शुद्धिकरण : प्रोक्षण, अभ्युक्षण और वोक्षण तीनों प्रकार को समझें – 3 Sikta karana

प्रोक्षण, अभ्युक्षण और वोक्षण तीनों प्रकार को समझें - Sikta karana

सामान्यतः शुद्धिकरण व पवित्रीकरण को समानार्थी समझ लिया जाता है किन्तु दोनों में बड़ा भेद है। शुद्धिकरण स्वछता मात्र का संकेत करता हैं एवं पवित्रीकरण का पूर्वगामी होता है। जैसे शुद्ध भूमि पर कोई भी कर्म किया जाता है तो प्रथमतया उस भूमि का मार्जन, मंडल आदि विधि से शुद्धिकरण होता है। किन्तु पवित्रीकरण पृथक विधि है जो पंचगव्यादि प्रोक्षण आदि करके किया जाता है। प्रोक्षण का तात्पर्य जल से सिक्त करना, जल छिड़कना आदि है किन्तु जल से सिक्त करने के भी एक प्रकार नहीं है। इस आलेख में पवित्रीकरण का ही एक अन्य भाग जो प्रोक्षणादि है उसकी विस्तृत चर्चा की गयी है।

पवित्रीकरण संबंधी पूर्व आलेख में बताया गया था कि “पुष्पं तु प्रोक्षणाच्छुद्धिः” पुष्प की शुद्धि प्रोक्षण से होती है। यहां पुष्प का तात्पर्य पुष्पमात्र ही ग्रहण नहीं करना चाहिये। पुष्प कथन का तात्पर्य यह है कि पुष्प भ्रमरोच्छिष्ट होने पर भी प्रोक्षण से शुद्ध और पवित्र हो जाते हैं अन्य वस्तुओं के बारे में तो संशय करना ही नहीं चाहिये। प्रोक्षण का तात्पर्य सामान्य रूप से जल छिड़कना ही समझा जाता है किन्तु ऐसा नहीं है। सामान्य रूप से जल छिड़कने का तात्पर्य कुशा-दूर्वा आदि द्वारा छिड़कना होता है जिसे सिक्तीकरण कहा जा सकता है। प्रोक्षण तो एक विशेष प्रक्रिया है।

पवित्रीकरण/शुद्धिकरण का तात्पर्य

सर्वप्रथम हमें जल का महत्व समझना आवश्यक है और ये सामान्य जलाशय के जलों का महत्व होता है, गंगादि पवित्र नदियों और तीर्थों के जल का महत्व तो और भी विशिष्ट होता है।

पवित्रीकरण/शुद्धिकरण का तात्पर्य

आपो देवगणाः सर्वे आपः पितृगणाः स्मृताः ।
तेनैवाभ्युक्षणं प्रोक्तमृषिभिः वेदवादिभिः ॥
– कारिका

आप/अप् जल को कहा जाता है और जल में सभी देवताओं, पितृगणों का वास होता है इसलिये जल परमपवित्र होता है और जल से अन्य सभी वस्तुओं को भी पवित्र किया जाता है। कारिकाकार का कथन है कि ऐसा वेदवादी ऋषियों ने बताया है कि जल से अभ्युक्षण करे।

यद्यपि यहां अभ्युक्षण कहा गया है किन्तु जल से सिक्त करने का ही यह भी एक प्रकार है जिसे आगे समझेंगे।

गङ्गादिसर्वतीर्थेषु समुद्रेषु सरित्सु च । सर्वतश्चाप आदाय अभ्युक्षेच्च पुनः पुनः ॥ – संस्कार दीपक

संस्कार दीपक में कहा गया है जल में (सामान्य जल में) गंगादि तीर्थ, समुद्र, नदियों का आवाहन करके बारंबार अभ्युक्षण करे। यह हवन के पंचभूसंस्कार के पश्चात् अभ्युक्षण के प्रसंग में बताया गया है और उस समय अभ्युक्षण किया जाता है इसलिये यहां अभ्युक्षण ही कहा गया है, किन्तु अन्यत्र भी जल की इसी दिव्यता के कारण प्रोक्षण आदि सभी के विषय में है।

समान्य रूप से भी किसी प्रकार की पवित्रता हेतु सर्वप्रथम जो विचार आता है वो जल का प्रयोग ही आता है। जिसका मार्जन किया जा सकता है उसे मार्जन करके और जिसका मार्जन नहीं किया जा सकता है उसे सिक्त करके ही पवित्र किया जाता है। पुष्प के मार्जन का निषेध है इसलिये पुष्प को जल सिक्त करके पवित्र किया जाता है।

इसी प्रकार मिष्टान्न आदि अन्य वस्तुयें भी जिसे मार्जित न किया जा सकता हो उसे सिक्त मात्र ही किया जाता है।

सिक्त करने के प्रकार

सिक्त करना एक विशेष विधि भी है जब कुशोदक अथवा कुश के स्थान पर दूर्वा द्वारा भी सिक्त किया जाता है। इसके अतिरिक्त वास्तव में सिक्त करने के तीन प्रकार होते हैं और कुशोदक से सिक्त करने का भी तात्पर्य इन्हीं तीनों में से कोई एक होता है न कि कुश अथवा दूर्वा द्वारा सिक्त करना।

कुशोदक का तात्पर्य जिस जल में कुश भी हो ऐसा समझना चाहिये, न की कुशा के द्वारा सिक्त करना। जब पवित्री से सिक्त करने की आवश्यकता हो तो उसका उल्लेख भी किया जाता है। पवित्री में कुशाग्र भाग नहीं होता है और कुशाग्र भाग से जल छिड़कना भी निषिद्ध होता है इस कारण कुशोदक से सिक्त करने का तात्पर्य कुशायुक्त जल ही ग्रहण करना युक्तियुक्त प्रतीत होता है। तत्पश्चात पञ्चगव्य हेतु कुर्च का विधान है।

उत्तानेनैव हस्तेन प्रोक्षणं समुदाहृतं । तिरश्चावोक्षणं प्रोक्तं नीचेनाभ्युक्षणं स्मृतं ॥ – वर्द्धमान

वर्द्धमान के वचन से सिक्त करने के तीन प्रकार ज्ञात होते हैं : प्रोक्षण, वोक्षण और अभ्युक्षण

  1. प्रोक्षण : “उत्तानेनैव हस्तेन प्रोक्षणं समुदाहृतं” अर्थात उत्तान हस्त से जल छिड़कना प्रोक्षण कहलाता है। उत्तान हस्त का तात्पर्य होता है करतल ऊपर की रहना।
  2. वोक्षण : “तिरश्चावोक्षणं प्रोक्तं” अर्थात तिरछा छिड़कना वोक्षण कहलाता है। तिरछा का तात्पर्य न उत्तान और न अधोमुखी अपितु हाथ को तिरछा करके जल गिराना (छिड़कना) और इस प्रकार से जब हाथ तिरछा हो अर्थात न करतल ऊपर हो न ही नीचे हो अपितु बगल की ओर हो।
  3. अभ्युक्षण : “नीचेनाभ्युक्षणं स्मृतं” अर्थात करतल नीचे करके जल छिड़कना अभ्युक्षण कहलाता है।

इन तीनों प्रकारों में से जहां जिसकी आवश्यकता हो उसका उल्लेख भी किया जाता है। एवं सर्वाधिक प्रोक्षण का ही प्रयोग होता है। प्रोक्षण का तात्पर्य करतल ऊपर रखते हुये जल छिड़कना। अर्थात अनेकानेक स्थितियों में जब तीनों में से किसी का उल्लेख न हो तो प्रोक्षण ही समझना चाहिये।

इस प्रकार से पवित्रीकरण में जल से सिक्त करने का विशेष महत्व होता है। किन्तु इस तथ्य को पुनः ध्यान में रखना आवश्यक है कि सिक्त सभी वस्तुओं को करना होता है किन्तु उसका तात्पर्य पवित्रीकरण होता है। शुद्धिकरण की जो सामान्य अन्य विधियां भस्म, अम्ल, जलादि द्वारा मार्जन करने की होती है मार्जनीय वस्तु का मार्जन अनिवार्य होता है।

यथा अनेकानेक पात्र, पात्रों का मार्जन न करके मात्र जल सिक्त करने से पुनः प्रयोग की सिद्धि नहीं होती। पवित्रीकरण से पूर्वक्रिया शुद्धिकरण भी आवश्यक होता है।

इस आलेख में अन्य अनेकों प्रमाण भविष्य में संग्रहित किये जायेंगे अतः पुनर्निरीक्षण आवश्यक समझना उचित होगा। पवित्रीकरण के संबंध में दो विषय जानने की उत्सुकता हो सकती है : “पवित्रीकरण का विधान” , “पवित्रीकरण के मंत्र” और “पवित्रीकरण प्रयोग” दोनों के अनुसरण पथ यहां समाहित हैं जो सहयोगी वेबसाइटों पर प्रकाशित किये गये हैं।

विनम्र आग्रह : त्रुटियों को कदापि नहीं नकारा जा सकता है अतः किसी भी प्रकार की त्रुटि यदि दृष्टिगत हो तो कृपया सूचित करने की कृपा करें : info@karmkandvidhi.in

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