शास्त्रों में शिखा का बहुत ही महत्व बताया गया है और शिखाहीनता को बहुत बड़ा दोष भी माना गया है। वर्त्तमान के कुछ दशकों में धर्मनिरपेक्षता रूपी राजनीतिक षड्यंत्र के द्वारा धर्म की अपार क्षति की गयी है और शिखा धारण करना पुरानी सोच सिद्ध कर दिया गया, आधुनिकता की पहचान शिखाहीन होना सिद्ध कर दिया गया। तथापि शनैः शनैः जागरूकता की भी वृद्धि हो रहा है और षड्यंत्र को समझते हुये पुनः शिखा आदि के प्रति जागरूकता में वृद्धि भी देखी जा रही है। इस आलेख में शिखा के महत्व व शिखा संबंधी अन्य आवश्यक व महत्वपूर्ण चर्चा की गयी है।
शिखा विधान : शिखा का महत्व – shikha ka mahatva
प्रत्येक आलेख और विषय में यह स्पष्ट करना आवश्यक नहीं है कि धर्म/कर्मकांड में किसी विषय की वैज्ञानिक सार्थकता सिद्धि करना एक अनुचित प्रथा और कुप्रयास है एवं कर्मकांड सीखें ऐसा कोई प्रयास नहीं करता है। धर्म/कर्मकांड का कोई भी विषय हो इसका प्रमाण विज्ञान अथवा तर्क नहीं; शास्त्र है और शास्त्रोक्त चर्चा ही करनी चाहिये।
वैज्ञानिकता के आधार पर शिखा के लिये भी अनेकानेक तथ्य बताये जाते हैं किन्तु जो वैज्ञानिक तथ्य बताने वाले होते हैं वो शास्त्रोक्त तथ्य नहीं बता पाते, अथवा दूसरे प्रकार से कहें तो यह भी कहा जा सकता है शास्त्रोक्त प्रमाणों के आधार पर किसी विषय की सिद्धि, विश्लेषण आदि न कर पायें तो वैज्ञानिक दृष्टिकोण बताकर स्वयं को विद्वान सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है।
अस्तु हम शास्त्रोक्त चर्चा ही करेंगे जिसमें प्रमाणों का ही महत्व होता है और प्रमाणरहित चर्चा का कोई महत्व नहीं होता है। एवं उसमें आध्यात्मिक गुण, फल आदि की कल्पना नहीं करनी चाहिये। हमें सर्वप्रथम शिखा की आवश्यकता को समझना आवश्यक है।
शिखा की आवश्यकता
स्नाने दाने जपे होमे, सन्ध्यायां देवतार्चने । शिखाग्रन्थिं विना कर्म न कुर्याद् वै कदाचन ॥ स्नान, दान, जप, होम, पूजा आदि सभी कर्म शिखा ग्रन्थि के बिना कदापि न करे । इससे शिखा की अनिवार्यता सिद्ध होती है और जो शिखा भी नहीं रखते उन्हें विचार करने की आवश्यकता है कि वो कि धर्म/शास्त्र का पालन करते हैं?
स्नाने दाने जपे होमे सन्ध्यायां देवतार्चने । शिखाग्रन्थिं सदा कुर्यादित्येतन्मनुरब्रवीत् ॥ ‘स्नान, दान, जप, होम, सन्ध्या और देवपूजनके समय शिखामें ग्रन्थि (चोटीमें गाँठ) अवश्य लगानी चाहिये – ऐसा महाराज मनुने कहा है। ‘
स्नाने च भोजने चैव तथा मूत्र पुरीषयो । मैथुने च शव स्कन्धे शिखां षट सुविववर्जयेत ॥ ऊपर शिखा ग्रन्थि करने वाले कर्मो का वर्णन था तो इस वचन में शिखा कब खुली रहनी चाहिये इसका उल्लेख किया गया है : स्नान (प्रेतस्नान), भोजन, मल मूत्र त्याग समय, मैथुन एवं शव को कंधा देते समय शिखा खुली रहनी चाहिए ।
मुक्तकेशैर्न कर्तव्यं प्रेतस्नानं क्वचित् । बिना स्नानं दानं जपं होमं मुक्तकेशं न कारयेत् ॥ वृद्ध वशिष्ठः
प्रेतस्नान : खुली हुई शिखा रखकर स्नान, दान, जप, हवन नहीं करना चाहिये । खुली शिखा रखकर जो स्नान किया जाता है, उसे प्रेतस्नान कहते हैं ।
बिना शिखाके जो भी यज्ञ, दान, तप, व्रत आदि शुभकर्म किये जाते हैं, वे सब निष्फल हो जाते हैं – सदोपवीतिना भाव्यं सदा बद्धशिखेन च । विशिखो व्युपवीतश्च यत्करोति न तत्कृतम् ॥ कात्यायनस्मृति १।४
शिखाके बिना किये गये वे पुण्यकर्म राक्षस-कर्म हो जाते हैं – विना यच्छिखया कर्म विना यज्ञोपवीतकम् । राक्षसं तद्धि विज्ञेयं समस्ता निष्फला क्रियाः ॥ – व्यास
शिरः प्रावृत्य कण्ठं वा मुक्तकच्छशिखोऽपि वा । अकृत्वा पादयोः शौचं आचान्तोऽप्यशुचिर्भवेत्॥ : आह्निकतत्त्वम्
शिखाच्छेदन का निषेध
अशौचान्तकृत्ये सर्वेषां वपनं नखलोमयोः। स्त्रीणां तु मुण्डनं नैव नखच्छेदनकेवलम्॥
मुखमूर्ध्निस्थितान् केशान् शिखावर्जन्तु वापयेत्॥ – बृहस्पति
शिखाछेदन का सर्वथा निषेध है। अशौचादि में मुंडन करते समय भी शिखा को छोड़कर ही मुंडन करना चाहिये। अर्थात् आशौचके अन्तमें सभी लोगोंको नख और बालोंको बनवाना चाहिए। स्त्रियोंका मुण्डन न कराकर केवल नख कटवा दें, तथा पुरुषोंके शिखाको छोड़कर मूछ, दाढ़ी तथा शिरके बाल बनवा देना चाहिए।
शिखां छिन्दन्ति ये मोहाद् द्वेषादज्ञानतोऽपि वा। तप्तकृच्छ्रेण शुध्यन्ति त्रयो वर्णा द्विजातयः॥ – हारीत
यदि किसी कारण से ज्ञाताज्ञात (जाने-अनजाने) शिखाछेदन हो जाये तो हारीत के वचनानुसार तप्तकृच्छ्र करने से प्रायश्चित अर्थात शुद्धि होती है।
शिखाप्रमाण
चतुरङ्गुलविस्तारं शिखामूलं द्विजन्मनः। राज्ञः पञ्चाङ्गुलं न्यासं वैश्यानां वै तथैव च॥
स्थापयेयुः शिरोमध्ये शिखां सर्वे द्विजातयः। स्वऋष्युक्तस्थले वाऽपि खल्वाटस्य न चोदित:॥
भारद्वाजस्मृति में ब्राह्मणके लिए शिखाका मूल चार अङ्गुल, क्षत्रिय, वैश्योंके लिए पांच अङ्गुल रहना चाहिए ऐसा कहा गया है। अपने ऋषियों द्वारा कहे गये स्थल पर सभी द्विजातीय शिरके मध्यमें शिखा रखें। जिसके शिर पर बाल नहीं है, उसके लिये यह नियम नहीं है।
खल्वाट्वादिदोषेण विशिखश्च्चेन्नरो भवेत्। कौशीं तदा धारयीत ब्रह्मग्रन्थियुतां शिखाम्॥
कार्येयं सप्तभिर्दर्भैर्धार्या श्रोत्रे तु दक्षिणे॥
शिखा के अभाव में
प्रतिनिधि विचारमें कहा गया है कि जो खल्वाट हैं अथवा जिनके शिखा नहीं हैं वे लोग कर्मकाल में दक्षिण कान पर ब्रह्मग्रंथिसे युक्त कुशाकी शिखाको अवश्य धारण करें।
“अथ चेत् प्रमादान्निशिखं वपनं स्यात् तत्र कौशीं शिखां ब्रह्मग्रन्थिसमन्वितां दक्षिणकर्णोपरि आशिखाबन्धादवतिष्ठेत् ॥” – काठकगृह्यसूत्र : यदि कोई मनुष्य प्रमादवश शिखासहित क्षौर (हजामत) करा ले तो वह ब्रह्मग्रन्थियुक्त कुशाकी शिखा बनाकर दाहिने कानपर तबतक रखे, जबतक बाँधनेयोग्य शिखा न बढ़ जाय ।
सप्तत्यूर्ध्वं तु चेत्तस्याः पूर्वतः पृष्ठतोऽपि वा। पार्श्वतः परितो वापि समुद्भूतैश्च रोमभिः ॥
शिखा कार्या प्रयत्नेन न चेन्नैवोपपद्यते । तत्स्थाने सर्वशून्ये तु परितो वापि किं पुनः ॥
ब्राह्मण्यसूचनायैवं तानि लोमानि धारयेत् । अन्यथा न भवेदेव तथा तस्मात्समाचरेत् ॥
आंगिरसस्मृति में शिखाहीन दोष उत्पन्न होने पर उसका उपाय बताते हुये कहा गया है : यदि सत्तर वर्षकी अवस्थाके बाद (वृद्धावस्था में) बाल झड़ जानेके कारण शिखा न रहे तो यथासम्भव चारों ओर बचे हुए बालोंसे शिखा बनाकर नित्यकर्म करता रहे । यदि बाल बिलकुल न हों तो कुशा आदिकी शिखा रखकर नित्यकर्म करे, पर शिखाशून्य कभी न रहे । (आंगिरसस्मृति ६१-६३)
खल्वाट्वादिदोषेण विशिखश्च्चेन्नरो भवेत्। कौशीं तदा धारयीत ब्रह्मग्रन्थियुतां शिखाम्॥
कार्येयं सप्तभिर्दर्भैर्धार्या श्रोत्रे तु दक्षिणे॥
पुनः अन्य प्रमाण में भी बताया गया है कि खल्वाटादि दोष के कारण यदि शिखाहीन हो जाये तो कुशाओं की शिखा बनाकर उसमें ग्रंथि लगाकर दाहिने कर्ण पर धारण करे। यह प्रमाण उस तर्क का भी खंडन करता है जिसमें अप्रमाणिक रूप से किसी बड़े कथित धर्मगुरु ने बताया था कि जब शिखा न हो तो सिर को वस्त्र से ढँक लेना चाहिये। वह कथन पूर्णतः शास्त्रविरुद्ध और प्रमाणरहित था और दुर्भाग्य है कि ऐसा व्यक्ति स्वयं को शंकराचार्य (विवादित) के रूप में घोषित करता है।
इसलिये कर्मकांडियों के लिये यह अनिवार्य हो जाता है कि भले ही वह स्वघोषित शंकराचार्य हो (अनेकों लोगों में स्वयं को शंकराचार्य घोषित कर रखा है) अथवा कोई अन्य ही क्यों न हो सप्रमाण जो सिद्ध करें वही स्वीकार्य होता है। प्रमाणरहित होने पर व्यवहार/परंपरा को ही ग्रहण करें, तर्क आदि को नहीं। तर्क की आवश्यकता परस्पर विरोधाभासी प्रमाणों का रहस्य ज्ञात करने के लिये होना चाहिये।
शिखा बंधन विधि
“शिखाग्रन्थिं विना कर्म न कुर्याद् वै कदाचन” – इस प्रकार सभी धार्मिक कर्मों में शिखा ग्रंथि को आवश्यक बताया गया है और जिसमें ग्रंथि नहीं रखना चाहिये उसका भी वर्णन किया गया है।
शिखीवच्छिखया भाव्यं ब्रह्मावर्तनिबद्धया । प्रदक्षिणं द्विरावर्त्य पाशान्तः सम्प्रवेशनात् ॥
प्रथमं द्विगुणं कृत्वा ब्रह्मावर्त मितीरितम् । गायत्रीजपनं निबन्धने ॥
कुर्याच्छिखायाश्च इति कौथुमि:
शिखा को दुगना करके प्रदक्षिण क्रम घुमाकर उसमें ब्रह्मग्रन्थि लगा दे। मयूर के शिखा के समान शिखा होनी चाहिये। पहले दुगना किया हुआ को ब्रह्मग्रन्थि कहा गया है। गायत्री मन्त्रका जप करते हुए शिखा को बाँधना चाहिये ।
विप्रादिकानां खलु मुष्टिमेयकेशाः शिखा स्यादधिका न तेन।
द्विधा त्रिधा वापि विभज्य बन्धो ह्यल्पास्ततोऽल्पापि न लम्बितानि ॥
ब्राह्मणों कि शिखा मुष्टि में आने योग्य होनी चाहिये। दुगना या तिगुना करके बाँधना चाहिये। शिखा बहुत अधिक लम्बी और छोटी भी न हो ।
गायत्त्र्या तु शिखां बद्ध्वा नैरृत्यां ब्रह्मरन्ध्रतः । जुटिकाञ्च ततो बद्ध्वा ततः कर्म्म समारभेत् ॥
अमन्त्रो दीयते ग्रन्थिर्जपो होमो वृथा भवेत् । स्मृत्वोङ्कारञ्च गायत्रीं निबध्नीयाच्छिखां ततः ॥ नागदेव
अमंत्रक शिखा ग्रंथि में दोष : प्रणव और गायत्री मन्त्र पढ़कर शिखा बाँधनी चाहिये । बिना मन्त्र पढ़े शिखा बाँधी गयी हो तो जप होम आदि निष्फल होता है।
शिखा बंधन मंत्र : 3 shikha bandhan mantra
विनम्र आग्रह : त्रुटियों को कदापि नहीं नकारा जा सकता है अतः किसी भी प्रकार की त्रुटि यदि दृष्टिगत हो तो कृपया सूचित करने की कृपा करें : info@karmkandvidhi.in
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।
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