इन पांच सूत्रों से कर्मकांड सीखें – 5 sutro se karmkand sikhe

इन पांच सूत्रों से कर्मकांड सीखें - 5 sutro se karmkand sikhe

कर्मकांड सीखने की इच्छा तो बहुत लोगों के मन में होती है सुयोग्य अथवा कुशल कर्मकांडी बनने की इच्छा राजनीतिक और सामाजिक कारणों से उत्पन्न नहीं हो पाती। आवश्यकता यह है कि कर्मकांड सीखने की इच्छा के साथ-साथ सुयोग्य न हो तो न सही किन्तु कुशल कर्मकांडी बनने की इच्छा रखनी चाहिये। यह सामान्य नियम है कि आप जो कुछ भी करें उसमें दक्षता प्राप्त करें अर्थात कुशल बनें फिर कर्मकांड में ये क्यों आवश्यक नहीं होगा। इस आलेख में पांच सूत्र बताये गये हैं जिनका पालन करके कुशल कर्मकांडी बना जा सकता है।

सुयोग्य कर्मकांडी होने के लिये गुरुकुल में अध्ययन अनिवार्य होता है, किन्तु इसका दूसरा अर्थ नहीं लेना चाहिये कि गुरुकुल में अध्ययन करने वाले सभी सुयोग्य कर्मकांडी ही होते हैं, क्योंकि गुरुकुल में तो अन्य वर्णों के छात्र भी अध्ययन करते हैं, और कर्मकांडी तो ब्राह्मण मात्र ही बन सकते हैं।

हम देखते हैं कि सर्वत्र ढेरों कर्मकांडी पूजा-पाठ आदि करते रहते हैं उनमें कठिनता से 2-3 प्रतिशत ही सुयोग्य कर्मकांडी होते हैं और उतने ही कुशल कर्मकांडी। इसका तात्पर्य यह होता है कि शेष कुशलता के लिये प्रयास नहीं करते हैं कारण चाहे जो भी हों।

कर्मकांड सीखें : Karmkand Sikhen part 2

कुशल कर्मकांडी से तात्पर्य है कि भले गुरुकुल में अध्ययन न किया हो किन्तु अन्य माध्यमों (अध्ययन-प्रशिक्षण आदि) से दक्षता प्राप्त कर चुके हों। वर्त्तमान युग में कुशलता का अभाव बड़े स्तर पर देखा जा रहा है। ऐसे-ऐसे विडियो भी देखने को मिले हैं जिसमें फिल्मी गाने गाकर फेरे लगाते देखे गये हैं। आप सोशल मीडिया पर देखिये सबके-सब फोटो, लाइव-विडियो आदि तो साझा करते रहते हैं और उसमें उनकी अकुशलता-अयोग्यता भी स्पष्ट हो जाती है।

तथापि 20-25 प्रतिशत ऐसे भी हैं जो कुशलता प्राप्त करना चाहते हैं लेकिन कैसे कुशल कर्मकांडी बने यह नहीं जानते हैं और ये आलेख उन लोगों के लिये बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां कुशल कर्मकांडी बनने के लिये पांच सूत्र बताया जा रहा है जिसका पालन करके कुशलता प्राप्त की जा सकती है। यहां दिये गये विडियो में भी कुशल कर्मकांडी बनने से संबंधित चर्चा की गयी है जो महत्वपूर्ण है।

यदि आप कर्मकांड सीखना चाहते हैं तो आपको इन पांचों सूत्रों का विशेष रूप से पालन करना चाहिये।

सुयोग्य और कुशल कर्मकांडी

यहां कर्मकांड सीखने के जो पांच सूत्र दिये जा रहे हैं वह कुशल कर्मकांडी बनने वालों के लिये है, सुयोग्य कर्मकांडी बनने के लिये गुरुकुल में अध्ययन करने की आवश्यकता है। कुशल कर्मकांडी का तात्पर्य उनके लिये है जो गुरुकुल में अध्ययन नहीं कर पाये हों और आगे भी किसी कारण से नहीं कर सकते हैं किन्तु कर्मकांड सीखना चाहते हैं अर्थात कुशल कर्मकांडी बनना चाहते हैं। इस प्रकार हमें प्रथम इन वर्गों को समझना होगा कर यह आलेख किसके लिये उपयोगी है यह भी समझना होगा।

गुरुकुल में अध्ययन करने वालों के लिये यह आलेख महत्वपूर्ण नहीं है। किन्तु उनकी संख्या नगण्य है, सर्वाधिक संख्या उन कर्मकांडियों की है जिन्होंने गुरुकुल तो क्या महाविद्यालय-विश्वविद्यालय आदि में भी अध्ययन नहीं किया है अथवा किया है। मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय आदि में भी अध्ययन करने से यदि गुरुकुल में अध्ययन न किया हो तो सुयोग्य कर्मकांडी नहीं बना जा सकता मात्र कुशल कर्मकांडी ही बना जा सकता है।

ऐसे लोगों को दो वर्गों में बांटा जा सकता है प्रथम वह जो गुरुकुल में अध्ययन तो नहीं कर पाये हों किन्तु तत्काल अर्थात कुछ महीने अथवा कुछ एक-दो वर्षों से कर्मकांड वृत्ति को ग्रहण करके जीवनयापन प्रारम्भ कर चुके हैं, अथवा करना चाहते हैं। इनकी विशेषता यह है कि ये कर्मकांड सीखना चाहते हैं और यह आलेख विशेष रूप से उनके लिये ही उपयोगी है।

द्वितीय वह जो कई वर्षों से कर्मकांड वृत्ति का आश्रय ग्रहण करके जीवनयापन कर रहे हैं। इस वर्ग को पुनः दो वर्गों में बांटा जा सकता है :

  1. प्रथम वह हो कितनी भी आयु हो गयी हो किन्तु कर्मकांड सीखने के लिये प्रयत्नशील हैं, सीखना चाहते हैं और उनके लिये भी यह आलेख महत्वपूर्ण है तथापि प्रथम (प्रशिक्षण) कर चतुर्थ (स्मरण) सूत्र का पालन वो नहीं कर सकते किन्तु अन्य तीन सूत्रों का पालन करना चाहें तो कर सकते हैं और ज्ञानवृद्धि कर सकते हैं।
  2. द्वितीय वह जो मात्र धनार्जन करना चाहते हैं उनके लिये शास्त्र-भगवान-धर्म आदि कुछ नहीं है और जो कुछ भी शास्त्रों में है वह ब्राह्मणों के जीवनयापन हेतु है अर्थात ब्राह्मण ठग है। ये वर्ग नारकीय प्राणी हैं जो ठगी करते हैं और ठगी के लिये भी धर्म (कर्मकांड) का आश्रय लेते हैं। इस वर्ग के लिये कुशल कर्मकांडी बनना स्वप्न में भी संभव नहीं है वो ठग हैं और उन्हें ठग ही मानना चाहिये।

कर्मकांड सीखने के पांच सूत्र

पंचसूत्र : कर्मकांड सीखने के पांच सूत्र हैं : 1. प्रशिक्षण, 2. नित्यकर्म, 3. अध्ययन, 4. स्मरण और 5. श्रद्धा-विश्वास

प्रशिक्षण

किसी भी कार्य में प्रशिक्षण विशेष महत्वपूर्ण होता है और यदि प्रशिक्षण न मिले तो वर्षों तक त्रुटियां करके अनुभव से कुछ सीखा जाता है किन्तु फिर भी दक्षता अर्थात कर्मकौशल प्राप्त नहीं कर पाता। अध्ययन कितना भी कर ले किसी भी कार्य को करने से पूर्व उस कार्य के लिये प्रशिक्षण अनिवार्य होता है। आप चिकित्सा की पुस्तकों से अध्ययन तो कर सकते हैं किन्तु प्रशिक्षण के बिना चिकित्सा करना घातक होगा। उसी प्रकार कर्मकांडी के लिये भी प्रशिक्षण सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।

प्रशिक्षण के बिना कुशल कर्मकांडी नहीं बना जा सकता। यदि आप कुशल कर्मकांडी बनना चाहते हैं तो आपको न्यूनतम तीन वर्षों के प्रशिक्षण की आवश्यकता होगी। कर्मकांड में जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त अनेकों कर्म हैं, और इसमें मात्र षोडश संस्कार ही नहीं ढेरों व्रत-पूजा-जप-अनुष्ठान-यज्ञादि हैं और सभी को सीखने के लिये न्यूनतम तीन वर्षों का प्रशिक्षण आवश्यक है।

इसके साथ ही अन्य सूत्रों का पालन करने के लिये भी यह तीन वर्ष विशेष महत्वपूर्ण होगा। प्रशिक्षण काल में भी कुछ-न-कुछ आय होती रहती है किन्तु आय के प्रति तनिक भी आसक्त नहीं होना चाहिये अन्यथा प्रशिक्षण भंग हो सकता है।

प्रशिक्षण हेतु यह भी आवश्यक है कि जिससे प्रशिक्षण प्राप्त करना हो वो सुयोग्य कर्मकांडी हों अथवा कुशल कर्मकांडी हों और ठग न हो। ठग से ठगी सीखी जा सकती है कर्मकांड नहीं और जो कर्मकांड को धनार्जन का साधन मात्र कहता है, सब ब्राह्मणों की आय के लिये शास्त्रों में लिखा गया है ऐसा बोलता है वह ठग ही होता है कर्मकांडी नहीं। प्रशिक्षक (गुरु) बनाने से पहले यह परख करना आवश्यक होता है कि वो सुयोग्य अथवा कुशल हैं भी या नहीं। इसके लिये कुछ लक्षण यहां दिये जा रहे हैं :

  • संस्कार-यज्ञादि में वृद्धिश्राद्ध अनिवार्य होता है और जो कर्मकांडी नान्दी श्राद्ध/वृद्धि श्राद्ध का त्याग न करते हों उन्हें सुयोग्य/कुशल कर्मकांडी समझना चाहिये।
  • इसी प्रकार से हवन विधि भी है और जो हवन विधि का पालन करते हुये हवन करते हों उन्हें सुयोग्य/कुशल समझना चाहिये।
  • इसी प्रकार श्राद्ध में नित्यकर्म से भी समझा जा सकता है, पाकक्रिया नित्यकर्म के पश्चात् करनी चाहिये किन्तु यह निर्देश सुयोग्य/कुशल कर्मकांडी ही कर सकते हैं।

अब जो कर्मकांडी बहुत प्रसिद्ध भी हो, कई विषयों से आचार्य का प्रमाणपत्र भी धारण करते हों, किन्तु वृद्धिश्राद्ध का त्याग करते हों, विधि रहित हवन कराते हों, श्राद्ध में पाककर्म करके नित्यकर्म कराते हों उन्हें सुयोग्य/कुशल नहीं समझना चाहिये। अर्थात ऐसे कर्मकांडियों से प्रशिक्षण नहीं लेना चाहिये।

नित्यकर्म

एक कुशल कर्मकांडी के लिये नित्यकर्म अनिवार्य होता है और इसे द्वितीय क्रम में इस कारण से रखा गया है क्योंकि कुशल प्रशिक्षक ही नित्यकर्म का भी प्रशिक्षण दे सकते हैं। नित्यकर्म किये बिना भोजन का भी अधिकार प्राप्त नहीं होता फिर जो नित्यकर्म न करे वह कुशल कर्मकांडी कैसे बन सकता है।

नित्यकर्म विधि के लिये विस्तृत चर्चा तो पृथक आलेख में ही संभव है और कर्मकांड सीखें वेबसाइट पर नित्यकर्म विधि का विश्लेषण किया जायेगा। किन्तु नित्यकर्म विधि का जो अन्य अर्थ है वो है नित्यकर्म करने की विधि उसकी चर्चा संपूर्ण कर्मकांड विधि पर की जा चुकी है जिसका लिंक भी यहां दिया जा रहा है।

नित्यकर्म की विधि
नित्यकर्म की विधि

कर्मकांड में प्रथम स्थान ही नित्यकर्म का आता है। नित्यकर्म का तात्पर्य भी कुछ लोग प्रातः संध्या मात्र समझते हैं और यह भी अर्धसत्य ही है। नित्यकर्म में प्रातः संध्यामात्र नहीं है। नित्यकर्म से रहित होने पर कुशल कर्मकांडी बनने के लिये सोचना भी नहीं चाहिये।

अध्ययन

तीसरे क्रम पर अध्ययन आता है और अध्ययन आजीवन करना ही होता है, तथापि प्रशिक्षण के तीन वर्षों में विशेष रूप से अध्ययन करना चाहिये। अध्ययन हेतु प्रामाणिक पुस्तकों का संग्रह होना भी आवश्यक होता है। ग्रंथों के चयन में भी त्रुटि हो सकती है क्योंकि ग्रन्थ हेतु हिन्दी अथवा अन्य स्थानीय भाषा को वरीयता देने की चूक हो सकती है।

अध्ययन के लिये जिन प्रामाणिक ग्रंथों का संग्रहण करना चाहिये उनमें वेद, पुराण, स्मृति, सूत्र आदि ग्रन्थ होने चाहिये न की भ्रामक पुस्तकें। इन ग्रंथों की मूल भाषा संस्कृत है और उस संस्कृत से निकटता किये बिना कुशल कर्मकांडी बनना संभव नहीं है। कुशल कर्मकांडी बनाने के लिये इन प्रामाणिक ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिये।

कर्मकांड में प्रथम स्थान ही नित्यकर्म का आता है। नित्यकर्म का तात्पर्य भी कुछ लोग प्रातः संध्या मात्र समझते हैं और यह भी अर्धसत्य ही है। नित्यकर्म में प्रातः संध्यामात्र नहीं है। नित्यकर्म से रहित होने पर कुशल कर्मकांडी बनने के लिये सोचना भी नहीं चाहिये।

वर्त्तमान युग को डिजिटल युग कहना अतिशयोक्ति नहीं है और अध्ययन हेतु भी डिजिटल संसाधनों का प्रयोग किया जा सकता है किन्तु यहां कर्मकांड सीखने वालों के लिये भ्रामक तथ्यों की ही अधिकता है। कर्मकांड सीखने के लिये यदि आप वेबसाइट, सोशलमीडिया आदि से सामग्रियां लेना चाहते हैं तो प्रामाणिकता की जांच प्रथम कर लें, क्योंकि कठिनता से ही 5% वेबसाइट, चैनल आदि मिलेंगे जो प्रामाणिक सामग्री प्रस्तुत करते हैं, अन्यथा अंतर्जाल में भ्रामक सामग्रियां ही भरी-पड़ी है व उसी को प्रचारित-प्रसारित किया जाता है।

अब तो AI के माध्यम से आलेख-विडियो आदि की सामग्रियां ली जाने लगी है जो सनातन-धर्म-कर्मकांड के विषय में 0.0001% भी प्रामाणिक नहीं होते हैं। अतः यदि आप डिजिटल माध्यमों से अध्ययन सामग्री प्राप्त करना चाहते हैं तो आपको प्रामाणिक वेबसाइट-चैनल आदि को भी ढूंढना होगा।

वर्त्तमान युग में यत्र-तत्र यह पूछने वाले मिलते हैं कि “कहां लिखा है” इसका उत्तर देने के लिये अध्ययन आवश्यक है जिससे जहां लिखा है वह बताया और दिखाया जा सके। जैसे जब तक एक कुशल कर्मकांडी पर्याप्त अध्ययन नहीं करेगा तब-तक यह नहीं कह सकता कि कर्मकांडी ब्राह्मण के लिये जन्मजात ब्राह्मण होना भी अनिवार्य है क्योंकि प्रमाण की आवश्यकता तो होगी, लोग पूछेंगे “कहां लिखा है” इसी प्रकार जब अनुपनीतों को हवन से मना करेंगे तो पूछेंगे और न जाने कहां-कहां, कब-कब पूछेंगे। इसलिये अध्ययन में विशेष समय देना अनिवार्य होगा।

स्मरण

मंत्र को धारण करने वाले सुयोग्य कर्मकांडी होते हैं, किन्तु कुशल कर्मकांडी हेतु भी मंत्र को कंठाग्र करना आवश्यक होता है। कर्मकांड में मंत्र-प्रयोग ही किया जाता है और मंत्र से ही देवता आते-जाते हैं, पूजा ग्रहण करते हैं। कंठाग्र करने हेतु निरंतर स्मरण करना होता है जिसमें तीन वर्ष का प्रशिक्षण काल जो है यदि प्रतिदिन एक मंत्र मात्र स्मरण किया जाय 1100 मंत्र स्मरण हो जायेंगे। और यह भी एक कारण है जिसके लिये प्रशिक्षण काल तीन वर्ष होना आवश्यक है।

जिन कर्मों की बारम्बारता होनी हो उन कर्मों के मंत्र तो निश्चित रूप से स्मरण करते रहना चाहिये। सभी मंत्र एक दिन में स्मरण नहीं हो सकते किन्तु जैसे रुद्राष्टाध्यायी, गीता आदि स्मरण हो जाते हैं उसी प्रकार यदि परिश्रम किया जाये तो आवश्यक सभी मंत्र भी कंठाग्र हो सकते हैं। कोई भी कार्य ऐसा नहीं है जिसमें बहुत कुछ स्मरण रखने की आवश्यकता न होती हो।

क्या एक चिकित्सक चिकित्सा करते समय पुस्तक से औषधि का नाम ढूढ़ सकता है। उसी प्रकार कर्मकांड में सहायता हेतु पुस्तक रहने चाहिये किन्तु मंत्रों को कंठाग्र करना अनिवार्य समझना होगा।

श्रद्धा-विश्वास

श्रद्धा-विश्वास होना तो अनिवार्य शर्त है। एक कर्मकांडी आध्यात्मिक विषय से जुड़े कर्म करता-कराता है जिसमें देवता-पितरों की पूजा आदि की जाती है, एवं इसका आधार शास्त्र है। जिसे देवता-पितर-शास्त्रों पर विश्वास न हो, वो कुशल कर्मकांडी क्या कर्मकांडी भी नहीं बन सकता है और निंदनीय-नारकीय प्राणी होता है। कुशल कर्मकांडी बनने के लिये आपको अध्यात्म-शास्त्र आदि में विश्वास रखना अनिवार्य है।

निष्कर्ष : कर्मकांड सनातन का वह विषय है जिसमें विशेष योग्यता-कुशलता की आवश्यकता होती है और किसी भी विषय कुशलता हेतु उस विषय का ज्ञान होना आवश्यक होता है। योग्यता-कुशलता का तात्पर्य यह भी नहीं होता कि पुस्तकों को पढ़ लेने मात्र प्राप्त हो जाती है यदि ऐसा हो तो सबके घर में पुस्तकालय हो, विद्यालय/महाविद्यालय/विश्वविद्यालय मात्र परीक्षा लेने के लिये ही हो। कर्मकांड सीखने के लिये प्रशिक्षण, नित्यकर्म, अध्ययन, स्मरण, विश्वास आदि मुख्य सूत्र हैं और इन पंचसूत्रों के द्वारा कुशल कर्मकांडी बना जा सकता है।

विनम्र आग्रह : त्रुटियों को कदापि नहीं नकारा जा सकता है अतः किसी भी प्रकार की त्रुटि यदि दृष्टिगत हो तो कृपया सूचित करने की कृपा करें : info@karmkandvidhi.in

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।


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