धर्म और विज्ञान अर्थात धर्मकृत्य और वैज्ञानिक रहस्य – Dharm aur Vigyan

धर्म और विज्ञान अर्थात धर्मकृत्य और वैज्ञानिक रहस्य - Dharm aur Vigyan

वर्त्तमान युग में अनेकानेक व्यवस्थायें अपने अनुसार धर्म को रूपांतरित करने के प्रयास में रत हैं। राजनीति अपने अनुकूल धर्म को स्थापित करना चाहती है, लोकतंत्र अपने अनुसार बहुमत से निर्णय करके धर्म का निर्णय करना चाहती है इसी प्रकार विज्ञान भी यही प्रयास करता है। विज्ञान भी चाहता है कि धर्म शास्त्रों के आधार पर धार्मिक कृत्य न हों, वैज्ञानिक रहस्यों के आधार पर किये जायें जिसका सबसे प्रबल उदाहरण है फास्टिंग। इस आलेख में धर्म और विज्ञान अर्थात धर्माचरण और वैज्ञानिक रहस्य के भेद की चर्चा विस्तार से की गयी है।

विज्ञान ने व्रतादि को अस्वीकार किया किन्तु अब फास्टिंग को लाभकारी बता रहा है और किसी प्रकार फास्टिंग करो, 5 घंटे का करो, 12 घंटे का करो, 24 घंटे का करो आदि-आदि कह रहा है किन्तु यह नहीं कहता है कि सनातन शास्त्रों के अनुसार व्रत करो। इसी प्रकार संध्या, प्रातः स्नान आदि को धर्माचरण के रूप में स्वीकार नहीं करता किन्तु प्रातः काल सूर्योदय काल में सूर्य के किरणों का महत्व बताकर कुछ भी करते हुये सूर्य किरणों को प्राप्त करने का आग्रह करता है।

यदि आप कर्मकांड सीखना चाहते हैं तो आपको इस भ्रम का पहले ही निस्तारण कर लेना चाहिये कि विज्ञान से धर्म और कर्मकांड की सिद्धि करने की आवश्यकता है। धर्म और कर्मकांड की सिद्धि न तो विज्ञान से करने की आवश्यकता है न राजनीति से और न ही लोकतंत्र से अर्थात बहुमत द्वारा। अपराध का निर्धारण विज्ञान, राजनीति, बहुमत आदि से किया जायेगा अथवा अपराध विधान से किया जायेगा ? यदि घर के 10 में से 6 सदस्य किसी एक सदस्य के विरुद्ध मतदान कर दें तो क्या उसका रक्तसंबंध समाप्त हो जायेगा ? यदि DNA जांच द्वारा कोई पुत्र न सिद्ध हो तो क्या उसका पुत्रत्व समाप्त हो जायेगा ?

ऐसी आवश्यकता क्यों है ? क्योंकि वर्त्तमान में ऐसा ही देखा जा रहा है कि धर्म और धार्मिक कृत्यों की सिद्धि वैज्ञानिक आधार से करने की प्रथा का जन्म हो गया है।

फास्टिंग करने से इम्यून सेल बनता है इसलिये फास्टिंग करो, इसलिये सनातन में व्रत किया जाता है। हवन करने से वातावरण शुद्ध होता है इसलिये हवन करो और सनातन में इसीलिये सभी कर्मकांड में हवन किया जाता है, इसका वैज्ञानिक रहस्य है, आदि-इत्यादि। इन सभी स्थानों पर भिन्न-भिन्न प्रकार से धर्म और धर्मकृत्यों की पुष्टि करने का प्रयास किया जाता है, किन्तु मूल प्रश्न तो यह है कि इस प्रकार पुष्टि करने की आवश्यकता ही क्या है ?

  • यदि ये कहें कि नास्तिकों अथवा विधर्मियों के लिये तो क्यों ? उससे प्रमाणपत्र चाहिये क्या ?
  • धर्म और धर्मकृत्य हेतु विज्ञान/राजनीति/लोकतंत्र/राजनेता/विधर्मी/नास्तिकों से किसी प्रकार के प्रमाणपत्र की आवश्यकता क्या है ?

धर्म और धर्मकृत्य हेतु विज्ञान/राजनीति/लोकतंत्र/राजनेता/विधर्मी/नास्तिकों से किसी प्रकार के प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है

कर्मकांडी/कथावक्ता/ज्योतिषी आदि किसी को भी धर्म और धर्मकृत्य हेतु विज्ञान/राजनीति/लोकतंत्र/राजनेता/विधर्मी/नास्तिकों से किसी प्रकार के प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है, इस बात की गांठ बांध लेनी चाहिये। अन्यथा यदि आप उनके भ्रम के शिकार होते रहेंगे तो कल को वो उन सभी धर्म और धर्मकृत्यों का स्वरूप ही परिवर्तित कर देंगे। जो उनकी कसौटी पर सिद्ध नहीं होता उसे धर्म या धर्मकृत्य नहीं है यह भी सिद्ध कर देंगे तब शास्त्र का क्या होगा ?

किन्तु इस विषय को विस्तार से समझना भी आवश्यक है और जो कर्मकांडी/ज्योतिषी आदि बनना चाहते हैं उनके लिये तो अत्यावश्यक है कि वो इनमें से किसी के भी प्रमाणपत्र की अपेक्षा न रखे, मात्र शास्त्र में ही विश्वास रखे और विज्ञानसम्मत है ऐसा सिद्ध करने का प्रयास कदापि न करे।

वैज्ञानिक रहस्य का कुचक्र

वैज्ञानिक रहस्य एक मात्र कुचक्र है जिसमें कर्मकांडियों/ज्योतिषियों को फंसाया जा रहा है जिसका उद्देश्य धर्मशास्त्रों का खंडन करना ही है। इसको अनेकानेक उदाहरणों से समझना होगा :

वैज्ञानिक भाषा में फास्टिंग से इम्यून सेल बनता है अथवा और जो कुछ भी होता है यदि इस आधार से व्रत की सिद्धि करेंगे तो फिर ये कैसे सिद्ध करेंगे कि अमुक तिथि को ही व्रत करना चाहिये। फास्टिंग की सिद्धि करेंगे तो फिर उसमें जो कर्मकांड है उसकी सिद्धि किस विज्ञान से करेंगे कि अमुक व्रत में इस देवता की पूजा अमुक काल में करनी चाहिये।

एक बार को एकादशी की सिद्धि तो ज्योतिष व विज्ञान से सूर्य-चंद्र की स्थिति के आधार पर कर भी दी जाये किन्तु उदयव्यापिनी एकादशी को ही करे इसकी सिद्धि कैसे होगी ? अमुक एकादशी में अमुक वस्तु से पारण करे विज्ञान से इसकी सिद्धि कैसे करोगे ? अन्य व्रतों रामनवमी, कृष्णाष्टमी, जितिया, दुर्गाष्टमी, शिवरात्रि आदि की भी तो विज्ञान से सिद्धि करो और उसके विधि की भी, मंत्र की भी, देवता की भी, कथा की भी। और यदि विज्ञान से ही सब सिद्ध कर सकते हो तो वैज्ञानिक बनो कर्मकांडी नहीं।

शवदाह करने से बालों में सूक्ष्म जीवाणु आदि की वैज्ञानिक धारणा से यदि क्षौर कर्म की सिद्धि करोगे तो वह तत्क्षण की कर्तव्य होगा, दशवें दिन की सिद्धि कैसे करोगे ? वार्षिक श्राद्ध में, पितृपक्षीय श्राद्ध में क्षौरकर्म की विज्ञान से सिद्धि कैसे करोगे ? जो शवदाह में उपस्थित नहीं था उसके लिये क्षौरकर्म की सिद्धि विज्ञान से कैसे करोगे ? यदि 99.999% सिद्धि शास्त्र से करोगे तो 0.0001% की विज्ञान से क्यों सिद्धि करते हो ?

विज्ञान द्वारा यदि यह सिद्ध करो कि जप से मन एकाग्र होता है ठीक है, किन्तु अमुक मंत्र ही जपना चाहिये इसकी सिद्धि कैसे करोगे ? जप तो पप्पू-चप्पू भी किया जा सकता है मंत्र का ही जप क्यों करें ?

  • एकाग्रता की प्राप्ति हेतु जप करनी चाहिये तो जप की अन्य विशेष विधियों का प्रयोजन कैसे सिद्ध करोगे ?
  • आसन/आचमन/प्राणायाम/शिखा/चंदन आदि की सिद्धि विज्ञान से यत्र-तत्र करने का प्रयास किया जाता है किन्तु ये सभी कर्मकाल में ही करे इसकी सिद्धि कैसे करोगे ?
  • आसन को पैर से नहीं खिंसकाना चाहिये, आसन को लांघना नहीं चाहिये इसकी सिद्धि कैसे करोगे।
  • दिग्बन्धन की सिद्धि कैसे करोगे ?
  • शिखा के अभाव में कुशात्मक शिखा की सिद्धि कैसे करोगे ? सबके मंत्रों की सिद्धि कैसे करोगे ?
  • यदि ये कहकर आचमन की सिद्धि करो कि गला साफ होता है तो सबके लिये आचमन की समान विधि ही होनी चाहिये न। वर्णों के आधार पर आचमन के जल की मात्रा के अंतर की सिद्धि कैसे करोगे ?
  • स्त्रियों-कुमारों-शूद्रों के आचमन निषेध की सिद्धि कैसे करोगे ?
  • आचमन करते समय गिरने वाला जल शुद्ध होता है इसकी सिद्धि कैसे करोगे ?अंगुष्ठमूल से ही ओष्ठ मार्जन करना चाहिये और दो बार करनी चाहिये इसकी सिद्धि कैसे करोगे ?

हवन करने से वातावरण की शुद्धि होती है यदि विज्ञान से यह सिद्ध करने का प्रयास करोगे तो हवन की विधियों और मंत्रों की सिद्धि कैसे करोगे ? ब्राह्मण के अनिवार्यता की सिद्धि कैसे करोगे ? दक्षिण में ब्रह्मा, उत्तर में प्रोक्षणी-प्रणीता, अन्य वस्तुओं के आसादन, कब कुंड बनायें, कब वेदी बनायें, कैसे बनायें इसको विज्ञान से कैसे सिद्ध करोगे ? और यदि विज्ञान को यही सिद्ध करना है कि हवन से वातावरण की शुद्धि होती है तो विज्ञान ये भी कहे कि सबको, सभी देशों में, सभी संस्थानों में नित्यहवन करना चाहिये। जिन देशों में हवन नहीं होता वहां का वातावरण पूर्णतः अशुद्ध है विज्ञान ये भी कहे।

  • पूजा में नमः कहे, हवन में स्वाहा कहे और पितृकर्म में स्वधा कहे इसकी विज्ञान से कैसे सिद्धि करोगे ? पत्नी के वाम-दक्षिण का निर्धारण विज्ञान से कैसे करोगे ?
  • प्रत्येक कर्मकांड में ब्राह्मण अनिवार्य होते हैं इसकी सिद्धि विज्ञान से कैसे करोगे, यदि एक बार को यह मान लिया जाय कि यजमान को ज्ञान नहीं होता है, स्वयं कर्मकांडी भी करे तो भी ब्राह्मण अनिवार्य ही होता है विज्ञान से यह कैसे सिद्ध करोगे?
  • ब्राह्मण द्वारा किया गया जप-पाठ-पूजा-हवन का फल यजमान को ही प्राप्त होता है इसकी सिद्धि विज्ञान से कैसे करोगे ?

एक बार को कुशा के कुचालक होने का वैज्ञानिक आधार भले प्रस्तुत करो, किन्तु पवित्री तो स्वर्ण की भी होती है स्वर्ण कुचालक होता है क्या ? कुशा जो सुखी हो कुचालक हो सकती है किन्तु जो नयी-नयी हो अथवा कुशा के स्थान पर दूर्वा का प्रयोग करे तो कुचालक होने के वैज्ञानिक सिद्धांत का क्या होगा ?

शिवलिंग में रेडियेशन का वैज्ञानिक आधार रचते रहोगे तो मिट्टी आदि से बनाने वाले पूजा में किस रेडियेशन को सिद्ध करोगे ? अन्य देवताओं की पूजा में किस रेडियेशन को सिद्ध करोगे। गंगाजल को विज्ञान से विशेष सिद्ध कर सकते हो तो गंगा उच्चारण स्मरण को कैसे सिद्ध करोगे ?

रक्षाबंधन और होलिका भद्रा में न करे एक बार इसके पीछे वैज्ञानिक कारण ढूंढा जा सकता है किन्तु श्रावण पूर्णिमा को ही रक्षाबंधन करे और फाल्गुन पूर्णिमा को ही होलिका दहन करे क्या इसका वैज्ञानिक कारण बताया जा सकता है ?

इसी प्रकार से अनेकानेक विषय हैं जिसका शास्त्रोक्त सिद्धि से भिन्न आधार द्वारा सिद्धि करने पर खंडन होने लगेगा। इसलिये यदि आप कर्मकांडी/ज्योतिषी आदि बनना चाहते हैं तो शास्त्र से ही सिद्धि करें, विज्ञान/लोकतंत्र/राजनीति/तर्क आदि आधारों से नहीं।

कुच्रक का दुष्परिणाम

इन कुचक्रों का ही दुष्परिणाम है कि वर्त्तमान में धर्म से जुड़े होने का छलावा करने वाले सभी धारावाहिकों में बड़ी-बड़ी मूर्तियां दिखाई जा रही है जबकि घर में शास्त्र द्वादशाङ्गुल प्रतिमा ही स्थापित करने की आज्ञा देता है उससे अधिक प्रमाण की नहीं। उन्हीं धारावाहिकों में पति भी पत्नी का नाम ले रहा होता है और पत्नी भी पति का नाम लेती रहती है जो शास्त्र निषिद्ध है। पत्नी करवा चौठ करती है तो पति भी करता है, लेकिन किस शास्त्र से करता है यह कोई नहीं बता सकता।

  • जो पुरुष पत्नी की दीर्घायु कामना से करवा चौठ करते हैं उन्हें मांग में सिंदूर भी धारण करना चाहिये अथवा नहीं ?
  • विवाह में पुरुष ही सिंदूरदान ही क्यों करेगा, स्त्रियों को भी करना चाहिये अथवा नहीं, करवा चौठ करने वाले पुरुष इसका उत्तर दें।
  • मंगलसूत्र पत्नियां ही क्यों धारण करे, पति क्यों नहीं; करवा चौठ करने वाले पुरुष इसका उत्तर दें।
  • पति से करवा चौठ करवाने वाली महिलायें जब पुत्र के लिये जितिया व्रत करती है तो फिर उस दुधमुहें पुत्र से भी जितिया क्यों नहीं कराती ?
  • पुत्र और पुत्री में भेद नहीं होता है तो पुत्र को विदा करे और जमाताप्रवेश करे।
  • और जब यही सब करना हो अर्थात शास्त्र का उल्लंघन ही करना है तो धर्म/कर्मकांड कहकर न करे।

धर्म, कर्मकांड, ज्योतिष आदि का आधार शास्त्र है विज्ञान नहीं

जो भी कर्मकांडी/ज्योतिषी हैं अथवा बनना चाहते हैं उनको एक ही बात की गांठ बांधनी होगी कि धर्म, कर्मकांड, ज्योतिष आदि का आधार शास्त्र है विज्ञान नहीं। और जब आधार शास्त्र है तो सिद्धि भी शास्त्र से ही की जायेगी न की विज्ञान से, तर्क से, राजनीति से, लोकतंत्र (मतदान/बहुमत) से। शास्त्र के आधार से रहित होने पर धर्म/कर्मकांड/ज्योतिष सभी आधारविहीन होकर परिणामरहित भी हो जाते हैं अर्थात उनके करने और न करने का कोई महत्व नहीं होता है।

जो पत्नियां अपने पति से शास्त्रोलन्घन करते हुये करवा चौठ करवाती है उस पत्नी के करवा चौठ का भी कोई महत्व नहीं रह जाता। जो हवन का तात्पर्य वातावरण की शुद्धि समझते हैं उनके लिये हवन का कोई महत्व नहीं रह जाता अर्थात शास्त्रोक्त फल समाप्त हो जाता है।

सबसे बड़ी बात तो यह है कि यदि शास्त्रसिद्धि का त्याग कर विज्ञान से ही धर्म और धर्मकृत्यों की सिद्धि हो तो कर्मकांडी और ज्योतिषी की कोई आवश्यकता नहीं है। अर्थात जो कर्मकांडी/ज्योतिषी किसी शास्त्रीय विषय की शास्त्र से सिद्धि न कर विज्ञानादि से सिद्ध करने का प्रयास करते हों उसे कर्मकांडी या ज्योतिषी बनने का कोई अधिकार ही नहीं शेष रहता है।

विज्ञान द्वारा धर्म के कुछ विषयों की सिद्धि करने का प्रयास भी किया जाता है, जिससे ज्ञान की सीमाओं का विस्तार होता है और नई खोजों का मार्ग प्रशस्त होता है। यह प्रक्रिया न केवल वैज्ञानिक खोजों का आधार बनाती है, बल्कि मानवता के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ये उन विषय के ज्ञाताओं अर्थात वैज्ञानिकों का विषय हो सकता है, जो अपने अनुसंधान और प्रयोगों के माध्यम से किसी विशेष भेद को उजागर करते हैं। उनके द्वारा की गई खोजें नई तकनीकों, स्वास्थ्य संबंधी उपचार और पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान में सहायक सिद्ध होती हैं।

किन्तु कर्मकांडी या ज्योतिषी का विषय इसमें सम्मिलित नहीं है, क्योंकि उनका संबंध धर्म और शास्त्रों से होता है न कि विज्ञान से। कर्मकांडी या ज्योतिषी को धर्म एवं धर्मविषयक किसी भी विषय की वैज्ञानिक सिद्धि नहीं, बल्कि शास्त्रोक्त सिद्धि करनी चाहिए, जिसमें उनके द्वारा प्रस्तुत सिद्धांतों की सत्यता को शास्त्रोक्त प्रमाणों के माध्यम से प्रमाणित किया जाए। इस प्रकार, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से कर्मकांड या ज्योतिष का अध्ययन नहीं किया जा सकता, क्योंकि धर्म और धर्माचरण का आधार विज्ञान है ही नहीं, इसका आधार शास्त्र है।

यह भी महत्वपूर्ण है कि हम विज्ञान और धार्मिक विचारधारा के बीच इस भेद को स्पष्ट रूप से जाने-समझें और धर्म संबंधी निर्णय/विमर्श आदि करने के लिये धर्मशास्त्र को ही आधार बनाया करें न कि विज्ञान/राजनीति/तर्क आदि को।

निष्कर्ष : उपरोक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि धर्म और धर्मकृत्यों की प्रामाणिकता शास्त्र से सिद्ध होती है किसी अन्य विधि से नहीं। वर्त्तमान में विज्ञान द्वारा कुछ विषयों की सिद्धि करने का प्रयास किया जाता है ये उन विषय के ज्ञाताओं अर्थात वैज्ञानिकों का विषय हो सकता है किन्तु कर्मकांडी या ज्योतिषी का विषय नहीं है। कर्मकांडी/ज्योतिषी को धर्म एवं धर्मविषयक किसी भी विषय की वैज्ञानिक सिद्धि नहीं शास्त्रोक्त सिद्धि करनी चाहिये।

विनम्र आग्रह : त्रुटियों को कदापि नहीं नकारा जा सकता है अतः किसी भी प्रकार की त्रुटि यदि दृष्टिगत हो तो कृपया सूचित करने की कृपा करें : info@karmkandvidhi.in

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।


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