वर्तमान राजनीति का स्तर इतना गिर चुका है कि सत्ता हेतु समाज में ‘तेल छिड़ककर तिली लगाने’ की बात की जा रही है। जातिवाद मिटाने का ढोंग करने वाले ही आज सवर्णों को ‘राजनीतिक अछूत’ बना रहे हैं। क्या भारतीय लोकतंत्र अब जातीय संघर्ष का साधन बन चुका है? जानिए कैसे राजनीति और मीडिया सवर्णों का उत्पीड़न कर रहे हैं, ‘गजवा-ए-हिंद’ जैसे वैश्विक षड्यंत्रों का इसमें क्या हाथ है और इन संवेदनशील विषयों पर सर्वोच्च न्यायालय की चुप्पी के पीछे का क्या कारण है। एक विस्तृत विश्लेषण।
सामान्य वर्ग का संवैधानिक उत्पीड़न और सुप्रीम कोर्ट की चुप्पी: क्या लोकतंत्र अब जातीय गृहयुद्ध का टूल बन चुका है – Constitutional oppression
🚩 इस लेख में विश्लेषण किया गया है:
- राजनीतिक अवसरवाद और जातीय उन्माद- सवर्ण समाज (सामान्य वर्ग) के विरुद्ध बढ़ता नफरती एजेंडा।
- मीडिया का ‘अग्नि में घृत’ (आग में घी) डालने वाला आचरण।
- सांप्रदायिक षड्यंत्र और ‘गजवा-ए-हिंद’ का परिप्रेक्ष्य
- सुप्रीम कोर्ट का इन विषयों पर स्वतः संज्ञान न लेना।
- समाधान : सामान्य वर्ग का संवैधानिक अधिकार
वर्त्तमान में जो देखने को मिल रहा है वो ये कि अनेकों राजनीतिक दल और नेता जातिवाद की घृणित राजनीति करते हुये जनमानस में जातिवाद का उन्माद भर रहे हैं और दूसरी ओर जातिवाद मिटाने का राग भी अलापते रहते हैं। एक नेता ने विदेश में जाकर ऐसा वक्तव्य भी दिया था “देश में तेल छिड़का हुआ है तिली लगाने की देर है” क्या इसका तात्पर्य भी जातीय संघर्ष ही नहीं था ?

संभवतः उस समय उससे चूक हो गयी और देश में जातीय संघर्ष नहीं हुआ, किन्तु पुनः ऐसी ही जातिवाद की घृणित राजनीति निरंतर की जा रही है और आश्चर्यजनक तो ये है कि ऐसा करने वाले लोकतंत्र और संविधान की दुहाई भी देते रहते हैं तो प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या संविधान और लोकतंत्र देश को जातीय राजनीति के संघर्ष की आग में झोंकने का साधन (टूल) है ?
कहीं इसके पीछे “गजबा-ए-हिन्द” का सांप्रदायिक षड्यंत्र भी तो नहीं है क्योंकि देश में यदि जातीय संघर्ष होता है तो उसका लाभुक कोई जाति नहीं अपितु “गजबा-ए-हिन्द” का सपना जिन्होंने पाला है वो होंगे। सरकार भी इस पर किसी प्रकार का कोई नियंत्रण नहीं लगा रही है जिससे यह सिद्ध होता है कि सरकारें भी इसको अपने स्वार्थसिद्धि का साधन मानती है। किन्तु “सर्वोच्च न्यायालय इस विषय पर स्वतः संज्ञान क्यों नहीं लेता” यह एक गंभीर प्रश्न है।
आज सवर्ण जिसे सामान्य वर्ग कहा जाता है पीड़ित हो रहा है, इसे राजनीतिक और सरकारी अछूत बना दिया गया है और ऊपर से गालियां भी दी जाती हैं, धार्मिक आस्था पर भी प्रहार किया जाता है, तो सुप्रीम कोर्ट घोड़े बेचकर क्यों सो रहा है।
सामान्य वर्ग का संवैधानिक अधिकार मूलतः आरक्षण अब सवर्णों (सामान्य वर्ग) का उत्पीड़क हो गया है, इसी प्रकार SC-ST एक्ट भी उत्पीड़न का साधन बन गया है और झूठे वाद लाकर पीड़ित किया जा रहा है। सोचिये झूठा वाद लाने वाले को ऊपर से सरकार सहयोग राशि तो प्रदान करती किन्तु जब वह झूठा सिद्ध हो जाता है आरोपी का (संवैधानिक/कानूनी) उत्पीड़न हुआ यह सिद्ध हो जाता है तो उसके पश्चात् उस झूठे वाद लाने वाले (झूठा केस करने वाले) के लिये तो कोई नियम नहीं है, वह तो सवर्णों का संवैधानिक उत्पीड़न करके लाभान्वित हो जाता है। इसे संवैधानिक उत्पीड़न न कहें तो और क्या कहा जायेगा ?
“क्या सवर्णों (सामान्य वर्ग) का संवैधानिक और लोकतान्त्रिक उत्पीड़न उचित है ?“
जाति व्यवस्था को लेकर जितने भी प्रलाप किये जाते हैं वो प्रलापी के भारतीय संस्कृति विरोधी होना सिद्ध करता है। वर्णाश्रम व्यवस्था और जातीय व्यवस्था भारतीय समाज की, संस्कृति की विशिष्ट पहचान रही है, इसके बिना भारतीय संस्कृति की, व्यवस्थित भारतीय समाज की कल्पना ही नहीं की जा सकती। जो वर्णाश्रम और जातिव्यवस्था भारतीय समाज और सामाजिक व्यवस्था का आधार है उसे ही ये घृणित नेता संविधान और लोकतंत्र की ओट लेकर जातीय उन्माद फैलाया जा रहा है। यह बहुत ही गंभीर विषय है।

राजनीतिक अवसरवाद और जातीय उन्माद
समस्या अनादि काल से वर्त्तमान तक प्रचलित वर्णाश्रम और जाति-व्यवस्था नहीं है, समस्या वो सोच है जो इसे भेद-भाव सिद्ध करके देश को जातीय संघर्ष की आग में झोंकना चाहता है। निश्चित रूप से सिद्ध होता है कि यह सोच भारत के शुभचिंतकों का नहीं अपितु भारत के शत्रुओं का ही हो सकता है। किन्तु घृणित राजनीति करने वाले नेता यदि इसी सोच को स्वीकार कर लेते हैं तो उनकी बौद्धिक क्षमता भी संदेह के घेरे में आ जाती है। क्या नेताओं के लिये जो देश के कर्णधार होते हैं कोई बौद्धिक क्षमता, दूरदर्शिता का मानक सुनिश्चित नहीं किया जाना चाहिये।
भारतीय लोकतंत्र वर्तमान में एक ऐसे संक्रमण काल से गुजर रहा है जहाँ संवैधानिक मर्यादाओं की दुहाई देकर ही सामाजिक समरसता को खंडित करने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है। अनेकों राजनीतिक दल अपनी सत्ता-पिपासा की तृप्ति हेतु जनमानस के अंतर्मन में जातीय विष घोल रहे हैं। विडंबना यह है कि जो नेता सार्वजनिक मंचों से जातिवाद उन्मूलन का पाखंड करते हैं, वही बंद कमरों में जातीय जनगणना और आरक्षण के नए समीकरणों के माध्यम से समाज को खंड-खंड करने की योजना बनाते हैं।

एक बड़े नेता का विदेशी भूमि पर दिए गए “तिली लगाने” जैसे वक्तव्य न केवल गैर-जिम्मेदाराना हैं, बल्कि वे उस सुलगती हुई मानसिकता के परिचायक हैं जो देश को गृहयुद्ध (Civil War) की विभीषिका में धकेलने का स्वप्न देखते हैं। यह केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं, अपितु राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षा और अखंडता के विरुद्ध एक वैचारिक प्रहार है।
सांप्रदायिक षड्यंत्र और ‘गजवा-ए-हिंद’ का परिप्रेक्ष्य
जातीय संघर्ष का सबसे भयावह पक्ष इसका परोक्ष लाभुक है। जब हिंदू समाज जातियों के आधार पर परस्पर संघर्षरत होगा, तो उसकी सामूहिक शक्ति क्षीण होगी। इस दुर्बलता का लाभ उठाने हेतु वे कट्टरपंथी शक्तियाँ (जिहादी तत्व) सदैव तत्पर रहती हैं जिनका ध्येय भारत की सांस्कृतिक अस्मिता को नष्ट करना है। ‘गजवा-ए-हिंद’ जैसे मध्यकालीन और प्रतिगामी विचारों को पोषित करने वाले तत्वों हेतु जातीय संघर्ष एक सुवर्ण अवसर के समान है। यदि समाज के भीतर ही विखंडन होगा, तो राष्ट्र विरोधी शक्तियों (जिहादी तत्वों) को अपना एजेंडा थोपने में सुगमता होगी।

देश में जो जातिवाद की घृणित राजनीति की जा रही है, सवर्णों का संवैधानिक और लोकतांत्रिक उत्पीड़न करते हुये ऊपर से गालियां भी दी जा रही है ये उकसावा तो है किन्तु इससे यदि जातीय संघर्ष होता है तो सनातनियों का आपसी संघर्ष होता और उसमें बंदर-बांट करके जिहादी तत्व लूटेंगे जैसे पूर्व में देश का विभाजन हो चुका है। यद्यपि वहां जातीय संघर्ष नहीं था किन्तु साम्प्रदायिक संघर्ष था। देश का विभाजन होगा ऐसी मानसिकता वाले लोग-नेता भी निरंतर भितरघात कर ही रहे हैं और “चिकन-नेक” की धारणा इसका साक्ष्य है।
सामान्य वर्ग (सवर्ण) का उत्पीड़न और राजनीतिक उपेक्षा
आज का विद्रूप सत्य यह है कि सामान्य वर्ग (सवर्ण) को राजनीति और नीतियों के केंद्र से हाशिए पर धकेल दिया गया है। योग्यता और सामर्थ्य होने के उपरांत भी वे व्यवस्थागत भेदभाव के शिकार हैं और पीड़ित होता हुआ अनुभव कर रहे हैं। उन्हें न केवल “राजनीतिक अछूत” बनाने का प्रयास किया जा रहा है, बल्कि उनके विरुद्ध अभद्र टिप्पणियां और उनकी धार्मिक आस्थाओं पर प्रहार करना एक ‘प्रगतिशील’ फैशन सा बन गया है।
जब राज्य और राजनीतिक दल केवल एक विशेष समूह के तुष्टीकरण में संलिप्त हों, तो बहुसंख्यक समाज के एक बड़े हिस्से में पनपता हुआ असंतोष राष्ट्र हेतु शुभ संकेत नहीं है। एक बार को आरक्षण आदि व्यवस्था के कारण अनदेखी किया जाना, हाशिये पर ढकेल देना तो सह्य हो सकता है, किन्तु बारम्बार देवी-देवताओं, मनुस्मृति, रामायण आदि धार्मिक ग्रंथों के ऊपर घृणित टिपण्णियां करके आस्था पर प्रहार करना असह्य होता है और उसमें भी बारम्बारता होना ये तो उकसाना है कि पिछली बार सह लिया तो अबकी बार मत सहना अथवा जितना सहन करोगे उतनी ही गाली देंगे का भाव।

ब्राह्मणों-क्षत्रियों की बेटियों के विरुद्ध तो षड्यंत्र चलाया जा ही रहा है और वक्तव्य आ ही रहे हैं, आगे वैश्यों की बेटियों के विरुद्ध भी यह कुप्रयास होगा ही। निशाने पर तो पूरा सवर्ण समाज ही है जिसे सामान्य वर्ग कहा जाता है।
मीडिया की नकारात्मक भूमिका
स्वघोषित रूप से लोकतंत्र का चतुर्थ स्तंभ कहा जाने वाला मीडिया आज ‘अग्नि में घृत’ (आग में घी) डालने का कार्य कर रहा है। टी.आर.पी. (TRP) की अंधी दौड़ में संवेदनशील विषयों को सनसनीखेज बनाकर प्रस्तुत किया जाता है। विमर्श (Discourse) को समाधान की ओर ले जाने के स्थान पर, मीडिया का एक बड़ा वर्ग जातीय संघर्षों को महिमामंडित करता है और समाज के विभिन्न वर्गों के मध्य अविश्वास की खाई को और अधिक चौड़ा करता है।

सामान्य वर्ग मीडिया के छल तक को नहीं समझ रहा है क्या यह भी एक प्रश्न है। यदि मीडिया का कटुसत्य जान रहे हैं तो उस मीडिया को पोषित-पल्लवित क्यों कर रहे हैं, देखना बंद क्यों नहीं कर देते। मीडिया को पोषित-पल्लवित तो मुख्य रूप से सामान्य वर्ग जिसे सवर्ण कहते हैं वही कर रहा है।
न्यायपालिका की निष्क्रियता और स्वतः संज्ञान का अभाव
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न न्यायपालिका की भूमिका पर उठता है। जब देश की एकता और अखंडता पर संकट के बादल मंडरा रहे हों, जब खुलेआम समाज को बांटने वाले वक्तव्य दिए जा रहे हों, तब सर्वोच्च न्यायालय की चुप्पी विस्मयकारी है। अनेकों प्रकरणों में जहां कोई आवश्यकता नहीं थी न्यायपालिका को स्वतः संज्ञान लेते देखा गया है। उन प्रकरणों में जहां अपराधी को संरक्षित करना हो, बेल देना हो सर्वोच्च न्यायालय को अति-सक्रीय देखा गया है।
किन्तु जो विषय देश और राष्ट्र के लिये भयावह हैं, जिसका अंतिम परिणाम “जातीय संघर्ष की आग में देश का जलना” होगा उस विषय पर क्यों नहीं विचार करती और स्वतः संज्ञान क्यों नहीं लेती ? क्या न्यायपालिका में दूरदर्शियों का अभाव है जिन्हें देश की वर्त्तमान घृणित जातिवाद की राजनीति का अंत नहीं दिख रहा है।
- स्वतः संज्ञान (Suo Motu): क्या शीर्ष न्यायालय का उत्तरदायित्व केवल प्रशासनिक विसंगतियों तक सीमित है? क्या संविधान की मूल भावना, जो बंधुत्व (Fraternity) पर आधारित है, उसकी रक्षा करना न्यायालय का परम धर्म नहीं है?
- न्यायिक विलंब: सवर्णों के साथ हो रहे संवैधानिक भेदभाव और उनके विरुद्ध बढ़ती घृणा (Hate Speech) पर न्यायालय की निष्क्रियता ‘न्याय के सिद्धांत’ के विरुद्ध प्रतीत होती है। ऐसा आभास होता है कि न्यायपालिका केवल उन्हीं विषयों पर त्वरित प्रतिक्रिया देती है जो कथित रूप से ‘राजनीतिक रूप से सही’ (Politically Correct) होते हैं।

समाधान : सामान्य वर्ग का संवैधानिक अधिकार
यदि हम समाधान की दिशा में सोचें तो एक बात स्पष्ट होता है कि सर्वप्रथम सभी स्तरों पर इस विषय की चर्चा हो, विमर्श किये जायें, सभी संस्थायें राष्ट्रहित का चिंतन करते हुये स्वस्थ विमर्श करे और दूरदर्शिता दिखाते हुये देश-संस्कृति की रक्षा के लिये सही दिशा में विचार विमर्श करें। किन्तु ऐसी कोई संभावना नहीं बनती है कि नेता/राजनीतिक दल/मीडिया या कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका में से कोई भी इस विषय को गंभीरता से लेगा क्योंकि इसके लिये जो दूरदर्शिता चाहिये उसका अभाव है और स्वार्थ के दलदल में फंसे हुये हैं।

तो शेष एक मात्र विकल्प बचता है कि पीड़ित जनता अर्थात उत्पीड़ित सवर्ण जिसे सामान्य वर्ग कहा जाता है वो जागरूक होकर अपने संगठनों, नेताओं से इस विषय में प्रश्न करे, रिपोर्ट मांगे कि इस विषय में आपने कौन सा कार्य किया है ? इन सबको बाध्य करे कि ये लोग भी इस प्रकार की चर्चा करें, सवर्णों के संवैधानिक उत्पीड़न को देश में विचारणीय विषय बनायें। समाधान की दिशा में प्रयास करें और सवर्णों अर्थात सामान्य वर्ग के भी कुछ संवैधानिक अधिकार सुनिश्चित करें :
- योग्य व्यक्ति इसलिये किसी नियुक्ति से बहिष्कृत नहीं किया जा सकता क्योंकि वह सवर्ण है, आरक्षित कोटे में नहीं आता है।
- यदि SC-ST एक्ट का किसी सवर्ण के विरुद्ध दुरुपयोग करके उसका उत्पीड़न किया गया है तो आगे उस सवर्ण के लिये भी वैधानिक मार्ग खोले, क्योंकि जिसने कानून का दुरुपयोग किया उसने मात्र दुरुपयोग नहीं किया, किसी का उत्पीड़न भी किया है।
- बेटियों से विवाह कराने वाली बात हो, या मनुस्मृति जलाने की घटना हो, या देवताओं के निंदा जैसे कुकर्म हो ये सवर्णों की भावना को निसंदेह आहत करने वाली होती है यदि वह ढोंगी सेकुलर न हो तो। इन कुकर्मों के लिये दंडात्मक प्रक्रिया आरम्भ किया जाय, स्थानीय न्यायालय को इसमें स्वतः संज्ञान लेना चाहिये। यदि स्थानीय न्यायालय स्वतः संज्ञान न ले तो उच्च-सर्वोच्च न्यायालय इन विषयों का स्वतः संज्ञान ले और स्थानीय न्यायालय से भी प्रश्न करे।
बुद्धिमत्ता तो यही है कि यदि यह संवैधानिक कर लोकतांत्रिक उत्पीड़न हो रहा है एवं जातीय उन्माद व जातीय संघर्ष की आग में देश को धकेलने वाला है तो संवैधानिक और लोकतान्त्रिक उपायों से ही इसके समाधान का प्रयास किया जाये।

सवर्ण अर्थात सामान्य वर्ग को विशेष सावधान रहते हुये सक्रीय होने की आवश्यकता है क्योंकि जातिवाद की घृणित राजनीति करने वाले नेता और उनके अनुयायी ऐसे निरंतर उकसावे वाले वक्तव्य देते रहते हैं ताकि सवर्ण अर्थात सामान्य वर्ग तीखी प्रतिक्रिया दे और जातीय संघर्ष आरम्भ हो जाये। सवर्ण को अपनी बौद्धिकता का परिचय देते हुये बिना जातीय संघर्ष के समाधान तक पहुंचने का प्रयास करना होगा।
निष्कर्ष
संविधान और लोकतंत्र स्वयं में साध्य नहीं, बल्कि जनकल्याण के साधन हैं। यदि इनका उपयोग देश को जातीय संघर्ष की अग्नि में झोंकने हेतु किया जा रहा है, तो यह लोकतंत्र की विफलता है। राजनीतिक दलों/नेताओं/सरकारों की स्वार्थसिद्धि और न्यायपालिका की कुंभकर्णी निद्रा राष्ट्र को एक ऐसे विनाशकारी मोड़ पर खड़ा कर सकती है जहाँ से वापसी असंभव होगी। समय आ गया है कि राष्ट्र की अखंडता के प्रहरी सजग हों और जातीय तुष्टीकरण की राजनीति के विरुद्ध एक सशक्त सांस्कृतिक और संवैधानिक प्रतिरोध खड़ा किया जाए।
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कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।
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