अंधभक्तों : आंखों की पट्टी खोलो, विकास के पीछे विनाश छुपा है

अंधभक्तों : आंखों की पट्टी खोलो, विकास के पीछे विनाश छुपा है अंधभक्तों : आंखों की पट्टी खोलो, विकास के पीछे विनाश छुपा है

“आहार से लेकर विचार तक, जहाँ विवेक का अभाव है, वहीं उन्माद का वास है।”

वर्त्तमान युग का नाम जो शास्त्रों से ज्ञात होता है वह कलयुग ही है और मतिछिन्न युग का तात्पर्य शास्त्रोक्त तथ्य से संबंधित न होकर वैश्विक परिदृश्य से है जो वर्त्तमान में स्पष्टः दिख रहा है। इसमें सांसारिक व्यवहार, जीवन-शैली के आधार पर विचार किया गया है और सांसारिक स्थिति (pagal world) एवं लोगों की मनोदशा का यदि सम्यक अध्ययन करें तो ऐसा प्रतीत होता है कि ये तो पागलपंती (pagalpanti) है, लोग मतिछिन्न हो गये हैं और परस्पर युद्ध में तल्लीन हैं एवं नेता लोग हर्षित हैं, उद्यमी जगत का कुटिल हास्य व्यंग्यात्मक है।

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यह बात मैं पहले ही स्पष्ट कर दूँ कि देश की राजनीति में दो विचारधारा मुख्य रूप से है : राष्ट्रवादी विचारधारा और वामपंथ (साम्यवाद, लिबरल आदि अन्य सभी इसी के अंतर्गत समाहित हैं मूलतः वामपंथ ही हैं) और यदि वैचारिक समर्थन की बात हो तो मैं राष्ट्रवादी विचारधारा का समर्थन करता हूँ और इस कारण कई बार मुझे भी “अंधभक्त” सुनना पड़ता है, किन्तु ये सापेक्षता के आधार पर समर्थन है कि इसके अतिरिक्त और है ही नहीं एवं वामपंथ के सापेक्ष राष्ट्रवादी विचारधारा को ही समर्थन देना उपर्युक्त है।

किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं कि आंखों पर पट्टी बांध लें और अंधभक्त बन जायें क्योंकि वास्तविकता तो यही है कि जितने भी राष्ट्रवादी हैं उनके आंखों पर पट्टी बांध दी गयी है और विकास के पीछे छुपे विनाश को नहीं देख पा रहे हैं और आज हम इसी का उद्भेदन करेंगे।

आगे की चर्चा से पूर्व हमें इसके आधार को समझ लेना अनिवार्य है और आलेख के आधार पागलपंती ही है जिसे मतिछिन्नता का वेग कहा जा सकता। इसके लिये व्यावहारिक लक्षण जो आधार के आधार के रूप में ग्रहण किये गये हैं वो कुछ इस प्रकार हैं :

  • सांप्रदायिक उन्माद
  • जातिवादी उन्माद
  • स्त्रीवर्ग का उन्माद
  • सेवकवर्ग का उन्माद
  • शैक्षणिक उन्माद
  • चिकित्सकीय उन्माद
  • आहार संबंधी उन्माद

यहां इसी प्रकार से और भी अनेकों आधार हैं जो गिने जा सकते हैं और ये सभी धरातल पर देखे जा रहे हैं, कल्पना मात्र नहीं हैं।

पागलपंती - pagal world
पागलपंती – pagal world

इन सबके मूल आधार को ढूंढें तो वह लोकतांत्रिक उन्माद ज्ञात होता है जिसके साथ एक अन्य उद्यमिता उन्माद भी चल रहा है। इनके पीछे भी एक और घातक घटक है जिसे “डीप स्टेट” के नाम से जाना जाता है। यदि हम “डीप स्टेट” की चर्चा को छोड़ दें तो चर्चा ही अधूरी रहेगी इस कारण इसको सम्मिलित करना ही होगा।

डीप स्टेट – deep state

डीप स्टेट विश्व और मानवता के लिये कितना घातक है इसपर अभी कोई विचार भी नहीं किया जा रहा है जबकि इसपर व्यापक विचार-विमर्श की आवश्यकता है क्योंकि यह विश्व और मानवता के लिये बहुत ही घातक है। डीप स्टेट अपने विचारों को षड्यंत्रपूर्वक विश्व पर थोपता है और अपने अनुकूल सभी व्यवस्था, व्यवहार के लिये विश्व और मानवता को बाध्य करता है। इससे सभी राष्ट्र की सत्ता भी अस्थिर रहती है, अनेकों देशों में सत्ता पलटने का खेल निरंतर देखने को मिल रहा है। इसके साथ ही इसने वास्तव में लोगों के मस्तिष्क को ही अपने अधीन कर रखा है लोग उसी दिशा में चर्चा करेंगे, सोचेंगे और व्यवहार भी करेंगे जो डीप स्टेट चाहता है।

विश्व में लोकतंत्र को महान सिद्ध किया जा रहा है यह भी डीप स्टेट ही करा रहा है एवं जहां चुनी हुई सरकार को गिराकर सत्तापलट का खेल खेला जाता है वहां भी यही रहता है। लोकतांत्रिक विधि से चुनी हुयी सरकार भी यदि डीप स्टेट की अधीनता स्वीकार करके उसके अनुकूल कार्य करे तभी तक किसी भी देश में लोकतंत्र रहता है, जैसे ही वह सरकार इसके प्रतिकूल कार्य करने लगती है उस सरकार को ही गिरा दिया जाता है और हम भारत में भी ऐसा प्रयास होते हुये अनुभव कर रहे हैं।

डीप स्टेट - deep state
डीप स्टेट – deep state

“डीप स्टेट” है यह सत्य है और राष्ट्रवादियों को उससे युद्ध (विचारिक) करना ही होगा किन्तु तनिक सोचिये इसके लिये क्या आवश्यक है अर्थात यह कैसे करें ?

  1. सजग रहकर, ,जनमानस में जागरूकता बहकर इसके षड्यंत्रों को विफल करें या
  2. इसके सामानांतर दूसरी व्यवस्था करके राष्ट्रवादियों और जनमानस के आंखों पर पट्टी बांध दें जिससे वो युद्ध में साथ तो दे किन्तु वास्तविकता से फिर भी कोसों दूर ही रहे!

इस आलेख में मुख्य रूप से यही विषय स्पष्ट होगा कि राष्ट्रवादियों के आंखों में कैसे पट्टी बांध दी गयी है और वो सनातन, राष्ट्रवाद, वंदे मातरं आदि करते तो हैं किन्तु सिद्धांतों को जानते भी नहीं, कुतर्कों के द्वारा जो कुछ भी बता दिया जाता है बस वही रटने लगते हैं, वास्तविकता क्या है इसका सैद्धांतिक परिक्षण ही नहीं करते। और यही कारण है कि आज ये अंधभक्त सिद्ध होने लगे हैं।

हम यह भी स्पष्ट कर दें कि आर्थिक विकास, कानूनी सुधार, कठोर निर्णय, सामाजिक और कल्याणकारी योजनायें व अन्य विकास के सभी कार्यों का जो प्रकृति व सनातन सिद्धांत के विरुद्ध नहीं है एवं आरक्षण के कारण गुणवत्ता प्रभावित नहीं हो रही है उसको पूर्ण समर्थन देता हूँ और सही मनाता हूँ। जैसे कई गंभीर निर्णय : नोटबंदी, GST, किसान बिल, NCR, अर्थव्यवस्था, विदेशनीति आदि, किन्तु अंधभक्त नहीं बन सकता।

अंधभक्त का वास्तविक तात्पर्य

तो प्रथम प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि आप अंधभक्त कैसे बनते हैं ?

आंखों पर पट्टी बांधना एक मुहावरे की भांति है, वास्तविकता यह है कि ऑंखें ही नहीं हैं और इस कारण सामने पहाड़ है गड्ढा दूसरा व्यक्ति जो बताएगा वही समझेंगे और स्वीकार लेंगे। अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि ऑंखें कैसे नहीं हैं ? और इसका उत्तर हमें शास्त्रों से ज्ञात होगा :

अर्थ: श्रुति (वेद) और स्मृति (पुराण-स्मृति ग्रंथ आदि) विद्वान विप्रों की दो आँखों के समान बनाई गई हैं। यदि कोई एक से हीन है (अर्थात जिसे केवल एक का ज्ञान है), तो वह ‘काना’ है, और जो दोनों से हीन है, वह ‘अंधा’ कहलाता है।

भावार्थ: विप्राणां अर्थात ब्राह्मणों के लिये इस कारण कहा गया है क्योंकि अन्य सभी तो ब्राह्मण से ही विचार लेंगे, निर्णय लेंगे, धर्म-सम्मत है अथवा धर्मविरुद्ध यह प्रश्न करेंगे, क्या करें और क्या न करें इसका ज्ञान प्राप्त करेंगे। इसका तात्पर्य यह नहीं कि क्षत्रिय और वैश्य के लिये श्रुति-स्मृति के ज्ञान और अध्ययन का निषेध किया गया है। ब्राह्मण का तात्पर्य यह है कि स्वयं ज्ञानी हों तो भी ब्राह्मण से निर्णय-आज्ञा-उपदेश-शास्त्रसम्मति का वचन आदि लेना ही पड़ता है।

आप अंधभक्त कैसे बनते हैं
आप अंधभक्त कैसे बनते हैं

अध्ययन मात्र करना और आज्ञा-उपदेश-निर्णय आदि देना दोनों भिन्न विषय हैं और आज्ञा-उपदेश-निर्णय (शास्त्रीय) का अधिकार मात्र ब्राह्मण को ही है। इस श्लोक को देखें :

अर्थ: जो विद्वान धर्मशास्त्रों रूपी रथ पर सवार है और जिसके हाथ में वेद रूपी तलवार है, अर्थात जिसे शास्त्रों का ज्ञान हो और शास्त्रों के अनुसार ही और वेदों का रक्षात्मक बल प्राप्त है, वेदज्ञ है; शास्त्र से सिद्ध ही विचार का प्रवाहक हो, वह विद्वान स्वविवेक से भी जो निर्णय देता है, वही परम धर्म होता है।

हम क्या करें और क्या न करें इसका हमें विचार करना अनिवार्य होता है वो इसलिये कि हम जो करने जा रहे हैं वह धर्म है, शास्त्र सम्मत है या नहीं क्योंकि यदि शास्त्र विरुद्ध हुआ तो अधर्म हो जायेगा। अब शास्त्र से परिक्षण करना है तो इसके लिये शास्त्र का ज्ञान होना आवश्यक है। शास्त्र से सिद्धि के बिना किया गया कर्म के बारे में तो धर्म है या अधर्म यह भी ज्ञात नहीं हो सकता न।

स्वयं शास्त्र का ज्ञान है तो भी अनर्थ कर लेने का भय बना ही रहता है, बहकने/भ्रमित होने की संभावना बनी ही रहती है इसलिये जिन ब्राह्मणों का जीवन ही शास्त्र सेवा में व्यतीत होता है उन ब्राह्मणों की सम्मति, आज्ञा, उपदेश अनिवार्य हो जाता है। इस विषय को अधिक विस्तार देना तो उचित नहीं होगा किन्तु भली-भांति समझने के लिये एक उदाहरण की आवश्यकता हो है :

उदाहरण : आज लगभग सभी संस्कार विलुप्त हो गये हैं; उपनयन, विवाह और दाह के अवशेष मात्र पड़े हुये रह गये हैं। वेष-भूषा, वाणी आदि से देखें तो म्लेच्छ के समान हो गये हैं और मात्र सनातन-सनातन चिल्ला रहे हैं। आहार के नाम पर शाकाहार कर मांसाहार का विवाद करते हैं और आहार शुद्धि के विषय में ज्ञानशून्य हैं। मंदिर-तीर्थ जो जाते हैं किन्तु कब जायें, कैसे जायें, क्या करें कुछ नहीं ज्ञात। सभी राष्ट्रवादी और हिन्दू राष्ट्र के समर्थक आत्ममंथन करें क्या ये सत्य नहीं है ?

  • यदि यह सत्य है तो फिर आप किस हिन्दू राष्ट्र की बात कर रहे हैं ?
  • हिन्दू राष्ट्र के नाम पर आपको भ्रमित किया गया है अथवा नहीं विचार करें ?
  • हिन्दू राष्ट्र / सनातन राष्ट्र तब बनेगा जब हम हिन्दू बनेंगे, सनातनी बनेंगे, न कि संविधान में लिखने से।
  • यदि हम सब इसी तरह म्लेच्छ बनते रहे तो फिर हिन्दू राष्ट्र बनेगा या म्लेच्छ राष्ट्र विचार करें!

सांप्रदायिक उन्माद

अब बताईये आपको सनातनी (हिन्दू) बनने की शिक्षा कोई दे रहा है क्या ?

जिसे आप समझते होंगे कि हिन्दू और हिंदुत्व की बात कर रहा है; जिसके पीछे राष्ट्रवाद का झंडा लेकर दौड़ रहे हैं, वो भी मूलतः आर्यसमाजी ही जो वास्तव में सनातन सिद्धांत के विरुद्ध ही है, ईसाइयों का ही एक षड्यंत्र है। जो वेद की बात तो करता है किन्तु सभी वेदों को नहीं स्वीकारता, पुराणों और स्मृतियों को तो स्पष्टतः अस्वीकार कर ही रहा है, अमान्य (प्रक्षिप्त) कह ही रहा है। दयानन्द सरस्वती के प्रच्छन्न इसाई प्रचारक होने का उद्भेदन स्वामी निग्रहाचार्य ने बड़ी सफलता से किया है और उस वीडियो को यहां साझा किया गया है यदि अवलोकन करना चाहें तो कर सकते हैं।

ये आपको शिखा, सूत्र, अग्निहोत्र आदि के बारे में तो बताएगा किन्तु वो इसलिये क्योंकि यह षड्यंत्र कर रहा है और आगे फिर आपको यह भी कह देता है कि ३३ करोड़ देवता नहीं है, ३३ कोटि का तात्पर्य ३३ प्रकार के या वर्ग के देवता हैं और आप स्वीकार लेते हैं उसके बाद भी आप सैकड़ों देवताओं के मंदिरों में जाते हैं, पूजा करते हैं। इनसे पूछिये

  • भगवान राम को भगवान मानते हैं क्या ?
  • भगवान कृष्ण, हनुमान, दुर्गा, काली, सरस्वती, लक्ष्मी को स्वीकारते हैं क्या, उनकी पूजा करते हैं क्या ?
  • कभी रामायण, भागवत आदि ग्रंथों का परायण करते हैं क्या या उनमें आस्था रखते हैं क्या, कथा श्रवण करते हैं क्या?

इनका भेद खुल जायेगा। किन्तु ये तो आपको ज्ञात ही नहीं है इसने आपको बता दिया कि ३३ करोड़ देवता नहीं हैं और मान लिया, तो कितने करोड़ हैं ये क्यों नहीं पूछा ? कोटि का एक अर्थ प्रकार या वर्ग भी है किन्तु यह कैसे सिद्ध होता है कि देवताओं की संख्या ३३ करोड़ नहीं है? चलो मान लिया ३३ करोड़ नहीं कुछ लाख अथवा कुछ हजार, अथवा सौ ही है तो कितनी संख्या है ये बताओ न !

जैसे ये आपको आज ३३ करोड़ देवता के विषय में दिग्भ्रमित कर रहा है वैसे ही आगे सनातन के विषय में भी दिग्भ्रमित करेगा और ईसाई बना देगा किन्तु ये दीर्घकालिक षड्यंत्र है १-२ पीढ़ी के बाद करेगा। ये आपको रात-दिन एक पाठ पढ़ा रहा है शास्त्रों में सब प्रक्षिप्त है और आप स्वीकार भी कर रहे हैं, यह षड्यंत्र का ही भाग है। इसके नियम से इसका अपना सत्यार्थ प्रकाश ही प्रक्षिप्त है जो स्वामी निग्रहाचार्य ने स्पष्ट कर दिया है।

यहां सिद्ध यह हो रहा है कि हिन्दू-हिंदुत्व और हिन्दू राष्ट्र के नाम पर भ्रमित करके जो नारे लगवाये जा रहे हैं वह दिग्भ्रमित करके कर रहे हैं। धर्म का ज्ञान, धर्म के पालन का किसी भी प्रकार से उपदेश नहीं करते और यदि कभी करते भी हैं तो वो प्रपंच होता है, छल होता है, और अंततः यह एक सांप्रदायिक उन्माद ही स्थापित होता है, राष्ट्रवाद-हिंदुत्व आदि नहीं। ये आपको भ्रामक पाठ पढ़ाकर बस अपना उल्लू सीधा कर रहा है जैसे :

यह भी पढ़ाया जा रहा है कि सभी संस्कार दिन में ही होते हैं तो विवाह रात में क्यों ? और फिर कुतर्क दिया जाता है मुगल आक्रांताओं के अत्याचार का और आगे कहा जाता है कि रात में विवाह मत करो। इससे विवाह संस्कार में आपकी रही-सही आस्था भी भंग हो जाती है या प्रगाढ़ विचार करें। रात में विवाह करें या नहीं इस पर शास्त्र के मत को समझने के लिये यहां संलग्न वीडियो का अवलोकन कर सकते हैं।

वास्तव में यही अंधभक्त होना है। ये आपको जो सीखा रहा है वो आप समझ भी नहीं पा रहे हैं, ये आपको वो करने के लिये विवश कर रहा है जो ये करना चाहता है, किन्तु ये सीधे-सीधे नहीं कहता इस प्रकार से कहता है कि आपको वैसा नहीं लगता जैसा कोई सीधे-सीधे कहे तो लगेगा।

ये भी आपको ब्राह्मण द्रोही बना रहा है, ब्राह्मण में आपकी आस्था को कम कर रहा है, ये आपको सीखा रहा है कि ब्राह्मण का कहा मत मानो ब्राह्मणों को ही पढ़ाओ ३३ करोड़ देवता नहीं होते, ३३ प्रकार के होते हैं, विवाह रात में नहीं होता दिन में होता है।

आपने कई बार अपने प्रिय नेता को पूजा करते, गंगा आरती करते तो देखा होगा किन्तु कभी ब्राह्मणों का आशीर्वाद लेते नहीं देखा होगा, जो ब्राह्मण पूजा करा रहा होता है उसे भी नतमस्तक करवाता है। यदि आपने ध्यान न दिया हो तो पुराने वीडियो में जाकर ध्यान से देखें।

  • जब आप कोई पूजा आदि करते हैं तो ब्राह्मण को प्रणाम करके उनसे आशीर्वाद लेते हैं अथवा नहीं ?
  • आपके ब्राह्मण आपको आशीर्वाद देने के स्थान पर हाथ जोड़ें, क्या कभी आपकी ये भावना होती है और मान लिया जाय कोई यदि गलती से जोड़ भी ले तो मना करके, आशीर्वाद मांगेगे या नहीं ? हमें पाप न चढ़ायें ऐसा कहेंगे या नहीं ?

तो फिर आपका प्रिय नेता इतनी छोटी सी बात नहीं जानता क्या, ऐसा तो नहीं है, जान-बूझकर ऐसा संदेश दे रहा है और इसे ही कहते हैं “मुंह में राम बगल में छूड़ी”; इसको छोटी बात न समझें ये एक बड़ा सन्देश है, किन्तु अंधभक्त होने के कारण नहीं समझ पाये।

इसे समझने के लिये ही शास्त्र रूपी नेत्र की आवश्यकता होती है और न हो तो अंधे होते हैं, देख नहीं पाते-समझ नहीं पाते और उसका वो लाभ उठाते हैं जो आंखों पर पट्टी बांधने के मुहावरे जैसा है, वास्तव में वो हमारी आंखों पर पट्टी नहीं बांध रहे हैं, हम ही अंधे हैं, वो जो दिखा भी रहा है वो हम देख ही नहीं पा रहे हैं, बस झंडा उठाये हैं, नारे लगा रहे हैं।

यही अंधभक्ति है और इस कारण हम अंधभक्त हैं। यदि आपको अंधभक्त का यह विषय आघात कर रहा हो तो और गंभीरता से विचार करें क्योंकि आपकी अंधभक्ति का अनुचित लाभ उठाया जा रहा है और आपको राष्ट्रवाद, हिन्दुत्व, हिन्दुराष्ट्र आदि का लॉलीपॉप थमा दिया है।

मंदिरों और तीर्थों का विकास हो रहा है पूर्णतः सत्य है, वहां लोगों की भीड़ भी लगी हुई है और यह भी सत्य है, आप भी कई मंदिरों-तीर्थों में गये होंगे और आनंदविभोर हो रहे हैं, अभ्युदय काल मान रहे होंगे। किन्तु अब आँखों की पट्टी तो खोल ही नहीं सकते हैं और खोल भी लें तो क्या अंतर पड़ेगा क्योंकि आंख ही तो नहीं है, पट्टी उतारने पर भी क्या दिखेगा ? कुछ प्रश्न दे रहा हूँ और इनका उत्तर ढूंढने का प्रयास करें :

  1. किसे और कब तीर्थ नहीं जाना चाहिये ?
  2. तीर्थ जाने का विधान क्या है ?
  3. तीर्थ जाकर क्या-क्या करें ?

प्रश्न मात्र देकर इसलिये छोड़ रहा हूँ ताकि इसपर अनुसंधान करके यह समझ पायें कि अंधा होने का तात्पर्य क्या है, और मैं “अंधा” “अंधभक्त” शब्दों की सिद्धि क्यों कर रहा हूँ। यह कटु सत्य है तो स्पष्ट है कि कड़वा ही लगेगा किन्तु आपके लिये, सनातन के लिये, देश के लिये कल्याणकारी होगा। कड़वा लगेगा इस भय से न बोलूं तो ये पाप होगा।

इसी कड़ी में एक और महत्वपूर्ण प्रश्न है “तीर्थाटन” और “पर्यटन” दो भिन्न शब्द हैं और एक दूसरे के पर्याय भी नहीं हैं, पर्यटन मात्र भ्रमण करना होता है जो तीर्थों में नहीं किया जाता। क्या आपको नहीं लगता कि विकास नाम की पट्टी बांधकर चुपके से “तीर्थाटन को पर्यटन बना दिया गया”, किन्तु इसका चिंतन तब कर पाएंगे जब उपरोक्त प्रश्नों का अनुसंधान करके सही उत्तर ज्ञात कर लेंगे।

“धर्मो रक्षति रक्षितः” एक सिद्धांत है और वर्त्तमान में विकास के नाम पर मंदिरों-तीर्थों में जो कुछ भी किया जा रहा है उसके मूल में अर्थव्यवस्था है जो शास्त्रों के मूल सिद्धांत के विरुद्ध कर रहा है। तीर्थाटन को पर्यटन बनाकर अर्थव्यवस्था को सबल किया जा रहा है किन्तु आप उसे धार्मिक जागरण समझ रहे हैं क्योंकि अंधभक्त हैं।

धर्मो रक्षति रक्षितः

वास्तव में धर्म का क्षरण ही किया जा रहा है जो अंधभक्त होने के कारण समझ नहीं पा रहे हैं, अब सोचिये उस सिद्धांत पर, यदि धर्म की रक्षा करने वाला भी रक्षित होता है तो क्षरण करने वाले का क्या होगा, धर्म को नष्ट करने वाले का क्या होगा। विकास के पीछे विनाश है या नहीं ?

“अंधभक्ति वह वैचारिक कारागार है जिसका द्वार भीतर से बंद होता है और जिसकी चाबी व्यक्ति स्वयं खो चुका होता है।”

जातिवादी उन्माद

उपरोक्त तथ्यों को तो विस्तार से समझाया गया है किन्तु अब उतना विस्तार करने की आवश्यकता नहीं है। अब संक्षेप में भी कहने पर सभी बातें समझ में आ जायेगी। अब हम जातिवादी उन्माद की बात कर रहे हैं। आप स्वयं विचार करें जातीय संघर्ष बढ़ा है या घटा है। “लव जिहाद” की बात तो की जाती है किन्तु सवर्णों की बेटियों पर उन लोगों की भी कुदृष्टि है जो असवर्ण हैं ये कभी चर्चा का विषय बनता है, जबकि खुलेआम मंचों से ऐसी बातें की जाती हैं, वीडियो भी वायरल होता है।

यदि आपके प्रिय नेता जिनका गीता बांटना आपके हर्ष का विषय होता है इतने ही गीता के और भगवान कृष्ण के भक्त हैं, तो गीता में ही वर्णसंकर का जो विषय है उसको क्यों संरक्षित कर रहे हैं, उसे रोकने का प्रयास क्यों नहीं कर रहे। आप स्वयं विचार करें इनके काल में अंतर्जातीय विवाह को रोकने का कोई प्रयास हुआ है क्या ?

हम स्वीकारते हैं कि ऐसे कानून वो जो सनातन विरोधी है उसके द्वारा बनाये गए हैं किन्तु धरातल पर उसका प्रचलन अत्यल्प था, अब बढ़ा है या नहीं, बेटियां भाग रही हैं या नहीं। इस विषय को लेकर पूरा सवर्ण समाज उद्वेलित हो रहा है या नहीं। ये जातिवाद की उन्माद को भी बढ़ा रहे हैं और देश को जातीय संघर्ष में भी झोंकने की पृष्ठभूमि तैयार की जा रही है।

आरक्षण के विषय की तो चर्चा ही क्या करें, EWS का लॉलीपोल थमा दिया और अब निजी क्षेत्रों में भी आरक्षण लाने जा रहे हैं। आपको लगता था कि आरक्षण समाप्त किया जायेगा, किन्तु चिंतन कीजिये आरक्षण को बढ़ाया जा रहा है। आपके एक दूसरे प्रिय व्यक्ति ने तो सैकड़ों वर्षों तक आरक्षण व्यवस्था बनी रहने की बात भी बोल दी जिसने कभी पुनर्विचार करने की बात किया था। यदि जातीय संघर्ष होता है तो इसे विकास कहा जायेगा या विनाश ?

स्त्रीवर्ग का उन्माद

वर्तमान राजनीति और सामाजिक विमर्श में स्त्रियों का एक बड़ा वर्ग ‘भावनात्मक अंधभक्ति’ का शिकार है। शास्त्रों में स्त्री को ‘शक्ति’ और ‘धृति’ (धैर्य) का प्रतीक माना गया है, लेकिन आधुनिक ‘अंधभक्ति’ ने उन्हें केवल एक ‘वोट बैंक’ या ‘भीड़’ में बदल दिया है।

  • शास्त्रीय संदर्भ: मनुस्मृति कहती है: “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः”। लेकिन यहाँ ‘पूजा’ का अर्थ विवेक सम्मत सम्मान था। आज का उन्माद यह है कि स्त्रियाँ अपनी सुरक्षा, महँगाई या मूल अधिकारों के बजाय केवल आकर्षक नारों और व्यक्तित्व पूजा के पीछे उन्मत्त हैं। अपनी मर्यादाओं का उल्लंघन कर रही हैं और सरकारी योजनाओं के माध्यम से धर्म के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध उन्हें प्रेरित किया जा रहा है जिसका ज्वलंत उदाहरण है “नारी सशक्तिकरण”
  • राजनीतिक विश्लेषण: राजनीति ने स्त्रियों को ‘मुफ्तखोरी’ (Freebies) के जाल में फँसाकर उनके स्वतंत्र राजनैतिक चिंतन को कुंद कर दिया है। जब स्त्रीवर्ग शास्त्रोक्त ‘कुलवधू’ या ‘विदुषी’ की गरिमा भूलकर केवल किसी राजनैतिक व्यक्ति के लिए सड़कों पर तर्कहीन विलाप या नृत्य करने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि समाज की ‘शक्ति’ दिशाहीन हो गई है। उत्थान नहीं पतन की दिशा में अग्रसर हैं विकास नहीं विनाश की ओर जा रहे हैं। स्त्रियों का दूषित होना, वर्णसंकर उत्पन्न होना, नाश की दिशा में बढ़ने का प्रमाण है जिसका सिद्धांत गीता में मिलता है।

सेवकवर्ग का उन्माद

सेवक (यहाँ कर्मचारी, कार्यकर्ता और अनुयायी) का धर्म ‘स्वामिभक्ति’ है, लेकिन ये समाप्त हो रहा है। सेवक वर्ग भी उन्मादी बनता जा रहा है किन्तु ये मात्र आपके प्रिय नेता का कार्य नहीं है पूर्ववर्ती नेताओं के भी लगाये हुये आग हैं। सेवक अब सेवा को भूल गया है और संघर्ष में जुट गया है।

विदुर नीति के अनुसार, वह सेवक जो अपने स्वामी के गलत निर्णय पर मौन रहे, वह पापी है। आज का सेवकवर्ग (कार्यकर्ता) अपने नेता के कुकृत्यों को भी ‘मास्टरस्ट्रोक’ सिद्ध करने के उन्माद में लगा है। किन्तु सही निर्णयों पर संघर्ष करने लगता है। अधिकार की लड़ाई लड़ रहा है, हड़ताल करता है, सड़कें मार्ग को अवरुद्ध करता है, काम रोकता है। कामचोरी की तो बात ही मत कीजिये, जो काम स्वयं कराने पर १० दिन में करेंगे वही काम यदि ठेके पर दें तो ५-६ दिन में पूरा कर देंगे और इसको घर बनाने में सही-सही समझा जा सकता है।

यदि उसकी कामचोरी पर मौन रहें तो वो आपका भक्त बना रहेगा और आपके अनीति में भी आपका साथ देगा किन्तु यदि कामचोरी से मना करें तो पता नहीं कौन-कौन सी धारायें लगाकर फंसा देगा। ये विशेष रूप से आपके प्रिय नेता का ही किया धरा है, नारा भले ही सेवा और सेवक होने का लगा रहे हों।

शैक्षणिक उन्माद

यह सबसे घातक उन्माद है। जब पढ़ा-लिखा वर्ग, शिक्षक और छात्र अपनी तर्कशक्ति को किसी विशेष विचारधारा (Ideology) के चरणों में गिरवी रख देते हैं, तो शैक्षणिक उन्माद जन्म लेता है। शिक्षा में मुगलों-आक्रांताओं के इतिहास मिटाने की घूंटी पिलाने के बाद आप अचेत हो गये हैं और चुपके से शिक्षा को बना दिया गया कि आपके बच्चे भले शिक्षित और पढ़े-लिखे कहलाने लगें किन्तु वो आपके बच्चे नहीं रहते हैं, वो स्वतंत्र हो जाते हैं, स्वेच्छाचारी बन जाते हैं, दुराचार के दलदल में फंसते जा रहे हैं।

हां “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” नारा बहुत अच्छा है और आप नारा लगाते रहो, आंखें तो हैं नहीं उन्हें दलदल में फंसने दो। कभी बेटी अपने पति की हत्या कर देगी या घर से भागकर लव मैरिज करेगी, अधिक कड़ा रुख मत अपना लेना नहीं तो आगे आपके ऊपर ही बलात्कार का केस भी कर देगी, तो कभी बहू जिसे बेटी बनाकर घर लाये वही बेटे का प्राणहरण करेगी या आत्महत्या के लिये विवश कर देगी, यदि नियंत्रण करने का प्रयास किया तो सपरिवार न्यायालय के चक्कर लगाते रहेंगे।

भाइयों में संपत्ति का विवाद था, है और रहेगा किन्तु भाई-बहन में संपत्ति का विवाद नहीं था, अब वो भी होगा। क्या आप चाहते हैं कि आपके सभी बच्चे आजीवन संपत्ति का ही विवाद लड़ते रहें, आपस में ही लड़ते-झगड़ते रहें। आपके प्रिय नेता का बहुत बड़ा योगदान है।

चिकित्सकीय उन्माद

आज का मनुष्य स्वास्थ्य के प्रति जागरूक नहीं, बल्कि ‘भयभीत’ और ‘उन्मत्त’ है। वह शरीर को मंदिर नहीं, बल्कि रसायनों की प्रयोगशाला समझने लगा है। आयुर्वेद कहता है— “स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणं, आतुरस्य विकार प्रशमनं च”। लेकिन आज का उन्माद ‘निवारण’ (Prevention) पर नहीं, ‘दवाइयों’ (Supplements) पर टिका है ।

हर छोटी समस्या के लिए भारी एंटीबायोटिक्स लेना, बिना जरूरत के विटामिन की गोलियां निगलना और मशीनरी टेस्ट्स पर अंधविश्वास करना ‘चिकित्सकीय उन्माद’ है। हम ‘वैद्यों’ के बजाय ‘कंपनियों’ के भक्त हो गए हैं। यह उन्माद हमें अरोग्यवान नहीं, अपितु दवाइयों के अधीन कर रहा है।

यद्यपि इस विषय में चर्चा तो बहुत की जाती है ऐसा भी दिखाया जाता है कि बहुत प्रयास कर रहे हैं किन्तु सोचिये समस्या तो मूल में ही है, यदि डॉक्टर बनने के लिये लाखों व्यय करने पड़ते हैं अपितु करोड़ भी तो वो क्या करेगा ? मात्र डॉक्टर बनने से ही कुछ नहीं होता आगे उससे भी अधिक व्यय होता है तो वो क्या करेगा, जनसेवा ?

आरक्षण वाले विषय की तो चर्चा ही क्या करें, क्या आप उस डॉक्टर से दिखाना चाहते हैं जिसे आरक्षण का लाभ मिला हो। आरक्षण के कारण जो डॉक्टर बन गया क्या वो आपकी सही चिकित्सा कर सकता है ?

आहार संबंधी उन्माद

“जैसा अन्न, वैसा मन”—इस सनातन सत्य को भूलकर आज का समाज दो तरह के आहार उन्माद में फँसा है: एक ‘जिह्वा स्वाद’ का उन्माद और दूसरा ‘दिखावे का सात्विक’ उन्माद। गीता में कृष्ण कहते हैं— “युक्ताहारविहारस्य योगो भवति दुःखहा” (संतुलित आहार ही दुखों का नाश करता है)।

क्या आपने कभी सोचा है कि स्वदेशी के नाम पर जिसका प्रचार-प्रसार किया गया उसकी ढेरों वस्तुयें जिनमें खाद्य सामग्रियां भी होती हैं वो मानकों में खड़ा नहीं उतरती कई बार ऐसा हुआ है और होता ही रहता है। क्या आपने पैकेट की ब्रांडेड खाद्य पदार्थों का उपयोग करना बढ़ाया है या नहीं जैसे तेल, घी, मसाले, बिस्किट, मिठाइयां आदि। क्या आपको ऐसा लगता है कि जो पहले आपको परोस में मिल जाता था उससे अधिक अच्छी और स्वास्थ्यवर्द्धक होती है? थूक-जिहाद जैसे विषयों की तो चर्चा ही क्या करें।

विदेशी जंक फूड को स्टेटस सिंबल मानना एक उन्माद है, तो दूसरी तरफ ‘कीटो’, ‘वीगन’ जैसे विदेशी पैमानों को बिना सोचे-समझे अपनी प्रकृति के विरुद्ध अपनाना दूसरा उन्माद है। हम अपनी धरती, ऋतु और प्रकृति के अनुसार मिलने वाले भोजन को छोड़कर ‘पैकेज्ड’ और ‘मार्केटिंग’ वाले आहार के पीछे पागल हैं। आहार का यह उन्माद अंततः बुद्धि का नाश कर रहा है। मिलावट के बारे में भी अवश्य विचार करें, इसकी चर्चा करने की आवश्यकता नहीं है स्वाभाविक है कि पहले की तुलना में कई गुना बढ़ गया है और उन वस्तुओं में भी होने लगा है जिनमें पहले नहीं होता था।

आहार संबंधी उन्माद का मूल विषय उनका विषाक्तीकरण करना है जो निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। जब अन्न ही विषाक्त होता जा रहा है तो उसका परिणाम क्या होगा। दूध या दूध से बनी अन्य सामग्रियां जब दूध ही विषाक्त होता जा रहा है तो अन्य सामग्रियां भी स्वाभाविक है विषाक्त होंगी ही और उत्तेजक भी। आज बलात्कार जैसी घटनायें बढ़ती जा रही हैं उसमें एक बड़ा कारण अन्न का विषाक्त और उत्तेजक होना भी है सामान्य दृष्टिकोण से समझ नहीं आता है।

सब्जियों/फलों में इंजेक्शन लगाने की कई घटनायें आपने भी सुनी होगी जो उसे बड़ा कर देता है, फुला देता है। इसका प्रभाव किस पर पड़ेगा खाने वाले पर या किसी और पर। अरे सब्जी वाला सब्जी में लगा रहा है और अपने लिये सही सब्जी रख लेता है तो क्या हुआ उसके लिये फल वाला हैं न, दूध वाला है न, फल वाला अपने लिये यदि अच्छे फल की व्यवस्था कर ही ले तो क्या हुआ सब कुछ की व्यवस्था थोड़ी न कर लेगा !

ये विकास की गाथा नहीं विनाशगाथा है समझ में न आये तो दोष भी अपना ही है। कैंसर के मामले कई गुणा बढ़ गये हैं या नहीं बस विचार कर लें, यदि बढ़ गये हैं तो विकास की दिशा में आगे बढे हैं या विनाश की दिशा में ये स्वयं विचार करें।

विवेक का मार्ग

यदि आप इस विषय का समाधान सोचने तक पहुंच पाये हों तो वो सरल है शास्त्र की शरणागति करके अपना अंधापन दूर करना। जब तक आप शास्त्र की शरणागति नहीं करेंगे तब तक आपको ज्ञान प्राप्त ही नहीं हो सकता। शास्त्र के मर्म को समझने के लिये यह भी आवश्यक है कि विद्वान गुरु जो ब्राह्मण (जन्मजात भी) हों को मार्गदर्शक बनायें न कि सत्ता द्वारा प्रचारित किये गये कथावाचकों और मीडिया में दिखने वाले धर्मगुरुओं को। जब विवेकचक्षु खुलेंगे तो समाधान के मार्ग भी मिलेंगे।

विवेक का मार्ग
विवेक का मार्ग

निष्कर्ष: विवेक का जागरण ही एकमात्र मार्ग

इस संपूर्ण विश्लेषण का सार यह है कि ‘अंधभक्ति’ कोई राजनैतिक लेबल नहीं, बल्कि एक ‘मानसिक और आध्यात्मिक व्याधि’ है। जब मनुष्य अपनी विचारशक्ति को किसी सत्ता, विचार या तकनीक के चरणों में समर्पित कर देता है, तो वह समाज के लिए एक ‘जीवित यंत्र’ मात्र रह जाता है।

शास्त्रों ने हमें ‘नेति-नेति’ (यह भी नहीं, वह भी नहीं) का मार्ग सिखाया है, जो निरंतर प्रश्न पूछने और सत्य की खोज करने की प्रेरणा देता है। 21वीं सदी के इन विविध उन्मादों—चाहे वे डिजिटल हों, चिकित्सकीय हों या शैक्षणिक—से बचने का एकमात्र अस्त्र ‘विवेक’ है।

जैसा कि हमने चर्चा की:

“श्रुतिस्मृति तु विप्राणां चक्षुषी द्वे विनिर्मिते।” अर्थात, यदि हम शास्त्र और तर्क की इन दो आँखों को बंद कर लेंगे, तो हम वैचारिक रूप से अंधे हो जाएंगे। अंधभक्ति के इस घने कोहरे को केवल ‘वेदखड्ग’ (ज्ञान की तलवार) से ही काटा जा सकता है।”

“ब्राह्मण वह नहीं जो भीड़ के साथ बहे, ब्राह्मण वह है जो ‘वेदखड्ग’ (ज्ञान की तलवार) से भ्रांतियों के जाल को काट सके।”

FAQ

प्रश्न 1: शास्त्रों के अनुसार ‘अंधभक्त’ कौन है?

उत्तर: शास्त्रानुसार वह व्यक्ति जो अपनी तर्कशक्ति (विवेक) को त्यागकर केवल सुनी-सुनाई बातों या किसी व्यक्ति के पीछे बिना सोचे-समझे चलता है, वह ‘विवेकभ्रष्ट’ या अंधभक्त की श्रेणी में आता है।

प्रश्न 2: क्या भक्ति और अंधभक्ति एक ही हैं?

उत्तर: बिल्कुल नहीं। भक्ति का आधार ‘श्रद्धा और ज्ञान’ है, जबकि अंधभक्ति का आधार ‘भय और अज्ञान’ है। सच्ची भक्ति प्रश्न पूछने और सत्य को जानने से नहीं रोकती।

प्रश्न 3: डिजिटल उन्माद से कैसे बचें?

उत्तर: डिजिटल उन्माद से बचने के लिए ‘साक्षी भाव’ विकसित करना आवश्यक है। सूचनाओं के उपभोग से अधिक उनके विश्लेषण और स्वाध्याय पर ध्यान देना चाहिए।

प्रश्न 4: अंधभक्त का अर्थ क्या है और यह शब्द क्यों चर्चा में है?

उत्तर: ‘अंधभक्त’ का अर्थ है वह व्यक्ति जो बिना किसी तर्क, प्रमाण या विवेक के किसी व्यक्ति, विचारधारा या दल का आँख मूंदकर अनुसरण करता है। वर्तमान में यह शब्द राजनैतिक और सामाजिक विमर्श में ‘विवेकशून्यता’ और ‘अंध-अनुकरण’ को दर्शाने के लिए अत्यधिक चर्चा में है।

प्रश्न 5: क्या शास्त्रों में अंधभक्ति या विवेकहीनता के बारे में कुछ कहा गया है?

उत्तर: हाँ, शास्त्रों में इसे ‘अविद्या’ और ‘मोह’ कहा गया है। मनुस्मृति और विदुर नीति जैसे ग्रंथों में स्पष्ट है कि जो मनुष्य अपनी तर्कशक्ति (विवेक) का त्याग कर देता है, उसका पतन निश्चित है। श्लोक “विवेकभ्रष्टानां भवति विनिपातः शतमुखः” इसी सत्य को पुष्ट करता है।

प्रश्न 6: क्या पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी ‘अंधभक्त’ हो सकता है?

उत्तर: हाँ, इसे ‘शैक्षणिक उन्माद’ कहा जाता है। जब कोई व्यक्ति उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी अपने ‘पूर्वाग्रहों’ (Prejudices) को नहीं छोड़ पाता और तथ्यों के बजाय विचारधारा को प्रधानता देता है, तो वह बौद्धिक रूप से अंधभक्त ही कहलाता है।

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कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।


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