पूर्व आलेख में कर्मकांड ज्ञान के महत्व पर चर्चा करते हुये कर्मकांड सीखने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया था। यह भी स्पष्ट किया गया कि मात्र कर्मकांडी ही नहीं, बल्कि सामान्य जनों को भी कर्मकांड की जानकारी होनी चाहिए। ज्ञान का अभाव त्रुटियां उत्पन्न करता है, जो अनुचित कर्मकांड में बदल सकता है। इस आलेख में आगे की चर्चा करते हुये कर्मकांड सीखने हेतु प्रारंभिक तथ्यों जो कि विशेष महत्वपूर्ण हैं के ऊपर प्रकाश डाला गया है। इस आलेख को पढ़ने के पश्चात् कर्मकांड सीखने की रूचि में वृद्धि भी होती है।
कर्मकांड सीखें : Karmkand Sikhen part 2
पूर्व आलेख को पढ़ें के उपरांत इतनी समझ तो हो ही जाती है कि सामान्य जन को भी सम्पूर्ण जीवन अनेकों कर्मकांड करना ही होता है और इसलिये संपूर्ण कर्मकांड का ज्ञान भी आवश्यक होता ही है। वहीं यदि कर्मकांडियों की चर्चा करें तो उनके लिये संपूर्ण कर्मकांड का ज्ञान आवश्यक मात्र नहीं अनिवार्य भी है। कोई यजमान जब किसी कर्मकांडी से मिलता है तो वो यही मानता है कि इन्हें पूजा-पाठ-जप-हवन-शांति-विवाह-श्राद्ध आदि सभी कुछ का ज्ञान होगा।
यदि कर्मकांडी को यजमान के कर्म का ज्ञान न हो तो भी उसे अस्वीकार करने में लज्जा का अनुभव होता है और अस्वीकार नहीं कर पाता एवं किसी भी प्रकार से कुछ भी करा देता है। इस कारण जब आप उन कर्मों को भी अस्वीकार नहीं कर सकते जो नहीं आता हो तो सभी कर्मों का ज्ञान अनिवार्य हो जाता है।
चिकित्सकों की तरह कर्मकांडी के लिये विवाह विशेषज्ञ, जप विशेषज्ञ, पाठ विशेषज्ञ, पूजा विशेषज्ञ, उद्यापन विशेषज्ञ आदि प्रकार का को श्रेणी विभाजन नहीं होता। यदि व्यावहारिक रूप से देखा भी जाता है तो मात्र श्राद्ध विशेषज्ञ, किन्तु उसमें भी यही त्रुटि उत्पन्न हो जाती है कि श्राद्ध विशेषज्ञ को संपूर्ण कर्मकांड का ज्ञाता समझने का भ्रम उत्पन्न हो जाता है।
हलवा है क्या
“हलवा है क्या” यह मुहावरा बहुत प्रयुक्त किया जाता है किन्तु कर्मकांड को छोड़कर अर्थात कर्मकांड को हलवा ही समझा जाता है। हलवा का तात्पर्य होता है कि न तो हलवा बनाने में कोई विशेष समय लगता है और न ही चबाने की आवश्यता होती है, बिना दांत का व्यक्ति भी सरलता से हलवा निगल सकता है। ये “हलवा है क्या” का मुहावरा कर्मकांड में भी लगाने की आवश्यकता है क्योंकि कर्मकांड भी हलवा नहीं है और यदि कर्मकांड भी हलवा नहीं है तो इसे सीखने हेतु विशेष समय देकर अध्ययन करने की आवश्यकता होती है।
कलंकि
जो लोग हलवा समझकर कर्मकांडी बनते हैं, और स्वेच्छाचार करते हुये मात्र धनार्जन का उद्देश्य रखते हैं वो कर्मकांडी के नाम पर कलंकवत हैं, वैसे लोगों के कारण ही ढेरों लोग अनाप-सनाप भी बका करते हैं। उन्हीं कलंकों के कारण ब्राह्मण को लोभी आदि भी कहा जाता है। यदि आप कर्मकांडी बनना चाहते हैं तो उन कलंकवर्ग से बचने की आवश्यकता है। कलंकियों का एक उदाहरण भी आगे प्रस्तुत किया जा रहा है :
- आपने कुछ विडियो देखा होगा जिसमें विवाह कराने वाला पंडित फिल्मी गीत गाकर फेरे आदि लगवाता है।
- मुख्यरूप से शहरों में सभी ऐसा ही प्रयास करते हैं की शीघ्रातिशीघ्र पूजा-हवन-विवाह-श्राद्ध आदि संपन्न किया जाय और शीघ्र करने हेतु अधिक पारितोषिक दिया करते हैं, ऐसा कराने वाला धनलोभ से कुछ भी करके निपटा देता है और कलंक ही समझना चाहिये।
- कर्मकांड का तात्पर्य पूजा-पाठ-जपादि सभी मुख्य कार्य गोपनीय होते हैं, किन्तु वर्त्तमान में सभी कलंक उसे सोशल मीडिया पर ही किसी न किसी प्रकार से दिखाया करते हैं। जब दिखाते हैं तो सीना चौड़ा करते हैं, किन्तु यदि कोई इसे अनुचित बताये तो उसका विरोध करते हुये कहेंगे कि सोशलमीडिया पर इस प्रकार से नहीं बोलना चाहिये।
ऊपर उदाहरण हेतु कुछ बिंदुओं का वर्णन किया गया है जिसका प्रयोजन यह है कि यदि आप कर्मकांड सीखना चाहते हैं तो आपको यह ज्ञात होना चाहिये कि किससे सीखना चाहिये और किसका तिरष्कार करना चाहिये। जो कलंक हैं, तिरष्कार करने योग्य हैं वही अधिकतर सोशलमीडिया पर व अन्यत्र भी ज्ञानीबाबा बनकर अज्ञान का पिटारा खोलकर अज्ञान बांटते रहते हैं और जनमानस को भ्रमित कर रहे होते हैं। इसका भी एक सर्वोत्तम उदाहरण देना आवश्यक है :
- नित्यकर्म सबको स्वयं करना चाहिये और नित्यकर्म में ब्राह्मण (कर्मकांडी/पंडित) की आवश्यकता नहीं होती, किन्तु कोई भी ज्ञानीबाबा नित्यकर्म के विषय में चर्चा नहीं करता। और यदि कोई करता भी है तो कुछ भी उटपटांग बातें बता देता है जिसका शास्त्र से कोई लेना-देना ही नहीं होता।
- नित्यकर्म के अतिरिक्त सम्पूर्ण कर्मकांड में ब्राह्मण (कर्मकांडी/पंडित) अनिवार्य होते हैं, बिना ब्राह्मण के कोई भी कर्म संपन्न नहीं हो सकता किन्तु इस प्रकार के ज्ञानी बाबा अनेकानेक प्रकार से कर्मकांड सीखा रहे होते हैं कि बिना पंडित के कैसे करें; यथा – “बिना पंडित के हवन कैसे करें”, “बिना पंडित के गृहप्रवेश कैसे करें” आदि-इत्यादि।
इन सबकी सोदाहरण चर्चा का तात्पर्य यह है कि यदि आप कर्मकांड सीखना चाहते हैं, आस्थावान हैं तो ऐसे कलंकियों को पहचान सकें और उससे दूरी बना सकें। सोशलमीडिया या अन्यत्र (अंतर्जाल) कर्मकांड सीखना कोई हलवा नहीं है। कर्मकांड गुरुमुखी होकर ही सीखना चाहिये अर्थात गुरुकुल में ही सीखना चाहिये।
कर्मकांड कहां सीखें

यदि आप कर्मकांड सीखना चाहते हैं अर्थात कर्मकांडी बनना चाहते हैं अथवा अपने बच्चों को कर्मकांडी बनाना चाहते हैं तो एक प्रश्न उत्पन्न होगा “कर्मकांड कहां सीखें” ? कर्मकांड सीखने का एक ही स्थान है और वो गुरुकुल है। गुरुमुखी होकर ही कर्मकांड सीखना चाहिये। कर्मकांड गुरुकुल में ही सीखा जा सकता है इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं कि गुरुकुल में मात्र कर्मकांड का ज्ञान प्राप्त होता है, और यह भी तात्पर्य नहीं कि गुरु मात्र गुरुकुल में ही मिलते हैं।
किन्तु ये तो उनके लिये है जो बाल्यपन से ही कर्मकांड सीखना चाहते हैं, कर्मकांडी बनना चाहते हैं। किन्तु जो बड़े हो गये हैं, गुरुकुल नहीं जा सकते, कर्मकांड वृत्ति को स्वीकार चुके हैं किन्तु सीख नहीं पाये हैं वो “कर्मकांड कहां सीखें” ?
कर्मकांड सीखने हेतु योग्य कर्मकांडी को कैसे पहचानें
जो गुरुकुल नहीं जा सकते, किन्तु कर्मकांड अपना चुके हैं और सीखना चाहते हैं उनके लिये योग्य कर्मकांडी की पहचान करना भी कठिन कार्य ही होता है। यदि मिल भी जायें तो अनेकों समस्या होती है। क्योंकि उन्हें न तो स्थानीय स्तर पर कोई सीखने देना चाहता है, इसके पीछे भय रहता है कि यदि नया कर्मकांडी बन जाये तो उनका महत्व/यजमान आदि कम हो जायेगा। एवं व्यस्तता भी ऐसी होती है कि सिखाने वाले और सीखने वाले को समान समय पर अवकाश मिलना भी कठिन होता है, यदि सिखाने वाले को अवकाश है तो सीखने वाले को नहीं और यदि सीखने वाले को अवकाश है तो सिखाने वाले को नहीं।
इसके साथ ही एक अन्य समस्या भी होती है और वो है योग्य कर्मकांडी का चयन करना। ये बहुत कठिन कार्य है क्योंकि सामान्य रूप से उसे योग्य समझा जाता है जिसकी प्रसिद्धि अधिक हो और इसे भी एक उदाहरण से ही समझेंगे; बड़े-बड़े विद्वान क्षेत्रीय स्तरों तक ही भूमि पर कार्य करते हैं, जो अष्टादश पुराण की कथा-व्याख्या कर सकते हैं, किन्तु नट श्रेणी का गायक राष्ट्रीय ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक प्रसिद्धि प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार यदि सीखने के लिये एक योग्य कर्मकांडी को ढूंढना भी कठिन कार्य ही होता है, ये आवश्यक नहीं कि जो प्रसिद्ध है वही योग्य भी हो।
यदि आप कर्मकांड सीखना चाहते हैं और गुरुकुल से ज्ञानार्जन करने वाले विद्वान भी प्राप्त न हों तो जो उपलब्ध हैं उनमें से कैसे सही विद्वान की पहचान करें इसके लिये कुछ विशेष लक्षणों का निर्धारण अवश्य किया जा सकता है। यहां कुछ विशेष लक्षण बताये जा रहे हैं जिसके आधार पर आप विद्वान कर्मकांडी की पहचान कर सकते हैं :
- यजमान हेतु धोती धारण अनिवार्य करते हों, कुर्ता आदि सिले वस्त्रों का निषेध करते हों।
- कर्मकाल में सिर पर वस्त्र/टोपी आदि का निषेध करते हों।
- अनुपनीतों से हवन न कराते हों व हवन जब भी करें हवन विधि से ही करते हों, अधिकांश हवन स्वयं ही करते हों।
- आचमन के विषय में विशेष निर्देश देते हों व सजग रहते हों।
- गीत-भजन का न्यूनतम और स्तोत्र-सूक्त का अधिकतम प्रयोग करते हों।
- मातृका पूजन के उपरांत नान्दीमुख श्राद्ध भी कराते हों।
- किसी प्रश्न का प्रामाणिक उत्तर देते हों न कि व्यावहारिक उत्तर।
- जो अधिकतम शास्त्र चर्चा करते हों, न की सांसारिक चर्चा में ही कालक्षेप करते हों।
- उपनयन यथाकाल करने का निर्देश करते हों।
- विवाह में अग्नि की चार प्रदक्षिणा, और चारों बार प्रस्तरारोहण व लाजा होम कराते हों, न कि सात फेरा लगवाकर लाजा विखेरने का निर्देश देते हों, विवाह में भी वर हेतु धोती धारण अनिवार्य करते हों, न कि पैजामा पहने वर से हवन कराते हों।
- कर्म कराते समय भी मोबाईल में ही अधिकांश समय न व्यतीत करते हों।
- बलि का विरोध न करते हों, क्योंकि बलि शास्त्रोक्त विधान ही है और एक योग्य कर्मकांडी शास्त्रोक्त विधान का विरोध नहीं कर सकता।
- रिंग-सेरेमनी नहीं कराते हों, क्योंकि रिंग-सेरेमनी कर्मकांड का भाग नहीं है, यदि यजमान रिंग-सेरेमनी भी घोषित करता हो किन्तु हस्तग्रहण-वरवरण-सगुन-तिलक आदि का ही संपादन कराते हों।
- स्विष्टकृद्धोम का चरु निर्माण स्थापित अग्नि पर ही करते हों न कि अन्य चूल्हे के बनाये पाक से करते हों। यदि उपरोक्त व्यवस्था न हो तो आज्यहोम ही करते हों, शाकल्यादि द्रव्य से नहीं। हवन में आहुति की न्यून संख्या होने पर भी विधि का लोप न करते हों।
- पाठ आदि में पुस्तक का ही प्रयोग करते हों, अंतर्जाल/PDF का नहीं। अंतर्जाल/PDF आदि मात्र ज्ञान बढ़ाने के लिये साधन है, किन्तु पाठ करने के लिये जो कंठाग्र न हो उसके लिये पुस्तक अनिवार्य है।
- भूल-चूक से भी कर्मकाल के अतिरिक्त अन्य कार्यों में पैजामा, पैंट आदि धारण न करते हों।
इसके साथ ही और भी अनेकानेक लक्षण बताये जा सकते हैं, जिसके आधार पर विद्वान कर्मकांडी और व्यवसायी में भेद किया जा सकता है। विद्वान/योग्य कर्मकांडी का निर्णय इन लक्षणों द्वारा ही करना चाहिये न कि प्रसिद्धि, प्रमाणपत्र, शिक्षक आदि के आधार पर। अनेकानेक विषयों व्याकरण, ज्योतिष, न्याय, दर्शन आदि के ज्ञाता भी विद्वान होते हैं, किन्तु कर्मकांड के भी ज्ञाता हों यह सिद्ध नहीं होता, क्योंकि कर्मकांड अध्ययन के साथ-साथ अनुभव की भी अपेक्षा रखता है।
आगे क्या करें ?
यदि किसी कारण से आप गुरुकुल में अध्ययन नहीं कर सकते और योग्य कर्मकांडी मिल जायें, तो कर्मकांड सीखने के लिये उनको अपना गुरु माने और शिष्यवत आचरण/व्यवहार करते हुये ज्ञान प्राप्त करें। यह महत्वपूर्ण है कि आप अपने गुरु के अनुभव और ज्ञान का आदर करें। कालसीमा भी स्वयं निर्धारित न करें; यदि करें तो न्यूनतम 3 वर्ष अवश्य ही करें। गहराई तक पहुंचे बिना अधूरा ज्ञान आपके विकास में बाधा डाल सकता है।

हलवा समझकर 2 – 4 महीने में सीखने का भ्रम न पालें, क्योंकि कर्मकांड केवल तकनीकी ज्ञान नहीं है, बल्कि यह एक गहन अनुभव और साधना का विषय है। ऐसे में, कर्मकांड ज्ञान का वास्तविक अनुभव प्राप्त करने के लिए पर्याप्त समय देना आवश्यक होता है।
साथ-साथ स्वयं ही यह निर्धारण भी न करें कि अमुकामुक कर्म का ज्ञान हमें है, मात्र अमुक कर्म का ज्ञान चाहिये। इस प्रकार का निर्धारण करना आपके ज्ञान और योग्यता को सीमित करेगी। आपको यह समझना चाहिए कि हर कर्मकांड की अपनी विशेषताएँ होती हैं, और उन्हें सही तरीके से सीखने के लिए समर्पित प्रयास और स्थायी निर्देश की आवश्यकता होती है।
सभी कर्मों का ज्ञान नये सिरे से ग्रहण करें, क्योंकि आपको जिस कर्म का ज्ञान है, यह कौन निश्चय करेगा कि उचित ही है। यह निश्चित करना अत्यंत आवश्यक है कि हमारी सोच और ज्ञान में कोई पूर्वाग्रह या भ्रांति तो नहीं है। स्वयं निर्णय लेंगे कि अमुक कर्म का ज्ञान हमें है तो उसमें जो त्रुटियां-विसंगतियां हैं, वो यथावत ही रह जायेगी।
यहां आगे एक और भी समस्या होगी और वो यह कि जो योग्य कर्मकांडी मिले वो आयु में न्यून हों अर्थात आपसे छोटे हों। ब्राह्मण हेतु वृद्ध (श्रेष्ठ/बड़ा) का निर्धारक आयु नहीं, ज्ञान होता है अतः आयु में कम होने पर भी उनके साथ शिष्यवत व्यवहार रखकर ही ज्ञान प्राप्त करें। ऐसा न कर यदि मात्र कुछ प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करके कर्मकांडी होने का भ्रम पालना हो तो वो पृथक विषय है। न्यूनतम 3 वर्ष सीखने का तात्पर्य यह नहीं कि शिष्य की भांति उनके घर में रहें, अपितु यह है कि न्यूनतम 3 वर्षों तक अधिकतम सान्निध्य प्राप्त करें, संपर्क बनाये रखें, प्रश्न करते रहें।
पुस्तक का चयन
यद्यपि वर्त्तमान युग में सभी पुस्तकें और विषय अर्न्तजाल पर व PDF के माध्यम से उपलब्ध हो रहा है, किन्तु अधिकाधिक पुस्तक और ग्रंथों का संग्रह करते रहें। प्रारंभिक अवस्था में आवश्यक पुस्तकों का निर्देश विशेषज्ञ से प्राप्त करें, जो आपके ज्ञान के विस्तार के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं। अंतर्जाल व पीडीएफ का अवलोकन कर सकते हैं, यह भी आपके ज्ञानवृद्धि में सहयोगी होता है, किन्तु इस पर आश्रित होना भी अज्ञानता ही है।
मात्र डिजिटल माध्यमों के भरोसे रहना आपको व्यावहारिक ज्ञान और अनुभव की कमी का सामना करा सकता है, जो अध्ययन के वास्तविक लाभ के लिए आवश्यक है। इसलिए, भले ही तकनीक ने पठन एवं अध्ययन को सुगम बना दिया है, किन्तु पुस्तकों का स्थान सदा महत्वपूर्ण रहेगा।
कर्मकांड सीखें वेबसाइट से कर्मकांडी बनना
विषय जब अंतर्जाल व PDF आदि का आ गया है तो कर्मकांड सीखें की भी यथार्थ चर्चा होनी चाहिये। क्या कर्मकांड सीखें वेबसाइट (https://karmkandsikhen.in/) से कर्मकांडी बना जा सकता है ? इसका स्पष्ट उत्तर है नहीं, कर्मकांड सीखें वेबसाइट (https://karmkandsikhen.in/) सहयोगी वेबसाइटों सहित स्पष्ट रूप से यह अस्वीकार करता है कि किसी भी व्यक्ति को इस वेबसाइट के सामग्री के आधार पर सीधे कर्मकांडी बनने का प्रयास करना चाहिये।
ऐसा संभव ही नहीं है, क्योंकि कर्मकाण्ड की गहराई और जटिलता को समझने के लिए विस्तृत अध्ययन और विशेषज्ञ मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। कर्मकांड सीखें वेबसाइट मात्र प्रेरक बन सकता है, अध्ययन की सामग्री प्रदान कर सकता है, ज्ञान नहीं। इसके अतिरिक्त, कर्मकांड को सिखाने के लिए व्यक्तिगत अनुभव, पारंपरिक शिक्षण और उचित व पर्याप्त अभ्यास भी आवश्यक हैं, जो कि केवल ऑनलाइन प्राप्त जानकारी से नहीं मिल सकता।
यहां कर्मकांड सीखें वेबसाइट एक और विषय के प्रति सजग करना आवश्यक समझता है कि यदि आप कर्मकांड सीखें वेबसाइट से भी सहयोग प्राप्त करना चाहते हैं, तो आपके लिये यह आवश्यक हो जाता है कि क्रमशः सभी आलेखों का अध्ययन करें, न कि कुछ विशेष चयनित आलेखों का ही।
ऐसा इसलिए आवश्यक है क्योंकि कर्मकांड का ज्ञान व्यापक और जटिल होता है, जिसमें एक विषय के अनेक पहलू होते हैं। कुछ विशेष आलेखों में जिन विषयों की चर्चा नहीं की गयी होती है, उनकी चर्चा अन्य आलेखों में होती है, जिससे आपको सम्पूर्ण दृष्टिकोण प्राप्त नहीं होता।

यदि आप केवल चयनित आलेखों पर ध्यान केंद्रित करेंगे, तो यह संभव है कि महत्वपूर्ण जानकारी और विधि आपकी दृष्टि से ओझल हो जाये, जो आपके अध्ययन के हेतु सहायक हो सकती है। इसलिए, इस विषय का ध्यान रखते हुये सजगता से सभी आलेखों को पढ़ना आवश्यक है ताकि आप एक संपूर्ण और सुसंगत विचारधारा विकसित कर सकें।
प्रमाण संग्रहण
एक विषय जो बहुत ही महत्वपूर्ण है वो है प्रमाण संग्रहण। नये कर्मकांडियों में प्रमाण संग्रहण का अभाव मिलता है, जो उनके विकास और कारगरता पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। यद्यपि प्रमाण की व्याख्या भी व्यापक है, एवं कई प्रकार हैं, इसकी सही समझ और पहचान आवश्यक है। तथापि, कर्मकांड में प्रमाण का तात्पर्य वो व्यापक अर्थ/विश्लेषण नहीं होता है।
कर्मकांड में प्रमाण का तात्पर्य स्मृति-सूत्र-पुराणादि ग्रंथों के विशेष वचन होते हैं, जो कर्मकांड के आधारभूत सिद्धांतों को स्थापित करते हैं। यदि आप इन ग्रंथों का अवलोकन नहीं भी कर पाते हैं, तो भी पद्धतियों में आवश्यक प्रमाण उद्धृत किये जाते हैं, जिसके माध्यम से आप एक आधारभूत समझ विकसित कर सकते हैं।
प्रमाण के विषय में एक अन्य त्रुटि यह भी होती है कि पद्धति संपादक की टिपण्णी के भी प्रमाण होने का भ्रम उत्पन्न होता है। यह भ्रम खासतौर पर तब बढ़ता है जब नए कर्मकांडी अपने अध्ययन के दौरान इन टिप्पणियों को संदर्भित करते हैं बिना यह समझे कि ये टिप्पणियाँ व्यक्तिगत विचारधारा पर आधारित होती हैं। पद्धति संपादक की टिपण्णी उनका व्यक्तिगत विचार होता है जो प्रमाण विरुद्ध भी हो सकता है, अतः पद्धति में जो सम्पादक की टिपण्णी रहते हैं, उसे प्रमाण समझने का भ्रम नहीं पालना चाहिये।
एक योग्य कर्मकांडी बनने हेतु आपको स्वयं ही प्रमाणों का संग्रह करते रहना चाहिये एवं निरंतर उनका अवलोकन भी करना चाहिये। प्रमाणों का सही विश्लेषण और उनकी व्याख्या करना भी आवश्यक है, ताकि आप एक सक्षम और विश्वसनीय कर्मकांडी बन सकें। परस्पर विरोधाभाषी प्रमाणों को गंभीरता से समझना, उसमें सामंजस्य स्थापित करना आदि विद्वानों का कार्य होता है एवं इसके लिये विद्वानों से चर्चा-विमर्श करना लाभकारी होता है।
एक आलेख में किसी भी विषय को सम्पूर्ण रूप से समाहित नहीं किया जा सकता। जिस समय आलेख लिखी जाती है उस समय कई ऐसे महत्वपूर्ण तथ्य होते हैं जो स्मृति में नहीं आते एवं अन्य आलेख लेखन काल में स्मरण होते हैं। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, क्योंकि लेखन के दौरान विचारों और सूचनाओं का विस्थापन होता है। अतः अन्य विशेष तथ्य भी जो इस आलेख में उल्लिखित न हो पाये हों उनका उल्लेख आगामी आलेखों में किया जायेगा। आगे आने वाले आलेखों में हम उन बिंदुओं को विस्तार से स्पर्श करेंगे जो यहाँ पर उपेक्षित रह गए हैं।
सारांश : इस आलेख में कर्मकांड के महत्व और इसे सीखने से सम्बंधित चर्चा की गई है। मात्र कर्मकांडी ही नहीं, सामान्य लोगों को भी इसके बारे में जानकारी होनी चाहिए। इसमें बताया गया है कि कर्मकांड सीखने में समय देना आवश्यक है, क्योंकि ये कोई हलवा नहीं है। योग्य कर्मकांडी की पहचान कठिन हो सकती है, परंतु उनके विशेष लक्षण के आधार पर पहचान की जा सकती है, योग्य कर्मकांडी को पहचानने के लिए कुछ लक्षण दिए गए हैं।
यदि आप कर्मकांड सीखना चाहते हैं, तो गुरुकुल में अध्ययन करना चाहिये किन्तु किसी कारण से गुरुकुल नहीं जा सकते तो कर्मकांड विशेषज्ञ से सीख सकते हैं। ऑनलाइन व PDF आदि के माध्यम से कर्मकांड सीखना संभव नहीं है। अंत में, विशेष रूप से बताया गया है कि इन सब योग्यता प्राप्ति हेतु प्रमाण संग्रह करते रहना चाहिये।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।
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3 thoughts on “कर्मकांड सीखें : Karmkand Sikhen part 2”