बुरा न मानो होली है ~ Bura na mano holi hai

बुरा न मानो होली है ~ Bura na mano holi hai

होली भारत के एक प्रमुख पर्व है और हर्षोल्लास पूर्वक देशभर में यह मनाया जाता है। किन्तु भारत में भी एक विशेष वर्ग है जो विदेशी चश्मा पहनकर निर्लज्जता पूर्वक भारतीय संस्कृति, पर्व-त्योहारों पर भी आक्षेप-प्रक्षेप करता रहता है। इस वर्ग को होली सांप्रदायिक लगता है जबकि होली भारत का पर्व है, जो भारत का पर्व नहीं है यथा ईद, क्रिशमश आदि वो कभी भी सांप्रदायिक नहीं लगता और उसपर कभी कोई टीका-टिपण्णी नहीं करता। होली के ऊपर नाना प्रकार के आक्षेप-प्रक्षेप किया जाता है यथा : अश्लीलता, हुड़दंग, जल की बर्बादी आदि। हमें इन मूर्खों को उनकी भाषा में उत्तर देना अपेक्षित है।

हम शास्त्रोक्त चर्चा भी करेंगे कि होली में क्या-क्या करना चाहिये किन्तु प्रथम इन अभारतीयों (मानसिक) से कुछ प्रश्न करना अपेक्षित समझता हूँ :

  1. मान लो तुम्हें किसी और की माँ अच्छी लगती है तो क्या तुम अपनी मां को गाली दोगे ?
  2. मान लो तुम्हें किसी और का बाप अच्छा लगता है, तो क्या तुम अपने बाप को घर से बाहर करके उसे अपनी मां के साथ रखोगे ?
  3. मान लो तुम्हें किसी और का जीजा पसंद है तो क्या अपने जीजा से बहन को छीन कर उसे देकर उसे ही जीजा बना लोगे?
  4. मान लो तुम्हें मुंह से खाना पसंद नहीं है तो क्या कहीं और से खाना खाओगे ?

भाई बुरा न मानो होली है

ये कटु प्रश्न इसलिये किये गये हैं क्योंकि होली का अवसर है और होली के अवसर पर इसी प्रकार से वार्तालाप समीचीन है। पसंद और न पसंद का तात्पर्य यह नहीं होता कि सर्वत्र प्रयोग होगा। बहुत ऐसे प्रकरण होते हैं जिसमें पसंद हो अथवा न हो आप उसका परित्याग नहीं कर सकते अर्थात पसंद होने न होने से कोई संबंध ही नहीं होता और उसी में संस्कृति है, पर्व-त्यौहार हैं।

तुम भारतीय हो तो तुम्हें होली आदि पर्व-त्यौहार पसंद हो अथवा न हों तुम इससे जुड़े हो और इसका त्याग नहीं कर सकते हो। जैसे उपरोक्त प्रश्नों का उत्तर नहीं होगा उसी प्रकार होली तुम्हें पसंद है अथवा नहीं है यदि भारतीय हो तो होली खेलना होगा, होली की निंदा नहीं कर सकते हो, होली पर आक्षेप-प्रक्षेप नहीं कर सकते हो और यदि करते हो तो इसका तात्पर्य यही होगा कि उपरोक्त प्रश्नों के लिये तुम्हारा उत्तर हां है।

हम तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर भी देंगे किन्तु पहले तुम होली तो खेलो, अपने मस्तिष्क को जो की किसी विदेशी संस्कृति से प्रभावित है उसे मुक्त तो करो, अपनी मां अर्थात भारतीय संस्कृति को अपनी संस्कृति तो स्वीकार करो।

तुम्हारी संस्कृति तुम्हें पसंद नहीं है यही तो सबसे बड़ा कुकर्म है, और यदि तुम यह कुकर्म कर रहे हो तो तुम कुकर्मी ही कहलाओगे भले ही कोई भी डिग्री क्यों न रखते हो मूर्ख ही कहलाओगे। क्योंकि संस्कृति में पसंद कर नापसंद का विकल्प ही नहीं है जैसे मां के लिये, बाप के लिये, जीजा के लिये विकल्प नहीं है।

इस विडियो में तुम्हारे कई प्रश्नों का उत्तर दिया गया है।

भाई बुरा न मानो होली है और ये होली की भाषा है

अब तक इतना तो स्पष्ट हो गया है कि किसी भी पर्व-त्यौहार के लिये तुम अपनी पसंद और नापसंद का राग नहीं अलाप सकते हो। जहां जन्म लिया वहीं के पर्व-त्योहार-तुम्हारे हैं क्योंकि ये तुम्हारे जन्म से ही सिद्ध होता है, जैसे माँ-बाप जन्म से ही सिद्ध होते हैं।

जैसे तुम्हारे पास कोई विकल्प नहीं होता कि तुम्हारे माँ-बाप कौन होंगे उसी प्रकार तुम्हारे पास ये विकल्प भी नहीं होता कि तुम्हारा देश क्या होगा, गांव क्या होगा, संस्कृति क्या होगी, पर्व-त्यौहार क्या होंगे ? ये जन्म से ही स्वतः निर्धारित होते हैं।

तनिक सोचो; तुम स्वयं को पढ़ा-लिखा कहते हो, बुद्धिजीवी घोषित करते हो और इतनी सी भी अक्ल नहीं रखते हो, अक्ल कहाँ घास चरने गयी है ? अरे अक्ल को ढूंढो अक्ल के अंधे कहीं के।

  • करमजले, नासपीटे अपनी संस्कृति को सांप्रदायिक कहते हो !
  • अरे अभागे यदि तुम भारतीय हो तो होली तुम्हारा पर्व है और होली पर आक्षेप करते हो !

यहां जान लो होली २०२५ कब है और अबकी बार ऐसी गलती मत करना। यदि तुमने भारत में जन्म लिया है तो भारतीय संस्कृति ही तुम्हारी संस्कृति है। तुम्हारे पास विकल्प नहीं है कि तुम किसी और संस्कृति को स्वीकार करो क्योंकि ये विकल्प का विषय ही नहीं है। मुंह से ही खाना होगा कर इसका विकल्प नहीं होता है। यदि तुम्हारे पास इसका भी विकल्प हो तो पहले मुँह से खाना बंद करो फिर किसी और के बाप को अपनी मां के पास ले जाओ और बाप बनाओ, फिर संस्कृति के बारे में भी सोचना।

बुरा लग रहा है क्या ? यदि तुम्हें बुरा लग रहा है तो इसका मतलब है कि तुमने शरीर से तो भारत में जन्म लिया है किन्तु मन को किसी विदेशी संस्कृति के पास बंधक बना रखा है। ~ बुरा न मानो होली है और ये होली की भाषा है

  • 15 मार्च 2025 शनिवार को प्रतिपदा 2:33 PM तक है।
  • औदयिक चैत्र कृष्ण प्रतिपदा इसी दिन उपलब्ध है।
  • शास्त्रों में औदयिक चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को ही होली मनाने के लिये ग्राह्य बताया गया है।
  • इस कारण शास्त्रों के प्रमाण से 2025 में होली 15 मार्च शनिवार को है।
  • 2025 होली की एक विशेषता यह है कि इस बार इस बार भी होलिका के दूसरे दिन न होकर तीसरे दिन है।

चलो तुम्हारे मन में अनेकों प्रश्न उठ रहे होंगे और बार-बार करते रहे हो, अब हम तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर भी देंगे किन्तु पहले भारतीय (मानसिक रूप से भी) बनो, भारतीय संस्कृति ही तुम्हारी संस्कृति है यह स्वीकारो और तब अपने प्रश्नों के उत्तर पढ़ो :

प्रथम प्रश्न : जल की बर्बादी होती है, जबकि जल संरक्षण की आवश्यकता है।

उत्तर : जल की बर्बादी तब होती है जब जल उपयोगरहित हो जाये और भूगर्भ में भी समाविष्ट न हो। होली में जो जल में रंग मिलाया जाता है वह जल भूमि से ही निकला और भूमि में ही समा गया फिर बर्बाद कैसे हुआ ? बर्बादी तो वो है जो नदियों का जल भी उपयोगी न रहा और उदाहरण है यमुना। यमुना के जल को अनुपयोगी किसने बनाया ? होली ने या दिवाली ने, दुर्गा पूजा ने या गणेश पूजा ने ?

प्रश्न : पर्व-त्यौहार तो सादगी, हर्ष आदि के लिये होता है फिर अश्लीलता या फूहड़ता क्यों ?

उत्तर : ये तुम्हारा अज्ञान है क्योंकि तुमने सनातन को कभी समझने का प्रयास ही नहीं किया, तुमने विदेशी संस्कृतियों के बारे में पढ़ा-समझा और उसने तुम्हारे मन-मस्तिष्क में सनातनद्रोह का विषाणु भर दिया है जिसके कारण तुम्हें भारतीय संस्कृति से जुड़े प्रत्येक विषयों पर विवाद ही उत्पन्न करने का मन करता है और करते भी हो। तुम्हें कहीं भी हिंसा नहीं दिखेगी बस एक सनातन के बलि को छोड़कर। ये तुम्हारी अश्लीलता है, तुम्हारी फूहड़ता है। तुम्हीं हो जो फटे कपड़े पहनने का समर्थन करते हुये पहनने की स्वतंत्रता चिल्लाते हो, उसमें तुमको अश्लीलता क्यों नहीं दिखती।

फिल्मों-सीरियलों में तुमको अश्लीलता कहां दिखती है, उसमें तो तुमको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और क्रिएटिविटी दिखती है। ये तो तुम्हारी जड़ता है न जो तुम्हें सनातन का सब-कुछ प्रतिकूल ही दिखता है। अब आओ शास्त्रों का प्रमाण देखो की होली में अश्लीलता या फूहड़ता अपेक्षित है :

होली और होलिका दोनों ही परस्पर संबद्ध है और होलिका से ही होली की सिद्धि होती है। अब होलिका दहन के विषय में देखो : ज्योतिर्निबंध में होलिकादहन के विषय में कहा गया है “तत्राग्निमंत्रमुच्चार्य दीपयेद्धोलिकां शुभां। भगलिङ्गाङ्कितैर्वाक्यैः क्रीडितव्यं पिशाचवत्॥”

होलिका दहन के पश्चात् भगलिङ्गाङ्कितैर्वाक्यैः का तात्पर्य क्या है ? क्रीडितव्यं पिशाचवत् का तात्पर्य क्या है ?

ये अश्लीलता और फूहड़ता दोनों की आज्ञा देता है अर्थात आवश्यक है अब तुम्हें यदि सनातन से द्रोह ही है तो करो किन्तु आक्षेप-प्रक्षेप करना बंद करो। क्योंकि तुम्हें तो कभी दुराचार भी नहीं दिखता है और “लिव & रिलेशनशिप” जैसी व्यवस्था थोप दिया है, समलैंगिक विवाह थोपने का प्रयास कर रहे हो और तुम हमें अश्लीलता का पाठ पढ़ाओगे ? अधिक समझने के लिये ये विडियो देख लो, इसमें यही बातें समझायी भी गयी है।

पुनः होली के सम्बन्ध में आगे देखो :

प्रभाते विमले जाते ह्यङ्गे भस्मं च कारयेत् । सर्वाङ्गे च ललाटे च क्रीडितव्यं पिशाचवत् ॥
सिन्दूरैः कुङ्कुमैश्चैव धूलिभिर्धूसरो भवेत् । गीतं वाद्यं च नृत्यं च कुर्याद्रथ्योपसर्पणम् ॥
ब्राह्मणैः क्षत्त्रियैर्वैश्यैः शूद्रैश्चान्यैश्च जातिभिः । एकीभूय प्रकर्तव्या क्रीडा या फाल्गुने सदा ॥

वृद्ध वशिष्ठ के वचनों में तुम्हारे अगले प्रश्न का उत्तर भी मिलेगा। यहां “क्रीडितव्यं पिशाचवत्” को पुनः देख लो।

प्रश्न : होली रंग-अबीरों का पर्व है, इसमें कीचड़-गोबर आदि क्यों खेला जाता है ?

उत्तर : ऊपर जो वचन दिया गया है उसमें देखो “ह्यङ्गे भस्मं च कारयेत्” और “धूलिभिर्धूसरो भवेत्” भी कहा गया है। इसका क्या तात्पर्य है होलिका दहन वाले भस्म से तो होली खेले ही क्योंकि होलिका से ही होली है और आगे कहा गया कि धूलिभिर्धूसरो भवेत् होलिका वाली भस्म तो पर्याप्त न होगी इसलिये धूलि से भी धूसरित होवे। अर्थात जो तुम्हारा प्रश्न है वो प्रश्न ही गलत है क्योंकि तुम्हारी दृष्टि में ही दोष है, होली तो यही है और शास्त्र सम्मत भी है।

प्रश्न : होली घरों-मुहल्लों में खेलना चाहिये, सड़कों पर क्यों ?

उत्तर : इसका उत्तर भी ऊपर दिये गए प्रमाण में ही दिख रहा है “कुर्याद्रथ्योपसर्पणम्” ~ सड़कों पर भी लहराये, नाचे-गाये। होली भारतीय पर्व है, भारतीय खेलते हैं, भारत की सड़कों पर खेलते हैं तो तुम्हारे बाप का क्या जाता है ? यदि तुम्हें भारत, भारतीय संस्कृति, भारतीय पर्व-उत्सव आदि अच्छे नहीं लगते तो भारत में करते क्या हो, भारत में रहते क्यों हो ?

अच्छा एक बड़ी समस्या क्या है जानते हैं ! ये मीडिया वाले स्वयं भी न तो भारत को जानते समझते हैं और न ही भारतीय संस्कृति को किन्तु बहस भी छेड़ देते हैं। उसमें भाग लेने वाले भी उल्लू ही होते हैं उनके पास शास्त्रों का कोई ज्ञान होता ही नहीं है। वो तुरंत ही अश्लीलता को गलत मान लेंगे, सड़कों पर होली खेलने को गलत भी मान लेंगे क्योंकि जानते ही नहीं हैं। जबकि ये उस एंकर को भी जानना चाहिये जो बहस करा रहा हो।

इसी प्रकार प्रश्न करने वाले यदि डंका पीटकर भी कहे कि मैं भी हिन्दू हूँ, उसे खुलकर कहो कि तुम हिन्दू नहीं हो सनातनी नहीं हो क्योंकि तुम भारतीय शास्त्रों का अवलोकन तो करते नहीं हो किन्तु भला-बुड़ा कहते रहते हो।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।


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