आसन का एक तात्पर्य तो विशेष प्रकार से बैठना भी होता है जिसे पद्मासन, वीरासन, भद्रासन आदि कहा जाता है। कर्मकांड में आसन का यह भाव भी ग्रहण किया जाता है कि किस प्रकार से बैठे, किन्तु मुख्य भाव जिस पर बैठते हैं उससे ग्रहण किया जाता है। बिना आसन के कर्मकांड में कुछ ही कर्म होते हैं जिसका उल्लेख उन कर्मों में अंकित रहता है जैसे बड़ी प्रतिमाओं की पूजा जो बैठकर नहीं की जा सकती। आसन कर्मकांड में विशेष महत्वपूर्ण विषय है और इसके बारे में विस्तृत जानकारी प्रत्येक कर्मकांडी को रखनी चाहिये। इस आलेख में आसन से संबंधित अनेकों महत्वपूर्ण जानकारी दी गयी है।
आसन सर्वस्व अर्थात सप्रमाण आसन संबंधी विस्तृत विमर्श – Asan Gyan
बिना आसन के कोई भी कर्म नहीं करना चाहिये अर्थात प्रत्येक कर्म में आसन अनवार्य होता है जो बैठकर कर्तव्य हो। बैठकर किये जाने वाले कर्मों का उल्लेख करने से तात्पर्य है जो कर्म खड़ा होकर भी किया जा सकता हो उसमें आसन की आवश्यकता नहीं होती। जैसे जब जल में प्रविष्ट होकर जप किया जाय तो खड़े-खड़े ही करे, और आसन की तो आवश्यकता हो ही नहीं सकती। परिक्रमा खड़ा होकर ही किया जायेगा अतः आसन की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।
आसन की वैज्ञानिक अवधारणा
सनातन के सभी विषयों के लिये वैज्ञानिक अवधारणा से सिद्धि की परम्परा का आरंभ हो गया है जो निर्मूल है। यदि वैज्ञानिक अवधारणा को प्रधानता देने लगें तो बहुत सारे विषय ऐसे होंगे जिसमें शास्त्र वचन और वैज्ञानिक अवधारणा परस्पर विरुद्ध होंगे तब क्या करोगे ? धार्मिक कृत्य में शास्त्रवचन का पालन करोगे अथवा वैज्ञानिक अवधारणा का ?
वैज्ञानिक अवधारणा गढ़ने वालों ने ही चलते-चलते, जूते पहने हुये खाना (भोजन नहीं) खाते हैं, और अब तो हाथ धोना भी बंद करने लगे हैं। ऐसी वैज्ञानिक अवधारणा की “ऐसी-की-तैसी” हो, धर्म/कर्मकांड में वैज्ञानिक अवधारणा को 0.0000001% भी प्रश्रय मत दो ये प्रपंच रचा जा रहा है।
ये वैज्ञानिक अवधारणा का प्रपंच करने वाले कहते हैं पृथ्वी तुम्हारी ऊर्जा सोख लेगी इसलिये आसन रखो। यदि मात्र इतना ही कारण है तब तो लकड़ी का पट्टा भी आसन हो सकता है और कुछ न हो तो जूता-चप्पल भी हो सकता है, प्लास्टिक का मचियां/बैठनी भी हो सकता है और प्लास्टिक की थैली भी।
- इस वैज्ञानिक अवधारणा से तो परिक्रमा करते समय भी आसन की आवश्यकता होती है और चलते समय आसन पर नहीं बैठ सकते तो क्या जूते-चप्पल पहनकर परिक्रमा करें ?
- क्या परिक्रमा करते समय धरती ऊर्जा का शोषण नहीं करेगी ?
- इसी प्रकार तीर्थयात्रा में भी शास्त्र जूता-चप्पल का निषेध करता है किन्तु वैज्ञानिक अवधारणा तो कहती है की धरती ऊर्जा को अवशोषित कर लेगी फिर क्या करोगे जूता-चप्पल पहनकर कांवड़-यात्रा करोगे या नंगे पांव करोगे ?
- जब नंगे पांव कांवड़-यात्रा करोगे क्या तब धरती ऊर्जा नहीं अवशोषित करेगी ?
जब भी धर्माचरण करो तो इस वैज्ञानिक अवधारणा के प्रपञ्च में कदापि न फंसो, और यदि वैज्ञानिक अवधारणा से ही करना हो तो धर्म-कर्म मत कहो। धर्म-कर्म के विषय में जो भी नियम-विधान, विहित-निषिद्ध होगा वो शास्त्र से होगा वैज्ञानिक अवधारणा के प्रपञ्च से नहीं।
वैज्ञानिक अवधारणा से हाथ भी जूठा नहीं होता बस टिशू पेपर से पोंछ लो, बोतल का पानी तो जूठा होता ही नहीं है। शास्त्र कहता है एक बार जिस पात्र से जल पी लिया वह जूठा हो गया और शेष जूठा जल दुबारा नहीं पीना चाहिये। और जो ऐसा ही शास्त्रवचन के उल्लंघन का कुकर्म सदा करते रहते हैं वही वैज्ञानिक अवधारणा का प्रपञ्च रचते हैं।
धर्मकृत्यों में आसन की आवश्यकता शास्त्रवचनों से है, वैज्ञानिक अवधारणा से नहीं और यदि आप इस सत्य को स्वीकार करते हैं तभी आगे के प्रमाणों की आपको आवश्यकता होगी अन्यथा नहीं। यदि शास्त्र वचन पर विश्वास नहीं हो तो नास्तिक हो और नास्तिकों के लिये धर्म-कर्म की क्या आवश्यकता ? विधि-विधान, मंत्रों की क्या आवश्यकता ?
किन-किन वस्तुओं का आसन प्रशस्त होता है
कौशेयं कम्बलं चैव अजिनं पट्टमेव च । दारुजं ताडपत्रं वा आसनं परिकल्पयेत् ॥
कृष्णाजिने ज्ञानसिद्धिर्मोक्षः श्रीर्व्याघ्रचर्मणि । कुशासने व्याधिनाशः सर्वेष्टं चित्रकम्बलम् ॥
वंशासने तु दारिद्र्यं पाषाणे व्याधिरेव च । धरण्यां तु भवेद्दुःखं दौर्भाग्यं छिद्रदारुजे ॥
तृणे धनयशोहानिः पल्लवे चित्तविभ्रमः ॥
व्यास के वचनानुसार कुशा, कम्बल, अजिन, पट्ट (वस्त्र), दारु (लकड़ी), तालपत्र (ताड़ के पत्ते इनका आसन बनाया जा सकता है। कृष्णाजिन के आसन से ज्ञान और सिद्धि, व्याघ्रचर्म के आसन से मोक्ष और श्री, कुशासन से व्यधिनाश, चित्रित (रंग-बिरंगे) कम्बल से सभी प्रकार का इष्ट की पूर्ति होती है।
इसी प्रकार वंशासन से दारिद्र्य, पाषाणासन से व्याधि, धरणी पर (आसन रहित अथवा मिट्टी से निर्मित, ईंट आदि का) दुःख, छिद्रयुक्त आसन अथवा लकड़ी के आसन से दुर्भाग्य, तृण (घास-फूंस) के आसन से धन-यशी की हानि और पल्लव के आसन से चित्त में भ्रम की प्राप्ति होती है।
जपज्ञानतपो हानिं कुर्वन् वस्त्रासनं तथा॥ – एक वचन से वस्त्र आसन का भी निषेध प्राप्त होता है और इसका तात्पर्य सूती वस्त्र ग्रहण किया जाता है, रेशमी-ऊनी आदि का निषेध नहीं है।

मृगचर्म प्रयत्नेन वर्जयेत्पुत्रवान् गृही॥ – इसी प्रकार अन्य स्मृति में गृहस्थों के लिये मृगचर्म का आसन निषिद्ध कहा गया है। किन्तु ब्रह्मचारी के लिये प्रशस्त है।
गृहस्थों के लिये कुश, कम्बल, ऊर्ण, रेशमी वस्त्र आदि के आसन प्रशस्त हैं। एक विशेष आसन व्याघ्रचर्म का भी गृहस्थों के लिये प्रशस्त है किन्तु पुत्रवान गृहस्थों के लिये उसका भी निषेध है। उसी प्रकार ब्रह्मचारी के लिये एणेय (मृगचर्म) प्रशस्त है, किन्तु गृहस्थों के लिये निषिद्ध है। कालिका पुराण में आसन विषयक विस्तृत विवरण प्राप्त होता है जो आगे दिया गया है :
अत्रैव साधकानाञ्च आसनं शृणु भैरव । यत्रासीनः पूजकस्तु सर्वसिद्धिमवाप्नुयात् ॥
ऐणञ्च चार्मणं वास्त्रं तैजसञ्च चतुष्टयम् । आसनं साधकानाञ्च सततं परिकीर्त्तितम् ॥
पूर्वोक्तं यच्च देवेभ्य आसनं परिकीर्त्तितम् । तत्सर्वमासनं शस्तं पूजाकर्मणि साधके ॥
न यथेष्टासनो भूयात् पूजाकर्मणि साधकः। काष्ठादिकासनं कुर्यात् मितमेव सदा बुधः ॥
चतुर्व्विंशत्यङ्गुलेन दीर्घं काष्ठासनं मतम् । षोडशाङ्गुलविस्तीर्णमुत्सेधचतुरङ्गुलम् ॥
षडङ्गुलं वा कुर्यात्तु नोच्छ्रितं चात्र कारयेत् । पूर्वोक्तं वर्ज्जयेद्वर्ज्ज्यमासनं पूजनेष्वपि ॥
वास्त्रं द्विहस्तान्नो दीर्घं सार्द्धहस्तान्न विस्तृतम् । न त्र्यङ्गुलात्तथोच्छ्रायं पूजाकर्म्मणि संश्रयेत् ॥
यथेष्टं चार्मणं कुर्यात् पूर्वोक्तं सिद्धिदायकम् ॥
षडङ्गुलाधिकं कुर्यान्नोच्छ्रितन्तु कदाचन । काम्बलं चार्मणं चैलं महामायाप्रपूजने ॥
प्रशस्तमासनं प्रोक्तं कामाख्यायास्तथैव च । त्रिपुरायाश्च सततं विष्णोश्चापि कुशासनम् ॥
बहुदीर्घं बहूच्छ्रायं तथैव बहुविस्तृतम्। दारुभूमिसमं प्रोक्तमश्मापि सर्वकर्मणि ॥
पृथक् पृथक् कल्पयेच्च शोभनं तादृशासनम् । न पत्रमासनं कुर्य्यात् कदाचिदपि पूजने ॥
न प्राण्यङ्गससुद्भूतमस्थिजं द्विरदादृते। मातङ्गदन्तसञ्जातमासनं कामिके चरेत् ॥
चर्मपूर्वोदितं ग्राह्यं तथा गन्धमृगस्य च ॥ सलिले यदि कुर्वीत देवतानां प्रपूजनम् ॥
तत्राप्यासनमासीनो नोत्थितस्तु समाचरेत् । तोये शिलामयं कुर्यादासनं कौशमेव वा ॥
दारवं तैजसं वापि नान्यदासनमाचरेत्। आसनारोपसंस्थानं स्थानाभावे तु पूजकः ॥
आसनं कल्पयित्वा तु मनसा पूजयेज्जले ॥ यद्यासनस्य संस्थानं तोयमध्ये न विद्यते ॥
अन्यत्र वा तदा स्थित्वा देवपूजां समाचरेत्। इत्येतत् कथितं पुत्र पूज्यपूजकसङ्गतम् ॥
आसनं पाद्यमधुना शृणु वेतालभैरव॥
॥ कालिकापुराण अध्याय ॥६७॥
अभिचारे नीलवर्णं रक्तं वश्यादिकर्मणि। शान्तिके कम्बलः प्रोक्तः सर्वेष्टं चित्रकम्बले॥ – कर्म के आधार पर भी आसनों का वर्गीकरण किया गया है अभिचार कर्म में नील वर्ण का, वश्यादि कर्मों में रक्त वर्ण का, शांति कर्म में कम्बल और सभी इष्टों के लिये चित्र (रंगीन) कम्बल का प्रयोग करे।
आसन के कुछ विशेष नियम
आसनं वसनं शय्या जायापत्यं कमण्डलुः । आत्मनः शुचिरेतानि न परेषां कदाचन ॥ आपस्तम्बस्मृतौ, आग्नेये
आपस्तम्बस्मृति व आग्निपुराण में कहा गया है कि आसन, वस्त्र, शय्या, पत्नी, सेवक और कमण्डलु ये सभी स्वयं के लिये शुद्ध होते हैं और इनका बारम्बार प्रयोग करने पर भी ये अशुद्ध नहीं होते। साथ ही इसमें “न परेषां कदाचन” से यह भी सिद्धि होती है कि अन्य व्यक्तियों द्वारा प्रयोग करने पर अशुद्ध भी हो जाते हैं। इसलिये इन वस्तुओं का अन्यों को प्रयोग न करने दे। इसमें आसन भी एक है अतः आसन का प्रयोग भी स्वयं ही करे और पूजा-जप-पाठ-हवन आदि जो भी कर्म हों उस कर्म के उपरांत आसन को अच्छे से मोड़कर रखे, इस प्रकार रखे कि अन्य व्यक्ति भूलवश भी उसका प्रयोग न करे, अर्थात सुरक्षित रखे।
आपस्तम्बस्मृति व आग्निपुराण में कहा गया है कि आसन, वस्त्र, शय्या, पत्नी, सेवक और कमण्डलु ये सभी स्वयं के लिये शुद्ध होते हैं और इनका बारम्बार प्रयोग करने पर भी ये अशुद्ध नहीं होते। साथ ही इसमें “न परेषां कदाचन” से यह भी सिद्धि होती है कि अन्य व्यक्तियों द्वारा प्रयोग करने पर अशुद्ध भी हो जाते हैं। इसलिये इन वस्तुओं का अन्यों को प्रयोग न करने दे। इसमें आसन भी एक है अतः आसन का प्रयोग भी स्वयं ही करे और पूजा-जप-पाठ-हवन आदि जो भी कर्म हों उस कर्म के उपरांत आसन को अच्छे से मोड़कर रखे, इस प्रकार रखे कि अन्य व्यक्ति भूलवश भी उसका प्रयोग न करे, अर्थात सुरक्षित रखे।
इसी प्रकार आसन से संबंधित कुछ और भी विशेष महत्वपूर्ण नियम हैं जो इस प्रकार हैं :
- आसन का लंघन न करे अर्थात आसन को कभी लांघे नहीं।
- आसन का पैर से स्पर्श न करे, न ही पैर से खिंसकाये।
- अकारण आसन पर खड़ा न होवे। सकारण यथा सूर्यार्घ्य देते समय, प्रदक्षिणा करते समय, पूर्णाहुति आदि के समय आसन पर खड़ा हुआ जा सकता है।
कुशासन में सावधानी
यदि आप कुशासन का प्रयोग करते हैं तो इसमें एक विशेष सावधानी की भी आवश्यकता होती है। “तृणे धनयशोहानिः” कुशासन तो प्रशस्त है किन्तु तृणासन निषिद्ध है। यदि बाजार से कुशासन क्रय करते हैं तो उसमें कुश का ही प्रयोग किया गया है और तृण का प्रयोग नहीं किया गया है इसकी विशेष रूप से पुष्टि करें। अन्यथा कुशासन के नाम पर तृणासन भी मिल जाता है।
वस्त्रासन से बचें

सूती वस्त्र के आसन का तो प्रयोग न ही करें किन्तु रेशमी वस्त्रों के आसन का प्रयोग किया जा सकता है। तथापि एक समस्या होती है कि रेशमी वस्त्र के भी आसन होने पर वो शीघ्र ही गंदे हो जाते हैं। कम्बल का आसन होने पर वो शीघ्र दूषित नहीं होते और शीघ्र ही क्षालन की आवश्यकता नहीं होती है। क्षालन किया जा सकता है किन्तु आवश्यक होने पर ही करना चाहिये। अनावश्यक रूप से वस्त्रों की भांति आसन का नित्य क्षालन नहीं किया जाता है।
आसनं प्रोक्ष्य संपूज्य जपं तत्र समाचरेत् ॥ – पूजा-जपादि के आरंभ में आसन का प्रोक्षण करके पूजा करे। और समापन होने पर आसन के नीचे जल गिराकर मस्तक में लगाये अथवा आसन के नीचे की मिट्टी लगाये।
“आसन शुद्धि मंत्र 4 प्रयोग – asan shuddhi mantra“
विनम्र आग्रह : त्रुटियों को कदापि नहीं नकारा जा सकता है अतः किसी भी प्रकार की त्रुटि यदि दृष्टिगत हो तो कृपया सूचित करने की कृपा करें : info@karmkandvidhi.in
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।
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