवस्था पर कोई दुष्प्रभाव न पड़े।
और इसलिये परस्पर एक दूसरे को नियंत्रित भी करते हैं एवं व्यक्ति को सभी नियंत्रित करते हैं क्योंकि सभी का मूल तत्व तो व्यक्ति ही है। ये आधुनिक विचारधारा व्यक्ति को इस नियंत्रण से मुक्त करके अपने नियंत्रण में अर्थात अपने अधीन करना चाहती है। वो व्यक्ति तब भी स्वतंत्र नहीं रह सकता जब वो अपने परिवार, समाज, देश के नियमों से स्वतंत्र हो जाये।
नियंत्रण में रहना ही सिद्धांत है और इसी लिये देश कानून बनाता है, समाज अपनी नियम बनाता था, परिवार कर कुल के अपने नियम होते हैं। कुल के नियमों का पालन करना ही कुलीनता है, समाज के नियमों का पालन करना ही बाध्यता है, देश के कानूनों का पालन करना भी बाध्यता है तो फिर तुम किस मुंह से व्यक्तिगत स्वतंत्रता रटते रहते हो, ये छल है, प्रपञ्च है, षड्यंत्र है। तुम जिस स्वतंत्रता (स्वेच्छारिता) की बात करते हो वो संभव ही नहीं है और जो ऐसा बन जाता है वह अपराधी कहलाता है।
ऊपर शास्त्रोक्त तथ्य जो हैं उसको विवादित कहने में ये तनिक भी देर नहीं करते हैं, कैसे विवादित है भाई ? विवादित तो तब हो न जब अन्यत्र इसके विरुद्ध प्रमाण और सिद्धांत हो, शास्त्रों में जहां देखें इस विषय में ऐसा ही सिद्धांत है, प्रमाण है और नियम है एवं कुछ वर्ष पूर्व तक जब लोकोक्तियों का प्रयोग किया करते थे तो ऐसे ही लोकोक्तियों का भी प्रयोग होता था। यदि ये सिद्धांत तुम्हारे कुतर्क के विरुद्ध है तो तुम इसे विवादित कह दोगे ?
ठीक है मैं तुम्हें चुनौती दे रहा हूँ इस सिद्धांत का कुतर्कों से नहीं सैद्धांतिक रूप से खण्डन करो तो विवादित मान लूँ। पूर्व आलेख में इसी श्लोक का वीडियो बनाते समय AI ने इसे विवादित श्लोक कहा था; तो ये चुनौती AI और आधुनिक विचारधारा रखने वाले दोनों को है।
विवाह की आयु : सैद्धांतिक और प्रामाणिक पक्ष
सभी पुराणों स्मृतियों में आपको ये श्लोक मिलेंगे या इससे किंचित अंतर के साथ मिलेगें किन्तु भाव समान ही होगा इसलिये मैं किसी एक स्मृति या पुराण का नाम नहीं कह सकता। इसमें कहा गया है कि अष्टवर्षा की संज्ञा गौरी, नववर्षा की संज्ञा रोहिणी और दशवर्षीया की संज्ञा कन्या होती है एवं इससे ऊपर रजस्वला संज्ञक होती है।
अष्टवर्षा भवेद्गौरी नववर्षा तु रोहिणी। दशवर्षा भवेत्कन्या अत ऊर्ध्वं रजस्वला ॥
कन्या दान का तात्पर्य होता है दशवर्षीया कन्या दान करना और धूर्तता पूर्वक जो मुगलकाल की प्रताड़ना से जोड़ने वाले मूढ़ हैं वो ये बतायें की सीता के विवाह में कौन से मुग़ल थे और किसका भय था और कैसी अज्ञानता थी ? क्या सीता और उनके पिता राजा जनक को तुम अज्ञानी मानते हो जिनके विवाह में शास्त्रीय सिद्धांत का पालन हुआ था। दस वर्ष से अधिक आयु वाली कन्या की संज्ञा रजस्वला बताई गयी है और कन्या यदि रजस्वला हो जाये तो पिता एवं भाई पाप के भागी होते हैं और इतना ही नहीं रजस्वला से विवाह करने वाला भी दोषी होता है।
रजस्वलां च यः कन्यामुद्वाहयति निर्घृणः। तस्याः सन्तानमासाद्य पातयेत्पुरुषान्दश ॥
रजस्वला तु यः कन्यां पिता यच्छति निर्घृणः। स पातयेदसंदिग्धं दश पूर्वान्दशापरान् ॥
:- स्कन्द पुराण
प्राप्ते तु द्वादशे वर्षे यः कन्यां न प्रयच्छति । मासि मासि रजस्तस्याः पिबन्ति पितरः स्वयम् ॥
माता चैव पिता चैव ज्येष्ठो भ्राता तथैव च । त्रयस्ते नरकं यान्ति दृष्ट्वा कन्यां रजस्वलाम् ॥
यस्तां समुद्वहेत्कन्यां ब्राह्मणो मदमोहितः । असंभाष्यो ह्यपाङ्क्तेयः स विप्रो वृषलीपतिः ॥
:- पराशर स्मृति
ये मत समझना कि ये किसी एक स्थान से उठाकर दे रहा हूँ तो अन्यत्र नहीं है, सर्वत्र है। पराशर स्मृति में कन्यादान की अधिकतम आयु १२ वर्ष बताई गयी है और इसका उल्लंघन होने पर प्रतिमास उनके पितर उस रज का पान करते हैं। माता-पिता और ज्येष्ठ भ्राता तीनों नरकगामी हो जाते हैं। इसके साथ ही जो मदमोहित होकर उस रजस्वला से विवाह करता है वह वृषलीपति कहलाता है एवं उससे वार्तालाप तक भी नहीं करना चाहिये, उसके साथ भोजन (एक पंक्ति में) आदि भी नहीं करे।
नोट : यह स्पष्ट करना अनिवार्य है कि वर्त्तमान काल में जब शासक ने कानून के माध्यम से हमें धर्मपालन से रोक रहा है तो उपरोक्त दोष मान्य नहीं यह भी सैद्धांतिक पक्ष ही है। कहीं ऐसा न हो कि ढेरों लोग जिनके घर में रजस्वला कन्या हो वो चिंतामग्न हो जायें। किन्तु शासक द्वारा जो आयु निर्धारित की गयी है (18 वर्ष, वर्तमान में आयु को और बढ़ाने की चर्चा हो रही है) यदि उस आयु में भी न करें तो उपरोक्त दोष के भागी निश्चित होते हैं।
ऐसा कुतर्क भी मत करना कि ये अंग्रेजों ने छल से ग्रंथों में लिख दिया या प्रक्षिप्त है, असंभव है क्योंकि ये धरातल पर भी सभी जानते थे, आज भी बहुत लोग शास्त्रों का अध्ययन किये बिना भी परंपरा से जानते हैं। यदि कोई नास्तिक हो तो ही इसे स्वीकारने से मना कर सकता और जो इसे मान्यता, प्राचीन सोच आदि कहकर वंचना करता है वो भी वास्तव में नास्तिक ही है। क्योंकि आस्तिकता तो इसमें विश्वास प्रदान करती है और श्रद्धापूर्वक पालन करने के लिये प्रेरित करती है। इसको प्रमाण कहते हैं, सिद्धांत कहते हैं, मान्यता या परम्परा नहीं।

त्रीणि वर्षाण्यृतुमती काङ्क्षेत पितृशासनं। ततश्चतुर्थे वर्षे तु विन्देत सदृशं पतिं ॥
अविद्यमाने सदृशे गुणहीनामपि श्रयेत् ॥ :- बौधायन स्मृति
ऊपर पिता के लिये अंतिम १२ वर्षों तक कन्या के विवाह का सिद्धांत पराशर स्मृति से प्राप्त होता है जिसमें बौधायन स्मृति एक वर्ष की और छूट देता है किन्तु वो पाप के विषय में नहीं अपितु कन्या के लिये प्रतीक्षा हेतु देता है कि रजस्वला 3 वर्षों तक पिता के शासन को स्वीकार करते हुये विवाह की प्रतीक्षा करे, यदि ३ वर्षों तक भी पिता विवाह न करे तो चतुर्थ वर्ष में स्वयं ही योग्य पति का वरण कर ले और यदि योग्य भी न मिले तो हीन गुण वाले से भी विवाह कर ले। इस ३ वर्ष को सम्मिलित करने पर १३ वर्ष होता है अर्थात १४वें वर्ष में रजस्वला स्वेच्छा से भी विवाह करने के लिये स्वतंत्र हो जाती है। इसी प्रकार मनुस्मृति में भी एक वचन मिलता है :
त्रीणि वर्षाण्युदीक्षेत कुमार्यर्तुमती सती। ऊर्ध्वं तु कालादेतस्माद्विन्देत सदृशं पतिम्॥
ये सिद्धांत ही है और इसका उल्लंघन शासक के कानून से हो रहा है जिस कारण दुराचार की भयंकर अग्नि देश में प्रज्वलित हो चुकी है। जहां देखो स्कुल हो या कॉलेज, कार्यालय हो या न्यायालय, पार्क हो या पर्यटन स्थल दुराचार ही दुराचार हो रहे हैं। ये दुराचार न हो इसी लिये दूरदर्शी ऋषियों का सिद्धांत यथाकाल विवाह का था।
“बाल विवाह को केवल एक ‘दूषित प्रथा’ कहना उन ऋषियों की मेधा का अपमान है जिन्होंने समाज को एक सुदृढ़ ढांचा दिया। यह ‘प्रथा’ नहीं, बल्कि ‘संस्कार’ की वह पराकाष्ठा थी जहाँ चेतना के निर्माण हेतु योग्य समय का चयन किया गया था। आज का विरोध ऋषियों के प्रति नहीं, बल्कि स्वयं की अपात्रता के प्रति होना चाहिए। जिसे हम ‘आधुनिक विचारधारा’ कहते हैं, वह वास्तव में प्राचीन सन्दर्भों को समझने में असमर्थ एक ‘अविवेक’ मात्र है। जब तक हम पात्रता और कुल-धर्म के मर्म को नहीं समझेंगे, तब तक हम ‘विवाह’ को केवल एक शारीरिक अनुबंध मानते रहेंगे और शास्त्रों के गूढ़ रहस्यों से वंचित रहेंगे।”
दुराचार अर्थात दुःख की अग्नि में प्रवेश
अब बात आती है दुराचार की अनैतिकता, पाप आदि के विचार का तो जिसके पास शास्त्र हो, सिद्धांत हो वो इसे समझेगा न, जिसके पास न कोई शास्त्र हो न सिद्धांत हो मात्र कुतर्क और असत्य का आश्रय हो वो इसे कहां से समझे और इस कारण ये आधुनिक विचारधारा इसे सामान्य सी बात मानती है और शारीरिक भूख मिटाना समझती है।
- अरे धूर्तों यदि अविवाहिता का यत्र-तत्र शारीरिक भूख मिटाना सामान्य सी बात है तो विवाहिता का पति से सम्भोग अपराध कैसे हो गया ?
- यदि अविवाहिता का यत्र-तत्र शारीरिक भूख मिटाना सामान्य सी बात नहीं है तो उसे भी अपराध क्यों नहीं कहते, पाप क्यों नहीं मानते।
तुम शारीरिक भूख की बात तो करते हो किन्तु विवाह पूर्वक हो तो वह अत्याचार है, अन्याय है और न जाने क्या-क्या है किन्तु यदि यत्र-तत्र करती रहे तो वह सही है। इतना विवेक तो पशु को भी होता है कि वो गर्भधारण (काम) की योग्यता प्राकृतिक रूप से ही जान जाते हैं किन्तु मनुष्य उन पशुओं से भी अल्पज्ञ हो गया जो इस प्राकृतिक विधान को ही गलत कहने लगा। ये मूढ़ता नहीं धूर्तता है, क्योंकि जो स्वयं को विचारधारा कहती है और उसमें भी आधुनिकता का आवरण भी ओढ़ती है वो इतनी मूढ़ कैसे हो सकती है।

कोई गर्भधारण के योग्य है अथवा नहीं, कब है और कब नहीं ये मनुष्य मात्र का नहीं समस्त जीवों के लिये प्रकृति ही निर्धारित करती है और ऋषियों ने इसे शास्त्रों में सिद्धांत बनाकर समाहित कर दिया है तो तुमको ये अधिकार कहां से प्राप्त हो गया कि प्राकृतिक नियम को भी असत्य कहो, नहीं धूर्तों दिन को रात कहने से होता नहीं है अपितु कहने वाला असत्य सिद्ध होता है जैसे तुम यहां असत्य और कुतर्कों पर आश्रित सिद्ध हो गए हो।
जब प्रकृति गर्भधारण की योग्यता दे देता है तो मनुष्य के अतिरिक्त कितने जीव हैं जो गर्भधारण नहीं करते हैं, वर्षों तक सम्भोग का त्याग करते हैं। इसी प्रकार एक दूसरा नियम भी इनकी धूर्तता को उजागर करता है,
- मुझे भूख लगी तो मैं भोजन करूँगा ही, प्यास लगी तो पानी पीयूंगा ही ये निर्धारित करने वाले तुम हो कौन कि मुझे भूख लगी और तुम कहो कि भोजन 2 दिन बाद करो,
- प्यास लगी है तो मुझे ज्ञात होगा न कि अभी लगी है अथवा नहीं, अभी जल चाहिये अथवा नहीं तुमने ये निर्धारित करने का अधिकार कहां से प्राप्त किया कि मुझे प्यास अभी लगी है और जल 5 घंटे बाद पियूँ।
- इसी प्रकार काम भी जब जगता है तो जिसका जगा उसे ज्ञात होता है न, तुमने उसमें अड़चन उपस्थित करने का अधिकार कहां से प्राप्त कर लिया ?
तुम्हारे पास दुराचार का कोई सिद्धांत नहीं होगा ये मुझे ज्ञात है किन्तु हमारे पास है क्योंकि हमारे ऋषि-मुनि दूरदर्शी नहीं त्रिकालद्रष्टा थे, भारत भूमि में देवताओं का अवतरण होता रहा है और हमारे पास सिद्धांत है जो दुराचार का भी ज्ञान देता है, एवं इससे बचने के लिये कहता है। आओ पढ़ो :
दुराचारो हि पुरुषो लोके भवति निन्दिता । दुःखभागी च सततं व्याधितोऽल्पायुरेव च ॥ :-वशिष्ठ स्मृति
दुराचारो हि पुरुषो लोके भवति निन्दितः । दुःखभागी च सततं व्याधिना व्याप्त एव च ॥ :- श्रीमद्देवीभागवत
दुराचार लोक में निंदा का पात्र बनाता है, दुराचार के कारण दुःख का भाजन बनना पड़ता है, और दुराचार सतत रोग प्रदायक है और दुराचार के कारण आयु भी क्षीण होती है एवं अल्पायु हो जाते हैं।
मृत्तिकानां सहस्रेण चोदकानां शतेन हि । न शुध्यति दुराचारो भावोपहतचेतनः ॥ :- गरुड़पुराण
दुराचार के कारण मात्र शरीर दूषित नहीं होता है, भाव भी दूषित हो जाता है, चेतना का क्षरण होता है और सहस्रों बार मिट्टी मलने से, सैकड़ों बार जल से मार्जन करने पर भी यह दोष समाप्त नहीं होता।
संस्कृतोऽपि दुराचारो नरकं याति मानवः । निःसंस्कारः सदाचारो भवेद्विप्रोत्तमः सदा ॥ :- भविष्य पुराण
दुराचार भविष्य पुराण में कितना जघन्य पाप कहा गया है थोड़ा समझ लो। ब्राह्मण के विषय में कहा गया है कि उसके सभी संस्कार हुये हों अर्थात संस्कृत हो किन्तु दुराचारी हो तो नरक का ही भागी बनता है किन्तु यदि संस्कृत न भी अर्थात संस्कार न भी हुआ हो किन्तु सदाचारी हो वह (दुराचारी संस्कृत के सापेक्ष) उत्तम होता है।
यही सिद्धांत है जो शास्त्रों में वर्णित है और तुम्हारे करोड़ों कुतर्कों से भी इसका खण्डन नहीं हो सकता, हाँ दुष्परिणाम हो सकते हैं और हो रहे हैं। यदि तुम्हारी विचारधारा इतनी ही महान है क्योंकि आधुनिकता का दम्भ भरते हुये स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने का और सैद्धांतिक पक्ष को प्राचीन मत कहकर अनुपयोगी सिद्ध करने का अथक प्रयास तो निरंतर करते ही रहते हो न। तो चुनौती स्वीकार करते हुये इन सिद्धांतों का खण्डन करो किन्तु ध्यान रखो ये खण्डन कुतर्कों से नहीं हो सकता, यहां प्रमाण प्रस्तुत किया गया है और खण्डन के लिये इससे अधिक शास्त्रोक्त प्रमाण ही अनिवार्य होगा।
कर्णधारों का दृष्टिदोष, अविवेक, अदूरदर्शिता
अब बात देश के कर्णधारों की अर्थात नीति-निर्माताओं की आती है जिन्होनें विवाह की आयु का निर्धारण 18 वर्ष (कन्या) किया और सैद्धांतिक पक्ष व प्राकृतिक रूप से भी सिद्ध होने वाले सिद्धांत का हनन किया। एक बार को पूर्व के नीति-निर्माताओं का अज्ञान कहें या सनातन द्रोह कहें उनका ऐसा कुकर्म करना थोड़ा चल भी जाये किन्तु वर्त्तमान में जो सरकार हिंदुत्व और सनातन की बात करने वाली है वो तो इसे और आगे बढ़ाने का विचार कर रही है और 18 से 21 वर्ष करने का प्रकरण चल रहा है। पता नहीं कहीं कर भी दिया हो।

इसे तो सनातन सिद्धांत जो प्राकृतिक सिद्धांत से भी अभी भी सत्यापित हो रहा है वैसा सुकर्म करना चाहिये था न। ये तो और भी उलटी गंगा बहाकर 18 वर्ष की आयु को 21 वर्ष करने का विचार कर रही है। ये इसका अज्ञान, अविवेक, अदूरदर्शिता, शास्त्रद्रोह आदि नहीं तो क्या है ? जय श्री राम और हर हर महादेव का नारा लगाना मात्र सनातनी सिद्ध नहीं कर सकता। इसके लिये शास्त्रानुकूल व्यवहार करना होगा।
ध्यातव्य : कानूनी विषय में जो चर्चा यहां पर है वो समीक्षात्मक है न कि उल्लंघन के लिये किसी प्रकार से उत्प्रेरक। यह भी स्पष्ट किया जा चुका है कि कानून यदि हमें यथाकाल विवाह करने से रोक रहा है तो निर्धारित काल तक विवाह न करने में दोष की भी निवृति हो जाती है अर्थात जो आयु निर्धारित (कानूनी) है उस आयु तक दोष का विचार अकरणीय।
निष्कर्ष:
आधुनिक विचारधारा ही उसे कहते हैं जिसने सिद्धांत का त्याग करके कुतर्क का आश्रय ले लिया हो और इसका दुष्परिणाम यह है कि इसकी दृष्टि में दुराचार भी सही है, सामान्य सी बात है। ये शिक्षा, स्वास्थ्य, सुख, शांति आदि कि मौखिक बात तो करता है किन्तु इसके कुतर्कों से धरातल पर जो दुष्परिणाम प्रकट होते हैं उसकी भी अनदेखी कर देता है अर्थात इसका व्यक्ति, समाज, देश आदि के लिये दूर-दूर तक किसी अच्छे विचार से संबंध नहीं है। और
यही आधुनिक विचारधारा है जिसने देश के कर्णधारों को अपने जाल में फंसा लिया क्योंकि वो अदूरदर्शी और अविवेकी थे एवं उन्होंने बाल-विवाह को दोषपूर्ण मानकर प्रतिबंधित कर दिया और देश को दुराचार की अग्नि में झोंक दिया।
“यह आलेख उन लोगों के लिए है जो नारों की भीड़ में नहीं, अपितु शास्त्रों की प्रकाशपुञ्ज में सत्य को ढूंढने का साहस रखते हैं।”
“पाठकों की जिज्ञासा” (FAQs)
“आपको क्या लगता है : सिर्फ कानून बनाने से यह प्रथा खत्म होगी या सोच बदलनी पड़ेगी ये बाल विवाह को कुरीति कहना ही दृष्टिदोष है” – यदि आप आलेख के विचार से सहमत हैं तो इस विचार को साझा करें।
प्रश्न 1: क्या बाल विवाह केवल एक सामाजिक कुप्रथा है?
उत्तर: नहीं। शास्त्रों की दृष्टि में विवाह एक ‘संस्कार’ है, ‘प्रथा’ नहीं। इसे ‘कुप्रथा’ कहना आधुनिक दृष्टिदोष और अविवेक है। वास्तव में, यह कन्या के संस्कार और कुल की शुचिता को अक्षुण्ण रखने हेतु ऋषियों द्वारा निर्धारित एक वैज्ञानिक विधान है, जिसे ‘गौरी’ जैसे संज्ञाओं से शास्त्र सम्मत किया गया है।
प्रश्न 2: शास्त्रों में विवाह के लिए ‘नग्निका’ (अल्पायु) को प्राथमिकता क्यों दी गई है?
उत्तर: ‘नग्निका’ का तात्पर्य उस अवस्था से है जहाँ कन्या में काम-विकार का उदय न हुआ हो और वह पूर्णतः सात्विक एवं ग्रहणशील हो। इस आयु में विवाह का उद्देश्य यह है कि कन्या पति-कुल के संस्कारों को ‘उपनयन’ की भांति आत्मसात कर सके। यह ‘बीज’ और ‘क्षेत्र’ की शुद्धि का प्राकृतिक सिद्धांत है।
प्रश्न 3: क्या बाल विवाह कन्या की शिक्षा (विद्या) में बाधक नहीं है?
उत्तर: शास्त्रों के अनुसार स्त्री के लिए ‘विवाह ही उपनयन’ है। अतः विवाह शिक्षा का अंत नहीं, बल्कि एक नए प्रकार की शिक्षा का आरंभ है, जहाँ पति ‘आचार्य’ की भूमिका निभाता है। विदुषी होने के लिए आयु नहीं, बल्कि संस्कार और सही मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है, जो प्राचीन काल में गृहस्थाश्रम में ही सुलभ था।
प्रश्न 4: यदि समाज असुरक्षित है, तो क्या शीघ्र विवाह ही एकमात्र समाधान है?
उत्तर: शास्त्र ‘आपद्धर्म’ के सिद्धांत को स्वीकार करते हैं। असुरक्षा के काल में मर्यादा की रक्षा हेतु आयु का घटाना एक शास्त्रीय सुरक्षा कवच है। वर्तमान की बढ़ती असुरक्षा इस बात का प्रमाण है कि कन्या को यथाकाल (शास्त्रों द्वारा निर्धारित आयु में) योग्य संरक्षण प्रदान करना ही श्रेयस्कर है।
प्रश्न 5: क्या आधुनिक ‘वयस्कता’ (18 वर्ष) का पैमाना शास्त्रों से श्रेष्ठ है?
उत्तर: नहीं। शास्त्रों का पैमाना ‘प्राकृतिक’ है, जबकि आधुनिक पैमाना ‘कानूनी और कृत्रिम’ और अविवेक की ऊपज है। प्रकृति जब कन्या को ‘रजस्वला’ होने के संकेत देती है, तभी वह प्राकृतिक रूप से परिपक्व मानी जाती है। इसी प्राकृतिक संकेत को आधार मानकर शास्त्रों ने विवाह का काल निर्धारित किया है, जो किसी भी मानव-निर्मित कानून से अधिक विश्वसनीय है।
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“शास्त्रों के विधान ‘काल-बाधित’ नहीं होते, अपितु वे प्रकृति के उन शाश्वत नियमों पर आधारित होते हैं जिन्हें आधुनिक बुद्धि समझने में असमर्थ है। बाल विवाह को कुप्रथा मानना स्वयं की वैचारिक दरिद्रता और ऋषियों के प्रति दृष्टिदोष है।”
विधिक घोषणा एवं अस्वीकरण (Legal Disclaimer)
1. वैचारिक एवं शास्त्रीय उद्देश्य: इस आलेख में प्रस्तुत विचार पूर्णतः शैक्षिक, ऐतिहासिक और शास्त्रीय समीक्षा (Scriptural & Academic Analysis) पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य सनातन धर्म के प्राचीन सिद्धांतों, स्मृतियों और परंपराओं के मूल मर्म की व्याख्या करना है।
2. वर्तमान कानून का सम्मान: लेखक और यह पोर्टल भारत के वर्तमान कानूनों, विशेषकर ‘बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006’ (Prohibition of Child Marriage Act, 2006) का पूर्ण सम्मान करते हैं। यह आलेख किसी भी व्यक्ति को वर्तमान कानून का उल्लंघन करने के लिए प्रेरित या प्रोत्साहित नहीं करता है।
3. व्यक्तिगत उत्तरदायित्व: आलेख में की गई चर्चा सिद्धांतों और आदर्शों के धरातल पर है। व्यावहारिक रूप से विवाह की आयु के संबंध में वर्तमान संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों का पालन करना अनिवार्य है। कानून के विरुद्ध किया गया कोई भी कार्य दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है, जिसके लिए लेखक या संस्था उत्तरदायी नहीं होगी।
4. कोई कानूनी सलाह नहीं: यहाँ दी गई सामग्री को कानूनी सलाह (Legal Advice) न माना जाए। विवाह संबंधी किसी भी निर्णय के लिए प्रचलित भारतीय कानून और वैधानिक आयु सीमा का संज्ञान लेना आवश्यक है।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।
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